Monday, February 8, 2016

सतपुडा नैरो गेज में आखिरी यात्रा-1

   नवम्बर 2015 के पहले सप्ताह में जब पता चला कि सतपुडा नैरो गेज हमेशा के लिये बन्द होने जा रही है तो मन बेचैन हो गया। बेचैन इसलिये हो गया कि इस रेल नेटवर्क के काफी हिस्से पर मैंने अभी तक यात्रा नहीं की थी। लगभग पांच साल पहले मार्च 2011 में मैंने छिन्दवाडा से नैनपुर और बालाघाट से जबलपुर तक की यात्रा की थी। छिन्दवाडा से नागपुर और नैनपुर से मण्डला फोर्ट की लाइन अभी भी मेरी अनदेखी बची हुई थी। अब जब यह बन्द होने लगी तो अपने स्तर पर कुछ खोजबीन और की तो पाया कि यह लाइन असल में 31 अक्टूबर 2015 को ही बन्द हो जानी थी लेकिन इसे एक महीने तक के लिये बढा दिया गया है। एक महीने तक बढाने का अर्थ था कि मेरे लिये इसमें यात्रा करने का आखिरी मौका आखिरी सांसें गिन रहा है। 16 नवम्बर को दिल्ली से निकलने की योजना बन गई। कानपुर में रहने वाले मित्र आनन्द शेखावत को पता चला तो वे भी चलने को राजी हो गये। सभी आवश्यक आरक्षण और रिटायरिंग रूम की भी बुकिंग हो गई।
   लेकिन जब 16 नवम्बर को नई दिल्ली केरल एक्सप्रेस पकडने गया तो छठ के कारण अन्दर से बाहर तक बिल्कुल ठसाठस भरे नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन में ऐसा फंसा कि केरल एक्सप्रेस छूट गई। इससे मुझे नागपुर तक जाना था। वैसे तो इसके बाद भी बहुत सारी नागपुर जाने वाली ट्रेनें थीं लेकिन मैं लम्बी दूरी की खासकर रात में बिना आरक्षण के यात्राएं नहीं किया करता। वापस घर लौट आया और आनन्द को सारी वास्तुस्थिति बता दी। उसका भी झांसी से आरक्षण था और वह कानपुर से चल चुका था। उसने पूछा- अब क्या करूं? मैंने कहा- तुम होकर आओ और वापस आकर अपने वृत्तान्त सुनाना। आनन्द चला गया। अगले ही दिन फोन आ गया- भाई, नागभीड वाली ट्रेन में तो भारी भीड थी। मैं तो तीन-चार स्टेशनों तक ही गया और उसके बाद आगे की यात्रा रद्द करके बस से नागपुर लौट आया। फिर इतवारी स्टेशन के कुछ फोटो भी दिखाये जहां वास्तव में काफी भीड थी। अगले दिन फिर फोन आ गया कि उसने बालाघाट से नैनपुर की यात्रा करते समय भीड के कारण ट्रेन बीच में कहीं छोड दी और बस से नैनपुर पहुंचा।

Friday, February 5, 2016

नागटिब्बा ट्रैक-2

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27 दिसम्बर 2015
   सुबह उठे। बल्कि उठे क्या, पूरी रात ढंग से सो ही नहीं सके। स्थानीय लडकों ने शोर-शराबा और आपस में गाली-गलौच मचाये रखी। वे बस ऐसे ही मुंह उठाकर इधर आ गये थे। जैसे-जैसे रात बीतती गई, ठण्ड भी बढती गई। उनके पास न ओढने को कुछ था और न ही बिछाने को। वे ठण्ड से नहीं सो सके, हम शोर-शराबे से नहीं सो सके। हमने उन्हें परांठे और एक कम्बल दे दिया था। नहीं तो क्या पता वे हमारे साथ भी गाली-गलौच करने लगते। रात में पता नहीं किस समय उन्होंने अपनी बनाई झौंपडी भी जला दी।
   अभी तक मैं यही मानता आ रहा था कि पन्तवाडी से आने वाला रास्ता भी यहीं आकर मिलता है। हिमाचल वालों से भी मैंने यही कहा कि मेरी जानकारी के अनुसार पन्तवाडी वाला रास्ता आकर मिलता है, इसलिये हमें अपने टैंट आदि आगे नागटिब्बा तक ले जाने की आवश्यकता नहीं है। खाली हाथ जायेंगे और वापस यहां आकर सामान उठाकर नीचे पन्तवाडी चले जायेंगे। इसलिये पहले हिमाचल वालों ने और बाद में मैंने पन्तवाडी की तरफ उतरती पगडण्डी ढूंढी, लेकिन कोई पगडण्डी नहीं मिली। एक हल्की सी पगडण्डी धार के नीचे की तरफ अवश्य जा रही थी, लेकिन यह पन्तवाडी वाला रास्ता नहीं हो सकता। इसलिये सभी ने सामान समेटा और लादकर नागटिब्बे की ओर चल दिये।

