Wednesday, October 22, 2014

मलाणा- नशेडियों का गांव

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मलाणा समुद्र तल से 2685 मीटर की ऊंचाई पर बसा एक काफी बडा गांव है। यहां आने से पहले मैं इसकी बडी इज्जत करता था लेकिन अब मेरे विचार पूरी तरह बदल गये हैं। मलाणा के बारे में प्रसिद्ध है कि यहां प्राचीन काल से ही प्रजातन्त्र चलता आ रहा है। कहते हैं कि जब सिकन्दर भारत से वापस जाने लगा तो उसके सैनिक लम्बे समय से युद्ध करते-करते थक चुके थे। सिकन्दर के मरने पर या मरने से पहले कुछ सैनिक इधर आ गये और यहीं बस गये। इनकी भाषा भी आसपास के अन्य गांवों से बिल्कुल अलग है।
एक और कथा है कि जमलू ऋषि ने इस गांव की स्थापना की और रहन-सहन के नियम-कायदे बनाये। प्रजातन्त्र भी इन्हीं के द्वारा बनाया गया है। आप गूगल पर Malana या मलाणा या मलाना ढूंढो, आपको जितने भी लेख मिलेंगे, इस गांव की तारीफ करते हुए ही मिलेंगे। लेकिन मैं यहां की तारीफ कतई नहीं करूंगा। इसमें हिमालयी तहजीब बिल्कुल भी नहीं है। कश्मीर जो सुलग रहा है, वहां आप कश्मीरी आतंकवादियों से मिलोगे तो भी आपको मेहमान नवाजी देखने को मिलेगी लेकिन हिमाचल के कुल्लू जिले के इस दुर्गम गांव में मेहमान नवाजी नाम की कोई प्रथा दूर-दूर तक नहीं है। ग्रामीणों की निगाह केवल आपकी हरकतों पर रहेंगी और मामूली सी लापरवाही आपकी जेब पर भारी पड जायेगी।
कुल्लू के अन्य गांवों की तरह यहां भी घर लकडी के बनाये जाते हैं। गांव के बीच में जमलू का मन्दिर है। और भी कई दूसरे मन्दिर हैं। यहां गैर-मलाणियों को अछूत माना जाता है। उन्हें गांव में केवल निर्धारित पथ पर ही चलना होता है। यदि आपने किसी देवस्थान या घर को स्पर्श कर लिया तो आपकी खैर नहीं। पूरा गांव एक नम्बर का निकम्मा है। निकम्मों की जमात हर घर के सामने बैठी रहती है और आने-जाने वालों पर निगाह रखती है। आपके किसी इमारत को छूने भर से ही आप पर प्रथम दृश्ट्या 2500 रुपये का जुर्माना लग जायेगा। वो तो अच्छा है कि हर घर पर तख्ती टंगी है कि छूना मना है, छूने पर 2500 रुपये का जुर्माना लगेगा। जमलू मन्दिर के बाहर तो फोटो खींचने की भी मनाही लिखी दिखी।
यह छुआछूत की बुराई तो कुछ भी नहीं। असल बुराई तो कुछ और है। यहां चरस और अफीम की खेती होती है। चरस की कीमत बाजार में कितनी है, इसे हर मलाणी जानता है। इसे यहां मलाणा क्रीम कहते हैं। आपको कदम कदम पर टोका जायेगा कि क्रीम चाहिये क्या। यहां चरस उगाने, बेचने और इस्तेमाल करने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। हालांकि मलाणा से बाहर ले जाने पर प्रतिबन्ध है। लेकिन मलाणा क्रीम आसानी से अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में पहुंच जाती है। यहां की चरस अच्छी गुणवत्ता वाली मानी जाती है, इसलिये ज्यादा महंगी भी है।
अच्छी खासी खेती होती है और हर खेत में नशा ही उगाया जाता है। जिसके पास जमीन ज्यादा, उसकी आमदनी भी ज्यादा। लालच का आलम यह है कि अभी जिस खतरनाक रास्ते से हम आये हैं, जहां खडे होने की भी जगह नहीं मिलती है, वहां भी फुट फुट भर के खेत बना रखे हैं। हालांकि सरकार चरस की खेती को हतोत्साहित कर रही है और मलाणियों को फ्री में गेहूं आदि के बीज बांट रही है लेकिन कौन अपने लाखों के कारोबार को छोडकर गेहूं उगायेगा?
मलाणा से कुछ दूर एक और गांव है रसोल। पता नहीं चरस वहां भी पैदा होती है या नहीं। मुझे यकीन है कि होती होगी। मलाणी केवल रसोल में ही विवाह सम्बन्ध बनाते हैं और रसोल वाले केवल मलाणा में। हजारों सालों से ऐसा ही होता आ रहा है। आपस में ही शादी-ब्याह। निश्चित रूप से आनुवांशिक बीमारियां पैदा हो गई होंगी।
गांव के बाहर कुछ रेस्ट हाउस बने हैं, जो निःसन्देह मलाणियों के ही हैं। यहां कोल्ड ड्रिंक से लेकर भारतीय, चाईनीज, इटैलियन, कॉंटिनेंटल, ये, वो, सब तरह का खाना मिलता है। रुकने को कमरे भी। भारतीयों से ज्यादा विदेशी यहां आते हैं। 99 प्रतिशत लोग नशेडी होते हैं। चरस को देश से बाहर ले जाने का सारा काम भी विदेशियों पर ही है। इसमें मुख्य भूमिका निभाते हैं कसोल के इजराइली। कसोल पूरी तरह इजराइलियों की बस्ती है। जी हां, वही कसोल जो मणिकर्ण से तीन-चार किलोमीटर पहले पडता है। कसोल मलाणा क्रीम की मण्डी है।
मलाणा से मलाणा नाला ज्यादा दूर नहीं है। उस तरफ सडक है। गांव से सडक की दूरी करीब ढाई-तीन किलोमीटर है। ये ढाई-तीन किलोमीटर जबरदस्त चढाई भरे हैं। नशेडियों को यहां पहुंचने के लिये खूब पसीना बहाना पडता है लेकिन उसके बाद जो उन्हें मिलता है, वो उनके लिये ज्यादा कीमती है। मलाणा नशेडियों का मक्का है। ये नशेडी जब मलाणा घूमकर वापस लौटते हैं तो इसके गुण तो गायेंगे ही। इंटरनेट पर जो भी कुछ इसकी शान में लिखा गया है, सब नशेडियों ने ही लिखा है।
भयंकर गन्दगी है यहां। न लोग साफ, न ही उनके घर व गलियां। जरुरत भी क्या है? बैठे बिठाये लाखों में खेलते हैं। अब प्रशासन को चाहिये कि मलाणा के साथ सख्ती से पेश आये। अब इन्हें गेहूं के बीज बांटना बन्द करके इनकी चरस पर ही चोट करनी चाहिये। खडी फसल को बर्बाद करते रहना चाहिये। आने-जाने वालों पर कडी नजर रखी जाये और उनकी नियमित कठोर जांच की जाये। जमलू मन्दिर को अपने नियन्त्रण में ले लेना चाहिये। हालांकि कोई हिमाचली ऐसा नहीं कर सकेगा, इसके लिये बाहर से भी बुलाया जा सकता है। इससे मलाणियों में छुआछूत की भावना कम होगी। क्रोधित होकर जमलू अगर तांडव कर दे तो उसे भी सबक सिखाया जा सकता है।
मलाणा वास्तव में हिमाचल और आखिरकार भारत पर एक कलंक है। अपनी विलक्षण संस्कृति होना ठीक है लेकिन नशा किसी भी हालत में ठीक नहीं है।

