Wednesday, April 22, 2015

उत्तरकाशी से दिल्ली वाया मसूरी

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3 अप्रैल 2015
हम उत्तरकाशी से तीन किलोमीटर आगे गंगोत्री की तरफ थे। सुबह आठ बजे सोकर उठे। गीजर था ही, नहा लिये। आज दिल्ली पहुंचना है, जो यहां से 400 किलोमीटर से भी ज्यादा है। सामान पैक कर लिया। जब कमरे से निकलने ही वाले थे तो मन में आया कि एक बार बालकनी में खडे होकर बाहर का नजारा देखते हैं। बालकनी का दरवाजा खोला तो होश उड गये। बारिश हो रही थी। हवा नहीं चल रही थी और बिल्कुल सीधी बारिश हो रही थी। अगर पहाडों पर सुबह सवेरे बारिश होती मिले तो समझना कि हाल-फिलहाल रुकने वाली नहीं है। और उधर हम भी नहीं रुक सकते थे। रेनकोट पहने और नौ बजे तक बारिश में ही चल दिये।
मैंने पहले भी बताया था कि जब हम धरासू बैंड से उत्तरकाशी आये थे तो वो रास्ता कहीं कहीं बडा खराब था। अब बारिश की वजह से उस पर फिसलन हो गई थी या फिर गड्ढों में पानी भर गया था। बडी मुश्किल हुई इस पर चलने में। फिर भी डेढ घण्टे में धरासू बैंड पहुंच गये। यहां के आलू के परांठे हमें बहुत पसन्द आये थे। इस बार दोनों ने दो-दो परांठे मारे।

Monday, April 20, 2015

डोडीताल यात्रा- मांझी से उत्तरकाशी

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पूरी रात मुझे नींद नहीं आई। इसके कई कारण थे। पहला तो कारण था वो सस्ते वाला स्लीपिंग बैग जो मैं कुछ दिन पहले पठानकोट से लाया था। पठानकोट जब हम गये थे, तो स्टेशन के बाहर बाजार में गर्म कपडों की बहुत सारी दुकानें हैं। उनमें स्लीपिंग बैग बाहर ही रखे थे। मैंने देखना शुरू किया तो एक स्लीपिंग बैग पसन्द आ गया। इसका साइज बहुत छोटा था, बहुत हल्का था और 1200 रुपये का था। इसमें पंख भरे थे। ले लिया। इसका परीक्षण करने को इसे मैंने ही इस्तेमाल किया। लेकिन यह मेरी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। गौरतलब है कि मुझे सर्दी कम लगती है। फिर भी मैं ठण्ड से कांपता रहा। पैर बर्फ से हुए रहे। दूसरा कारण था कि मेरे नीचे मैट्रेस नहीं थी। हमारे पास एक ही मैट्रेस थी और वो निशा को दे रखी थी। मुझे नीचे से भी बहुत ठण्ड लगी। पहले तो लगा था कि शरीर की गर्मी से जमीन का वो टुकडा भी गर्म हो जायेगा और ठण्ड नहीं लगेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुल मिलाकर नींद नहीं आई।

Friday, April 17, 2015

डोडीताल यात्रा- अगोडा से मांझी

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1 अप्रैल 2015
अगोडा की समुद्र तल से ऊंचाई 2100 मीटर है जबकि डोडीताल 3200 मीटर पर। दूरी लगभग 12 किलोमीटर है। आजकल डोडीताल तक आवाजाही तो है लेकिन उतनी नहीं है। अगोडा में होटल वाले ने पहले ही बता दिया था कि मांझी के बाद बहुत ज्यादा बर्फ है, रास्ता मुश्किल है। फिर खाने का भी भरोसा नहीं था। इसलिये यहीं से आलू के चार परांठे भी पैक करा लिये। पेटभर खा तो लिये ही थे।
पौने नौ बजे यहां से चल पडे। गांव से निकलते ही एक पगडण्डी दाहिने नीचे की तरफ उतर जाती है। यह आगे नदी पार करके उस तरफ ऊपर चढती है। उधर गुज्जरों के कुछ ठिकाने दिख रहे थे, यह उन्हीं ठिकानों पर जाती होगी। अगर उधर ऊपर चढते जायें तो आखिरकार दयारा बुग्याल पर पहुंच जायेंगे। दयारा पर आजकल खूब बर्फ थी।

