Friday, June 27, 2014

आसमानी बिजली के कुछ फोटो

बरसात में जब बिजली चमकती है तो सेकंड के सौवें हिस्से में सबकुछ हो जाता है। पता नहीं लोगबाग इतनी फुर्ती से इनके फोटो कैसे खींच लेते हैं? मैंने भी कोशिश की लेकिन जब तक क्लिक करता, तब तक दो सेकंड बीत जाते। कडकती बिजली के लिये तो दो सेकंड बहुत ज्यादा होते हैं। मुझे हमेशा अन्धेरी रात ही दिखाई देती।
इलाज निकला। कैमरे को ट्राइपॉड पर वीडियो मोड में लगाकर छोड दिया और अन्दर जाकर डिनर करने लगा। वापस आया तो करीब बीस मिनट की वीडियो हाथ लग चुकी थी। इसमें बहुत बढिया बिजली कडकती व गिरती भी कैद हो गई। दो-तीन बार ऐसा किया। आखिरकार उन वीडियो से कुछ फोटो हाथ लगे हैं, क्वालिटी बेशक उतनी अच्छी नहीं है लेकिन बिजली अच्छी लग रही है।
आप भी देखिये:
 


















 
 
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Wednesday, June 25, 2014

चूडधार की जानकारी व नक्शा

चूडधार की यात्रा कथा तो पढ ही ली होगी। ट्रेकिंग पर जाते हुए मैं जीपीएस से कुछ डाटा अपने पास नोट करता हुआ चलता हूं। यह अक्षांस, देशान्तर व ऊंचाई होती है ताकि बाद में इससे दूरी-ऊंचाई नक्शा बनाया जा सके। आज ज्यादा कुछ नहीं है, बस यही डाटा है।
अक्षांस व देशान्तर पृथ्वी पर हमारी सटीक स्थिति बताते हैं। मैं हर दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह मिनट बाद अपनी स्थिति नोट कर लेता था। अपने पास जीपीएस युक्त साधारण सा मोबाइल है जिसमें मैं अपना यात्रा-पथ रिकार्ड नहीं कर सकता। हर बार रुककर एक कागज पर यह सब नोट करना होता था। इससे पता नहीं चलता कि दो बिन्दुओं के बीच में कितनी दूरी तय की। बाद में गूगल मैप पर देखा तो उसने भी बताने से मना कर दिया। कहने लगा कि जहां सडक बनी है, केवल वहीं की दूरी बताऊंगा। अब गूगल मैप को कैसे समझाऊं कि सडक तो चूडधार के आसपास भी नहीं फटकती। हां, गूगल अर्थ बता सकता है लेकिन अपने नन्हे से लैपटॉप में यह कभी इंस्टाल नहीं हो पाया।
कुल मिलाकर यहां मैं अपना वो सारा डाटा लिख रहा हूं, जो यात्रा के दौरान नोट किया था। इससे आपको यात्रा-पथ व ऊंचाई की जानकारी हो जायेगी। गूगल अर्थ हो तो कुल दूरी भी पता चल सकती है। हालांकि पहाडों पर कभी भी सीधी रेखा में नहीं चला जाता और यहां हर दो बिन्दुओं के बीच की सीधी दूरी ही पता चल सकती है, इसलिये सटीकता के लिये इसका लगभग डेढ गुना करना होगा।

क्रम
अक्षांसदेशान्तरऊंचाई (मीटर में)मेरे पहुंचने व चलने का समयअन्य
1
30°48'46.81''77°25'06.96''
2135
08:10
नोहराधार
2
30°48'53.14''77°25'06.91''
2211