मलाणा से दिल्ली
कुल्लू से रोज यहां एक बस आती है। बाकी सारा आवागमन टैक्सियों से होता है। जरी जाने के लिये 800 रुपये में एक गाडी बुक की। ड्राइवर जरी का रहने वाला था। खफा था वो भी मलाणियों से। पूरे रास्ते इनकी आलोचना ही करता रहा।
मलाणा नाले पर एक बांध बना है और उसका पानी सुरंगों से होकर जरी के पास पावर प्लांट में जाता है। एक और बांध और भी आगे बनाया जा रहा है। यह सडक उस नये बांध तक सामान ले जाने के लिये ही बनाई गई है। लेकिन सडक बनने से पहले पुराने बांध से नये बांध तक सामान पहुंचाने के लिये रज्जु-मार्ग का प्रयोग किया जाता था। यह रज्जु मार्ग अब भी है और इसकी तारों पर जगह-जगह ट्रालियां लटकी हैं। अब यह रज्जु-मार्ग बन्द है।
जरी से हमें कुल्लू की बस मिल गई। लेकिन भून्तर के पास इसमें पंक्चर हो गया। पंक्चर ठीक कराकर आगे बढे तो जाम लगा मिला। ड्राइवर ने बस तुरन्त वापस मोड ली और ब्यास के बायें किनारे पर बनी सडक से कुल्लू पहुंच गया। भून्तर से मनाली तक ब्यास के दोनों तरफ सडकें हैं। मुख्य सडक दाहिनी तरफ वाली है। बायीं तरफ वाली मुख्य नहीं है इसलिये ट्रैफिक नहीं होता।
हम तीन दिनों से पैदल चल रहे थे, थक गये थे। इसलिये हम चाहते थे कि दिल्ली किसी वोल्वो बस से ही जायेंगे। लेकिन जब काउंटर पर जाकर पता किया तो वोल्वो तो क्या, साधारण बस के भी लाले पड गये। अगले एक सप्ताह तक सभी बसें पूरी तरह भरी हैं। यह जून का महीना था और सभी लोग छुट्टियां मनाने मनाली जाते हैं। हिमाचल की बसों में ऑनलाइन बुकिंग होती है तो बसें पहले ही भर जाती हैं।
अब क्या करें? काउंटर वाले ने बताया कि कोई हरियाणा की बस आयेगी तो उसमें चले जाना। हरियाणा की बसों में पहले से बुकिंग नहीं होती। जाओ और किसी भी खाली सीट पर बैठ जाओ। थोडा घूमे-फिर तो पता चला कि कम से कम सौ सवा सौ यात्री किसी हरियाणा की बस की प्रतीक्षा में हैं। बढिया भीड थी। अशोक ने कहा कि हममें से जो भी कोई पहले बस में चढेगा, वो बाकियों के लिये सीट घेर लेगा। लेकिन मैंने कहा- मनाली में भी ऐसा ही हाल हो रहा होगा भीड का। यहां जो भी बस आयेगी, वो मनाली से ही आयेगी। जाहिर है कि भरी ही होगी। अगर बस कुल्लू से पहले ही पूरी भर गई तो हरियाणा वाले बस को यहां नहीं लायेंगे, बाईपास से निकाल ले जायेंगे। फिर भी अगर कोई बस अगर आ भी गई तो उसमें इक्का-दुक्का सीटें ही होंगी या फिर एक सीट यहां, एक सीट वहां। एक आदमी चार सीटें नहीं घेर सकता। सभी अपनी-अपनी सीटों के लिये स्वयं जिम्मेदार होंगे।
तभी हरियाणा की एक बस आती दिखी। भीड टूट पडी। कुछ ही सीटें खाली थीं। हमने हालात का सटीक पूर्वानुमान लगाया था और प्रवेश द्वार के पास ही खडे हो गये थे, इसलिये चारों को सीटें मिल गईं।
समाप्त।