Thursday, January 14, 2016

नागटिब्बा ट्रेक-1

   नागटिब्बा जाना तो अपने घर की बात लगती थी। वो रहा देहरादून, वो रहा मसूरी और वो रहा नागटिब्बा। फिर भी कई सालों तक बस सोचते ही रहे, लेकिन जाना नहीं हो पाया। लेकिन इस बार कमर कस ली। नागटिब्बा समुद्र तल से 3000 मीटर से भी ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है, इसलिये सर्दियों में अच्छी-खासी बर्फ गिर जाती है। कम दूरी का ट्रैक होने के कारण यह विण्टर ट्रैकों में भी अहम स्थान रखता है। यही सोचकर दिसम्बर में यहां जाने की योजना बनी।
   मेरी बडे दिनों से इच्छा थी कि किसी ग्रुप को ट्रैकिंग पर लेकर जाऊं। एक बार इस बारे में अपने फेसबुक पेज पर भी लिखा था। इस बार की योजना थी कि क्रिसमस की छुट्टियों में एक ग्रुप को तो अवश्य तैयार कर लेना है। शुक्रवार का क्रिसमस था, उसके बाद शनिवार और फिर रविवार। किसी भी नौकरीपेशा के लिये यह एक शानदार संयोग होता है। इसलिये कोई सन्देह नहीं था कि ग्रुप नहीं बनेगा। खर्चे का अन्दाजा लगाया और आखिरकार तय हुआ कि दिल्ली से दिल्ली तक प्रति व्यक्ति 5000 रुपये और देहरादून से देहरादून तक 4000 रुपये लगेंगे। इसमें आना-जाना, रहना और खाना-पीना सब शामिल था। ग्रुप बडा हुआ तो दिल्ली से ही गाडी कर लेंगे, नहीं तो एसी बस से आना-जाना करेंगे जिसका किराया एक तरफ का लगभग 500 रुपये है।

Tuesday, December 15, 2015

श्योपुर कलां से ग्वालियर नैरो गेज ट्रेन यात्रा

   ग्वालियर और श्योपुर कलां से बीच 2 फीट गेज की यह रेलवे लाइन 200 किलोमीटर लम्बी है और विश्व की सबसे लम्बी नैरो गेज की लाइन है। लेकिन इसके बनने की कहानी बडी ही दिलचस्प है। ग्वालियर के महाराजा थे माधव राव जी। कहते हैं कि उन्होंने एक बार इंग्लैण्ड से टॉय ट्रेन मंगवाई। राजा थे तो यह टॉय ट्रेन कोई छोटी-मोटी तो होगी नही। बडी बिल्कुल असली ट्रेन थी लेकिन 2 फीट गेज की पटरियों पर चलती थी। इंजन था और छह सात डिब्बे थे। आधे किलोमीटर लम्बी पटरियां भी मंगाई गईं और किले के अन्दर ही बिछा दी गईं। लेकिन दिक्कत ये हो गई कि जब तक इंजन स्पीड पकडता, तब तक पटरियां ही खत्म हो जातीं। तो महाराजा ने और पटरियां मंगाईं और किले में ही करीब दो किलोमीटर लम्बा नेटवर्क बना दिया और अपनी निजी ट्रेन का आनन्द लेने लगे।
   फिर ऐसा हुआ कि यह भी महाराजा को कम लगने लगा। किले में इतनी जगह नहीं थी कि इससे भी ज्यादा पटरियां बिछाई जायें। तय हुआ कि किले से बाहर पटरियां बिछाते हैं। बात किले के अन्दर थी तो अन्दर की बात थी लेकिन बाहर ऐसा करना थोडा मुश्किल था क्योंकि उस समय रेलवे लाइन बिछाना केवल अंग्रेजों का ही कार्य था, भारतीयों का नहीं। अभी तक तो यह महाराजा की ‘टॉय ट्रेन’ थी लेकिन अब इसे ‘रेलवे’ बनना पडेगा। फिर पता नहीं महाराजा ने अंग्रेजों को क्या पढाया, क्या सिखाया; किले से बाहर लाइन बिछाने की अनुमति मिल गई। सबसे पहले इसे ग्वालियर के पास मुरार तक बनाया गया। वर्तमान में मुरार की लाइन को शहर में सडकें बनाने आदि के लिये बन्द करके हटा दिया है।

Friday, December 11, 2015

सवाई माधोपुर-जोधपुर-बिलाडा-पुष्कर ट्रेन यात्रा

   ज्यादातर मित्र मेरी पैसेंजर ट्रेन यात्राओं को पसन्द नहीं करते। यह नापसन्दगी पिछले साल खूब सुनने को मिली, इसलिये ट्रेन यात्राओं के वृत्तान्त प्रकाशित करने बन्द कर रखे थे। पिछले साल का जो वृत्तान्त प्रकाशित किया था, वो था मुगलसराय से गोमो, गोमो से हावडा और पटना से बक्सर पैसेंजर ट्रेन यात्राएं। इसके अगले ही सप्ताह भारत के इसी हिस्से में मैं फिर गया था और गोमो से खडगपुर, खडगपुर से टाटानगर, बिलासपुर होते हुए गोंदिया, चाम्पा से गेवरा रोड और बिलासपुर से कटनी तक का मार्ग देख लिया था। रतनगढ-बीकानेर-फलोदी मार्ग भी देखा और पठानकोट-अमृतसर, जालन्धर-पठानकोट-जम्मू-तवी-श्री माता वैष्णों देवी कटडा, दिल्ली-फर्रूखनगर, जोधपुर-भिलडी, पाटन-महेसाना-वीरमगाम-राजकोट, अहमदाबाद-आबू रोड मार्गों पर रेल यात्राएं कीं और रास्ते में आने वाले सभी स्टेशनों के बोर्डों के फोटो भी लिये। मुझे स्टेशन बोर्ड के फोटो संग्रह करने का शौक है। पिछले दिनों भिण्ड-ग्वालियर-गुना मार्ग देखा जिसका वृत्तान्त प्रकाशित किया जा चुका है। अब के बाद ऐसी ट्रेन यात्राओं के वृत्तान्त भी छपा करेंगे। ताजातरीन यात्रा का वृत्तान्त आज पढिये।
   यात्रा शुरू हुई थी 13 अक्टूबर 2015 को। निजामुद्दीन से कोटा जनशताब्दी एक्सप्रेस चलती है। इसमें अपनी बुकिंग थी। मेरी खिडकी वाली सीट पर एक परिवार बैठा था। मैं गया तो वे मुझे अपनी खिडकी से दूर वाली पर बैठने को कहने लगे लेकिन चूंकि मुझे सोना था, इसलिये मुझे जिद करनी पडी। उन्हें अवश्य बुरा लगा होगा।

