Monday, January 26, 2015

मोटरसाइकिल यात्रा- ऋषिकेश, नीलकण्ठ और कद्दूखाल

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
सवा ग्यारह बजे हम बरनावा से निकल गये। अब हमें सीधे ऋषिकेश जाना था। यहां से सरधना लगभग 20 किलोमीटर है। बरनावा की सीमा से निकलते ही हिण्डन नदी पार की और हम बागपत जिले से मेरठ जिले में प्रवेश कर गये। सडक की जितनी तारीख की जाये, कम है। यूपी में ऐसी सडकें मिलती नहीं हैं। भूनी चौराहा पार करते करते सरधना पांच किलोमीटर रह जाता है। भूनी में मेरठ-शामली सडक इस बडौत-सरधना सडक को काटती है। भूनी से मेरा गांव दबथुवा लगभग 8 किलोमीटर मेरठ रोड पर है।
सरधना में बेतरतीब भीड ने हमारा स्वागत किया। सरधना से भी हमारा गांव आठ किलोमीटर दूर ही है। यहां एक बडा प्रसिद्ध चर्च है। सरधना से इतना नजदीक होने के बावजूद भी मैं आज तक यह चर्च नहीं देख सका। इस बार भी नहीं देखा।
सचिन को गूगल मैप के अनुसार चलने का शौक है। मैं चाहता था कि सरधना से दौराला जाया जाये और फिर नेशनल हाईवे से होते हुए मुजफ्फरनगर और रुडकी होते हुए हरिद्वार। लेकिन सचिन ने कहा कि गंगनहर के रास्ते चलेंगे। मैं इस रास्ते से नहीं जाना चाहता था क्योंकि यह सिंगल रोड है। इस पर अब काफी ट्रैफिक भी रहने लगा है और गन्ने से लदी बुग्गियां व ट्रैक्टर ऐसे रास्तों पर बडा परेशान करते हैं। दौराला के रास्ते आठ-दस किलोमीटर का चक्कर जरूर पडेगा लेकिन ऐसी कोई समस्या नहीं आयेगी। लेकिन सचिन की जिद व अरुण की स्वीकृति के कारण गंगनहर के रास्ते चलने की मंजूरी देनी पडी।

Friday, January 23, 2015

लाक्षागृह, बरनावा

नई बाइक ली और अगले ही दिन लाइसेंस के लिये पहुंच गया लोनी रोड। वहां जो लम्बी लाइन देखी, तत्काल वापस भाग आया। फिर अगले दिन गया कडकडडूमा के पास सूरजमल विहार। यहां बिल्कुल लाइन नहीं थी। मोटरसाइकिल के लाइसेंस की फीस 30 रुपये जमा की और उसी दिन लर्निंग लाइसेंस लेकर लौट आया। अब इन्तजार था कि कब एक महीना पूरा हो और कब मैं परमानेंट लाइसेंस लेने जाऊं। लेकिन इस दौरान मुझे बाइक चलानी भी सीखनी थी। अब से पहले मैंने कभी भी बाइक नहीं चलाई थी। एक महीने बाद जब मैं ड्राइविंग टेस्ट देने पहुंचा तो घबराहट होनी स्वाभाविक थी। मेरे देखते ही देखते कई बाइक वाले असफल भी घोषित हुए।
आखिरकार मैं सफल हुआ। शनिवार 22 नवम्बर को परमानेंट लाइसेंस घर आ गया। अब निश्चित हो गया कि सोमवार को यात्रा पर निकलूंगा। पहले ही बता चुका हूं कि मेरी पहली पैदल हिमालय यात्रा नीलकण्ठ महादेव की थी, पहली साइकिल यात्रा भी नीलकण्ठ की ही थी तो तय कर लिया कि पहली बाइक यात्रा भी नीलकण्ठ की ही होगी। इसे और ज्यादा आकर्षक बनाने के लिये नाम दिया- लाक्षागृह से लाखामण्डल। लाक्षागृह बडौत के पास है और लाखामण्डल चकराता के पास। दोनों की कहानी एक ही है कि कौरवों ने लाख का एक महल बनवाया था और उसमें पाण्डवों को रहने के लिये राजी कर लिया। जब पाण्डव रहने लगे तो कौरवों ने धोखे से उसमें आग लगा दी। पाण्डव किसी तरह सुरंगों के रास्ते बचकर निकले। यही सब देखने के लिये लाक्षागृह और लाखामण्डल जाना था।

Wednesday, January 21, 2015

जांस्कर यात्रा का कुल खर्च

इस यात्रा वृत्तान्त को पूरा पढने के लिये यहां क्लिक करें
यह एक बेहद खर्चीली यात्रा रही। इसका खर्च विधान के माध्यम से काफी चर्चा में रहा। मैं बताता हूं हमारा कहां-कहां कितना खर्च हुआ।
दिल्ली से श्रीनगर फ्लाइट खर्च= 4200 रुपये
(विधान और प्रकाश जी दूसरी फ्लाइट से गये थे। उनकी फ्लाइट सस्ती थी। उनके 3000-3000 रुपये के आसपास दिल्ली से श्रीनगर का खर्च आया।)
घर से निकला, शास्त्री पार्क से नई दिल्ली तक मेट्रो से गया, जेब से कुछ नहीं लगा, अपना स्टाफ कार्ड काम करता है। इसके बाद एयरपोर्ट लाइन पर अपना यह कार्ड काम नहीं करता, इसलिये टिकट लेना पडा।

