Friday, March 27, 2015

कच्छ से दिल्ली वापस

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अब बारी थी दिल्ली लौटने की। दिल्ली अभी भी 1000 किलोमीटर से ज्यादा थी और मेरे पास थे दो दिन। यानी प्रतिदिन 500 किलोमीटर के औसत से चलना पडेगा जोकि बाइक से कतई भी आसान नहीं है। उस पर भी आखिर के ढाई सौ किलोमीटर यानी जयपुर से आगे का रास्ता और ट्रैफिक जान निकाल देने वाला होगा। चलिये, देखते हैं क्या होगा?
रापर से चला मैं सुबह साढे नौ बजे। पहली गलती। बल्कि पहली क्या... हमेशा की तरह आज भी गलती की कि इतनी देर से चला। सात बजे ही निकल जाना चाहिये था, अब तक सौ किलोमीटर दूर जा चुका होता। लेकिन रापर मुझसे भी सुस्त निकला। कोई दुकान खुली नहीं मिली, भूखे पेट ही निकलना पडा।

Monday, March 23, 2015

धोलावीरा- 2

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पिछली बार आपको धोलावीरा के पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व के बारे में बताया था, आज वहां की यात्रा करते हैं। यात्रा वृत्तान्त लिखते हैं। खास बात यह है कि धोलावीरा जाने का रास्ता भी कच्छ के सुन्दरतम रास्तों में से एक है। इसी वजह से कच्छ जाने वाला हर आदमी धोलावीरा की भी योजना बनाता है।
भचाऊ में प्रभु आहिर ने बताया कि आप पहले एकल माता जाओ, वहां से दसेक किलोमीटर रन में चलना पडेगा और आप सीधे धोलावीरा पहुंच जाओगे। असल में धोलावीरा एक टापू पर स्थित है। इस टापू को खडीर बेट कहते हैं। इसके चारों तरफ समुद्र है जो बारिश के मौसम में भर जाता है और सर्दियां आते आते सूखने लगता है जैसा कि पूरे रन में होता है। गर्मियों में यह इतना सूख जाता है कि इस ‘समुद्र’ को आप गाडियों से भी पार कर सकते हैं। प्रभु ने कहा कि तुम एकल माता से सीधे रन में उतर जाना और सीधे चलते जाना। खडीर बेट आयेगा, तो वहां जल्दी ही आपको धोलावीरा वाली सडक मिल जायेगी जिससे आप धोलावीरा जा सकते हो।

Friday, March 20, 2015

धोलावीरा- सिन्धु घाटी सभ्यता का एक नगर

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पहले धोलावीरा का थोडा सा परिचय दे देता हूं, फिर वहां घूमने चलेंगे। इतिहास की किताब में आपने पढा होगा- मैंने भी पढा है- कि कोई सिन्धु घाटी सभ्यता थी। इसका प्रमुख नगर हडप्पा था, इसलिये हडप्पा सभ्यता भी कहते हैं। मुझे याद है कि जब सातवीं-आठवीं में मास्टरजी इतिहास की किताब पढवाया करते थे तो कई सहपाठी हडप्पा शब्द को हडम्पा पढते थे। गौरतलब है कि हमारे यहां किसी महिला को नालायक कहने की बजाय हडम्पा कह देते हैं।
खैर, हडप्पा के साथ एक और स्थान के बारे में हम पढते थे- वो है मोहनजोदडो। ये दोनों स्थान अब पाकिस्तान में हैं इसलिये हमारे लिये उतने सुलभ नहीं हैं। लेकिन कुछ स्थान ऐसे हैं जो उसी काल के हैं, उसी तरह के लोग वहां बसते थे, उसी तरह का आचरण था, वही नगर व्यवस्था थी और आज वे भारत में हैं। इनमें कुछ नाम हैं- धोलावीरा, कालीबंगा, लोथल और रोपड। रोपड तो आज का रूपनगर है जो पंजाब में है। स्थानीय लोग इसे अभी भी रोपड ही कहते हैं- रोप्पड। कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ जिले में है जो पीलीबंगा रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूर स्थित है। लोथल और धोलावीरा दोनों गुजरात में हैं। इनके अलावा और भी कई नाम हैं जो कम प्रसिद्ध हैं। इनमें कुछ हरियाणा में हैं, कुछ उत्तर प्रदेश में हैं।