Wednesday, December 9, 2015

जोशीमठ-पौडी-कोटद्वार-दिल्ली

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30 सितम्बर 2015
आज हमें दिल्ली के लिये चल देना था। सुबह सात बजे ही निकल पडे। एक घण्टे में पीपलकोटी पहुंचे। पूर्व दिशा में पहाड होने के कारण धूप हम तक नहीं पहुंच पा रही थी, इसलिये रास्ते भर ठण्ड लगी। पीपलकोटी में बस अड्डे के पास ताजी बनी पकौडियां देखकर रुक गये। यहां धूप थी। पकौडियां, चाय और गुनगुनी धूप; तीनों के सम्मिश्रण से आनन्द आ गया। आधे घण्टे में यहां से चले तो नौ बजे चमोली पहुंचे, दस बजे कर्णप्रयाग। यहां 15 मिनट रुके, आराम किया। वातावरण में गर्मी बढने लगी थी। रास्ता अलकनन्दा के साथ साथ है और ज्यादा ऊंचाई पर भी नहीं है। इसलिये गर्मी लगती है।
गौचर रुके। यहां से बाल मिठाई ली। हम दोनों को यह मिठाई बेहद पसन्द है लेकिन चूंकि यह कुमाऊं की मिठाई है इसलिये लगता है गढवाल वाले इसे बनाना नहीं जानते। कुछ दिन पहले कर्णप्रयाग से ली थी, वो पिघल गई थी और सभी मिठाईयां एक बडा लड्डू बन गई थीं। आज ली तो यह भी खराब थी। इसका पता दिल्ली आकर चला। खैर, गौचर में दुकान वाले से कुछ बातें कीं। आपको पता नहीं याद हो या न हो; कुछ साल पहले जब देश में कांग्रेस की सरकार थी, तो सोनिया और राहुल गांधी आदि गौचर आये थे और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन का शिलान्यास किया था। इसी के बारे में पता करना था कि कुछ काम भी चल रहा है या नहीं। दुकान वाले ने बताया कि वे लोग तो यहां पिकनिक मनाने आये थे। ऊपर हवाई अड्डे परिसर में ही ‘शिलान्यास’ जैसा कुछ आयोजित हुआ, फीता जैसा कुछ काटा और बात खत्म हो गई।

Monday, December 7, 2015

बद्रीनाथ यात्रा

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29 सितम्बर 2015
   आपको याद होगा कि हम बद्रीनाथ नहीं जाना चाहते थे क्योंकि बद्रीनाथ के साथ साथ वसुधारा, सतोपंथ, हेमकुण्ड और फूलों की घाटी को हम एक साथ देखते और पूरे आठ-दस दिनों के लिये आते। लेकिन कल करण के बद्रीनाथ प्रेम के कारण हमें भी आना पडा। हमारे पास बद्रीनाथ में बिताने को केवल एक ही दिन था। जोशीमठ से लगभग 50 किमी दूर है बद्रीनाथ। हमने जोशीमठ में ही सामान छोडकर रात होने तक वापस यहीं आ जाने का विचार किया ताकि कल वापस दिल्ली के लिये निकला जा सके और उजाले में अधिकतम दूरी तय की जा सके।
   तो नहा-धोकर और गोभी के परांठे का नाश्ता करके साढे दस बजे बद्रीनाथ के लिये निकल पडे। शुरूआती दस किलोमीटर यानी अलकनन्दा पुल तक उतराई है, उसके बाद चढाई है। अलकनन्दा पुल के पास ही विष्णु प्रयाग है जहां अलकनन्दा में धौलीगंगा आकर मिलती है। धौलीगंगा घाटी बडी ही विलक्षण है। 1962 से पहले कैलाश मानसरोवर जाने का एक रास्ता यहां से भी था। वह रास्ता धौलीगंगा घाटी में ऊपर चढता था और नीति दर्रा पार करके यात्री तिब्बत में प्रवेश करते थे। अब तो नीति दर्रा इतना दुर्गम हो गया है कि कोई आम भारतीय भी वहां नहीं जा सकता। ऐसी घटनाओं का असर वहां के रहन-सहन पर भी पडता है। कैलाश मार्ग पर स्थित होने के कारण पहले धौलीगंगा घाटी में खूब चहल-पहल होती होगी, लेकिन अब कौन वहां जायेगा और क्यों जायेगा? हां, उधर जोशीमठ से निकलते ही तपोवन है और भविष्य बद्री है। इसके साथ ही ट्रेकिंग के शौकीनों के लिये नन्दा देवी बेस कैम्प और चांगबांग ग्लेशियर भी आकर्षण के केन्द्र हैं।