Monday, January 19, 2015

फोटोग्राफी चर्चा- 1

फोटोग्राफी पर चर्चा के लिये मित्रों से फोटो आमन्त्रित किये थे। काफी संख्या में फोटो आये। कुछ फोटो की पिछली डायरियों में चर्चा की थी, बाकी की इस बार कर देते हैं। 
बहुत मुश्कित है किसी के काम में कमियां निकालना। चर्चा के बहाने असल में कमियां ही निकाली जाती हैं। कमी न भी हो, तब भी... जबरदस्ती। असल में जब कोई भी मित्र अपने सैंकडों हजारों फोटो में से दो-चार फोटो भेजेगा तो निश्चित ही वह अपने सर्वोत्तम फोटो ही भेजेगा। इस बात में कोई शक नहीं कि सभी फोटो बेहद शानदार हैं। लेकिन फोटो आमन्त्रित करने का मकसद उन फोटो की वाहवाही करना नहीं है। इस काम का मकसद ही है कमियां निकालना तथा और ज्यादा प्रयोग करने की सलाह देना। मैं सभी मित्रों को यही सलाह देता हूं कि फोटो तो ठीक है लेकिन अगर ऐसा होता तो ये होता, वैसा होता तो वो होता। वास्तव में फोटोग्राफी कैमरे को क्लिक क्लिक करना भर नहीं होता। इसमें आपको बहुत प्रयोग भी करने होते हैं।
लेकिन मुश्किल यही है कि सर्वोत्तम फोटो होने के बाद भी थोडी बहुत कमियां निकाली जायेंगी तो फोटोग्राफर थोडा-बहुत आहत भी होता है। निश्चित ही आहत जरूर होगा। यही सोचकर अब इस काम को बन्द करने का निश्चय कर लिया (नहीं किया) है। 

Friday, January 16, 2015

शिंगो-ला से दिल्ली वापस

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
अगले दिन यानी 18 अगस्त को सुबह आठ बजे सोकर उठा। चाय पी, कुछ बिस्कुट खाये और जैम के साथ लद्दाखी रोटी भी। हालांकि अब मैं हिमाचल में था, लाहौल में था लेकिन यह लद्दाख से ज्यादा भिन्न नहीं है। साढे आठ बजे यहां से चल पडा।
आज मुझे अपने बाकी दोनों साथियों से मिलना है। पुरने में जब हम अलग हुए थे, तब यही तय हुआ था कि हम चार दिन बाद दारचा में मिलेंगे। सुबह वे लेह से चले होंगे, मैं यहां से चलूंगा। देखते हैं कौन पहले दारचा पहुंचता है?
लामाजी द्वारा बनवाई जा रही सडक लगभग शिंगो-ला तक पहुंच चुकी है। वह सडक यहां से बस कुछ ही ऊपर थी। नीचे पगडण्डी थी। मुझे अभी भी इतनी थकान थी कि मैं करीब सौ मीटर ऊपर सडक पर नहीं जाना चाहता था। लेकिन इसका भी अपना नुकसान था। ऊपर सडक बनी तो मलबा नीचे तक आ गया था। उससे पगडण्डी भी प्रभावित हुई थी, इसलिये चलने में समस्या आ रही थी। एक बार हिम्मत करके ऊपर सडक तक पहुंच गया और बाकी पैदल यात्रा मजे में कटी।

Wednesday, January 14, 2015

गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
आज तारीख थी 17 अगस्त 2014
आपको ध्यान होगा कि मैं पवित्र गोम्बोरंजन पर्वत के नीचे एक अकेले कमरे में सो गया था। रात में एकाध बार आंख भी खुली थी लेकिन मैं चूंकि सुरक्षित स्थान पर था, इसलिये कोई डर नहीं लगा। हां, एकान्त में होने का एक अजीब सा डर तो होता ही है।
साढे सात बजे आंख खुली। कुछ बिस्कुट खाये, पानी पीया, बिस्तर समेटा और सवा आठ बजे तक निकल पडा। अब ऊंचाई बढने लगी थी और रास्ता भी ऊबड खाबड होने लगा था। जिस स्थान पर मैं सोया था, वो जगह समुद्र तल से 4250 मीटर पर थी, अब जल्दी ही 4400 मीटर भी पार हो गया। वैसे तो अभी भी बडी चौडी घाटी सामने थी लेकिन इसमें छोटी छोटी कई धाराओं के कारण रास्ता बिल्कुल किनारे से था जहां बडे-बडे पत्थरों की भरमार थी।
सामने बहुत दूर खच्चरों का एक बडा दल इस घाटी को पार कर रहा था। कैमरे को पूरा जूम करके देखा तो पता चला कि उन पर कुछ राशन लदा है और कुछ लोग पैदल भी चल रहे हैं। निश्चित ही वह एक ट्रेकिंग ग्रुप होगा जो आज लाखांग में रुका होगा। आज शिंगो-ला पार कर लेगा।