Wednesday, March 18, 2015

माण्डवी बीच पर सूर्यास्त

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शाम साढे पांच बजे हम तीनों माण्डवी पहुंच गये। सुमित और गिरधर पहले ही काफी लेट हो चुके हैं, इसलिये उन्हें इन्दौर के लिये आज ही निकलना पडेगा जबकि मेरा इरादा आज यहीं माण्डवी में रुकने का है। कुछ देर बाद सूर्यास्त हो जायेगा, फिर अन्धेरा हो जायेगा, इसलिये माण्डवी मैं कल देखूंगा- ऐसा सोचा।
सीधे समुद्र तट पर पहुंच गये। शहर में काफी भीड थी, लेकिन समुद्र तट अच्छा लगा। भूख लगी हो, आप कच्छ में हों और दाबेली न खायें, तो बेकार है। लेकिन हमने स्वयं को बेकार नहीं होने दिया। दबा के दाबेली खाईं।

Monday, March 16, 2015

यात्रा में आनन्द कैसे लें?

वैसे तो आपको यात्राएं करने में आनन्द आता है, अच्छा लगता है, मन-मस्तिष्क तरोताजा हो जाता है लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? याद कीजिये जब आप पिछली बार कहीं गये थे, तो क्या सोचकर गये थे और वहां जाकर क्या वो सब मिला? सोचिये एक बार। बडी सिरदर्दी का काम होता है। पहले तो घर पर इतनी योजनाएं बनाओ, इतना सबकुछ सोचो; फिर वहां जाकर भी सारा समय योजनाएं बनाने में चला जाता है। बस, यही काम रह जाता है हमें- योजनाएं बनाते रहो, प्लानिंग करते रहो। नौकरी में भले ही मैनेजर न बन पायें हों, लेकिन यहां हम हमेशा मैनेजर होते हैं।

Friday, March 13, 2015

पिंगलेश्वर महादेव और समुद्र तट

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मुझे पिंगलेश्वर की कोई जानकारी नहीं थी। सुमित और गिरधर के पास एक नक्शा था जिसमें नलिया और कोठारा के बीच में कहीं से पिंगलेश्वर के लिये रास्ता जाता दिख रहा था। मोबाइल में गूगल मैप में दूरी देखी, मुख्य सडक से 16 किलोमीटर निकली। तय कर लिया कि पिंगलेश्वर भी जायेंगे। बाइक का फायदा।
एक बजे नारायण सरोवर से चल पडे और सवा दो बजे तक 70 किलोमीटर दूर नलिया पहुंच गये। सडक की तो जितनी तारीफ की जाये, उतनी ही कम है। नलिया में कुछ समय पहले तक रेलवे स्टेशन हुआ करता था। उस जमाने में भुज से मीटर गेज की लाइन नलिया आती थी। गेज परिवर्तन के बाद भुज-नलिया लाइन को परिवर्तित नहीं किया गया और इसे बन्द कर दिया गया। अब यह लाइन पूरी तरह खण्डहर हो चुकी है और इस पर पडने वाले स्टेशन भी। उस समय तक नलिया भारत का सबसे पश्चिमी स्टेशन हुआ करता था। इसे देखने की मेरी बडी इच्छा थी लेकिन शानदार सडक और इस पर बाइक चलाने के आनन्द के आगे यह इच्छा दब गई। नलिया ‘फिर कभी’ पर चला गया।

Wednesday, March 11, 2015

कोटेश्वर और नारायण सरोवर

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18 जनवरी 2015
लखपत से नारायण सरोवर की दूरी करीब 35 किलोमीटर है। किले से निकलते ही एक सडक तो बायें हाथ भुज चली जाती है और एक दाहिने वाली जाती है नारायण सरोवर। नारायण सरोवर से दो किलोमीटर आगे कोटेश्वर है।
जैसा कि कई अन्य स्थानों पर भी कथा प्रचलित है कि रावण ने तपस्या करी, शिवजी प्रसन्न हुए और शिवलिंग के रूप में रावण के साथ लंका जाने लगे। लेकिन शर्त लगा दी कि अगर शिवलिंग को जमीन पर रख दिया तो फिर उठाये नहीं उठूंगा। ऐसा ही कोटेश्वर में हुआ। रावण को लघुशंका लगी और शिवजी यहीं पर विराजमान हो गये। अब वर्तमान में मानचित्र देखें तो सन्देह होता है कि रावण शिवजी को कैलाश से ला रहा था या पुरुषपुर से। कैलाश-लंका के बीच में कोटेश्वर दूर-दूर तक भी नहीं आता।