Friday, December 4, 2015

अनुसुईया से जोशीमठ

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28 सितम्बर 2015
सुबह उठे तो पैर बुरी तरह अकडे थे। करण तो चलने में बिल्कुल असमर्थ ही हो गया था। इसका कारण था कि कल हमने तेज ढाल का कई किलोमीटर का रास्ता तय किया था। कल हम कई घण्टों तक उतरते ही रहे थे, इसलिये पैरों की दुर्गति होनी ही थी। आज के लिये कल तय किया था कि पहले अत्रि मुनि आश्रम जायेंगे, फिर वापस मण्डल। अत्रि मुनि आश्रम जाकर वापस अनुसुईया आना पडता, इसलिये किसी की भी वहां जाने की हिम्मत नहीं हुई।
आलू के परांठे बनवा लिये। साथ ही उसने थोडा सा पानी भी छौंक दिया। जी हां, पानी। प्याज टमाटर को बारीक काटकर पहले फ्राई किया, फिर उसमें दो-तीन गिलास पानी डाल दिया और उबलने दिया। फिर इसे चखकर देखा तो मजा आ गया। था तो यह पानी ही लेकिन इसका स्वाद किसी दाल या आलू की सब्जी को भी पीछे छोड रहा था।

Wednesday, December 2, 2015

रुद्रनाथ यात्रा- पंचगंगा से अनुसुईया

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27 सितम्बर 2015
   सवा ग्यारह बजे पंचगंगा से चल दिये। यहीं से मण्डल का रास्ता अलग हो जाता है। पहले नेवला पास (30.494732°, 79.325688°) तक की थोडी सी चढाई है। यह पास बिल्कुल सामने दिखाई दे रहा था। हमें आधा घण्टा लगा यहां तक पहुंचने में। पंचगंगा 3660 मीटर की ऊंचाई पर है और नेवला पास 3780 मीटर पर। कल हमने पितरधार पार किया था। इसी धार के कुछ आगे नेवला पास है। यानी पितरधार और नेवला पास एक ही रिज पर स्थित हैं। यह एक पतली सी रिज है। पंचगंगा की तरफ ढाल कम है जबकि दूसरी तरफ भयानक ढाल है। रोंगटे खडे हो जाते हैं। बादल आने लगे थे इसलिये अनुसुईया की तरफ कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। धीरे-धीरे सभी बंगाली भी यहीं आ गये।
   बडा ही तेज ढलान है, कई बार तो डर भी लगता है। हालांकि पगडण्डी अच्छी बनी है लेकिन आसपास अगर नजर दौडाएं तो पाताललोक नजर आता है। फिर अगर बादल आ जायें तो ऐसा लगता है जैसे हम शून्य में टंगे हुए हैं। वास्तव में बडा ही रोमांचक अनुभव था।

Monday, November 30, 2015

रुद्रनाथ यात्रा- पंचगंगा-रुद्रनाथ-पंचगंगा

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27 सितम्बर 2015
   सुबह छह बजे उठे और चाय-बिस्कुट खाकर रुद्रनाथ की ओर चल दिये। रुद्रनाथ यहां से तीन किलोमीटर दूर है। पंचगंगा समुद्र तल से 3660 मीटर पर है जबकि रुद्रनाथ 3510 मीटर पर। जाहिर है कि ढलान है। पंचगंगा ही वो स्थान है जहां मण्डल से आने वाला रास्ता भी मिल जाता है। हमें चूंकि अनुसुईया और मण्डल के रास्ते वापस जाना था, इसलिये रुद्रनाथ जाकर पंचगंगा आना ही पडता, इसलिये अपना सारा सामान यहीं रख दिया। पानी की एक बोतल, ट्रेकिंग पोल लेकर ही चले। अच्छी धूप निकली थी, रेनकोट की कोई आवश्यकता नहीं थी।
   करीब एक किलोमीटर बाद लोहे के सरिये को ऐसे ही मोडकर एक द्वार बना रखा है। यहां से रुद्रनाथ के प्रथम दर्शन होते हैं। बडा ही मनोहारी इलाका है यह। दूर दूर तक फैले बुग्याल, कोई जंगल नहीं। हम वृक्ष-रेखा से ऊपर जो थे। रुद्रनाथ के पीछे के पहाडों पर बादल थे, अन्यथा पता नहीं कौन-कौन सी चोटियां दिखतीं।

Friday, November 27, 2015

रुद्रनाथ यात्रा- पुंग बुग्याल से पंचगंगा

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26 सितम्बर 2015
आंख सात बजे से पहले ही खुल गई थी। बाहर निकले तो कोहरा था। चटाई बिछ गई और हम वहां जा भी बैठे। आलू के परांठे बनाने को कह दिया। परांठे खाये तो नीचे से एक ग्रुप आ गया। ये लोग खच्चर पर सवार थे। मुम्बई की कुछ महिलाएं थीं। सबसे पहले एक आईं, इनका नाम नीता था। 35 के आसपास उम्र रही होगी। भारी-भरकम कद-काठी। निशा ने धीरे से मुझसे कहा कि बेचारे खच्चर पर कैसी बीत रही होगी। खैर, अगले तीन दिनों तक हम मिलते रहे। उन्होंने पूर्वोत्तर समेत भारत के ज्यादातर इलाकों में भ्रमण कर रखा है। अच्छा लगता है जब कोई महिला इस तरह यात्रा करती हुई मिलती है।
आठ बजे पुंग बुग्याल से चल दिये। घना जंगल तो है ही। आज कुछ चहल-पहल दिखी। कई बार तो ऊपर से लोग आते मिले और मुम्बई वाला ग्रुप हमारे पीछे था ही। खूब चौडी पगडण्डी है। जंगल होने के बावजूद भी कोई डर नहीं लगा। जितना ऊपर चढते जाते, नीचे पुंग बुग्याल उतना ही शानदार दिखता जाता। चारों ओर घना जंगल और बीच में घास का छोटा सा मैदान। हम आश्चर्य भी करते कि रात हम वहां रुके थे और अब इतना ऊपर आ गये।