मलाणा गांव


मलाणा के बच्चे

जमलू मन्दिर


चेतावनी लिखी है कि गांव के बीच बने रास्ते पर ही चलें। किसी इमारत को न छुएं। नहीं तो 2500 रुपये जुर्माना।

जरी से मलाणा आने वाली सडक

सडक से मलाणा जाने का द्वार। पीछे मलाणा गांव दिख रहा है।

रज्जु-मार्ग और सीमेण्ट आदि ढोने वाली ट्रालियां

मलाणा जाने का एक और रास्ता
टिप्पणियां करने में कंजूसी ठीक नहीं।

चन्द्रखनी ट्रेक
1. चन्द्रखनी दर्रे की ओर- दिल्ली से नग्गर
2. रोरिक आर्ट गैलरी, नग्गर
3. चन्द्रखनी ट्रेक- रूमसू गांव
4. चन्द्रखनी ट्रेक- पहली रात
5. चन्द्रखनी दर्रे के और नजदीक
6. चन्द्रखनी दर्रा- बेपनाह खूबसूरती
7. मलाणा- नशेडियों का गांव

Monday, October 20, 2014

चन्द्रखनी दर्रा- बेपनाह खूबसूरती

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अगले दिन यानी 19 जून को सुबह आठ बजे चल पडे। आज जहां हम रुके थे, यहां हमें कल ही आ जाना था और आज दर्रा पार करके मलाणा गांव में रुकना था लेकिन हम पूरे एक दिन की देरी से चल रहे थे। इसका मतलब था कि आज शाम तक हमें दर्रा पार करके मलाणा होते हुए जरी पहुंच जाना है। जरी से कुल्लू की बस मिलेगी और कुल्लू से दिल्ली की।
अब चढाई ज्यादा नहीं थी। दर्रा सामने दिख रहा था। वे दम्पत्ति भी हमारे साथ ही चल रहे थे। कुछ आगे जाने पर थोडी बर्फ भी मिली। अक्सर जून के दिनों में 3600 मीटर की किसी भी ऊंचाई पर बर्फ नहीं होती। चन्द्रखनी दर्रा 3640 मीटर की ऊंचाई पर है जहां हम दस बजे पहुंचे। मलाणा घाटी की तरफ देखा तो अत्यधिक ढलान ने होश उडा दिये।
चन्द्रखनी दर्रा बेहद खूबसूरत दर्रा है। यह एक काफी लम्बा और अपेक्षाकृत कम चौडा मैदान है। जून में जब बर्फ पिघल जाती है तो फूल खिलने लगते हैं। जमीन पर ये रंग-बिरंगे फूल और चारों ओर बर्फीली चोटियां... सोचिये कैसा लगता होगा? और हां, आज मौसम बिल्कुल साफ था। जितनी दूर तक निगाह जा सकती थी, जा रही थी। धूप में हाथ फैलाकर घास पर लेटना और आसमान की तरफ देखना... आहाहाहा! अनुभव करने के लिये तो आपको वहां जाना ही पडेगा।
मलाणा घाटी में मलाणा गांव से भी आगे एक जगह है नगरोणी। यह कोई गांव नहीं है, बस जगह का नाम है। वहां जाने के लिये राशन और टैंट-स्लीपिंग बैग साथ ले जाने पडते हैं। खूबसूरत जगह ही होगी। उसका एक रास्ता यहां चन्द्रखनी से भी जाता है। मलाणा के लिये नीचे उतरना शुरू कर दो, नगरोणी के लिये सीधे चलते जाओ। उस दिल्ली वाले परिवार को आज नगरोणी ही जाना था। हमारे पास समय नहीं था, इसलिये हमें मलाणा जाना पडेगा।
दर्रे से करीब एक किलोमीटर दूर वो जगह आती है जहां पगडण्डियों का तिराहा है। नगरोणी का रास्ता यहीं से अलग होता है। मलाणा की तरफ भयंकर ढलान शुरू हो जाती है। यह ढलान धीरे धीरे भयंकरतर और भयंकरतम होती जाती है। खडे खडे ही बजरियों पर नीचे फिसलने लगते हैं। नीचे बिल्कुल पाताल लोक तक देखने पर भी ढलान का अन्त नहीं दिख रहा था। बहुत नीचे मलाणा नाला नन्हीं सी लकीर की तरह दिखाई देता है। यह वाकई रोंगटे खडे कर देने वाला नजारा था।