Monday, March 9, 2015

लखपत-2

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कल यहां हमें डरा दिया गया था कि ये मत करना, वो मत करना, सीमावर्ती इलाका है, बीएसएफ का बहुत दबाव है; तो हम लखपत किले के अन्दर ज्यादा घूमते हुए डर रहे थे कि कहीं बेवजह की पूछताछ न होने लगे। लेकिन जब सेना के जवान गुरुद्वारे में आये, साथ बैठकर आलू काटे तो उन्होंने बडी काम की बातें बताईं। उन्होंने बताया कि आप पूरे किले में कहीं भी घूम सकते हो। उधर बीएसएफ की चौकी है, वहां भी जा सकते हो; कोई दिक्कत नहीं है। हमारा हौंसला बढा और हमने गुरुद्वारे से निकलकर सबसे पहले उस चौकी पर ही जाना उचित समझा।
मोटरसाइकिलें स्टार्ट कीं और लखपत के खण्डहरों से होते हुए सीधे बीएसएफ की चौकी के नीचे जा रुके। किलों की दीवारों पर जगह जगह काफी बडी जगह होती है जहां से चारों तरफ की रखवाली की जा सके। पता नहीं इसे क्या कहते हैं, शायद परकोटा कहते हैं। ऐसी ही एक जगह पर बीएसएफ की चौकी है। सीढियों से ऊपर चढे तो वहां दो जवान थे। एक जाट जींद का और दूसरा मराठा बुलढाणा का- जाट-मराठा संगम। हमसे पहले वहां एक घुमक्कड परिवार भी था। उनके जाने के बाद हमने जवानों से जी भरकर बातें कीं। जवानों ने कह दिया कि हमारा फोटो छोडकर चारों तरफ के जितने भी जैसे भी फोटो ले सको, ले लो।

Friday, March 6, 2015

लखपत में सूर्यास्त और गुरुद्वारा

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17 जनवरी 2015
साढे तीन बजे हम थान मठ से निकल गये। अब जाना था हमें लखपत। यह भारत के सबसे पश्चिमी कुछ गांवों में से एक है और दुनिया का सर्वप्रथम गुरुद्वारा भी यहीं है। पश्चिमी होने के कारण यहां का सूर्यास्त देखना बनता था। इसलिये हमें छह बजे से पहले लखपत पहुंच जाना था।
शीघ्र ही हम भुज-लखपत मुख्य सडक पर थे। खाली चौडी सडक पर जब हम 70 की रफ्तार से बढे जा रहे थे, तो हमें एक ऐसी चीज दिखी कि आपातकालीन ब्रेक लगाने पडे। यह था- कर्करेखा यहां से गुजरती है। मैंने पहले भी कहा था कि अपनी इस यात्रा में मुझे कई बार कर्करेखा पार करनी पडी। हिम्मतनगर-अहमदाबाद के बीच, भुज-खावडा के बीच, खावडा-नखत्राणा के बीच, नखत्राणा-लखपत के बीच, लखपत-नलिया के बीच और भचाऊ-रापर के बीच। लेकिन सूचना-पट्ट सिर्फ यहीं पर दिखा। सडक पर सफेद रेखा भी खिंची थी कि यह है कर्करेखा।

Wednesday, March 4, 2015

थान मठ, कच्छ

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फॉसिल पार्क से डेढ-दो किलोमीटर आगे थान मठ है। एक धर्मनाथ नाम के योगी थे जिन्होंने बारह वर्ष तक सिर के बल खडे होकर तपस्या की थी। कहते हैं कि उनकी तपस्या से भगवान प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा। उन्होंने वर तो मांगा नहीं, बल्कि अ-वर मांग लिया- मैं सीधा होकर जहां भी देखूं, वो स्थान बंजर हो जाये। भगवान ने कहा तथास्तु और कच्छ का एक बडा इलाका बंजर हो गया।
यह मठ एक पहाडी के नीचे बना हुआ है। इस पहाडी का नाम है धीणोधार पहाडी। यह एक ज्वालामुखी था जो अब सुप्त हो चुका है। सैटेलाइट से देखने पर इसकी चोटी पर ज्वालामुखी जैसा मुख भी दिखता है हालांकि लाखों साल बीत जाने के कारण काफी टूट-फूट हो चुकी है। ऊपर पहाडी पर भी एक मन्दिर बना है जहां केवल पैदल ही जाया जा सकता है। एक रास्ता तो यहां मठ से ही है जो लम्बा है। इसके अलावा दूसरा रास्ता पहाडी के दूसरी तरफ से है जो छोटा और सुविधाजनक है। समयाभाव के कारण हम वहां नहीं जा पाये। कच्छ आने का दूसरा बहाना मिल गया।