3
30°49'02.37''77°25'10.70''
2276
08:30
4
30°49'07.62''77°25'19.68''
2315
08:41
5
30°49'15.50''77°25'22.51''
2357
08:50
6
30°49'23.38''77°25'29.79''
2368
09:00
7
30°49'29.09''77°25'37.55''
2384
09:07
लक्की ढाबा
8
30°49'33.69''77°25'50.56''
2484
09:25
9
30°49'36.30''77°25'49.12''
2520
09:31
विश्राम शेड, जंगल शुरू
10
30°49'47.34''77°25'55.41''
2560
09:42
11
30°49'50.81''77°25'58.49''
2564
09:53
शिरगुल होटल
12
30°50'02.00''77°26'11.55''
2652
10:18
13
30°50'13.01''77°26'28.80''
2744
10:36
14
30°50'15.97''77°26'25.77''
2815
10:50-11:05
15
30°50'34.37''77°26'25.42''
2848
11:19
जमनाला, खुला मैदान, चाय
16
30°50'45.11''77°26'31.69''
2911
11:33
17
30°51'02.73''77°26'35.96''
2972
11:45-11:50
20 मीटर आगे पानी
18
30°51'01.75''77°26'47.88''
3020
12:04
19
30°51'16.70''77°27'05.74''
3107
12:20-12:28
20
30°51'26.76''77°27'15.89''
3128
12:42
21
30°51'35.70''77°27'17.52''
3150
12:54
22
30°51'48.46''77°27'21.44''
3207
13:05
23
30°51'57.46''77°27'25.18''
3228
13:18-08:25
तीसरी, विश्राम, चाय, खाना
24
30°52'07.68''77°27'36.13''
3246
08:35
25
30°52'00.50''77°27'49.81''
3290
08:50
वृक्ष रेखा समाप्त
26
30°51'54.41''77°28'01.25''
3300
09:04
27
30°51'53.50''77°28'11.00''
3330
09:13
28
30°51'54.74''77°28'18.86''
3360
09:28-09:33
कठिन चढाई शुरू
29
30°51'54.45''77°28'21.13''
3374
09:38-09:43
30
30°51'52.98''77°28'25.73''
3400
09:55
खडी चढाई समाप्त, मामूली सा ढलान
31
30°51'54.76''77°28'28.45''
3433
10:04
32
30°51'57.20''77°28'33.94''
3465
10:18
33
30°52'00.03''77°28'37.07''
3501
10:30-10:40
34
30°51'59.25''77°28'41.70''
3560
10:52
रिज के ऊपर
35
30°52'08.08''77°28'46.50''
3595
11:20-11:30
36
30°52'14.10''77°28'49.23''
3614
12:00-12:15
चूडधार चोटी
37
30°52'16.53''77°28'54.43''
3564
12:39
38
30°52'14.04''77°28'58.98''
3492
12:49
39
30°52'18.73''77°29'10.81''
3397
13:05-14:00
शिरगुल मन्दिर
40
30°51'59.24''77°29'22.88''
3000
14:20-14:25
ट्रांसफॉर्मर
41
30°51'55.38''77°29'31.99''
2846
14:42
नाला पार करना है
42
30°51'43.80''77°29'48.88''
2679
15:01
थोडी सी खुली जगह
43
30°51'43.28''77°29'55.10''
2619
15:12
नाला पार करना है
44
30°51'35.42''77°30'07.36''
2470
15:29
नाला पार करना है
45
30°51'25.59''77°30'38.83''
2352
15:47
46
30°51'23.47''77°30'46.82''
2350
15:53
नाला पार करना है, लकडी का पुल
47
30°51'19.41''77°30'59.50''
2246
16:02-16:12
घराट, खुली जगह
48
30°51'09.52''77°31'07.77''
2218
16:19-16:27
नाला पार करना है
49
30°50'59.25''77°31'23.34''
2106
16:38
नाला पार करना है
50
30°50'57.50''77°31'28.07''
2088
16:45-16:50
छोटा सा मैदान
51
30°50'55.92''77°31'43.11''
2042
17:00
दूसरा नाला पार करना है
52
30°50'42.34''77°31'56.17''
1965
17:18
घराट, लोहे का पुल
53
30°50'19.39''77°32'39.82''
1842
17:50
तराहां