मधुर चीखने में माहिर था। जब कभी किसी को आवाज लगानी होती थी तो हम मधुर को ही कहते थे। वह ज्यादा फ्रीक्वेंसी वाली आवाज में बडा तेज चीखता था। यहां ढलान पर उसने चीखना शुरू कर दिया- हेलो... हेलो...। उसकी देखा-देखी अशोक व सुरेन्द्र भी शुरू हो गये। आगे नीचे कुछ स्थानीय लोग जा रहे थे। आवाज सुनकर उन्होंने पीछे मुडकर देखा। मैंने मना किया तो बोले कि हम एंजोय कर रहे हैं। मैंने कहा कि ऐसी खतरनाक जगह पर हेलो, हेलो चीखने का एक ही मतलब होता है कि तुम किसी मुसीबत में हो और बचाव के लिये किसी को बुला रहे हो। आगे कुछ लोग जा रहे हैं, अगर वे आ गये तो क्या कहोगे? मधुर ने कहा कि कह देंगे कि हमने तुम्हें बुलाया ही नहीं।
यह एक नम्बर की घटिया हरकत थी। आनन्द ही मनाना था तो ऊपर दर्रे पर मनाते, चीखते, नाचते, गाते। यहां क्या तुक है? और वो भी हेलो, हेलो बोलना। फिर भी नहीं माने तो मैंने चेतावनी दी- देखो, मैं क्रोधित हो जाऊंगा। बस, समझदार थे, मान गये। नहीं तो नासमझ लोग आनन्द मनाने के बहाने चीखना और शोर-शराबा करना ही जानते हैं।
यह बडी जानलेवा उतराई थी। मुझे नहीं पता था कि मलाणा गांव कितनी ऊंचाई पर है, इसलिये दूरी का अन्दाजा लगाना असम्भव था। नीचे नदी भी दिख रही थी लेकिन एक घण्टे बाद, दो घण्टे बाद भी वह उतनी ही नीचे थी। रास्ता एक बरसाती नाले से होकर था जिसमें अब बिल्कुल भी पानी नहीं था। बडे बडे पत्थर और झाडियां ही बस। बरसात में जब इसमें पानी आता होगा तो कई बार लोगों के बिल्कुल सिर पर भी गिर जाता होगा। हम यह सोचकर हैरान थे कि इसमें पानी कितनी तेजी से बहता होगा।
लेकिन इससे भी ज्यादा हैरान तब हुए जब नीचे से दो लोगों को आते देखा। जहां उतरना ही इतना खतरनाक है, वहां ऊपर चढना तो और भी खतरनाक था। ये दोनों विदेशी थे- एक महिला, एक पुरुष। पसीने से लथपथ और आंखें-मुंह लाल। पता नहीं यह लाल चढाई व गर्मी की वजह से थी या ये मलाणा से चरस का सुट्टा मारकर आये हैं। कुछ देर बाद एक लडकी और मिली। बुरी हालत थी। यह मुम्बई की थी। मेरे मुंह से एकदम निकला- किसी ने मना नहीं किया इधर से आने को? बोली कि क्या कोई और भी रास्ता है चन्द्रखनी जाने का? हमने बताया कि उधर मनाली की तरफ से है। बिल्कुल प्लेन है, सीधा रास्ता, ज्यादा चढाई नहीं है। बेचारी गालियां देने लगी अपने ‘गाइड’ को जो अभी बहुत नीचे था। मैंने पूछा कि मलाणा में चरस का सुट्टा नहीं लगाया? उसने मना कर दिया।
दो घण्टे तक अनवरत उतरने के बाद एक छोटी सी समतल जगह मिली। यह चट्टान की आड में एक गुफा थी। यहां बकरियों की खूब लीद पडी थी। यहां हमें वे दिल्ली वाले दम्पत्ति मिले। हमसे कुछ ही आगे आगे वे उतर रहे थे। उनकी भी हालत बडी खराब थी। जब पूछा कि आप तो उधर नगरोणी की तरफ जाने वाले थे तो बोले कि इधर ही आ गये। भूख लग आई थी और अभी भी मलाणा का कोई नामो निशान नहीं दिख रहा था। बिस्कुट का एक पैकेट बचा था। मन तो था कि निगाह बचाकर अकेला ही खा जाऊं लेकिन मिल-बांटकर खाना पडा। पानी सभी के पास समाप्त हो गया था।
पन्द्रह मिनट रुककर फिर चल पडे। यहां से निकलते ही इतनी तीखी ढलान पर छोटे छोटे खेत दिखने लगे। आस बंधी कि मलाणा आने ही वाला है लेकिन जालिम ने फिर भी पौन घण्टा लगा दिया आने में।