Wednesday, November 25, 2015

रुद्रनाथ यात्रा: गोपेश्वर से पुंग बुग्याल

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25 सितम्बर 2015
पांचों केदारों में केवल रुद्रनाथ ही अनदेखा बचा हुआ था, बाकी चारों केदार मैंने देख रखे हैं। सभी के लिये कुछ न कुछ पैदल अवश्य चलना पडता है। लेकिन रुद्रनाथ की यात्रा को कठिनतम माना जाता है। मैंने इसके कई यात्रा-वृत्तान्त पढ रखे हैं लेकिन एक बात का हमेशा सन्देह रहा। गोपेश्वर से रुद्रनाथ जाने के दो रास्ते हैं- एक तो मण्डल, अनुसुईया होते हुए और दूसरा सग्गर होते हुए। मुझे मण्डल का तो पता चल गया कि यह चोपता रोड पर गोपेश्वर से पन्द्रह किलोमीटर दूर है। लेकिन कभी यह पता नहीं चला कि सग्गर कहां है। चोपता रोड पर ही है या किसी और सडक पर है। सग्गर से आगे भी कोई सडक जाती है या सग्गर में ही सडक समाप्त हो जाती है- इस बात को जानने की मैंने खूब कोशिश कर ली लेकिन मैं यात्रा पर जाने तक नहीं जान पाया था कि सग्गर कहां है। गूगल मैप पर भी सग्गर की कोई स्थिति नहीं है। जब आपको यह आधारभूत जानकारी ही नहीं होगी तो आपको आगे का कार्यक्रम बनाने में भी परेशानी आयेगी।

Monday, November 23, 2015

गैरसैंण से गोपेश्वर और आदिबद्री

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25 सितम्बर 2015
   दिल्ली से चले थे तो हमारी योजना बद्रीनाथ और सतोपंथ जाने की थी लेकिन रात जब सतोपंथ के बारे में नेट पर पढने लगे तो पता चला कि वहां जाने का परमिट लेना होता है और गाइड-पोर्टर और राशन-पानी भी साथ लेकर चलना होता है। तभी मैंने सतोपंथ जाना स्थगित कर दिया और विचार किया कि रुद्रनाथ जायेंगे। निशा तो तुरन्त राजी हो गई लेकिन करण को समझाना पडा क्योंकि वह बद्रीनाथ और सतोपंथ का ही विचार किये बैठा था। आखिरकार वह भी मान गया।
   सुबह सवा आठ बजे बिना नाश्ता किये गैरसैंण से चलना पडा क्योंकि रेस्टोरेंट का रसोईया आज नहीं आया था। यहां से आदिबद्री ज्यादा दूर नहीं है। वहीं नाश्ता करेंगे।
   कुछ दूर तक चढाई है, फिर उतराई है। यहां हमें चाय की खेती दिखाई दी। उत्तराखण्ड में अक्सर चाय नहीं होती लेकिन यहां कुछ जगहों पर चाय की खेती होती है। यह इलाका मुझे बडा पसन्द आया। एक तो यह काफी ऊंचाई पर है, फिर चीड का जंगल। कहीं 2000 मीटर से ऊंची जगह पर अगर आपको चीड का जंगल मिले तो समझना कि आप वहां पूरा दिन भी बिता सकते हैं। बार-बार रुकने को मन करता है। खूब फोटो खींचने को मन करता है।

Friday, November 20, 2015

दिल्ली से गैरसैंण और गर्जिया देवी मन्दिर

   सितम्बर का महीना घुमक्कडी के लिहाज से सर्वोत्तम महीना होता है। आप हिमालय की ऊंचाईयों पर ट्रैकिंग करो या कहीं और जाओ; आपको सबकुछ ठीक ही मिलेगा। न मानसून का डर और न बर्फबारी का डर। कई दिनों पहले ही इसकी योजना बन गई कि बाइक से पांगी, लाहौल, स्पीति का चक्कर लगाकर आयेंगे। फिर ट्रैकिंग का मन किया तो मणिमहेश परिक्रमा और वहां से सुखडाली पास और फिर जालसू पास पार करके बैजनाथ आकर दिल्ली की बस पकड लेंगे। आखिरकार ट्रेकिंग का ही फाइनल हो गया और बैजनाथ से दिल्ली की हिमाचल परिवहन की वोल्वो बस में सीट भी आरक्षित कर दी।
   लेकिन उस यात्रा में एक समस्या ये आ गई कि परिक्रमा के दौरान हमें टेंट की जरुरत पडेगी क्योंकि मणिमहेश का यात्रा सीजन समाप्त हो चुका था। हम टेंट नहीं ले जाना चाहते थे। फिर कार्यक्रम बदलने लगा और बदलते-बदलते यहां तक पहुंच गया कि बाइक से चलते हैं और मणिमहेश की सीधे मार्ग से यात्रा करके पांगी और फिर रोहतांग से वापस आ जायेंगे। कभी विचार उठता कि मणिमहेश को अगले साल के लिये छोड देते हैं और इस बार पहले बाइक से पांगी चलते हैं, फिर लाहौल में नीलकण्ठ महादेव की ट्रैकिंग करेंगे और वापस रोहतांग से आ जायेंगे। इस यात्रा में ऊधमपुर के रहने वाले रोमेश शर्मा जी ने भी सहमति दे दी। दिल्ली का ही एक मित्र करण जादौन अपनी बुलेट पर साथ चलेगा और पठानकोट से हम रोमेश जी को ले लेंगे।