Monday, January 12, 2015

पदुम-दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
16 अगस्त 2014
सुबह साढे आठ बजे सोकर उठा। हालांकि रात जब सोने जा रहा था तो दुकान मालकिन से यही कहकर सोया था कि सुबह छह बजे चल पडूंगा। सुबह छह बजे आंख भी खुली थी लेकिन बाहर बूंदाबांदी हो रही थी। मैं फिर सो गया। अबकी उठा तो साढे आठ बज चुके थे और तेज धूप टेंट पर पडने लगी थी। दुकान भी खुल चुकी थी। सरचू जाने वाले विदेशियों के ग्रुप का साजो-सामान उखड चुका था और खच्चरों पर लादा जा रहा था।
मैं तय कार्यक्रम से काफी पीछे था। सुबह सवेरे चलने का मकसद इतना ही था ताकि कुछ समय व दूरी की पूर्ति कर सकूं। परसों शाम तक हर हाल में दारचा पहुंचना है। दारचा में मुझे विधान व प्रकाश जी मिलेंगे, कल ही इस बारे में सबकुछ तय हो गया था। अगर मैं न पहुंचा तो वे दारचा में मेरी प्रतीक्षा करते रह जायेंगे। लेकिन बुरी आदत है देर तक सोने की, सोता ही रह गया।

Friday, January 9, 2015

पदुम- दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
आज देश में स्वतन्त्रता दिवस मनाया जा रहा था और हम जांस्कर के दुर्गमतम स्थान पर छोटे से गांव के छोटे से खेत में तम्बू लगाये पडे सो रहे थे। हमें तिरंगा देखना था और दो घरों के गांव पुरने में इसकी कोई सम्भावना नहीं थी। उम्मीद थी कि आगे बढेंगे तो कहीं किसी बडे गांव में स्कूल मिलेगा और हम तिरंगा देख सकेंगे।
आगे बढने से पहले थोडा सा भूतकाल में लौटते हैं। कल की बात है। जब हम फुकताल से पुरने आये तो हमें घोडे वाला मिला। यह वही घोडे वाला था जो हमें परसों शाम अनमो से चा के रास्ते में मिला था और हमने उसे सुबह पुरने में मिलने को कहा था। जिस समय हमारी घोडे वाले से बात हुई थी, उस समय हमारा इरादा पुरने रुकने का ही था लेकिन बाद में अन्धेरा हो गया तो इरादा बदल गया और हम चा रुक गये। हालत हमारी तब ऐसी थी कि हम इस वाकये को भूल गये।
अब आगे क्या हुआ, यह भी जान लीजिये। वो घोडे वाला तेंगजे का था जो पुरने से भी करीब 15 किलोमीटर आगे है। वह पहले अपने घर गया। उसे पुरने तक पहुंचने में ही अन्धेरा हो गया होगा। अपने घर वह कम से कम दस ग्यारह बजे रात को पहुंचा होगा। फिर रात को ही वहां से पुरने लौट आया और सुबह हमें ढूंढने लगा। लेकिन हम वहां होते तो उसे मिलते भी। तब हम चा में थे और फुकताल जाने वाले थे। वह हमें ढूंढता रहा लेकिन हम नहीं मिले। फिर दोपहर को प्रकाश जी और विधान का सामान लेकर एक आदमी पुरने गया। आपको याद होगा कि हमने आठ सौ रुपये में सामान चा से पुरने पहुंचाने के लिये एक आदमी को कहा था और खाली हाथ फुकताल चले गये थे। उस आदमी ने वहां हमारे बारे में बताया। उससे हमने किसी घोडे वाले को तैयार करने को भी कहा था। उसने एक घोडे वाले को तैयार कर दिया। अब पुरने में दो घोडे वाले ऐसे हो गये जो हमारा इंतजार कर रहे थे।

Wednesday, January 7, 2015

अदभुत फुकताल गोम्पा

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें

   जब भी विधान खुश होता था, तो कहता था- चौधरी, पैसे वसूल हो गये। फुकताल गोम्पा को देखकर भी उसने यही कहा और कई बार कहा। गेस्ट हाउस से इसकी दूरी करीब एक किलोमीटर है और यहां से यह विचित्र ढंग से ऊपर टंगा हुआ दिखता है। इसकी आकृति ऐसी है कि घण्टों निहारते रहो, थकोगे नहीं। फिर जैसे जैसे हम आगे बढते गये, हर कदम के साथ लगता कि यह और भी ज्यादा विचित्र होता जा रहा है।

   गोम्पाओं के केन्द्र में एक मन्दिर होता है और उसके चारों तरफ भिक्षुओं के कमरे होते हैं। आप पूरे गोम्पा में कहीं भी घूम सकते हैं, कहीं भी फोटो ले सकते हैं, कोई मनाही व रोक-टोक नहीं है। बस, मन्दिर के अन्दर फोटो लेने की मनाही होती है। यह मन्दिर असल में एक गुफा के अन्दर बना है। कभी जिसने भी इसकी स्थापना की होगी, उसी ने इस गुफा में इस मन्दिर की नींव रखी होगी। बाद में धीरे-धीरे यह विस्तृत होता चला गया। भिक्षु आने लगे और उन्होंने अपने लिये कमरे बनाये तो यह और भी बढा। आज इसकी संरचना पहाड पर मधुमक्खी के बहुत बडे छत्ते जैसी है। पूरा गोम्पा मिट्टी, लकडी व पत्थरों का बना है। जांस्कर में बारिश नहीं होती इसलिये मिट्टी का बना होने के बावजूद भी यह अभी तक टिका है।