ब्यास घाटी की ओर का नजारा




चन्द्रखनी दर्रा हिमालय के सुन्दरतम दर्रों में से एक है।














दर्रों पर स्थानीय लोग झण्डियां व पत्थर रख देते हैं।




चन्द्रखनी के बाद ढलान है।


यहां से सीधे नीचे उतरना है। कल्पना कीजिये एक बार।




ऊपर बायें कोने में मेरे तीनों साथी धीरे धीरे नीचे उतरते दिख रहे हैं।


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चन्द्रखनी ट्रेक
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4. चन्द्रखनी ट्रेक- पहली रात
5. चन्द्रखनी दर्रे के और नजदीक
6. चन्द्रखनी दर्रा- बेपनाह खूबसूरती
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Saturday, October 18, 2014

चन्द्रखनी दर्रे के और नजदीक

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अगले दिन यानी 18 जून को सात बजे आंख खुली। रात बारिश हुई थी। मेरे टैंट में सुरेन्द्र भी सोया हुआ था। बोला कि बारिश हो रही है, टैंट में पानी तो नहीं घुसेगा। मैंने समझाया कि बेफिक्र रहो, पानी बिल्कुल नहीं घुसेगा।
सुबह बारिश तो नहीं थी लेकिन मौसम खराब था। कल के कुछ परांठे रखे थे लेकिन उन्हें बाद के लिये रखे रखा और अब बिस्कुट खाकर पानी पी लिया। सुनने में तो आ रहा था कि दर्रे के पास खाने की एक दुकान है लेकिन हम इस बात पर यकीन नहीं कर सकते थे।
मैंने पहले भी बताया था कि इस मैदान से कुछ ऊपर गुज्जरों का डेरा था। घने पेडों के बीच होने के कारण वह न तो कल दिख रहा था और न ही आज। हां, आवाजें खूब आ रही थीं। अभी तक हमारा सामना गद्दियों से नहीं हुआ था लेकिन उम्मीद थी कि गद्दी जरूर मिलेंगे। आखिर हिमाचल की पहचान खासकर कांगडा, चम्बा व कुल्लू की पहचान गद्दी ही तो हैं। गुज्जर व गद्दी में फर्क यह है कि गुज्जर गाय-भैंस पालते हैं जबकि गद्दी भेड-बकरियां। गुज्जर ज्यादातर मुसलमान होते हैं और गद्दी हिन्दू। ये गुज्जर पश्चिमी उत्तर प्रदेश व राजस्थान वाली गुर्जर जाति नहीं हैं।
इस मैदान को पार कर जब चढाई व जंगल शुरू हो गये तो गुज्जरों का डेरा भी दिखने लगा। तभी सुरेन्द्र को ध्यान आया कि उसका तौलिया नीचे ही छूट गया है। वह तौलिया लेने नीचे दौड पडा। उसकी जगह अगर मैं होता तो तौलिया लेने कभी नीचे नहीं जाता।
डेरा चन्द्रखनी वाले मुख्य रास्ते से करीब पचास मीटर हटकर था। हमें भूख तो नहीं थी लेकिन कुछ खास खाया भी नहीं था। अगर भूख लगनी शुरू हो जायेगी और खाना नहीं मिला तो फजीहत होनी तय थी। बस, थोडा प्रयास करना था और हम यहां कुछ खा सकते थे। मैंने अशोक से कहा कि वहां जाकर चाय के लिये पूछ आ लेकिन उसने जाने से बचने के लिये कुछ भी खाने-पीने से मना कर दिया। मधुर चीखने में माहिर था। उसने यहीं से चीखकर पूछा कि चाय मिल जायेगी क्या। गुज्जर उस समय यहां से विस्थापित होने की तैयारी कर रहे थे। काफी सारा सामान अगले डेरे में जा चुका था, बहुत थोडा सामान ही बचा था।
मधुर की आवाज सुनकर एक महिला की आवाज आई कि कुछ नहीं मिलेगा। हम निराश हो गये। तभी दूसरी महिला की आवाज आई कि आ जाओ। हम खुशी से दौड पडे। उसने बताया कि चाय तो नहीं है, बस दूध ही बचा है, चीनी भी नहीं है। मैंने कहा कि इसे ही गर्म कर दो। उसने एक छोटी पतीली में वहीं आग जलाकर दूध गर्म करके हमें दे दिया। अशोक ने दूध पीने से मना कर दिया। मधुर ने जैसे ही पहली घूंट भरी, बुरा सा मुंह बनाया। जब मैंने घूंट भरी, तो समझ गया कि मधुर ने मुंह क्यों बनाया था। असल में यह भैंस का दूध था। अगर आप नियमित थैलीबन्द या गाय का दूध पीते हैं, तो अचानक भैंस का दूध नहीं पी सकते। यह काफी नमकीन होता है। फिर इसमें चीनी भी नहीं थी। सुरेन्द्र ने भी एक गिलास के बाद और लेने से मना कर दिया। इसलिये मुझे ढाई-तीन गिलास दूध पीना पडा। वैसे तो मुझे भी भैंस के दूध की आदत नहीं है, दिल्ली में रहता हूं, थैलीबन्द दूध पीता हूं लेकिन इस दूध की पौष्टिकता को देखते हुए पी जाना पडा। दूध के साथ हम बिस्कुट भी खा रहे थे। उस महिला से हमसे बिस्कुट मांगे अपने बच्चों के लिये लेकिन हमें स्वयं अपनी चिन्ता थी और बिस्कुट ही हमारे आसरे थे इसलिये ज्यादा बिस्कुट हम उन्हें नहीं दे सकते थे। आधा पैकेट दे दिया। और दूध के लिये पचास रुपये भी।