Monday, March 2, 2015

डायरी के पन्ने- 30 (विवाह स्पेशल)

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।

1 फरवरी: इस बार पहले ही सोच रखा था कि डायरी के पन्ने दिनांक-वार लिखने हैं। इसका कारण था कि पिछले दिनों मैं अपनी पिछली डायरियां पढ रहा था। अच्छा लग रहा था जब मैं वे पुराने दिनांक-वार पन्ने पढने लगा।
तो आज सुबह नाइट ड्यूटी करके आया। नींद ऐसी आ रही थी कि बिना कुछ खाये-पीये सो गया। मैं अक्सर नाइट ड्यूटी से आकर बिना कुछ खाये-पीये सो जाता हूं, ज्यादातर तो चाय पीकर सोता हूं।। खाली पेट मुझे बहुत अच्छी नींद आती है। शाम चार बजे उठा। पिताजी उस समय सो रहे थे, धीरज लैपटॉप में करंट अफेयर्स को अपनी कापी में नोट कर रहा था। तभी बढई आ गया। अलमारी में कुछ समस्या थी और कुछ खिडकियों की जाली गलकर टूटने लगी थी। मच्छर सीजन दस्तक दे रहा है, खिडकियों पर जाली ठीकठाक रहे तो अच्छा। बढई के आने पर खटपट सुनकर पिताजी भी उठ गये।
सात बजे बढई वापस चला गया। थोडा सा काम और बचा है, उसे कल निपटायेगा। इसके बाद धीरज बाजार गया और बाकी सामान के साथ कुछ जलेबियां भी ले आया। मैंने धीरज से कहा कि दूध के साथ जलेबी खायेंगे। पिताजी से कहा तो उन्होंने मना कर दिया। यह मना करना मुझे बहुत खराब लगा। बेड पर बैठे थे, नीचे आंखें गडाये हुए गर्दन हिला दी; बस।

Friday, February 27, 2015

फॉसिल पार्क, कच्छ

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17 जनवरी 2015
अब हमारा लक्ष्य था लखपत। खावडा से लखपत जाने के लिये भुज जाने की आवश्यकता नहीं है। उससे पहले ही एक ग्रामीण रास्ता सीधा नखत्राणा जाता है। भीरंडीयाला से 27 किलोमीटर भुज की तरफ चलने पर यह रास्ता दाहिने मुडता है। हम इसी पर हो लिये। इस रास्ते पर निरोना, बीबर आदि गांव आते हैं। देवीसर से कुछ पहले एक रास्ता दाहिने जाता है। यह आगे फॉसिल पार्क और थान मोनेस्ट्री चला जाता है। मेरी इच्छा इन दोनों स्थानों को देखने की थी।
आपको फॉसिल पार्क का पता भी नहीं चलेगा अगर आप सावधान न हुए। मैंने पहले ही गूगल मैप का अध्ययन कर रखा था इसलिये मालूम था कि उस मोड के पास यह पार्क है। जैसे ही वह मोड आया, हमारी रफ्तार कम हो गई। झाडियों में इसका एक सूचना-पट्ट लगा था, हमने तुरन्त बाइक उधर ही मोड दी।

Wednesday, February 25, 2015

इण्डिया ब्रिज, कच्छ

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इण्डियाब्रिज काला डोंगर से लगभग 20 किलोमीटर दूर है। उनकी बुलेट में पेट्रोल कम था। पेट्रोल पम्प खावडा में था जोकि इण्डियाब्रिज के विपरीत दिशा में है। तय हुआ कि अगर रास्ते में पेट्रोल समाप्त हो गया तो वे मेरी बाइक से निकालेंगे। मैं राजी था। हालांकि इसकी आवश्यकता नहीं पडी।
आप कच्छ का नक्शा देखेंगे तो इसकी पूरी उत्तरी सीमा पाकिस्तान से मिलती है। लेकिन सीमा के इस तरफ एक बहुत बडा प्राकृतिक अवरोध भी है। यह है कच्छ का विशाल रन जहां साल में ज्यादातर समय पानी भरा रहता है या दलदल रहता है। इसी में एक उपयुक्त स्थान पर सडक भी निकाली गई है जो बिल्कुल सीमा तक जाती है। यह वही सडक है। यह भुज से वीघाकोट को जोडती है। वीघाकोट सीमावर्ती चौकी है। लेकिन आम नागरिकों के लिये सीमा तक जाना सरल नहीं होता। उससे कुछ ही पहले तक बेरोकटोक जाया जा सकता है, फिर आगे जाने के लिये परमिट लेना होता है।