Wednesday, April 15, 2015

डोडीताल यात्रा- उत्तरकाशी से अगोडा

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31 मार्च 2015
दोपहर बाद दो बजे हम उत्तरकाशी से पांच किलोमीटर आगे गंगोरी में थे। यहां असी गंगा पर पुल बना हुआ है। यहीं से डोडीताल का रास्ता अलग हो जाता है। दस किलोमीटर आगे संगमचट्टी तक तो सडक बनी है, उसके बाद 23 किलोमीटर पैदल चलना पडता है, तब हम डोडीताल पहुंच सकते हैं।
गंगोरी में एक जीप वाले से संगमचट्टी के रास्ते की बाबत पूछा तो उसने बताया कि यह रास्ता बहुत खराब है। बाइक जानी भी मुश्किल है, आप बाइक यहीं खडी कर दो और संगमचट्टी के लिये टैक्सी कर लो। हम अभी थोडी ही देर पहले धरासू बैंड से उत्तरकाशी आये थे। वहां भी कई जगह बडी खराब सडक थी। हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और कहा- उससे भी ज्यादा खराब सडक मिलेगी क्या? और बाइक पर ही चल पडे।

Monday, April 13, 2015

डोडीताल यात्रा- दिल्ली से उत्तरकाशी

30 मार्च 2015
डोडीताल का तो आपने नाम सुना ही होगा। नहीं सुना होगा तो कोई बात नहीं। आप स्वयं ही गूगल पर सर्च करेंगे कि डोडीताल क्या है। इस बार मैं नहीं बताऊंगा कि यह क्या है, कहां है, कैसे जाया जाता है। बस, चलता जाऊंगा और लौट आऊंगा। आपको अन्दाजा हो जायेगा।
दिल्ली से दोनों मियां-बीवी निकल पडे सुबह छह बजे। बाइक पर सामान बांधा और चल दिये। सामान भी बहुत ज्यादा हो गया। आखिर ट्रेकिंग थी और अभी ट्रेकिंग का मौसम शुरू नहीं हुआ था इसलिये टैंट भी ले लिया, स्लीपिंग बैग भी ले लिया, ढेर सारे गर्म कपडे ले लिये और कुछ नमकीन बिस्कुट भी। दो रकसैक थे- एक मेरे लिये, एक निशा के लिये।

Friday, April 3, 2015

अमृतसर के फोटो

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मैं पहले अमृतसर तो आ चुका था लेकिन घूमा पहली बार। स्टेशन से ऑटो लिया और सीधे पहुंचे स्वर्ण मन्दिर। अब ये किया, वो किया; ऐसा नहीं लिखूंगा। स्वर्ण मन्दिर अच्छा लगा। यहां से बाहर निकलकर सामने ही जलियांवाला बाग है, वहां पहुंचे। यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि जलियांवाला बाग का यह नाम इसलिये पडा क्योंकि यह किसी जिले सिंह या पंजाबी लहजे में कहें तो जल्ले सिंह का बाग था। इसी से इसे जल्लेयां वाला बाग कहते थे जो धीरे धीरे जलियांवाला बाग हो गया। बाद में जब वो नरसंहार हुआ तो देशभक्तों ने स्मारक बनाने के लिये इसे खरीद लिया और इसे स्मारक बना दिया।