गुज्जर व गद्दियों का कोई निश्चित ठिकाना नहीं होता। हिमालय में ये अपने अपने ‘माल’ के साथ गर्मियों में ऊंचाईयों पर जाते हैं और सर्दियों में नीचे आ जाते हैं। ये एक स्थान पर डेरा बनाते हैं, कुछ दिन बाद उसे छोडकर आगे बढ जाते हैं। आज इन गुज्जरों के आगे बढने का दिन था। हम कुछ ही दूर चले थे कि पीछे से वही महिला आती दिखाई दी। वह एक नम्बर की बातूनी थी। बताया कि वे कुछ आगे इस चन्द्रखनी वाले रास्ते को छोड देंगे और कुछ बायें जाकर डेरा लगायेंगे। अगर हम कहीं भटक जायें तो उनके ठिकाने पर आ जायें। वह बार-बार यही बात कहती रही। जब हमारा और उसका रास्ता अलग हो गया तब भी चिल्लाकर बताती रही- कहीं भटक जाओ तो हमारे यहां आ जाना। हमारा डेरा वहां है... देखो, वहां उस तरफ।
हमें बार-बार फोटो खींचते देखकर उसने पूछा कि आपको एक फोटो के कितने पैसे मिलते हैं? मैंने बताया कि एक भी नहीं। ... तो खींच क्यों रहे हो?... अपने मजे और यादगार के लिये।... कुछ दिन पहले एक विदेशी आया था। उसने बताया था कि बहुत पैसे मिलते हैं। हालांकि हमने उसे सन्तुष्ट करने की कोशिश की लेकिन वह सीधी-सादी अनपढ महिला सन्तुष्ट नहीं हुई। उसे लग रहा था कि ये बहुत मालदार हैं और लगातार फोटो इसीलिये खींचे जा रहे हैं ताकि और ज्यादा मालदार हो जायें।... काश! ऐसा हो पाता।
दस बजे जब हम 3000 मीटर की ऊंचाई पर थे तो एक बडा लम्बा चौडा मैदान मिला। इसे देखकर तबियत खुश हो गई। गढवाल में ऐसे मैदानों को बुग्याल कहते हैं। यह काफी ऊपर तक था। बीच बीच में पेड इसकी खूबसूरती और बढा रहे थे। मौसम खराब था ही, इसलिये बादल भी आ-जा रहे थे। अच्छा नजारा था।
इस मैदान को पार किया तो गद्दियों का एक डेरा मिला। इनकी भेडें इसी मैदान में चर रही थीं। उस समय डेरे पर दो महिलायें थीं। मौसम और भी खराब होने लगा था और हवा बडी तेज चल रही थी। इन्होंने बताया कि कुछ ही दूर एक होटल है जहां खाना मिल जायेगा। हमें भूख लगने लगी थी और चलने में परेशानी हो रही थी। खाना मिलने की बात सुनकर कुछ जान में जान आई और आगे बढ चले।
मैदान के बाद फिर से पेड दिखने लगे लेकिन अब बडे पेड समाप्त हो गये थे व छोटे पेड व झाडियां ही ज्यादा थीं। बीच-बीच में मिलने वाले छोटे छोटे ढलानदार मैदान नजारे को और भी खुशनुमा बना रहे थे। जमीन से बिल्कुल मिलकर तैरते बादल माहौल को रहस्यात्मक बना रहे थे।
बारह बजे जब 3200 मीटर पर थे तो बारिश होने लगी। रेनकोट पहनने पडे। गनीमत थी कि यह धौलाधार जैसी बारिश नहीं थी। धौलाधार में बारिश तो ज्यादा होती ही है, उससे भी ज्यादा गडगडाहट होती है और बिजलियां गिरती हैं। यहां पानी बहुत तेज गिर रहा था, हवा भी चल रही थी लेकिन गडगडाहट नहीं थी। एक जगह बैठे तो सर्दी लगने लगी। फिर उठने का मन नहीं किया। कल के चार परांठे बचे थे। चारों ने एक-एक खा लिए।
रेनकोट पहने होने के बावजूद हम चारों पूरी तरह भीग चुके थे। समझ नहीं आता कि रेनकोट के अन्दर पानी कहां से जा रहा था। क्या रेनकोट ही चू रहा है? असल में लगातार चढते रहने की वजह से पसीना खूब आ रहा था। रेनकोट ने शरीर पर एक रक्षा कवच बना दिया था। इस कवच के बाहर बेहद ठण्डा वातावरण था और अन्दर गर्म और नम वातावरण। जब अन्दर की नम हवा कवच को स्पर्श करती तो वह भी ठण्डी हो जाती और तुरन्त संघनित भी हो जाती यानी नमी पानी में परिवर्तित हो जाती। इससे कपडे और तेजी से गीले होने लगते। नतीजा हमें और ज्यादा ठण्ड लगने लगी।
ठण्ड से बचने का सर्वोत्तम तरीका था उठो और चलो। हमने ऐसा ही किया। कुछ देर बाद बारिश रुक गई और बादल इधर उधर हो गये। छोटे छोटे ढलानदार मैदान मिलते गये। चलने से पहले मेरा अन्दाजा था कि 3200 मीटर के बाद पेड पौधे मिलने बन्द हो जायेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसा हुआ लगभग 3400 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचकर। हिमालय में एक निश्चित ऊंचाई के बाद पेड पौधे नहीं उगते। सिर्फ घासफूस और छोटी छोटी झाडियां ही होती हैं। ऐसे में हम दूर दूर तक देख सकते हैं। जब हम पेडों के साम्राज्य से बाहर निकले तो सामने एक ‘होटल’ दिखाई दिया।