Monday, February 23, 2015

काला डोंगर- कच्छ का उच्चतम स्थान

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16 जनवरी 2015
खावडा से काला डूंगर की दूरी करीब बीस किलोमीटर है। आठ किलोमीटर आगे एक तिराहा है जहां से एक सडक तो सीधी चली जाती है और एक दाहिने मुड जाती है। यही दाहिने वाली काला डूंगर जाती है। सीधी सडक इण्डिया ब्रिज होते हुए विघाकोट जाती है। विघाकोट अर्थात भारत-पाक सीमा। विघाकोट जाने के लिये भुज से आज्ञापत्र बनवाना होता है। उसकी चर्चा अभी बाद में करेंगे जब इण्डिया ब्रिज चलेंगे। अभी फिलहाल काला डूंगर चलते हैं। चलिये, दाहिनी तरफ मुड जाते हैं।
एक गांव आता है और इसे पार करते ही सडक पतली सी हो जाती है। चूंकि काला डूंगर कच्छ की सबसे ऊंची चोटी है तो यहां जाने के लिये कुछ चढाई भी करनी पडेगी। शीघ्र ही चढाई भी शुरू हो जाती है लेकिन यह छोटी सी चढाई काफी ‘ट्रिकी’ है। फिर साढे चार सौ मीटर की ऊंचाई पर जाकर दत्तात्रेय मन्दिर के पास चढाई समाप्त हो जाती है। पौने छह बज चुके थे। सूर्यास्त में अभी देर थी। उधर ‘देश’ में सूर्यास्त हो चुका होगा, यहां यह काम देर से होता है। काफी पर्यटक कैमरे लिये सूर्यास्त को कैद करने के लिये तैयार खडे थे।

Friday, February 20, 2015

सफेद रन

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16 जनवरी 2015
बारह बज चुके थे और मैं भुज में था। अभी तक कुछ खाया भी नहीं था। सुबह पच्चीस-तीस रुपये की पूरी-सब्जी खाई थीं एक ठेले पर। ठेला समझकर यह मत सोचना कि मैं गन्दगी में जा घुसा। गन्दगी वाला ठेला होता तो दस रुपये में ही काम चल जाता। वह लडका पार्ट टाइम के तौर पर सुबह नाश्ते के लिये पूरी-सब्जी बेचता है, बाद में कुछ और काम करता है। सफाई अच्छी थी। दो तरह की आलू की सब्जियां थीं- सूखी और तरीदार। दोनों में फर्क बस इतना ही था कि एक में तेल कुछ कम था, दूसरी में तेल ही तेल था। गुजराती सब्जियों में लगता है पानी की बजाय तेल डाला जाता है। इतना तेल हो जाता है कि अगर आप एक कटोरी आलू की तरीदार सब्जी में से आलू खा जायें तो आधा कटोरी तेल बचा रहेगा। उधर हम दिल्ली वालों के लिये तेल का बडा परहेज होता है।
हां, तो मैं कह रहा था कि बारह बज गये थे। आज मुझे काला डूंगर जाना था जो यहां से करीब सौ किलोमीटर दूर है। अर्थात ढाई तीन घण्टे लगेंगे। रास्ते में कहीं रुककर खाना भी खाना था तो चार घण्टे लगेंगे। पांच बजे के बाद दिन छिपना शुरू हो जायेगा। हालांकि यह भारत का पश्चिमतम इलाका है, दिन यहां देर से छिपता है।