Wednesday, April 1, 2015

डलहौजी के नजारे

डलहौजी का क्या यात्रा वृत्तान्त लिखूं? इतना प्रसिद्ध पर्यटक स्थान... मैं यहां पहली बार गया। आप सभी जा चुके होंगे। ऐसे स्थानों पर पहली बात कि मेरा जाने का ही मन नहीं करता और दूसरी बात कि वापस आकर यात्रा वृत्तान्त लिखने का भी मन नहीं करता। लेकिन कुछ तो लिखना पडेगा।
विवाह हुआ, हम दो हो गये। तो क्या हुआ? घुमक्कडी मेरा पहला प्रेम है, शौक है, इसे नहीं छोडा जा सकता। घरवाली को यह सब समझाने की आवश्यकता ही नहीं पडी। उसने पहले ही कह दिया था कि जहां तू, वहां मैं। वह मेरे लेख भी पढती है, इसका अर्थ है कि घूमने की इच्छा उसकी भी होती है। अब मुझे देखना था कि इसकी सीमा कहां तक है? किस तरह की यात्रा में यह बोर होगी। मुझे रेलयात्राएं भी करनी हैं, बस यात्राएं भी करनी हैं, ट्रेकिंग भी करनी है और ऊल-जलूल स्थानों पर भी जाना है। भूखा भी रहना है, कई कई दिन का एक ही दिन में भी खाना है, जगना भी है, खूब सोना भी है। साफ सुथरे कपडे पहनने हैं तो एक ही जोडी कपडों में दस दिन भी निकालने हैं। उसकी सीमा कहां तक है, यही मुझे देखना था। फिर कुछ उसे परिवर्तित होना है, कुछ मुझे।

Monday, March 30, 2015

कच्छ यात्रा का कुल खर्च

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12 जनवरी 2015 की सुबह दिल्ली से निकल पडा था। पहले दिन बाइक में 700 रुपये का पेट्रोल भरवाया। घर से खाकर चला था, दोपहर को नीमराना अशोक भाई के यहां खा लिया और शाम को पहुंच गया विधान के यहां। इस तरह इस दिन कोई खर्च नहीं हुआ। अब चर्चा करते हैं इस यात्रा के कुल खर्च की:

12 जनवरी:
पेट्रोल (दिल्ली) 700 रुपये

Friday, March 27, 2015

कच्छ से दिल्ली वापस

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अब बारी थी दिल्ली लौटने की। दिल्ली अभी भी 1000 किलोमीटर से ज्यादा थी और मेरे पास थे दो दिन। यानी प्रतिदिन 500 किलोमीटर के औसत से चलना पडेगा जोकि बाइक से कतई भी आसान नहीं है। उस पर भी आखिर के ढाई सौ किलोमीटर यानी जयपुर से आगे का रास्ता और ट्रैफिक जान निकाल देने वाला होगा। चलिये, देखते हैं क्या होगा?
रापर से चला मैं सुबह साढे नौ बजे। पहली गलती। बल्कि पहली क्या... हमेशा की तरह आज भी गलती की कि इतनी देर से चला। सात बजे ही निकल जाना चाहिये था, अब तक सौ किलोमीटर दूर जा चुका होता। लेकिन रापर मुझसे भी सुस्त निकला। कोई दुकान खुली नहीं मिली, भूखे पेट ही निकलना पडा।

Monday, March 23, 2015

धोलावीरा- 2

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पिछली बार आपको धोलावीरा के पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व के बारे में बताया था, आज वहां की यात्रा करते हैं। यात्रा वृत्तान्त लिखते हैं। खास बात यह है कि धोलावीरा जाने का रास्ता भी कच्छ के सुन्दरतम रास्तों में से एक है। इसी वजह से कच्छ जाने वाला हर आदमी धोलावीरा की भी योजना बनाता है।
भचाऊ में प्रभु आहिर ने बताया कि आप पहले एकल माता जाओ, वहां से दसेक किलोमीटर रन में चलना पडेगा और आप सीधे धोलावीरा पहुंच जाओगे। असल में धोलावीरा एक टापू पर स्थित है। इस टापू को खडीर बेट कहते हैं। इसके चारों तरफ समुद्र है जो बारिश के मौसम में भर जाता है और सर्दियां आते आते सूखने लगता है जैसा कि पूरे रन में होता है। गर्मियों में यह इतना सूख जाता है कि इस ‘समुद्र’ को आप गाडियों से भी पार कर सकते हैं। प्रभु ने कहा कि तुम एकल माता से सीधे रन में उतर जाना और सीधे चलते जाना। खडीर बेट आयेगा, तो वहां जल्दी ही आपको धोलावीरा वाली सडक मिल जायेगी जिससे आप धोलावीरा जा सकते हो।