Friday, November 13, 2015

पातालकोट से इंदौर वाया बैतूल

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पातालकोट हम घूम चुके और अब बारी थी वापस इन्दौर जाने की। एक रास्ता तो यही था जिससे हम आये थे यानी पिपरिया, होशंगाबाद, भोपाल होते हुए। इस रास्ते को हम देख चुके थे। दूसरा रास्ता था बैतूल होते हुए। मैं इसी बैतूल वाले से जाना चाहता था। नया रास्ता, नई जगह देखने को मिलेगी। तामिया से दोनों रास्ते अलग होते हैं। हम बायें मुड गये और जुन्नारदेव के लिये ग्रामीण रास्ता पकड लिया। तामिया से जुन्नारदेव 28 किलोमीटर है और सारा रास्ता अच्छा बना है। सडक सिंगल लेन है यानी पतली सी है और कोई ट्रैफिक नहीं। ऊंची-नीची छोटी-छोटी पहाडियां इस रास्ते को बाइक चलाने के लिये शानदार बनाती हैं। आधा घण्टा लगा जुन्नारदेव पहुंचने में।
शाम के चार बज चुके थे। बैतूल अभी भी लगभग 100 किलोमीटर था। मुझे इस दूरी को तय करने में लगभग तीन घण्टे लगेंगे, अगर सडक अच्छी हुई तो। यानी बैतूल पहुंचने में अन्धेरा हो जाना है। मैं अन्धेरे में बाइक चलाना पसन्द नहीं करता इसलिये तय कर लिया कि रात बैतूल रुकना है। उधर सुमित पहले ही काफी लेट हो रहा था। उन्हें जल्द से जल्द इन्दौर पहुंचना था इसलिये आज वे बैतूल नहीं रुक सकते थे। सहमति बनी और हम जुन्नारदेव में अलग हो गये। सुमित तेज बाइक चलाता है और जब तक हम बैतूल पहुंचेंगे, वो हरदा पहुंच जायेगा।

Monday, November 9, 2015

पातालकोट भ्रमण और राजाखोह की खोज

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   अगले दिन यानी 24 अगस्त को आराम से साढे आठ बजे सोकर उठे। तेज हवाएं अभी भी चल रही थीं। बाहर निकले तो घना कोहरा था। अगस्त में कोहरा आमतौर पर नहीं होता लेकिन यहां के भूगोल, तेज हवाओं और अगस्त के नम वातावरण की वजह से यहां ऊपर बादल बन गये थे जो कोहरे जैसे लग रहे थे। नीचे घाटी में कोई कोहरा नहीं होगा। अदभुत अनुभव था।
   मैं और सुमित बाइक पर दूध लेने चल दिये। चौकीदार ने बताया कि गांव में किसी के यहां दूध मिल जायेगा। डिब्बा लेकर हम एक घर में पहुंचे। आवाज देने पर एक लडका बाहर आया। पूछने पर उसने पहले तो हमें विस्मय से देखा, फिर बोला- अभी हमारी गईया नहीं ब्याई है। फिर हमने किसी और से नहीं पूछा और सीधे पहुंचे तीन किलोमीटर दूर छिन्दी बाजार में। बाजार खुलने लगा था और हलवाई के यहां हमारी उम्मीदों के विपरीत ताजा पोहा उपलब्ध था। कल हमें बताया गया था कि यहां खाने को कुछ नहीं मिलता। अगर पोहे का पता होता तो हम आज खिचडी नहीं बनाते। देर-सबेर यहां आना ही था। हम सभी पोहे को बडे चाव से खाते हैं, तो आराम से भरपेट खाते।

Monday, November 2, 2015

पचमढ़ी से पातालकोट

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23 अगस्त 2015
बहुत दिनों से सोच रखा था कि जब भी पचमढी जाऊंगा, तब पातालकोट भी जाना है। मेरे लिये पचमढी से ज्यादा आकर्षक पातालकोट था। अब जब हम पचमढी में थे और हमारे पास बाइक भी थी, तो इतना तो निश्चित था कि हम पातालकोट भी अवश्य जायेंगे। पातालकोट का रास्ता तामिया से जाता है, तामिया का रास्ता मटकुली से जाता है और मटकुली पचमढी जाते समय रास्ते में आता है। मटकुली में एक तिराहा है जहां से एक सडक पिपरिया जाती है, एक जाती है पचमढी और तीसरी सडक जाती है तामिया होते हुए छिन्दवाडा और आगे नागपुर।
डेढ बजे पचमढी से चल दिये और एक घण्टे में ही मटकुली पहुंच गये। रास्ता पहाडी है और ढलान भरा है। हम रात के अन्धेरे में पचमढी आये थे। तब यह रास्ता बहुत मुश्किल लग रहा था, अब उतना मुश्किल नहीं लगा। पचमढी में मौसम अच्छा था, लेकिन जितना नीचे आते गये, उतनी ही गर्मी बढती गई।

Friday, October 30, 2015

पचमढी: चौरागढ यात्रा

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   आज हम जल्दी उठे और साढे छह बजे तक कमरा छोड दिया। आज हमें चौरागढ जाना था और वापस आकर दोपहर से पहले पचमढी छोड देना था। कल हम महादेव गये थे, जो कि पचमढी से दस किलोमीटर दूर है। आज भी सबसे पहले महादेव ही गये। रास्ते भर कोई नहीं मिला। लेकिन महादेव जाकर देखा तो हमसे पहले भी कई लोग चौरागढ जाने को तैयार मिले। दुकानें खुली मिलीं और उत्पाती बन्दर भी पूरे मजे में मिले। पार्किंग में बाइकें खडी करने लगे तो दुकान वालों ने कहा कि उधर बाइक खडी मत करो, बन्दर सीट कवर फाड देंगे। यहां हमारे पास खडी कर दो। उनके कहे अनुसार बाइक खडी कीं और उनके ही कहे अनुसार सीटों पर पत्थर रख दिये ताकि बन्दर सीटों पर ज्यादा ध्यान न दें।
   पैदल रास्ता यहीं से शुरू हो जाता है हालांकि सडक भी थोडा घूमकर कुछ आगे तक गई है। करीब एक किलोमीटर बाद सडक और पैदल रास्ते मिले हैं। हमें किसी ने नहीं बताया इस बारे में। बाइक वहां तक आसानी से चली जाती हैं और उधर बन्दरों का आतंक भी नहीं है। खैर।