Wednesday, February 18, 2015

भुज के दर्शनीय स्थल

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16 जनवरी 2015
कल जब सोया था तो योजना थी कि आज पहले माण्डवी जाऊंगा और वहां से फिर लखपत के लिये निकल जाऊंगा। लेकिन इसके लिये सुबह जल्दी उठना पडता और यही अपनी कमी है। साढे आठ बजे उठा। सूरज सिर पर चढ आया था। माण्डवी के लिये काफी विलम्ब हो चुका था। फिर आज ही लखपत जाना सम्भव नहीं था। जाता भी तो भागमभाग करनी पडती और अन्धेरे में भी बाइक चलानी पडती। रास्ता भी पता नहीं कैसा हो। इसलिये अब माण्डवी जाने का विचार छोड दिया। इसके बजाय अब काला डूंगर जाऊंगा।
काला डूंगर जाऊंगा तो वापसी में भुज नहीं आऊंगा। पहले मुझे क्लोकवाइज कच्छ देखना था, अब एण्टी-क्लोकवाइज देखूंगा। रूट वही रहेगा। वापस भुज नहीं आऊंगा। इसलिये भुज शहर में जो दर्शनीय स्थल हैं, उन्हें अभी ही देख लेता हूं। कमरे का ताला लगाया, बाइक यहीं छोडकर पैदल ही निकल पडा।

Monday, February 16, 2015

फोटोग्राफी चर्चा- 2

बडी बेइज्जती हो रही है फोटोग्राफी चर्चा करने में। कारण यही है कि मैं भद्दे तरीके से चर्चा करता हूं। बात तो ठीक है लेकिन करूं भी क्या? हमेशा कहता आया हूं कि आप जो भी फोटो भेजते हो, उसके बारे में चार लाइनें भी लिखकर भेज दिया करो। बहुत सहायता मिलती है इन चार लाइनों से। अन्यथा आपके फोटो पर मैं अपना अन्दाजा ही लगाता रहूंगा और आपको लगेगा कि बेइज्जती हो रही है।
खैर, इस बार एक फोटो आया है चर्चा के लिये। इसे भेजा है सुधाकर मिश्रा जी ने। साथ में लिखा है: “ये चित्र मैंने नैनीताल में डोरोथी सीट के रास्ते से कहीं लिया था। पेडों की लाइन, उसके ऊपर छोटे पहाड और फिर बर्फीली चोटियां मुझे अच्छी लगी थीं। आप अपनी राय दीजिये।”

Friday, February 13, 2015

कच्छ की ओर- अहमदाबाद से भुज

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15 जनवरी 2015
सुबह आठ बजे उठा। रात अच्छी नींद आई थी, इसलिये कल की सारी थकान समाप्त हो गई थी। अभी भी भुज यहां से लगभग साढे तीन सौ किलोमीटर दूर है, इसलिये आज भी काफी बाइक चलानी पडेगी। रास्ते में मालिया में उमेश जोशी मिलेंगे। फिर हम दो हो जायेंगे, मन लगा रहेगा।
लेकिन जोशी जी को फोन किया तो कहानी कुछ और निकली। पिछले दिनों वे जामनगर के पास समुद्र में कोरल देखने गये थे। वहां उन्हें काफी चोट लग गई और अभी भी वे बिस्तर पर ही थे, चल-फिर नहीं सकते थे। उन्होंने बडा अफसोस जताया कि साथ नहीं चल सकेंगे। फिर कहने लगे कि जामनगर आ जाओ। लेकिन मेरे लिये जानमगर जाना सम्भव नहीं था। अगली बार कभी सौराष्ट्र घूमने का मौका मिलेगा, तो जामनगर जाऊंगा।
अब पक्का हो गया कि मुझे कच्छ यात्रा अकेले ही करनी पडेगी। लेकिन जोशी जी ने भचाऊ के रहने वाले अपने एक मित्र के बारे में बता दिया। वहां बात की तो लंच करना तय हो गया।