Friday, March 20, 2015

धोलावीरा- सिन्धु घाटी सभ्यता का एक नगर

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पहले धोलावीरा का थोडा सा परिचय दे देता हूं, फिर वहां घूमने चलेंगे। इतिहास की किताब में आपने पढा होगा- मैंने भी पढा है- कि कोई सिन्धु घाटी सभ्यता थी। इसका प्रमुख नगर हडप्पा था, इसलिये हडप्पा सभ्यता भी कहते हैं। मुझे याद है कि जब सातवीं-आठवीं में मास्टरजी इतिहास की किताब पढवाया करते थे तो कई सहपाठी हडप्पा शब्द को हडम्पा पढते थे। गौरतलब है कि हमारे यहां किसी महिला को नालायक कहने की बजाय हडम्पा कह देते हैं।
खैर, हडप्पा के साथ एक और स्थान के बारे में हम पढते थे- वो है मोहनजोदडो। ये दोनों स्थान अब पाकिस्तान में हैं इसलिये हमारे लिये उतने सुलभ नहीं हैं। लेकिन कुछ स्थान ऐसे हैं जो उसी काल के हैं, उसी तरह के लोग वहां बसते थे, उसी तरह का आचरण था, वही नगर व्यवस्था थी और आज वे भारत में हैं। इनमें कुछ नाम हैं- धोलावीरा, कालीबंगा, लोथल और रोपड। रोपड तो आज का रूपनगर है जो पंजाब में है। स्थानीय लोग इसे अभी भी रोपड ही कहते हैं- रोप्पड। कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ जिले में है जो पीलीबंगा रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूर स्थित है। लोथल और धोलावीरा दोनों गुजरात में हैं। इनके अलावा और भी कई नाम हैं जो कम प्रसिद्ध हैं। इनमें कुछ हरियाणा में हैं, कुछ उत्तर प्रदेश में हैं।

Wednesday, March 18, 2015

माण्डवी बीच पर सूर्यास्त

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शाम साढे पांच बजे हम तीनों माण्डवी पहुंच गये। सुमित और गिरधर पहले ही काफी लेट हो चुके हैं, इसलिये उन्हें इन्दौर के लिये आज ही निकलना पडेगा जबकि मेरा इरादा आज यहीं माण्डवी में रुकने का है। कुछ देर बाद सूर्यास्त हो जायेगा, फिर अन्धेरा हो जायेगा, इसलिये माण्डवी मैं कल देखूंगा- ऐसा सोचा।
सीधे समुद्र तट पर पहुंच गये। शहर में काफी भीड थी, लेकिन समुद्र तट अच्छा लगा। भूख लगी हो, आप कच्छ में हों और दाबेली न खायें, तो बेकार है। लेकिन हमने स्वयं को बेकार नहीं होने दिया। दबा के दाबेली खाईं।

Monday, March 16, 2015

यात्रा में आनन्द कैसे लें?

वैसे तो आपको यात्राएं करने में आनन्द आता है, अच्छा लगता है, मन-मस्तिष्क तरोताजा हो जाता है लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? याद कीजिये जब आप पिछली बार कहीं गये थे, तो क्या सोचकर गये थे और वहां जाकर क्या वो सब मिला? सोचिये एक बार। बडी सिरदर्दी का काम होता है। पहले तो घर पर इतनी योजनाएं बनाओ, इतना सबकुछ सोचो; फिर वहां जाकर भी सारा समय योजनाएं बनाने में चला जाता है। बस, यही काम रह जाता है हमें- योजनाएं बनाते रहो, प्लानिंग करते रहो। नौकरी में भले ही मैनेजर न बन पायें हों, लेकिन यहां हम हमेशा मैनेजर होते हैं।

Friday, March 13, 2015

पिंगलेश्वर महादेव और समुद्र तट

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मुझे पिंगलेश्वर की कोई जानकारी नहीं थी। सुमित और गिरधर के पास एक नक्शा था जिसमें नलिया और कोठारा के बीच में कहीं से पिंगलेश्वर के लिये रास्ता जाता दिख रहा था। मोबाइल में गूगल मैप में दूरी देखी, मुख्य सडक से 16 किलोमीटर निकली। तय कर लिया कि पिंगलेश्वर भी जायेंगे। बाइक का फायदा।
एक बजे नारायण सरोवर से चल पडे और सवा दो बजे तक 70 किलोमीटर दूर नलिया पहुंच गये। सडक की तो जितनी तारीफ की जाये, उतनी ही कम है। नलिया में कुछ समय पहले तक रेलवे स्टेशन हुआ करता था। उस जमाने में भुज से मीटर गेज की लाइन नलिया आती थी। गेज परिवर्तन के बाद भुज-नलिया लाइन को परिवर्तित नहीं किया गया और इसे बन्द कर दिया गया। अब यह लाइन पूरी तरह खण्डहर हो चुकी है और इस पर पडने वाले स्टेशन भी। उस समय तक नलिया भारत का सबसे पश्चिमी स्टेशन हुआ करता था। इसे देखने की मेरी बडी इच्छा थी लेकिन शानदार सडक और इस पर बाइक चलाने के आनन्द के आगे यह इच्छा दब गई। नलिया ‘फिर कभी’ पर चला गया।