वैसे तो इसके बारे में यात्रा-वृत्तान्तों में सबकुछ लिखा जा चुका है। फिर भी मोटी मोटी जानकारी यहां भी लिख देता हूं:
चूडधार जाने के कई रास्ते हैं। सबसे प्रचलित और सुगम रास्ता नोहराधार से जाता है। नोहराधार सोलन से लगभग 75 किलोमीटर दूर है, खूब बसें चलती हैं। नोहराधार जैसा कि ऊपर चार्ट से भी स्पष्ट है कि समुद्र तल से 2135 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां जहां बस उतारती है, वहीं चूडधार जाने के लिये प्रवेश द्वार भी बना है। एक बार प्रवेश कर लिया, किसी से रास्ता पूछने की आवश्यकता नहीं रह जाती। कम से कम दो किलोमीटर तक बसावट है। अगर लगे कि रास्ता भटक गये, हमेशा कोई न कोई सहायता करने को मिल जायेगा।
जंगल के बीच में एक खुली जगह है, जहां अक्सर गायें चरती दिखती हैं। इसे जमनाला भी कहते हैं। जमनाला से कुछ आगे तीसरी है। जमनाला और तीसरी में खाने-पीने को मिल जाता है। तीसरी से चूडधार छह किलोमीटर रह जाता है जिनमें से शुरूआती ढाई तीन किलोमीटर बहुत आसान हैं। आखिरी भाग अवश्य कुछ कठिन है। चूडधार की ऊंचाई 3614 मीटर है।
एक और दूसरा रास्ता तराहां से जाता है। नोहराधार से आगे हरिपुरधार है और उससे भी बीस-पच्चीस किलोमीटर आगे तराहां। बहुत सीमित बसें यहां तक जाती हैं। तराहां की ऊंचाई 1840 मीटर है। यहां से करीब दो किलोमीटर आगे एक गांव है, अच्छा चलता-फिरता रास्ता है। उससे भी एक-डेढ किलोमीटर आगे तक खेत व आवागमन मिलता रहता है। फिर जंगल शुरू होता है जो चूडधार पर जाकर ही समाप्त होता है। यह एक घना जंगल है और इसमें भालुओं की भरमार है। निःसन्देह तेंदुओं की भी। रास्ता नहीं के बराबर है, हालांकि गौर करने पर दिख जाता है। चढाई भी बडी जबरदस्त है। रास्ते में खाने को कुछ नहीं मिलता।
तीसरा रास्ता सराहां से जाता है। पहले शिमला जाना पडता है। फिर चौपाल होते हुए सराहां पहुंचा जा सकता है। मैंने इस रास्ते को नहीं देखा है लेकिन बताते हैं कि यह भी ठीकठाक चलता हुआ रास्ता है। बीच में एक जगह खाने की दुकान भी है।
कब जायें: मई में बर्फ पिघलने के बाद से नवम्बर तक कभी भी जाया जा सकता है। कुछ अनुभवी लोग सर्दियों में भी जाते हैं लेकिन अत्यधिक बर्फ व आखिर में खडी चढाई होने के कारण यहां सर्दियों में नहीं आना चाहिये। जगह काफी ऊंचाई पर है तो जाहिर है कि गर्मियों में भी सर्दी लगेगी, इसलिये गर्म कपडे ले जाना ठीक रहता है।
 
 
 
अगर आपने अभी तक चूडधार यात्रा कथा नहीं पढी है, तो यहां क्लिक करें
चूडधार यात्रा तो समाप्त हो गई। अब आप क्या करेंगे? अच्छा, एक काम कीजिये। टिप्पणियां करनी शुरू कर दीजिये। मुख्यतः इस यात्रा से सम्बन्धित। जो भी कहना हो, प्रशंसा करनी हो, आलोचना करनी हो। मुश्किल नहीं है टिप्पणी करना। एक बार करके तो देखिये। तब तक एक और यात्रा-कथा का इंतजाम करता हूं।
टिप्पणियां उत्साह से भर देती हैं। जो टिप्पणियां अच्छी व जानदार लगेंगी, उन्हें आगामी डायरी के पन्नों में जगह दी जायेगी।