Monday, January 5, 2015

डायरी के पन्ने- 28

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।

1. पता है कुछ ही दिन पहले तक इस पोस्ट का शीर्षक क्या था? इसका शीर्षक था- डायरी के पन्ने- आखिरी भाग। इसमें कुछ नहीं लिखा था, बस जो बचे-खुचे फोटो थे, मित्रों ने भेज रखे थे चर्चा के लिये, उन्हें ज्यों का त्यों लगा दिया था बिना किसी कैप्शन के, बिना किसी चर्चा के। फिर अब ख्याल आया कि महीने में दो बार डायरी के पन्ने छपते हैं, यानी सालभर में चौबीस पोस्ट ऐसे ही हो जाती हैं बिना किसी यात्रा के। अब तो फोटो-चर्चा भी शुरू कर रहा हूं।
असल में डायरी के पन्ने लिखने में समय बहुत कम लगता है और फोटो चर्चा में तो और भी कम। किसी यात्रा-वृत्तान्त के मुकाबले बहुत ही कम। और इन्हें पसन्द भी किया जाता है। यात्रा-वृत्तान्त में पहले यात्रा करो, फिर वापस आकर थकान उतारो और फिर लिखना शुरू करो। फोटो का चुनाव करो, उन्हें एडिट करो। डायरी में ऐसा कुछ नहीं है। पन्द्रह दिन में दो घण्टे लगते हैं और एक अच्छी-खासी डायरी तैयार। और फोटो चर्चा में? मित्र लोग फोटो भेज देते हैं। न उनका चुनाव करने का झंझट, न एडिटिंग का झंझट; बस फोटो अपलोड करके चार लाइनें लिख दो, किसी की वाहवाही कर दो, किसी में कमी निकाल दो, किसी को सुझाव दे दो और काम खत्म।

Friday, January 2, 2015

फुकताल गोम्पा की ओर

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
सुबह आठ बजे आंख खुली। आज हम जमकर सोये। रात ही तय हो गया था कि आज क्या करना है। तय ये हुआ था कि आज एक आदमी विधान और प्रकाश जी का सामान लेकर पुरने जायेगा। मैं अपना सामान अपने साथ ही रखूंगा। वे दोनों खाली हाथ फुकताल गोम्पा जायेंगे और शाम को पुरने में सामान ले लेंगे। चा से पुरने लगभग दो किलोमीटर है। सारा ढलान है, फिर भी उस आदमी ने सामान के आठ सौ रुपये मांगे। मजबूरी थी इसलिये देने पडे। साथ ही उसे यह भी बता दिया कि पुरने जाकर घोडे या खच्चर का इंतजाम करके रखना। हमें उनकी सख्त आवश्यकता थी।
पिछली पोस्ट में बताया था कि पुरने में सारप में एक नदी और आकर मिलती है। यह नदी शिंगो-ला से आती है, इसलिये चलिये इसे सुविधा के लिये शिंगो नदी कह देते हैं। सारप नदी बारालाचा-ला से निकलती है और सरचू होते हुए लम्बा चक्कर लगाकर यहां तक आती है। हमें शिंगो-ला जाने के लिये पुरने में सारप को छोड देना है और अपना सफर शिंगो नदी के साथ साथ तय करना है। लेकिन पुरने से पांच किलोमीटर दूर सारप नदी की घाटी में अदभुत फुकताल गोम्पा है। हम फुकताल गोम्पा को अवश्य देखना चाहते थे। उसके लिये सबसे प्रचलित और सुविधाजनक रास्ता पुरने से जाता है। उधर हम पुरने नहीं पहुंचे थे, उससे कुछ पहले चा में थे। गोम्पा का एक रास्ता चा से भी जाता है। चा वाला रास्ता सारप नदी के इस तरफ से है तो पुरने वाला उस तरफ से। हम इस तरफ से फुकताल जायेंगे और उस तरफ वाले रास्ते से होते हुए पुरने चले जायेंगे। पुरने में हमें सामान भी मिल जायेगा और घोडे भी। अच्छा हां, हम इस बात को भूल ही गये थे कि कल हमने एक घोडे वाले से भी बात की थी और उसे पुरने मिलने को कहा था। अब वह हमें पुरने में ढूंढ रहा होगा। चलिये, उसका किस्सा बाद में बताऊंगा।

Monday, December 29, 2014

2014 की घुमक्कडी का लेखा-जोखा

यात्राओं के लिहाज से यह साल बिल्कुल भी शानदार नहीं रहा। एक के बाद एक बिगडते समीकरण, यात्राओं को बीच में छोडना; मतलब जो नहीं होना चाहिये था, वो सब हुआ। कुछ बडी यात्राएं जरूर हुईं लेकिन एकाध को छोडकर लगभग सभी में कुछ न कुछ गडबड होती रही। कई बार ऐसा लगा... बल्कि अब भी ऐसा लग रहा है कि इस साल जो भी यात्राएं कीं, सभी जबरदस्ती की गई यात्राएं थीं।
चलिये, पहले बात करते हैं उन यात्राओं की जिनका वृत्तान्त प्रकाशित हुआ।
साल के शुरू में ही जब सुना कि कश्मीर में भारी बर्फबारी हो रही है तो यहां की ट्रेन में यात्रा करने का मन हो गया। यहां ब्रॉड गेज है और भारत की एकमात्र ऐसी ब्रॉडगेज की लाइन है जहां बर्फ पडती है। जब शून्य से नीचे के तापमान में कश्मीर गया तो दूर तक फैली बर्फ में ट्रेन को गुजरते देखना बेहद सुखद एहसास था।