Wednesday, October 28, 2015

पचमढी: राजेन्द्रगिरी, धूपगढ और महादेव

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   अप्सरा विहार से लौटकर हम गये राजेन्द्रगिरी उद्यान। यहां जाने का परमिट नहीं लगता। हमारा गाइड सुमित था ही। राजेन्द्रगिरी जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है कि एक ऊंची जगह है। ज्यादा ऊंची नहीं है लेकिन यहां से पचमढी के कई अन्य आकर्षण दिखाई देते हैं। एक तरफ धूपगढ दिखता है तो दूसरी तरफ चौरागढ। राजेन्द्रगिरी में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की एक प्रतिमा है और अच्छा उद्यान भी है।
   इसके बाद रुख किया हमने धूपगढ का। यह पचमढी की सबसे ऊंची चोटी है। यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का अच्छा नजारा दिखता है। यहां जाने का परमिट लगता है, जिसे हम सुबह ही ले चुके थे। एक जगह जांच चौकी थी, जहां परमिट चेक किये और रजिस्टर में हमारी एण्ट्री की। सडक ठीक बनी है हालांकि संकरी और ‘बम्पी’ है। पहाडी रास्ता है और चढाई भी। कुछ ही दिन पहले तीज थी और उसके दो दिन बाद शायद नागपंचमी। आदिवासी समाज में नागों का बहुत महत्व होता है और इन्हें पूजा भी जाता है। तब यहां मेला लगा होगा। तभी तो रास्ते भर निर्जनता होने के बावजूद भी मेले के निशान मिलते गये।

Monday, October 26, 2015

यात्रा आयोजन- जलोडी जोत, ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क और पराशर झील

अभी पिछले सप्ताह मैं ग्वालियर में था। प्रशान्त जी के यहां डिनर का आनन्द ले रहा था। तभी उन्होंने सुझाव दिया कि अगले साल वे कई मित्र लद्दाख जायेंगे और मैं उनकी अगवानी करूं। किराये की गाडी लेंगे और निकल पडेंगे। उस समय वहां बैठे-बैठे इस मुद्दे पर खूब बातें हुईं।
वापस दिल्ली आकर मैं इस बारे में सोचने लगा। ऐसा नहीं है कि इस तरह की यात्राएं आयोजित करने के बारे में मैं पहली बार सोच रहा हूं। पहले भी मन में इस तरह के विचार आये हैं। क्या मैं इस तरह का आयोजन कर सकूंगा? इसमें जबरदस्त टीम-वर्क की आवश्यकता पडती है और अलग-अलग तरह के लोगों के साथ रहना भी होता है और उनकी समस्याएं सुननी-सुलझानी भी पडती हैं। मेरी प्रकृति अकेले रहने और भ्रमण करने की रही है। पहले भी कई बार यात्राओं पर अपने साथियों से मनमुटाव होता रहा है।
निशा के आने के बाद बहुत बडा परिवर्तन हुआ है। पहले पहले हमारी बहुत लडाई होती थी, अब सब ठीक होने लगा है। एक टीम-भावना मेरे अन्दर जाग्रत होने लगी है। सामने वाला क्या चाहता है, उसके अनुसार मैं स्वयं को ढालने लगा हूं।

Wednesday, October 21, 2015

पचमढी: पाण्डव गुफा, रजत प्रपात और अप्सरा विहार

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20 अगस्त 2015 की रात नौ बजे हम पचमढी पहुंचे। दिल्ली से चलते समय हमने जो योजना बनाई थी, उसके अनुसार हमें पचमढी नहीं आना था इसलिये यहां के बारे में कोई खोजबीन, तैयारी भी नहीं की। मुझे पता था कि यह एक सैनिक छावनी है। हमारे यहां लैंसडाउन और चकराता में भी सैनिक छावनियां हैं। दोनों के अनुभवों से मुझे सन्देह था कि इतनी रात को यहां कोई कमरा मिल जायेगा। लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ। अच्छी चहल-पहल थी और बाजार भी खुला था। सुमित यहां पहले आ चुका था, इसलिये हमारा मार्गदर्शक वही था। मेरे पास समय की कोई कमी नहीं थी। मेरी बस एक ही इच्छा थी कि वापसी में पातालकोट देखना है। आज हमारे पास बाइक है और पातालकोट यहां से ज्यादा दूर भी नहीं, इसलिये इस मौके को मैं नहीं छोडने वाला था। बाकी रही पचमढी, तो जैसे भी घुमाना है, घुमा।