Wednesday, March 11, 2015

कोटेश्वर और नारायण सरोवर

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18 जनवरी 2015
लखपत से नारायण सरोवर की दूरी करीब 35 किलोमीटर है। किले से निकलते ही एक सडक तो बायें हाथ भुज चली जाती है और एक दाहिने वाली जाती है नारायण सरोवर। नारायण सरोवर से दो किलोमीटर आगे कोटेश्वर है।
जैसा कि कई अन्य स्थानों पर भी कथा प्रचलित है कि रावण ने तपस्या करी, शिवजी प्रसन्न हुए और शिवलिंग के रूप में रावण के साथ लंका जाने लगे। लेकिन शर्त लगा दी कि अगर शिवलिंग को जमीन पर रख दिया तो फिर उठाये नहीं उठूंगा। ऐसा ही कोटेश्वर में हुआ। रावण को लघुशंका लगी और शिवजी यहीं पर विराजमान हो गये। अब वर्तमान में मानचित्र देखें तो सन्देह होता है कि रावण शिवजी को कैलाश से ला रहा था या पुरुषपुर से। कैलाश-लंका के बीच में कोटेश्वर दूर-दूर तक भी नहीं आता।

Monday, March 9, 2015

लखपत-2

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कल यहां हमें डरा दिया गया था कि ये मत करना, वो मत करना, सीमावर्ती इलाका है, बीएसएफ का बहुत दबाव है; तो हम लखपत किले के अन्दर ज्यादा घूमते हुए डर रहे थे कि कहीं बेवजह की पूछताछ न होने लगे। लेकिन जब सेना के जवान गुरुद्वारे में आये, साथ बैठकर आलू काटे तो उन्होंने बडी काम की बातें बताईं। उन्होंने बताया कि आप पूरे किले में कहीं भी घूम सकते हो। उधर बीएसएफ की चौकी है, वहां भी जा सकते हो; कोई दिक्कत नहीं है। हमारा हौंसला बढा और हमने गुरुद्वारे से निकलकर सबसे पहले उस चौकी पर ही जाना उचित समझा।
मोटरसाइकिलें स्टार्ट कीं और लखपत के खण्डहरों से होते हुए सीधे बीएसएफ की चौकी के नीचे जा रुके। किलों की दीवारों पर जगह जगह काफी बडी जगह होती है जहां से चारों तरफ की रखवाली की जा सके। पता नहीं इसे क्या कहते हैं, शायद परकोटा कहते हैं। ऐसी ही एक जगह पर बीएसएफ की चौकी है। सीढियों से ऊपर चढे तो वहां दो जवान थे। एक जाट जींद का और दूसरा मराठा बुलढाणा का- जाट-मराठा संगम। हमसे पहले वहां एक घुमक्कड परिवार भी था। उनके जाने के बाद हमने जवानों से जी भरकर बातें कीं। जवानों ने कह दिया कि हमारा फोटो छोडकर चारों तरफ के जितने भी जैसे भी फोटो ले सको, ले लो।