चूडधार कमरुनाग यात्रा

1. कहां मिलम, कहां झांसी, कहां चूडधार
2. चूडधार यात्रा- 1
3. चूडधार यात्रा- 2
4. चूडधार यात्रा- वापसी तराहां के रास्ते
5. भंगायणी माता मन्दिर, हरिपुरधार
6. तराहां से सुन्दरनगर तक- एक रोमांचक यात्रा
7. रोहांडा में बारिश
8. रोहांडा से कमरुनाग
9. कमरुनाग से वापस रोहांडा
10. कांगडा रेल यात्रा- जोगिन्दर नगर से ज्वालामुखी रोड तक
11.चूडधार की जानकारी व नक्शा

Monday, June 23, 2014

कांगडा रेल यात्रा- जोगिन्दर नगर से ज्वालामुखी रोड तक

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चला था मिलन ग्लेशियर के लिये, पहुंच गया चूडधार और उसके बाद कमरुनाग। अभी भी मेरे पास एक दिन और शेष था। सुरेन्द्र के पास भी एक दिन था। एक बार तो मन में आया भी कि दिल्ली वापस चलते हैं, एक दिन घर पर ही बिता लेंगे। फिर याद आया कि मैंने अभी तक कांगडा रेलवे पर जोगिन्दर नगर से बैजनाथ पपरोला के बीच यात्रा नहीं की है। तकरीबन पांच साल पहले मैंने इस लाइन पर पठानकोट से बैजनाथ पपरोला तक यात्रा की थी। उस समय मुझे पता नहीं था कि हिमाचल में रात को भी बसें चलती हैं। पता होता तो मैं उसी दिन जोगिन्दर नगर तक नाप डालता। जोगिन्दर नगर को मैं कोई छोटा-मोटा गांव समझता था। रात रुकने के लिये कोई कमरा मिलने में सन्देह था।
सुबह सवा सात बजे यहां से पठानकोट के लिये पैसेंजर चलती है। ढाई फीट गेज की यह ट्रेन पठानकोट और जोगिन्दर नगर के बीच 164 किलोमीटर की दूरी तय करती है। इसे 1926 में तब बनाया गया था, जब जोगिन्दर नगर से आगे बरोट में एक बांध का निर्माण किया गया- पठानकोट से बरोट तक सामान लाने-ले जाने के लिये।
पर्वतीय मार्गों पर चलने वाली ट्रेनें वैसे ही खूबसूरत दृश्यों से होकर चलती हैं, कांगडा रेल इनसे एक कदम आगे है। इसका पूरा मार्ग धौलाधार के बर्फीले पहाडों के समान्तर है, इसलिये पठानकोट से जोगिन्दर नगर तक हमेशा बर्फीले पहाड दिखते रहते हैं। मैं और सुरेन्द्र जमकर इन पहाडों और रेलवे लाइन के बराबर में गेहूं के खेतों के फोटो खींचते रहे।
बैजनाथ पपरोला में इसका 110 मिनट का ठहराव है। सुरेन्द्र बैजनाथ मन्दिर स्टेशन पर उतर गया और बैजनाथ के प्राचीन मन्दिर को देखने चला गया। मैंने इसे दो बार देख रखा है, इसलिये ट्रेन में ही बैठा रहा। बाद में सुरेन्द्र बस से पपरोला आ गया।