Monday, October 19, 2015

भोजपुर, मध्य प्रदेश

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   अगस्त 2009 में मैं पहली बार मध्य प्रदेश घूमने गया था। सबसे पहले पहुंचा था भीमबेटका। उसी दिन इरादा बना भोजपुर जाने का। भीमबेटका के पास ही है। लेकिन कोई सार्वजनिक वाहन उपलब्ध न होने के कारण आधे रास्ते से वापस लौटना पडा। तब से कसक थी कि भोजपुर जाना है। आज जब बाइक साथ थी और हम उसी सडक पर थे जिससे थोडा सा हटकर भोजपुर है, तो हमारा भोजपुर जाना निश्चित था। भोपाल से थोडा सा आगे भैरोंपुर है। भैरोंपुर से अगर सीधे हाईवे से जायें तो औबेदुल्लागंज 22 किलोमीटर है। लेकिन अगर भोजपुर होते हुए जायें तो यही दूरी 30 किलोमीटर हो जाती है। यह कोई ज्यादा बडा फर्क नहीं है।
   सावन का महीना होने के कारण भोजपुर में थोडी चहल-पहल थी अन्यथा बाकी समय यहां सन्नाटा पसरा रहता होगा। बेतवा के किनारे है भोजपुर। राजा भोज के कारण यह नाम पडा। उन्होंने यहां बेतवा पर बांध बनवाये थे और इस शिव मन्दिर का निर्माण करवाया था। किन्हीं कारणों से निर्माण अधूरा रह गया। पूरा हो जाता तो यह बडा ही भव्य मन्दिर होता। इसकी भव्यता का अन्दाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि एक बडे ऊंचे चबूतरे पर मन्दिर बना है और मन्दिर में जो शिवलिंग है वो 5.5 मीटर ऊंचा व 2.3 मीटर परिधि का है। बिल्कुल विशालकाय शिवलिंग।

Friday, October 16, 2015

इन्दौर से पचमढी बाइक यात्रा और रोड स्टेटस

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21 अगस्त 2015
   मुझे छह बजे ही उठा दिया गया, नहीं तो मैं अभी भी खूब सोता। लेकिन जल्दी उठाना भी विवशता थी। आज हमें पचमढी पहुंचना था जो यहां से 400 किलोमीटर से ज्यादा है। रास्ते में देवास से सुमित को अपने साले जी को भी साथ लेना था। सीबीजेड एक्सट्रीम पर मैं और निशा थे जबकि बुलेट पर सुमित और उनकी पत्नी। साले जी की अपनी बाइक होगी। सुमित ने हमें धन्यवाद दिया कि हम दोनों को देखकर ही उनकी पत्नी भी साथ चलने को राजी हुई हैं अन्यथा उनका दोनों का एक साथ केवल इन्दौर-देवास-इन्दौर का ही आना-जाना होता था, कहीं बाहर का नहीं।
   तो साढे छह बजे यहां से चल दिये। सुबह-सुबह का समय था, आराम से शहर से पार हो गये। मेन रोड यानी एनएच 3 पर पहुंचे। यह शानदार छह लेन की सडक है। देवास तक हम इसी पर चलेंगे, उसके बाद भोपाल के लिये दूसरी सडक पकड लेंगे।

Wednesday, October 14, 2015

शीतला माता जलप्रपात, जानापाव पहाडी और पातालपानी

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   इन्दौर से जब महेश्वर जाते हैं तो रास्ते में मानपुर पडता है। यहां से एक रास्ता शीतला माता के लिये जाता है। यात्रा पर जाने से कुछ ही दिन पहले मैंने विपिन गौड की फेसबुक पर एक झरने का फोटो देखा था। लिखा था शीतला माता जलप्रपात, मानपुर। फोटो मुझे बहुत अच्छा लगा। खोजबीन की तो पता चल गया कि यह इन्दौर के पास है। कुछ ही दिन बाद हम भी उधर ही जाने वाले थे, तो यह जलप्रपात भी हमारी लिस्ट में शामिल हो गया।

शीतला माता जलप्रपात (विपिन गौड की फेसबुक से अनुमति सहित)

   मानपुर से शीतला माता का तीन किलोमीटर का रास्ता ज्यादातर अच्छा है। यह एक ग्रामीण सडक है जो बिल्कुल पतली सी है। सडक आखिर में समाप्त हो जाती है। एक दुकान है और कुछ सीढियां नीचे उतरती दिखती हैं। लंगूर आपका स्वागत करते हैं। हमारा तो स्वागत दो भैरवों ने किया- दो कुत्तों ने। बाइक रोकी नहीं और पूंछ हिलाते हुए ऐसे पास आ खडे हुए जैसे कितनी पुरानी दोस्ती हो। यह एक प्रसाद की दुकान थी और इसी के बराबर में पार्किंग वाला भी बैठा रहता है- दस रुपये शुल्क बाइक के। हेलमेट यहीं रख दिये और नीचे जाने लगे।

Monday, October 12, 2015

महेश्वर यात्रा

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20 अगस्त 2015
   हमें आज इन्दौर नहीं आना था। अभी दो दिन पैसेंजर ट्रेनों में घूमना था और तीसरे दिन यहां आना था लेकिन निशा एक ही दिन में पैसेंजर ट्रेन यात्रा करके थक गई और तब इन्दौर आने का फैसला करना पडा। महेश्वर जाने की योजना तो थी लेकिन साथ ही यह भी योजना थी कि दो दिनों में पैसेंजर यात्रा करते करते हम महेश्वर के बारे में खूब सारी जानकारी जुटा लेंगे, नक्शा देख लेंगे लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं हो सका। सुमित के यहां नेट भी बहुत कम चलता है, इसलिये हम रात को और अगले दिन सुबह को भी जानकारी नहीं जुटा पाये। हालांकि सुमित ने महेश्वर के बारे में बहुत कुछ समझा दिया लेकिन फिर भी हो सकता है कि हम महेश्वर के कुछ अत्यावश्यक स्थान देखने से रह गये हों।