Friday, December 26, 2014

पदुम-दारचा ट्रेक- अनमो से चा

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
आपको याद होगा कि हम अनमो पहुंच गये थे। पदुम-दारचा ट्रेक आजकल अनमो से शुरू होता है। वास्तव में यह ट्रेक अब अपनी अन्तिम सांसे गिन रहा है। जल्दी ही यह ‘पदुम-दारचा सडक’ बनने वाला है। पदुम की तरफ से चलें तो अनमो से आगे तक सडक बन गई है और अगर दारचा की तरफ से देखें तो लगभग शिंगो-ला तक सडक बन गई है। मुख्य समस्या अनमो से आठ-दस किलोमीटर आगे तक ही है। फिर शिंगो-ला तक चौडी घाटी है, कच्ची मिट्टी है। सडक और तेजी से बनेगी। एक बार सडक बन गई तो ट्रेक का औचित्य समाप्त। इसी तरह पदुम को निम्मू से भी जोडने का काम चल रहा है। निम्मू वो जगह है जहां जांस्कर नदी सिन्धु नदी में मिलती है। पदुम से काफी आगे तक सडक बन चुकी है और उधर निम्मू से भी बहुत आगे तक सडक बन गई है। बीच में थोडा सा काम बाकी है। सुप्रसिद्ध चादर ट्रेक इसी पदुम-निम्मू के बीच में होता है। निम्मू से चलें तो चिलिंग से आगे तक सडक बन गई है। जहां सडक समाप्त होती है, वहीं से चादर ट्रेक शुरू हो जाता है। जब यह सडक पूरी बन जायेगी तो चादर ट्रेक पर भी असर पडेगा। उधर पदुम और कारगिल पहले से ही जुडे हैं।

Wednesday, December 24, 2014

जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
अगले दिन सुबह साढे तीन बजे ही ड्राइवर ने आवाज लगा दी। कसम से इस समय उठने का बिल्कुल भी मन नहीं था। सर्दी में रजाई छोडने का क्षण मेरे लिये बडा दुखदाई होता है। लेकिन उठना तो था ही। चार बजते बजते यहां से निकल चुके थे। अभी भी रात काफी थी। पांच बजे जाकर कहीं उजाला होना शुरू होगा।
आगे चलकर सूरू का पाट अत्यधिक चौडा हो गया और सडक छोडकर ड्राइवर ने गाडी सीधे पत्थरों में घुसा दी। ऊबड-खाबड रास्ता अभी तक था, ऊबड खाबड अभी भी है तो कुछ भी फर्क पता नहीं चला। पत्थरों से कुछ देर में पुनः सडक पर आ गये। कुछ ही आगे एक जगह गाडी रोक दी। यहां एक सन्तरी खडा था। यह असल में रांगडुम गोम्पा था। बडा प्रसिद्ध गोम्पा है यह। इसी के पास एक चेकपोस्ट है। यह पता नहीं सेना की चेकपोस्ट है या बीएसएफ की या किसी और बल की। पुलिस की तो नहीं है। ड्राइवर ने रजिस्टर में एण्ट्री की। हम सन्तरी को देखकर हैरान थे। आंखों में नींद का नामोनिशान तक नहीं था। जबकि यहां न कोई पाकिस्तान की सीमा है, न किसी चीन की। यहां ट्रैफिक भी बिल्कुल नहीं था। आखिरी गाडी कल दिन रहते ही गुजरी होगी। हमारे बाद जो गाडी आयेगी, वो भी उजाला होने के बाद ही आयेगी।

Monday, December 22, 2014

खूबसूरत सूरू घाटी

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
कल ही पता चल गया था कि पदुम तक कोई बस नहीं जाती बल्कि सुबह सुबह सूमो चलती हैं। कारगिल से पदुम की दूरी लगभग ढाई सौ किलोमीटर है और शेयर्ड सूमो में प्रति यात्री डेढ हजार रुपये किराया लगता है। हमारे पास भी अब डेढ हजार देकर सूमो में जाने के अलावा कोई चारा नहीं था लेकिन सुबह सोते रह गये और जितनी गाडियां पदुम जानी थीं, सभी जा चुकी थीं।
विधान और प्रकाश जी सूमो स्टैण्ट की तरफ चले गये और मैं कमरे पर ही रुका रहा। इस दौरान मैं नहा भी लिया। कारगिल में बिल्कुल भी सर्दी नहीं थी, रात हम पंखा चलाकर सोये थे। जब दोनों आये तो बताया कि अब हमें टैक्सी ही करनी पडेगी जो नौ हजार की पडेगी। इसका अर्थ था तीन-तीन हजार प्रति व्यक्ति। विधान ने सबसे पहले विरोध किया। उसे अभी भी यकीन नहीं था कि अब कोई भी शेयर्ड गाडी नहीं मिलेगी। खैर, बाहर निकले। पता चला कि शाम चार बजे के आसपास एक बस परकाचिक तक जायेगी। मैंने तुरन्त नक्शा खोलकर देखा। परकाचिक तो आधी दूरी पर भी नहीं है। उसके बाद? परकाचिक तक पहुंचते पहुंचते रात हो जायेगी। बहुत ही छोटा सा गांव होगा दो-चार घरों का। पता नहीं कोई रुकने का ठिकाना मिलेगा या नहीं। हालांकि हमारे पास रुकने का पूरा इंतजाम था। खाना कारगिल से लेकर चलेंगे। लेकिन परकाचिक से आगे कैसे जायेंगे? कोई ट्रक मिल जायेगा। लेकिन रात को ट्रक का क्या काम? ट्रक अगर कोई जायेगा भी तो दिन में जायेगा। इस रास्ते पर राज्य परिवहन की बसें नहीं चलतीं। इसका अर्थ है कि रास्ता बडे वाहनों के लिये नहीं है। फिर ट्रक भी नहीं मिलेगा। कल सुबह वही सूमो मिलेंगी जो कारगिल से जायेंगी। तो फिर परकाचिक क्यों जायें? सुबह यहां कारगिल से ही उन्हीं सूमो को पकड लें। लेकिन ऐसा करने से हम फिर एक दिन लेट हो रहे थे।