ठीक दस बजकर पचास मिनट पर ट्रेन चल पडी। हमने जोगिन्दर नगर से ही ज्वालामुखी रोड का टिकट ले लिया था। वहां यह डेढ बजे के आसपास पहुंचती है। जाने को तो हम पठानकोट भी जा सकते थे लेकिन हमारा दिल्ली के लिये कोई आरक्षण नहीं था। ज्वालामुखी रोड से हमें सीधे दिल्ली या चण्डीगढ की बस मिल जायेगी।
एक पुलिस वाला एक ‘अपराधी’ को लेकर ट्रेन में चढा और सीट पर बैठ गया। अपराधी को उसने गैलरी में नीचे फर्श पर बैठा दिया। ये तो पता नहीं चल पाया कि उसका अपराध क्या था लेकिन पुलिस वाला लगातार उसके साथ मारपीट और गाली-गलौच करता जा रहा था। एक बात और निश्चित थी कि उसने कोई अपराध नहीं किया था, क्योंकि वे पालमपुर से चढे थे और ज्वालामुखी रोड तक ट्रेन में ही रहे। अपराधी ने कई बार उतरने को भी कहा। बाद में दोनों हंस हंसकर बातें करने लगे, उसे सीट भी मिल गई। खैर, जो हो।
पिछली बार जब मैंने इस लाइन पर यात्रा की थी तो ट्रेन पठानकोट से ही भर गई थी व ज्वालामुखी रोड तक बेतहाशा भरी हुई आई थी। ज्वालामुखी के बाद यह खाली हो गई थी। बस, तभी से मन में बात जम गई थी कि अब ज्वालामुखी के बाद पठानकोट तक भयंकर भीड हो जायेगी। इस बारे में मैं लगातार सुरेन्द्र से भी बताता आ रहा था कि ज्वालामुखी के बाद ट्रेन पूरी भर जायेगी।
यह लाइन मेरी पसन्दीदा लाइनों में से एक है। पसन्दीदा क्यों है, यह तो फोटो देखने से पता चल ही जायेगा। लेकिन कमी यह है कि भारत की अन्य पर्वतीय रेलवे की तरह इसमें आरक्षण नहीं होता। सभी डिब्बे साधारण श्रेणी ही होते हैं। अगर शिमला, दार्जीलिंग, मथेरान व ऊटी वाली लाइनों की तरह इसका भी प्रचार किया जाये तो इससे रेलवे को अच्छी खासी आमदनी हो सकती है। बाकी सभी पर्वतीय रेलवे से ज्यादा खूबसूरत है इसका मार्ग।
ज्वालामुखी रोड पर उतर गये। असल में जोगिन्दर नगर से ज्वालामुखी रोड तक रेलवे लाइन राष्ट्रीय राजमार्ग के साथ साथ चलती है। इस राजमार्ग पर चौबीस घण्टे बसें चलती हैं। ज्वालामुखी रोड के बाद पठानकोट तक यह कांगडा के उन इलाकों से होकर गुजरती है जहां सडक मार्ग ज्यादा अच्छा नहीं है।
ज्वालामुखी रोड स्टेशन रानीताल नामक स्थान पर है। ज्वालामुखी मन्दिर यहां से बीस किलोमीटर दूर हैं, खूब बसें मिलती हैं। लेकिन हमें ज्वालामुखी नहीं जाना था, बल्कि दिल्ली जाना था। कांगडा से दिल्ली व चण्डीगढ जाने वाली प्रत्येक बस यहीं से होकर जाती है। स्टेशन से बाहर निकलकर सडक पर काफी देर प्रतीक्षा करने के बाद हिमाचल परिवहन की धर्मशाला-हरिद्वार बस आई तो इसमें चढ लिये व चण्डीगढ का टिकट ले लिया।