Friday, March 6, 2015

लखपत में सूर्यास्त और गुरुद्वारा

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17 जनवरी 2015
साढे तीन बजे हम थान मठ से निकल गये। अब जाना था हमें लखपत। यह भारत के सबसे पश्चिमी कुछ गांवों में से एक है और दुनिया का सर्वप्रथम गुरुद्वारा भी यहीं है। पश्चिमी होने के कारण यहां का सूर्यास्त देखना बनता था। इसलिये हमें छह बजे से पहले लखपत पहुंच जाना था।
शीघ्र ही हम भुज-लखपत मुख्य सडक पर थे। खाली चौडी सडक पर जब हम 70 की रफ्तार से बढे जा रहे थे, तो हमें एक ऐसी चीज दिखी कि आपातकालीन ब्रेक लगाने पडे। यह था- कर्करेखा यहां से गुजरती है। मैंने पहले भी कहा था कि अपनी इस यात्रा में मुझे कई बार कर्करेखा पार करनी पडी। हिम्मतनगर-अहमदाबाद के बीच, भुज-खावडा के बीच, खावडा-नखत्राणा के बीच, नखत्राणा-लखपत के बीच, लखपत-नलिया के बीच और भचाऊ-रापर के बीच। लेकिन सूचना-पट्ट सिर्फ यहीं पर दिखा। सडक पर सफेद रेखा भी खिंची थी कि यह है कर्करेखा।

Wednesday, March 4, 2015

थान मठ, कच्छ

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फॉसिल पार्क से डेढ-दो किलोमीटर आगे थान मठ है। एक धर्मनाथ नाम के योगी थे जिन्होंने बारह वर्ष तक सिर के बल खडे होकर तपस्या की थी। कहते हैं कि उनकी तपस्या से भगवान प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा। उन्होंने वर तो मांगा नहीं, बल्कि अ-वर मांग लिया- मैं सीधा होकर जहां भी देखूं, वो स्थान बंजर हो जाये। भगवान ने कहा तथास्तु और कच्छ का एक बडा इलाका बंजर हो गया।
यह मठ एक पहाडी के नीचे बना हुआ है। इस पहाडी का नाम है धीणोधार पहाडी। यह एक ज्वालामुखी था जो अब सुप्त हो चुका है। सैटेलाइट से देखने पर इसकी चोटी पर ज्वालामुखी जैसा मुख भी दिखता है हालांकि लाखों साल बीत जाने के कारण काफी टूट-फूट हो चुकी है। ऊपर पहाडी पर भी एक मन्दिर बना है जहां केवल पैदल ही जाया जा सकता है। एक रास्ता तो यहां मठ से ही है जो लम्बा है। इसके अलावा दूसरा रास्ता पहाडी के दूसरी तरफ से है जो छोटा और सुविधाजनक है। समयाभाव के कारण हम वहां नहीं जा पाये। कच्छ आने का दूसरा बहाना मिल गया।

Monday, March 2, 2015

डायरी के पन्ने- 30 (विवाह स्पेशल)

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।

1 फरवरी: इस बार पहले ही सोच रखा था कि डायरी के पन्ने दिनांक-वार लिखने हैं। इसका कारण था कि पिछले दिनों मैं अपनी पिछली डायरियां पढ रहा था। अच्छा लग रहा था जब मैं वे पुराने दिनांक-वार पन्ने पढने लगा।
तो आज सुबह नाइट ड्यूटी करके आया। नींद ऐसी आ रही थी कि बिना कुछ खाये-पीये सो गया। मैं अक्सर नाइट ड्यूटी से आकर बिना कुछ खाये-पीये सो जाता हूं, ज्यादातर तो चाय पीकर सोता हूं।। खाली पेट मुझे बहुत अच्छी नींद आती है। शाम चार बजे उठा। पिताजी उस समय सो रहे थे, धीरज लैपटॉप में करंट अफेयर्स को अपनी कापी में नोट कर रहा था। तभी बढई आ गया। अलमारी में कुछ समस्या थी और कुछ खिडकियों की जाली गलकर टूटने लगी थी। मच्छर सीजन दस्तक दे रहा है, खिडकियों पर जाली ठीकठाक रहे तो अच्छा। बढई के आने पर खटपट सुनकर पिताजी भी उठ गये।
सात बजे बढई वापस चला गया। थोडा सा काम और बचा है, उसे कल निपटायेगा। इसके बाद धीरज बाजार गया और बाकी सामान के साथ कुछ जलेबियां भी ले आया। मैंने धीरज से कहा कि दूध के साथ जलेबी खायेंगे। पिताजी से कहा तो उन्होंने मना कर दिया। यह मना करना मुझे बहुत खराब लगा। बेड पर बैठे थे, नीचे आंखें गडाये हुए गर्दन हिला दी; बस।