यह लकडी और तिरपाल की एक झोंपडी थी जिसमें से धुआं उठता दिखा। समझते देर नहीं लगी कि यही वो जगह है जिसके बारे में हम नीचे से सुनते आ रहे हैं कि खाना मिलेगा। जल्दी ही हम इसके अन्दर थे। इसके बराबर में एक झोंपडी और थी जहां रजाई-गद्दे थे और रात को वहां आराम से सोया जा सकता था।
चन्द्रखनी दर्रा यहां से बहुत नजदीक दिख रहा था क्योंकि हमारे और दर्रे के बीच में कोई भी अवरोध नहीं था।
अब ज्यादा कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है कि हमने क्या-क्या खाया, क्या-क्या पीया, क्या-क्या किया। हालांकि हमारे पास दो टैंट थे लेकिन तय हुआ कि एक ही टैंट लगायेंगे। मधुर और अशोक रजाईयों में सोयेंगे।
आज हमने 2675 मीटर की ऊंचाई से पैदल चलना शुरू किया था और अब 3425 मीटर पर थे अर्थात केवल 750 मीटर ही ऊपर चढे। लेकिन लग रहा था कि 1000-1500 मीटर ऊपर आ गये हों। सामने दर्रा होने और पर्याप्त समय होने के बावजूद भी हमारी किसी की भी हिम्मत आगे बढने की नहीं हुई। हालांकि दर्रे पर टैंट लगाने लायक पर्याप्त से ज्यादा जगह थी।
कुछ देर बाद कुछ विदेशी आये। उनके बाद एक भारतीय दम्पत्ति आये। इन पति-पत्नी के साथ इनके 8-10 साल के दो बच्चे भी थे। अपना राशन-पानी और बडा टैंट, स्लीपिंग बैग ये स्वयं ढो रहे थे। ये दिल्ली के रहने वाले थे। आदमी तो दिल्लीवासी लग रहा था लेकिन उसकी पत्नी दिल्ली की नहीं थी। हमने पूछा तो नहीं लेकिन वह शक्ल-सूरत से लद्दाखियों से मिलती-जुलती थी। उनका सारा वार्तालाप अंग्रेजी में था जिससे मेरा यकीन बढ गया कि यह लद्दाख की ही है। हालांकि दिल्ली के कुछ ‘बडे’ लोग अपने बच्चों से भी अंग्रेजी में ही बोलते हैं। सुरेन्द्र ने कहा कि महिला गढवाली लग रही है। मैंने तुरन्त नकार दिया। गढवाल में तो बडी सुन्दर महिलाएं होती हैं। हां, ऐसा हो सकता है कि वह गढवाल के हिमालय-पार के इलाके की हो जैसे कि नेलांग और माणा।
यहां से कुल्लू हिमालय की कुछ ऊंची चोटियां दिखाई देती हैं। बायें मनाली की तरफ हनुमान टिब्बा और सामने इन्द्रासन। इनके अलावा बडा भंगाल और स्पीति की तरफ की भी कई चोटियां दिखाई देती हैं।
जब यहां टैंट लग गया तो सुरेन्द्र ने कहा कि उसके सिर में दर्द हो रहा है, उसे कुछ आराम करना है। ऊंचाई पर जाने पर अक्सर सिर में दर्द होने लगता है। वह टैंट में लेट गया और टैंट की चैन बन्द कर ली। मैं बाहर ही घूमता रहा और इधर उधर जा-जाकर नजारे देखने लगा। कुछ देर बाद वापस लौटा और जब चैन खोली तो शराब की दुर्गन्ध का भभका बाहर आया। सुरेन्द्र के साथ अशोक भी बैठा था। मैं शराब का विरोधी हूं लेकिन अगर सामने वाले ने पीनी शुरू कर ही दी है तो उसे रोकने में अपना दिमाग खराब नहीं करता हूं। मैंने कहा कि अगर तुम्हें पीनी ही है तो क्यों टैंट में घुसकर पी रहे हो? बाहर खुले में बैठकर पीयो। बोले कि नहीं, कोई ऐतराज करेगा तो...। मैंने कहा कि यहां कोई ऐतराज करने वाला नहीं है। अगर तुम्हें और चाहिये तो ‘होटल’ वाले से ले सकते हो। ये लोग घर की बनी हुई शराब पीते हैं।
फिर हिदायत दी कि तुम दोनों रजाई में सोओगे, नहीं तो रातभर टैंट में बदबू आती रहेगी। सुरेन्द्र बोला कि नहीं, बदबू नहीं आयेगी। इस बारे में कुछ देर तक बहस होती रही। हालांकि इसके बाद टैंट की चैन खुली रखी ताकि बदबू बाहर निकल जाये।
हम दो दिन चलकर यहां तक आये थे। लेकिन यह घाटी हिमालय की बाकी घाटियों की तरह टेढी-मेढी न होकर सीधी है। सामने ब्यास घाटी दिखती है और मनाली भी। इसका ढाल पश्चिमाभिमुख है तो डूबता सूरज व उसकी लालिमा देर तक दिखती रही। यह एक वाकई जादुई नजारा था। अन्धेरा हो जाने पर जादुई नजारे दिखाने का काम मनाली ने संभाल लिया। ब्यास की विस्तृत घाटी, मनाली और उसके परे सोलांग की रोशनियों ने रात को भी समां बांधे रखा।
यह जगह सभ्यता से दूर तो है लेकिन चूंकि सभ्यता सामने दिख रही थी तो मोबाइल नेटवर्क भी अनवरत काम करता रहा। कम से कम मेरा एयरटेल तो ठीक काम कर रहा था और इंटरनेट भी चल रहा था। इतनी ऊंचाई पर अत्यधिक ठण्ड में टैंट और स्लीपिंग बैग में घुसकर इंटरनेट चलाना वाकई मजेदार और अद्वितीय अनुभव था।