रात दस बजे चण्डीगढ पहुंचे। वैसे तो नौ बजे से पहले ही पहुंच जाते लेकिन आनन्दपुर के पास इसमें पंक्चर हो गया। वहां काफी समय लग गया। हम दोनों की इच्छा ट्रेन से दिल्ली जाने की थी, कालका हावडा मेल में हमेशा सोने को बर्थ मिल जाती है। पचास रुपये लगाकर रेलवे स्टेशन पहुंचे। यहां उम्मीद के विपरीत बहुत लम्बी लाइन लगी देखकर होश उड गये। असल में आज के दिन चण्डीगढ-डिब्रुगढ एक्सप्रेस चलती है रात सवा ग्यारह बजे; तो बिहारी, बंगाली, आसामी व फौजी बडी संख्या में थे।
पूछताछ से पता चला कि यहां करंट आरक्षण जैसी कोई चीज नहीं है, आपको साधारण टिकट लेकर स्लीपर में चढ जाना है, टीटी ही आपको बर्थ देगा। ऐसे में हमेशा सन्देह होता है कि पता नहीं कोई बर्थ खाली होगी भी या नहीं। सुरेन्द्र से विमर्श किया तो तय हुआ कि बस से ही चलते हैं। गूगल मैप में रास्ता देखा। दिल्ली वाली सडक यहां से करीब दो किलोमीटर दूर से गुजरती है। पैदल ही चलते हैं, बस अड्डे जायेंगे तो बेवजह ऑटो वाले को पचास साठ रुपये देने पडेंगे। पैदल चल पडे। कुछ दूर तक तो चहल-पहल रही, धीरे धीरे सन्नाटा होता गया व सडक भी खराब व धूलभरी होती गई। आधी रात हो चुकी थी, इलाका अनजान था। एक किलोमीटर भी नहीं गये होंगे कि फिर से मन बदला- ट्रेन से ही चलते हैं। बर्थ मिल जायेगी। नहीं तो देखा जायेगा।
पुनः स्टेशन पहुंचे। टिकट लिया। ट्रेन एक घण्टे की देरी से चल रही थी। यह कालका से आती है। इसमें पांच शयनयान के, एक थर्ड एसी, एक सेकंड एसी व एकाध साधारण श्रेणी के डिब्बे चण्डीगढ से जोडे जाते हैं। ये डिब्बे चण्डीगढ पर ही सबसे आखिर वाले प्लेटफार्म पर खडे थे व इनमें यात्री सोये पडे थे। कालका से ट्रेन आती है और ये डिब्बे इनमें जोड दिये जाते हैं।
डेढ बजे ट्रेन आई। टीटीई की खोज शुरू हुई। वह एस-10 में मिल गया। दिल्ली का नाम लेते ही उसने इसी डिब्बे में दो बर्थ दे दीं व किराये के अन्तर के बराबर धनराशि लेकर शयनयान का टिकट बना दिया। नब्बे नब्बे रुपये और लगे। वैसे तो यह ट्रेन सुपरफास्ट है लेकिन कालका और दिल्ली के बीच यह एक्सप्रेस के तौर पर चलती है व टिकट भी एक्सप्रेस के ही जारी किये जाते हैं। इसकी सीटों के कोटे का एक बडा हिस्सा दिल्ली का है इसलिये कालका व चण्डीगढ से दिल्ली के लिये साधारण टिकटधारियों को भी बिना पूर्व आरक्षण के इसमें सोने के लिये बर्थ आसानी से मिल जाती हैं।
सुबह आठ बजे तक दिल्ली पहुंच गये।