Friday, December 19, 2014

जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल

तैयारी
अगस्त में भारत में मानसून पूरे जोरों पर होता है। हिमालय में तो यह काल बनकर बरसता है। मानसून में घुमक्कडी के लिये सर्वोत्तम स्थान दक्षिणी प्रायद्वीप माना जाता है लेकिन एक जगह ऐसी भी है जहां बेफिक्र होकर मानसून में घूमने जाया जा सकता है। वो जगह है लद्दाख। लद्दाख मूलतः एक मरुस्थल है लेकिन अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण यहां ठण्ड पडती है। हिमालय के पार का भूभाग होने के कारण यहां बारिश नहीं पडती- न गर्मियों में और न सर्दियों में। मानसून हो या पश्चिमी विक्षोभ; हिमालय सबकुछ रोक लेता है और लद्दाख तक कुछ भी नहीं पहुंचता। जो बहुत थोडी सी नमी पहुंचती भी है वो नगण्य होती है।
जांस्कर भी राजनैतिक रूप से लद्दाख का ही हिस्सा है और कारगिल जिले में स्थित है। जांस्कर का मुख्य स्थान पदुम है। अगर आप जम्मू कश्मीर राज्य का मानचित्र देखेंगे तो पायेंगे कि हिमाचल प्रदेश की सीमा पदुम के काफी नजदीक है। पदुम जाने के लिये केवल एक ही सडक है और वो कारगिल से है। बाकी दिशाओं में आने-जाने के लिये अपने पैरों व खच्चरों का ही सहारा होता है। चूंकि जांस्कर की ज्यादातर आबादी बौद्ध है इसलिये इनका सिन्धु घाटी में स्थित विभिन्न बौद्ध मठों में आना-जाना लगा रहता है। यह सारी आवाजाही पैदल ही होती है। अगर किसी को पदुम से हेमिस जाना हो तो सडक के रास्ते जाने में दो दिन लगेंगे, कारगिल व लेह होते हुए। जबकि स्थानीय निवासी पदुम से हेमिस दो दिनों में पैदल भी तय कर सकते हैं। जाहिर है कि वे पैदल यात्रा को ही वरीयता देंगे। इसलिये जांस्कर में ट्रैकिंग काफी प्रचलित है।

Tuesday, December 16, 2014

डायरी के पन्ने-27

नोट: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।

1. आज की चर्चा आरम्भ करते हैं गूगल मैप मेकर से। पिछली बार आपको बताया था कि गूगल मैप को कोई भी एडिट कर सकता है- मैं भी और आप भी। कुछ लोग अपने को बडा भयंकर जानकार समझते हैं। जिन्होंने कभी सोचा तक नहीं कि गूगल मैप को एडिट कैसे किया जाता है, वे एडिटर को दस बातें समझा सकते हैं। मुझे भी कुछ लोगों ने इसी तरह की बातें बताईं। मसलन आप गूगल को सुझाव भेजोगे कि यह रास्ता या यह गांव इस स्थान पर स्थित है। गूगल अपनी टीम को उस स्थान पर देखने भेजेगा कि वाकई वो रास्ता या गांव वहां है या नहीं। जब गूगल की टीम उस स्थान का सर्वे कर लेगी, तब आपका सुझाव गूगल मैप में प्रकाशित होना शुरू हो जायेगा। यह केवल अफवाह है। ऐसा कुछ नहीं है।

Sunday, December 14, 2014

ओशो चर्चा

हमारे यहां एक त्यागी जी हैं। वैसे तो बडे बुद्धिमान, ज्ञानी हैं; उम्र भी काफी है लेकिन सब दिखावटी। एक दिन ओशो की चर्चा चल पडी। बाकी कोई बोले इससे पहले ही त्यागी जी बोल पडे- ओशो जैसा मादर... आदमी नहीं हुआ कभी। एक नम्बर का अय्याश आदमी। उसके लिये रोज दुनियाभर से कुंवाई लडकियां मंगाई जाती थीं।
मैंने पूछा- त्यागी जी, आपने कहां पढा ये सब? कभी पढा है ओशो साहित्य या सुने हैं कभी उसके प्रवचन? तुरन्त एक गाली निकली मुंह से- मैं क्यों पढूंगा ऐसे आदमी को? तो फिर आपको कैसे पता कि वो अय्याश था? या बस अपने जैसों से ही सुनी-सुनाई बातें नमक-मिर्च लगाकर बता रहे हो?
चर्चा आगे बढे, इससे पहले बता दूं कि मैं ओशो का अनुयायी नहीं हूं। न मैं उसकी पूजा करता हूं और न ही किसी ओशो आश्रम में जाता हूं। जाने की इच्छा भी नहीं है। लेकिन जब उसे पढता हूं तो लगता है कि उसने जो भी प्रवचन दिये, सब खास मेरे ही लिये दिये हैं।