रात यहीं सोये थे।

गुज्जर डेरे पर हमारे लिये दूध गर्म हो रहा है।



दुग्धपान



एक बडा मैदान






गद्दण




सामने दिखता चन्द्रखनी दर्रा

सुरेन्द्र सिंह रावत के साथ

मधुर गौड के साथ। सफेद तम्बू में कुछ विदेशी रुके थे।

घाटी में ऊपर उठते बादल


इन्दौर वासी अशोक भार्गव



चन्द्रखनी दर्रा और उसके परे बर्फीली चोटियां


यहां मोबाइल नेटवर्क अच्छा काम कर रहा था।


यहां से सूर्यास्त के रंग देखने लायक होते हैं।






सूर्यास्त का एक दुर्लभ नजारा... साइज कम करने से फोटो में ब्लर आ गये हैं।




टैण्ट के अन्दर सुरेन्द्र
अगले भाग में जारी...

चन्द्रखनी ट्रेक
1. चन्द्रखनी दर्रे की ओर- दिल्ली से नग्गर
2. रोरिक आर्ट गैलरी, नग्गर
3. चन्द्रखनी ट्रेक- रूमसू गांव
4. चन्द्रखनी ट्रेक- पहली रात
5. चन्द्रखनी दर्रे के और नजदीक
6. चन्द्रखनी दर्रा- बेपनाह खूबसूरती
7. मलाणा- नशेडियों का गांव