Wednesday, February 11, 2015

कच्छ की ओर- जयपुर से अहमदाबाद

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13 जनवरी 2015
सुबह आठ बजे विधान के यहां से निकल पडा। उदयपुर यहां से चार साढे चार सौ किलोमीटर दूर है। आज का लक्ष्य उदयपुर पहुंचने का ही रखा। असल में मुझे अहमदाबाद के रास्ते कच्छ जाना था। इसका एक कारण था कि मौका मिलते ही कहीं छोटा रन भी देख लेना चाहता था। मलिया में उमेश जोशी मिलने वाले थे। और अहमदाबाद के रहने वाले अमित गौडा से भी मिलने का वादा कर रखा था।
जयपुर से अहमदाबाद जाने के मुख्य तीन रास्ते हैं। पहला, जयपुर से किशनगढ बाईपास, चित्तौडगढ, उदयपुर होते हुए; दूसरा, अजमेर, कांकरोली, उदयपुर होते हुए और तीसरा, अजमेर, ब्यावर, पाली, सिरोही, आबू रोड होते हुए। मैंने चलने से पहले मित्रों से पूछा भी था कि इनमें से कौन सा रास्ता सर्वोत्तम है। पता चला कि कांकरोली वाले रास्ते को चार लेन का बनाया जा रहा है। यानी वहां काम चल रहा है। पाली, आबू रोड वाले पर भी बताया गया कि काम चल रहा है। इसलिये चित्तौडगढ वाला रास्ता निर्विरोध चुन लिया गया। वैसे वापस मैं पाली के रास्ते आया हूं। वो रास्ता बर और ब्यावर के बीच में थोडा खराब है, बाकी एक नम्बर का है। पहले पता होता तो मैं उसी रास्ते जाता।

Monday, February 9, 2015

कच्छ नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा

कच्छ नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा- यह तुकबन्दी मुझे बडा परेशान कर रही थी कई दिनों से। पिछले साल एक बार साइकिल से जाने की भी योजना बनाई थी लेकिन वह ठण्डे बस्ते में चली गई। कच्छ में दो मुख्य रेल लाइनें हैं- अहमदाबाद-भुज और पालनपुर-समखियाली; दोनों पर कभी यात्रा नहीं की गई। बस फोटो देख-देखकर ही कच्छ दर्शन किया करता था।
लेकिन ऐसा कब तक होता? कभी न कभी तो कच्छ जाना ही था। मोटरसाइकिल ली, गढवाल की एक छोटी सी यात्रा भी कर ली; फिर सर्दी का मौसम; कच्छ के लिये सर्वोत्तम। इस बार चूक जाता तो फिर एक साल के लिये बात आई-गई हो जाती।
पिछले दिनों डिस्कवरी चैनल पर कच्छ से सम्बन्धित एक कार्यक्रम आया- यह कार्यक्रम कई दिनों तक आता रहा। मैंने कई बार इसे देखा। इसे देख-देखकर पक्का होता चला गया कि कच्छ तो जाना ही है। लेकिन समस्या थी दिल्ली से भुज ट्रेन से जाऊं या बाइक से। पहले तो तय किया कि जामनगर तक ट्रेन से जाऊंगा, बाइक या तो ट्रेन में ही रख लूंगा या फिर उमेश जोशी से ले लूंगा। जोशी जी ने भी साथ चलने की स्वीकृति दे दी।

Friday, February 6, 2015

मेरी कुछ प्रमुख ऊंचाईयां

बहुत दिनों से इच्छा थी एक लिस्ट बनाने की कि मैं हिमालय में कितनी ऊंचाई तक कितनी बार गया हूं। वैसे तो इस लिस्ट को जितना चाहे उतना बढा सकते हैं, एक एक गांव को एक एक स्थान को इसमें जोडा जा सकता है लेकिन मैंने इसमें केवल चुनिन्दा स्थान ही जोडे हैं जैसे कि दर्रे, झील, मन्दिर और कुछ अन्य प्रमुख स्थान।

Wednesday, February 4, 2015

चकराता से दिल्ली मोटरसाइकिल यात्रा

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27 नवम्बर 2014
छह बजे तक चकराता से निकल लेना था लेकिन चारों सोते रह गये और सात बजे उठे। अत्यधिक ठण्डे पानी में हाथ भिगोकर मुंह पर लगाया- मुंह धुल गया। सवा सात बजे तक चकराता से निकल पडे। होटल वाले ने हमें सचेत किया कि रास्ते में ब्लैक आइस मिलेगी, सावधानी से चलना। ब्लैक आइस से मुझे बहुत डर लगता है। यह दिखती नहीं है और मोटरसाइकिल इस पर फिसलकर गिर जाती है। खैर आधे-पौने घण्टे की बात है, सहिया तक ऊंचाई काफी कम हो जायेगी, ब्लैक आइस का खतरा भी टल जायेगा।
लेकिन हर जगह यह नहीं मिलती। यह ज्यादातर ऐसे मोडों पर होती है जहां अन्धेरा और लगभग पूरे दिन छाया रहती हो। ऐसी कई जगहों पर प्रशासन ने चेतावनी बोर्ड भी लगा रखे हैं कि मोड पर बर्फ जमने का खतरा है, सावधानी से चलें। खैर, सावधानी से चलते रहे और कोई नुकसान नहीं हुआ।