अगला भाग... आखिरी भाग ... चूडधार की जानकारी व नक्शा


चूडधार कमरुनाग यात्रा

1. कहां मिलम, कहां झांसी, कहां चूडधार
2. चूडधार यात्रा- 1
3. चूडधार यात्रा- 2
4. चूडधार यात्रा- वापसी तराहां के रास्ते
5. भंगायणी माता मन्दिर, हरिपुरधार
6. तराहां से सुन्दरनगर तक- एक रोमांचक यात्रा
7. रोहांडा में बारिश
8. रोहांडा से कमरुनाग
9. कमरुनाग से वापस रोहांडा
10. कांगडा रेल यात्रा- जोगिन्दर नगर से ज्वालामुखी रोड तक
11.चूडधार की जानकारी व नक्शा

Friday, June 20, 2014

कमरुनाग से वापस रोहांडा

इस यात्रा वृत्तान्त के फोटो देखने के के लिये यहां क्लिक करें
इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें
13 मई 2014, मंगलवार
आज हमें कमरुनाग से शिकारी देवी जाना था जिसकी दूरी स्थानीय निवासी 18 किलोमीटर बताते हैं। रास्ता ऊपर पहाडी धार से होकर ही जाता है, तो ज्यादा उतराई-चढाई का सामना नहीं करना पडेगा।
आंख खुली तो बाहर टप-टप की आवाज सुनकर पता चल गया कि बारिश हो रही है। हिमालय की ऊंचाईयों पर अक्सर दोपहर बाद मौसम खराब हो जाता है, फिर एक झडी लगती है और उसके बाद मौसम खुल जाता है। सुबह मौसम बिल्कुल साफ-सुथरा मिलता है। लेकिन आज ऐसा नहीं था। मैं सबसे आखिर में उठने वालों में हूं, सचिन ही पहले उठा और बाहर झांक आया। बताया कि बारिश हो रही है। इसका अर्थ है कि पूरी रात बूंदाबांदी होती रही थी और अभी भी खुलना मुश्किल है। ऐसे में हम शिकारी देवी नहीं जा सकते थे क्योंकि सचिन व सुरेन्द्र के पास रेनकोट नहीं थे। फिर वो रास्ता ऊपर धार से होकर ही है जहां मामूली हवा भी बडी तेज व ठण्डी लगती है।
दस बज गये और ग्यारह भी बज गये। आवाज देकर चाय और पकौडियां मंगा ली। कम्बलों में बैठे बैठे चाय पीने का आनन्द गजब का होता है।
सचिन का स्वभाव जल्दबाजी करने का है। वह हमेशा जल्दी करो, जल्दी करो कहता रहता है। फिर ऊपर से जाट, वो भी मुजफ्फनगर का; निर्णय पहले लेता है, अक्ल बाद में लगाता है। कहने लगा शिकारी माता जायेंगे, चाहे कुछ भी हो जाये। हमसे उठ जाने व जल्दी करने को कहने लगा। मैंने सुझाव दिया कि अगर यहां से दो छतरियों का इंतजाम हो सके तो कर लो। चाहे खरीदनी ही क्यों न पडे। बात उसकी समझ में आई। बाहर गया और कुछ देर बाद निराश होकर लौट आया- ये तो किसी भी कीमत पर छतरी नहीं दे रहे। बाद में मैंने पन्नी का इंतजाम करने का सुझाव दिया लेकिन ऐसा भी नहीं हो सका। इसका अर्थ यही था कि यही पडे रहो और बारिश रुकने की प्रतीक्षा करते रहो। एकाध घण्टे में रुक गई तो ठीक, नहीं तो बारिश रुकते ही वापस रोहांडा चले जायेंगे।
तभी सचिन की निगाह पडी मेरे स्लीपिंग बैग पर। मैं रात इसे ही ओढकर सोया था। पूछने लगा कि क्या यह वाटरप्रूफ है? मैंने कहा, हां है। बोला बस तो मेरा काम हो गया। इसे ही लपेट लूंगा। मैंने फिर सुझाव दिया कि एक बार इसे लपेटने की प्रैक्टिस कर। उसने लपेटने की कोशिश की। लाखवीं कोशिश में वह कुछ सफल हुआ। अब मैंने फिर कहा कि इसे इसी तरह लपेटकर और बैग कमर पर लटकाकर झील का एक चक्कर लगाकर आ। क्या पता बाहर निकलते ही यह फिर काबू से बाहर हो जाये?