Friday, December 12, 2014

जगदलपुर से दिल्ली वापस

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
जगदलपुर से रायपुर की बसों की कोई कमी नहीं है। हालांकि छत्तीसगढ में राज्य परिवहन निगम जैसी कोई चीज नहीं है। सभी बसें प्राइवेट ऑपरेटरों की ही चलती हैं। उत्तर भारत में भी चलती हैं प्राइवेट ऑपरेटरों की लम्बी दूरी की बसें लेकिन उनका अनुभव बहुत कडवा होता है। पहली बात उनका चलने का कोई समय नहीं होता, जब बस भरेगी उसके एक घण्टे बाद चलेगी। दूसरा... क्या दूसरा? सभी निगेटिव पॉइण्ट हैं। मैंने कई बार भुगत रखा है उन्हें।
लेकिन यहां ऐसा नहीं है। सभी बसों की समय सारणी निर्धारित है और बसें उसी के अनुसार ही चलती हैं। लम्बी दूरी की बसें स्लीपर हैं जिनमें नीचे एक कतार बैठने की हैं और बाकी ऊपर सोने व लेटने के लिये। किराये में कोई अन्तर नहीं है, जितना सीट का किराया है, उतना ही बर्थ का। बस में चढो, अपनी पसन्दीदा या खाली जगह पर बैठो या लेटो। जब बस चलेगी तो कंडक्टर आयेगा और आपसे किराया ले लेगा। जगदलपुर से रायपुर 300 किलोमीटर है और इस दूरी का किराया था 240 रुपये। मैं तो हैरान था ही कि इतना सस्ता; सुनील जी भी हैरान थे कि पिछली बार जब जगदलपुर आये थे तो 270 रुपये किराया था, अब बढना चाहिये था लेकिन उल्टा घट गया। मार्ग ज्यादातर तो मैदानी है लेकिन कुछ हिस्सा पर्वतीय भी है खासकर केसकल की घाटी। कोई सन्देह नहीं कि सडक शानदार बनी है। हम ऊपर जाकर लेट गये। कई दिन से बारिश होने के कारण एक जगह से पानी चू रहा था। तौलिया लटकाकर उसे सीधे अपने ऊपर टपकने से बचाया।

Wednesday, December 10, 2014

तीरथगढ जलप्रपात

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
बारह बजे के आसपास जगदलपुर से तीरथगढ के लिये चल पडे। इस बार हम चार थे। मेरे और सुनील जी के अलावा उनके भतीजे शनि, ममेरे भाई मनीष दुबे और भानजे प्रशान्त भी साथ हो लिये। लेकिन ये तो कुल पांच हो गये। चलो, पांच ही सही। शनि ने अपनी कार उठा ली। बारिश में भीगने का खतरा टला।
कुछ दूर तक दन्तेवाडा वाली सडक पर चलना होता है, फिर एक रास्ता बायें सुकमा, कोंटा की ओर जाता है। इसी पर चल दिये। मुडते ही वही रेलवे लाइन पार करनी पडी जिससे अभी कुछ देर पहले मैं किरन्दुल से आया था।
थोडा ही आगे चलकर कुख्यात जीरम घाटी शुरू हो जाती है जो तकरीबन चालीस किलोमीटर तक फैली है। पिछले साल नक्सलियों ने जोरदार आक्रमण करके 28 कांग्रेसी नेताओं को मौत के घाट उतार दिया था। देश हैरान रह गया था इस आक्रमण को देखकर। यह पूरा इलाका पहाडी है और घना जंगल है। तीरथगढ जलप्रपात और कुटुमसर की गुफाएं इसी घाटी में स्थित हैं।

Monday, December 8, 2014

किरन्दुल रेलवे- किरन्दुल से जगदलपुर

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
अब बारी थी बारसूर के बाद पहले दन्तेवाडा जाने की और फिर किरन्दुल जाने की। बारसूर से दन्तेवाडा की दूरी 40 किलोमीटर है और दन्तेवाडा से किरन्दुल भी लगभग इतनी ही दूरी पर स्थित है। बारसूर से बीस किलोमीटर दूर गीदम पडता है जहां से जगदलपुर और बीजापुर की सडकें मिलती हैं। गीदम से दन्तेवाडा वाली सडक बहुत खराब हालत में थी। इसकी मरम्मत का काम चल रहा था, ऊपर से लगातार होती बारिश। पूरे बीस किलोमीटर कीचड में चलना पडा। गीदम में बीआरओ की सडक देखकर हैरान रह गया। मैं तो सोचता था कि देश के सीमावर्ती इलाकों में ही सीमा सडक संगठन है लेकिन यहां देश के बीचोंबीच बीआरओ को देखकर आश्चर्य तो होता ही है।
दन्तेवाडा में दन्तेश्वरी मन्दिर है जो एक शक्तिपीठ है। दन्तेवाडा आयें और इस मन्दिर को देखे बिना निकल जायें, असम्भव था। मन्दिर में केवल धोती बांध कर ही प्रवेश किया जा सकता है। यहां लिखा भी था कि पैंट या पायजामा पहनकर प्रवेश न करें। हालांकि मैंने हाफ पैंट पहन रखी थी, इसी के ऊपर वहीं अलमारी में रखी धोती लपेट ली।