Friday, February 27, 2015

फॉसिल पार्क, कच्छ

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17 जनवरी 2015
अब हमारा लक्ष्य था लखपत। खावडा से लखपत जाने के लिये भुज जाने की आवश्यकता नहीं है। उससे पहले ही एक ग्रामीण रास्ता सीधा नखत्राणा जाता है। भीरंडीयाला से 27 किलोमीटर भुज की तरफ चलने पर यह रास्ता दाहिने मुडता है। हम इसी पर हो लिये। इस रास्ते पर निरोना, बीबर आदि गांव आते हैं। देवीसर से कुछ पहले एक रास्ता दाहिने जाता है। यह आगे फॉसिल पार्क और थान मोनेस्ट्री चला जाता है। मेरी इच्छा इन दोनों स्थानों को देखने की थी।
आपको फॉसिल पार्क का पता भी नहीं चलेगा अगर आप सावधान न हुए। मैंने पहले ही गूगल मैप का अध्ययन कर रखा था इसलिये मालूम था कि उस मोड के पास यह पार्क है। जैसे ही वह मोड आया, हमारी रफ्तार कम हो गई। झाडियों में इसका एक सूचना-पट्ट लगा था, हमने तुरन्त बाइक उधर ही मोड दी।

Wednesday, February 25, 2015

इण्डिया ब्रिज, कच्छ

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इण्डियाब्रिज काला डोंगर से लगभग 20 किलोमीटर दूर है। उनकी बुलेट में पेट्रोल कम था। पेट्रोल पम्प खावडा में था जोकि इण्डियाब्रिज के विपरीत दिशा में है। तय हुआ कि अगर रास्ते में पेट्रोल समाप्त हो गया तो वे मेरी बाइक से निकालेंगे। मैं राजी था। हालांकि इसकी आवश्यकता नहीं पडी।
आप कच्छ का नक्शा देखेंगे तो इसकी पूरी उत्तरी सीमा पाकिस्तान से मिलती है। लेकिन सीमा के इस तरफ एक बहुत बडा प्राकृतिक अवरोध भी है। यह है कच्छ का विशाल रन जहां साल में ज्यादातर समय पानी भरा रहता है या दलदल रहता है। इसी में एक उपयुक्त स्थान पर सडक भी निकाली गई है जो बिल्कुल सीमा तक जाती है। यह वही सडक है। यह भुज से वीघाकोट को जोडती है। वीघाकोट सीमावर्ती चौकी है। लेकिन आम नागरिकों के लिये सीमा तक जाना सरल नहीं होता। उससे कुछ ही पहले तक बेरोकटोक जाया जा सकता है, फिर आगे जाने के लिये परमिट लेना होता है।

Monday, February 23, 2015

काला डोंगर- कच्छ का उच्चतम स्थान

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16 जनवरी 2015
खावडा से काला डूंगर की दूरी करीब बीस किलोमीटर है। आठ किलोमीटर आगे एक तिराहा है जहां से एक सडक तो सीधी चली जाती है और एक दाहिने मुड जाती है। यही दाहिने वाली काला डूंगर जाती है। सीधी सडक इण्डिया ब्रिज होते हुए विघाकोट जाती है। विघाकोट अर्थात भारत-पाक सीमा। विघाकोट जाने के लिये भुज से आज्ञापत्र बनवाना होता है। उसकी चर्चा अभी बाद में करेंगे जब इण्डिया ब्रिज चलेंगे। अभी फिलहाल काला डूंगर चलते हैं। चलिये, दाहिनी तरफ मुड जाते हैं।
एक गांव आता है और इसे पार करते ही सडक पतली सी हो जाती है। चूंकि काला डूंगर कच्छ की सबसे ऊंची चोटी है तो यहां जाने के लिये कुछ चढाई भी करनी पडेगी। शीघ्र ही चढाई भी शुरू हो जाती है लेकिन यह छोटी सी चढाई काफी ‘ट्रिकी’ है। फिर साढे चार सौ मीटर की ऊंचाई पर जाकर दत्तात्रेय मन्दिर के पास चढाई समाप्त हो जाती है। पौने छह बज चुके थे। सूर्यास्त में अभी देर थी। उधर ‘देश’ में सूर्यास्त हो चुका होगा, यहां यह काम देर से होता है। काफी पर्यटक कैमरे लिये सूर्यास्त को कैद करने के लिये तैयार खडे थे।