बाहर काफी तेज हवा चल रही थी। वह स्लीपिंग बैग को लपेटे लपेटे ही बाहर चला गया। उसके जाने के बाद मैंने सुरेन्द्र से कहा कि बारिश और इतनी तेज हवा में मैं शिकारी देवी नहीं जाऊंगा। अभी हम रजाईयों में बैठे हैं, रास्ते में जब धार पर उडा देने वाली और सुई की तरह चुभने वाली ठण्डी हवा लगेगी तो मुसीबत हो जायेगी। शिकारी फिर कभी। सुरेन्द्र सहमत था।
कुछ देर बाद सचिन आ गया। स्लीपिंग बैग की तरफ से वह काफी खुश था। उसने बताया कि स्थानीय लोगों से शिकारी देवी जाने की बात की थी तो उन्होंने मुझे लताड दिया। वे कह रहे हैं कि रास्ते में उडा देते वाली हवा चल रही होगी और न जाने की सलाह दे रहे हैं। फिर मैंने भी कुछ भाषण-प्रवचन दिये, सचिन बुझे मन से मान गया।
यहां से दाल-चावल खाकर एक बजे हम वापस रोहांडा के लिये चल दिये। अब तक मौसम खुल चुका था। सुरेन्द्र ने कहा भी कि अब मौसम खुल गया है, शिकारी देवी चल सकते हैं लेकिन मैंने मना कर दिया। कारण था कि अभी भी हवा बहुत तेज चल रही थी और मैं अगले चार पांच घण्टों के लिये मौसम की तरफ से निश्चिन्त नहीं हो सकता था खासकर इस समय। दोपहर बाद पूरे हिमालय की ऊंचाईयों पर मौसम खराब होने लगता है। अगर अभी हमें ठीक लग रहा है तो जरूरी नहीं कि अगले चार घण्टों तक ठीक ही रहेगा।
मेरा अन्दाजा ठीक निकला। जब तीन घण्टे बाद हम नीचे पहुंचे तो ऊपर मौसम खराब हो चुका था और घने काले बादल यहां कमरुनाग के आसपास दिख रहे थे।
मुझे नीचे उतरने के लिये डण्डे की आवश्यकता पडती है। कल जब ऊपर आ रहे थे तो मैंने अपना ट्रैकिंग पोल सचिन को दे दिया था। अब वापस ले लिया क्योंकि एक तो तेज ढलान था और दूसरे, चौबीस घण्टे से बारिश होते रहने से फिसलन भी हो गई थी। सचिन के लिये रास्ते में पडी एक मजबूत टहनी को उठा लिया था। सुरेन्द्र बिना डण्डे के उतरा।
हमने वापस आने में कोई जल्दबाजी नहीं की। आराम से फोटो खींचते हुए आये। बारिश के बाद आसमान खुलने से वातावरण भी धुला धुला हो गया था। काफी देर तक धौलाधार के बर्फीले पहाड दिखते रहे और दूसरी तरफ सुदूर किन्नौर तक का इलाका दिख रहा था। हालांकि उधर बादल होने के कारण किन्नौर की बर्फीली चोटियां नहीं दिखीं। बडी देर तक सुरेन्द्र उन बादलों को बर्फ मानता रहा व फोटो खींचता रहा।
रोहांडा आकर गर्मी लगने लगी। गर्म कपडे उतारकर बैग में रख लिये व दूसरे कपडे पहन लिये। तब तक सुन्दरनगर की बस भी आ चुकी थी। सचिन के पास और घूमने का समय नहीं था जबकि मेरे व सुरेन्द्र के पास एक दिन और था। सुन्दरनगर से सचिन ने दिल्ली की बस पकड ली और हमने मण्डी की। मण्डी से जोगिन्दरनगर जायेंगे और कांगडा घाटी रेल में यात्रा करेंगे।

कमरुनाग झील

देव कमरु का मन्दिर



सचिन कुमार जांगडा

झील के किनारे से दिखता रोहांडा गांव






यहां से दिखतीं धौलाधार की बर्फीली पहाडियां।

















आडू का पेड



अगले भाग में जारी...

चूडधार कमरुनाग यात्रा

1. कहां मिलम, कहां झांसी, कहां चूडधार
2. चूडधार यात्रा- 1
3. चूडधार यात्रा- 2
4. चूडधार यात्रा- वापसी तराहां के रास्ते
5. भंगायणी माता मन्दिर, हरिपुरधार
6. तराहां से सुन्दरनगर तक- एक रोमांचक यात्रा
7. रोहांडा में बारिश
8. रोहांडा से कमरुनाग
9. कमरुनाग से वापस रोहांडा
10. कांगडा रेल यात्रा- जोगिन्दर नगर से ज्वालामुखी रोड तक
11.चूडधार की जानकारी व नक्शा