Friday, December 5, 2014

बारसूर

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
चित्रकोट से बारसूर की सीधी दूरी 45 किलोमीटर है। वास्तव में इस रास्ते से हम शंकित थे। अगर आप दक्षिण छत्तीसगढ यानी बस्तर का नक्शा देखें तो चार स्थान एक चतुर्भुज का निर्माण करते हैं- जगदलपुर, चित्रकोट, बारसूर और गीदम। इनमें चित्रकोट से जगदलपुर, जगदलपुर से गीदम और गीदम से बारसूर तक शानदार सडक बनी है। इतनी जानकारी मुझे यात्रा पर चलने से पहले ही हो गई थी। जब सुनील जी से रायपुर में मिला तो उन्होंने चित्रकोट-बारसूर सीधी सडक पर सन्देह व्यक्त किया था। हम जगदलपुर पहुंच गये, फिर भी इस रास्ते की शंका बनी रही।
कुछ दिन पहले तरुण भाई बस्तर घूमने आये थे। उनसे बात की तो पता चला कि वे भी बारसूर से पहले गीदम गये, फिर जगदलपुर और फिर चित्रकोट। आखिरकार सन्देह सुनील जी के भतीजे ने दूर किया। उन्होंने बताया कि एक सडक है जो सीधे चित्रकोट को बारसूर से जोडती है जो तकरीबन पचास किलोमीटर की है। लेकिन साथ ही हिदायत भी दी कि उस रास्ते से न जाओ तो अच्छा। क्योंकि एक तो वह सडक बहुत खराब हालत में है और फिर वो घोर नक्सली इलाका है।

Wednesday, December 3, 2014

चित्रकोट जलप्रपात- अथाह जलराशि

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
चित्रधारा से निकले तो सीधे चित्रकोट जाकर ही रुके। जगदलपुर से ही हम इन्द्रावती नदी के लगभग समान्तर चले आ रहे थे। चित्रकोट से करीब दो तीन किलोमीटर पहले से यह नदी दिखने भी लगती है। मानसून का शुरूआती चरण होने के बावजूद भी इसमें खूब पानी था।
इस जलप्रपात को भारत का नियाग्रा भी कहा जाता है। और वास्तव में है भी ऐसा ही। प्रामाणिक आंकडे तो मुझे नहीं पता लेकिन मानसून में इसकी चौडाई बहुत ज्यादा बढ जाती है। अभी मानसून ढंग से शुरू भी नहीं हुआ था और इसकी चौडाई और जलराशि देख-देखकर आंखें फटी जा रही थीं। हालांकि पानी बिल्कुल गन्दला था- बारिश के कारण।
मोटरसाइकिल एक तरफ खडी की। सामने ही छत्तीसगढ पर्यटन का विश्रामगृह था। विश्रामगृह के ज्यादातर कमरों की खिडकियों से यह विशाल जलराशि करीब सौ फीट की ऊंचाई से नीचे गिरती दिखती है। मोटरसाइकिल खडी करके हम प्रपात के पास चले गये। जितना पास जाते, उतने ही रोंगटे खडे होने लगते। कभी नहीं सोचा था कि इतना पानी भी कहीं गिर सकता है। जहां हम खडे थे, कुछ दिन बाद पानी यहां तक भी आ जायेगा और प्रपात की चौडाई और भी बढ जायेगी।

Monday, December 1, 2014

डायरी के पन्ने- 26

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। इनसे आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। कृपया अपने विवेक से पढें।

1. आज की शुरूआत करते हैं जितेन्द्र सिंह से। शिमला में रहते हैं। पता नहीं फेसबुक पर हम कब मित्र बन गये। एक दिन अचानक उनके एक फोटो पर निगाह पडी। बडा ही जानदार फोटो था। फिर तो और भी फोटो देखे। एक वेबसाइट भी है। हालांकि हमारी कभी बात नहीं हुई, कभी चैट भी नहीं हुई। फोटो डीएसएलआर से ही खींचे गये हैं, बाद में कुछ एडिटिंग भी हुई है। चाहता हूं कि आप भी अपनी फोटोग्राफी निखारने के लिये उनके फोटो देखें और उनके जैसा कैप्चर करने की कोशिश करें।
इसी तरह एक और फोटोग्राफर हैं तरुण सुहाग। दिल्ली में ही रहते हैं और ज्यादातर वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी करते हैं खासकर बर्ड्स फोटोग्राफी।

Friday, November 28, 2014

चित्रधारा प्रपात, छत्तीसगढ

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
19 जुलाई 2014
आज हमें चित्रकोट जलप्रपात देखने जाना था। सुनील जी के बडे भाई यहां जगदलपुर में रहते हैं तो हमें उम्मीद थी कि यहां से हमें कुछ न कुछ साधन मिल ही जायेगा। घर पर वैसे तो मोटरसाइकिल और कार दोनों थीं लेकिन मौसम को देखते हुए मैं कार को ज्यादा वरीयता दे रहा था। लेकिन सुनील जी के भतीजे साहब कार देने में आनाकानी करने लगे। अपनी चीज आखिर अपनी होती है। उन्हें अच्छी तरह पता है कि सुनील जी एक बेहतरीन ड्राइवर हैं, स्वयं उससे भी ज्यादा सुरक्षित तरीके से गाडी चलाते हैं, कई बार रायपुर से जगदलपुर कार से आ भी चुके हैं लेकिन फिर भी उसे कहीं न कहीं सन्देह था। मैंने सुनील जी के कान में फुसफुसाकर कहा भी कि जैसे भी हो सके, कार ले लो। बारिश के मौसम में उससे बेहतरीन कुछ और नहीं है। दो दिन की बात है बस। सुनील जी ने समझा दिया कि भले ही मैं कितना ही अच्छा ड्राइवर क्यों न होऊं लेकिन इनके लिये अच्छा ड्राइवर नहीं हूं।