Monday, February 2, 2015

डायरी के पन्ने-29

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।

1. फिल्म ‘पीके’ देखी। फिल्म तो अच्छी है, अच्छा सन्देश देती है लेकिन कुछ चीजें हैं जो अवश्य विवादास्पद हैं। मुझे जो सबसे ज्यादा आहत किया, वो दृश्य था जब पीके ‘शिवजी’ को बाथरूम में बन्द कर देता है और इसके बाद शिवजी जान बचाकर भागते हैं। दूसरी बात कि फिल्म कहीं न कहीं इस्लाम को बढावा देती महसूस हुई। मसलन बार-बार पीके का कहना कि शरीर पर धर्म का ठप्पा। इससे कहीं न कहीं यह सन्देश जाता है कि जो धार्मिक हैं, उनके शरीर पर ठप्पा होना चाहिये, अन्यथा वे धार्मिक नहीं। गौरतलब है कि मुसलमानों के शरीर पर धर्म का ठप्पा लगा होता है।
बाकी तो एक शानदार फिल्म है ही। दो भगवान होते हैं- एक, जिसने हमें बनाया और दूसरा, जिसे हमने बनाया। इसी आधार पर जो बुराईयां समाज में व्याप्त हैं, वही सब इस फिल्म में दिखाया गया है।

Friday, January 30, 2015

लाखामण्डल से चकराता- एक खतरनाक सफर

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26 नवम्बर 2014
हमारा दिमाग खराब था कि हमने लाखामण्डल से शाम सवा चार बजे चकराता जाने का फैसला किया। दूरी लगभग 70 किलोमीटर है, सडक सिंगल लेन ही है। पूरा रास्ता पहाडी। इतनी जानकारी हमें थी। जैसे हम कल से पहाडों पर चलते आ रहे थे, ऐसे ही चलते रहें तो तीन घण्टे लगने ही थे जबकि एक घण्टे बाद ही दिन छिपना शुरू हो जायेगा। उसके बाद अन्धेरा। और चकराता भी हम किसलिये जाना चाहते थे? सिर्फ रात रुकने के लिये। हमें कल वहां से सुबह ही दिल्ली के लिये निकल पडना है। यह भी जानते थे कि चकराता में होटल यहां लाखामण्डल के मुकाबले महंगे मिलेंगे, फिर भी बस बिना सोचे समझे निकल पडे।
लाखामण्डल में ही हमें बता दिया गया था कि लाखामण्डल गांव से निकलते ही एक तिराहा आयेगा। आप ऊपर वाली सडक से जाना। हालांकि दोनों ही सडकें आगे गोराघाटी में फिर से मिल जाती हैं लेकिन नीचे वाली सडक खराब है, ऊपर वाली ठीक है। यह हमें बताया गया। यह भी बताया गया कि गोराघाटी के बाद सडक अच्छी बनी है।

Wednesday, January 28, 2015

लाखामण्डल

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आठ बजे सोकर उठे। आज मेरी छुट्टी का आखिरी दिन था। लाखामण्डल यहां से लगभग सवा सौ किलोमीटर दूर है और हम लाखामण्डल जाकर रात होने तक दिल्ली किसी भी हालत में नहीं पहुंच सकते थे। इसलिये लाखामण्डल जाना रद्द कर दिया था। आज के लिये तय था कि मसूरी से देहरादून उतर जायेंगे और फिर आगे अपने घर चले जायेंगे।
लेकिन अब जब चलने की तैयारी करने लगे तो अरुण ने कहा कि एक दिन की ही बात है, लाखामण्डल चलते हैं। मेरे लिये एक दिन की छुट्टी बढवाना कोई मुश्किल नहीं था। सबसे ज्यादा मुश्किल आई सचिन को। उसने पहले ही कह रखा था कि आज शाम तक हर हाल में उसे अपने घर जाना है। हमने उसे अपना निर्णय बताया। उसने पहले तो स्पष्ट मना कर दिया। लेकिन कुछ हमारी काउंसलिंग के बाद वह इस शर्त पर चलने को राजी हो गया कि कल दोपहर तक उसे घर पहुंचना ही पहुंचना है। हम उसकी बात पर राजी हो गये हालांकि जानते थे कि उसे कल भी घर पहुंचने में शाम हो जायेगी।