Friday, February 20, 2015

सफेद रन

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16 जनवरी 2015
बारह बज चुके थे और मैं भुज में था। अभी तक कुछ खाया भी नहीं था। सुबह पच्चीस-तीस रुपये की पूरी-सब्जी खाई थीं एक ठेले पर। ठेला समझकर यह मत सोचना कि मैं गन्दगी में जा घुसा। गन्दगी वाला ठेला होता तो दस रुपये में ही काम चल जाता। वह लडका पार्ट टाइम के तौर पर सुबह नाश्ते के लिये पूरी-सब्जी बेचता है, बाद में कुछ और काम करता है। सफाई अच्छी थी। दो तरह की आलू की सब्जियां थीं- सूखी और तरीदार। दोनों में फर्क बस इतना ही था कि एक में तेल कुछ कम था, दूसरी में तेल ही तेल था। गुजराती सब्जियों में लगता है पानी की बजाय तेल डाला जाता है। इतना तेल हो जाता है कि अगर आप एक कटोरी आलू की तरीदार सब्जी में से आलू खा जायें तो आधा कटोरी तेल बचा रहेगा। उधर हम दिल्ली वालों के लिये तेल का बडा परहेज होता है।
हां, तो मैं कह रहा था कि बारह बज गये थे। आज मुझे काला डूंगर जाना था जो यहां से करीब सौ किलोमीटर दूर है। अर्थात ढाई तीन घण्टे लगेंगे। रास्ते में कहीं रुककर खाना भी खाना था तो चार घण्टे लगेंगे। पांच बजे के बाद दिन छिपना शुरू हो जायेगा। हालांकि यह भारत का पश्चिमतम इलाका है, दिन यहां देर से छिपता है।

Wednesday, February 18, 2015

भुज के दर्शनीय स्थल

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16 जनवरी 2015
कल जब सोया था तो योजना थी कि आज पहले माण्डवी जाऊंगा और वहां से फिर लखपत के लिये निकल जाऊंगा। लेकिन इसके लिये सुबह जल्दी उठना पडता और यही अपनी कमी है। साढे आठ बजे उठा। सूरज सिर पर चढ आया था। माण्डवी के लिये काफी विलम्ब हो चुका था। फिर आज ही लखपत जाना सम्भव नहीं था। जाता भी तो भागमभाग करनी पडती और अन्धेरे में भी बाइक चलानी पडती। रास्ता भी पता नहीं कैसा हो। इसलिये अब माण्डवी जाने का विचार छोड दिया। इसके बजाय अब काला डूंगर जाऊंगा।
काला डूंगर जाऊंगा तो वापसी में भुज नहीं आऊंगा। पहले मुझे क्लोकवाइज कच्छ देखना था, अब एण्टी-क्लोकवाइज देखूंगा। रूट वही रहेगा। वापस भुज नहीं आऊंगा। इसलिये भुज शहर में जो दर्शनीय स्थल हैं, उन्हें अभी ही देख लेता हूं। कमरे का ताला लगाया, बाइक यहीं छोडकर पैदल ही निकल पडा।

Monday, February 16, 2015

फोटोग्राफी चर्चा- 2

बडी बेइज्जती हो रही है फोटोग्राफी चर्चा करने में। कारण यही है कि मैं भद्दे तरीके से चर्चा करता हूं। बात तो ठीक है लेकिन करूं भी क्या? हमेशा कहता आया हूं कि आप जो भी फोटो भेजते हो, उसके बारे में चार लाइनें भी लिखकर भेज दिया करो। बहुत सहायता मिलती है इन चार लाइनों से। अन्यथा आपके फोटो पर मैं अपना अन्दाजा ही लगाता रहूंगा और आपको लगेगा कि बेइज्जती हो रही है।
खैर, इस बार एक फोटो आया है चर्चा के लिये। इसे भेजा है सुधाकर मिश्रा जी ने। साथ में लिखा है: “ये चित्र मैंने नैनीताल में डोरोथी सीट के रास्ते से कहीं लिया था। पेडों की लाइन, उसके ऊपर छोटे पहाड और फिर बर्फीली चोटियां मुझे अच्छी लगी थीं। आप अपनी राय दीजिये।”