Tuesday, December 16, 2014

डायरी के पन्ने-27

नोट: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।

1. आज की चर्चा आरम्भ करते हैं गूगल मैप मेकर से। पिछली बार आपको बताया था कि गूगल मैप को कोई भी एडिट कर सकता है- मैं भी और आप भी। कुछ लोग अपने को बडा भयंकर जानकार समझते हैं। जिन्होंने कभी सोचा तक नहीं कि गूगल मैप को एडिट कैसे किया जाता है, वे एडिटर को दस बातें समझा सकते हैं। मुझे भी कुछ लोगों ने इसी तरह की बातें बताईं। मसलन आप गूगल को सुझाव भेजोगे कि यह रास्ता या यह गांव इस स्थान पर स्थित है। गूगल अपनी टीम को उस स्थान पर देखने भेजेगा कि वाकई वो रास्ता या गांव वहां है या नहीं। जब गूगल की टीम उस स्थान का सर्वे कर लेगी, तब आपका सुझाव गूगल मैप में प्रकाशित होना शुरू हो जायेगा। यह केवल अफवाह है। ऐसा कुछ नहीं है।
गूगल मैप के दो संस्करण हैं- एक पुराना और एक नया। पता नहीं आपके कम्प्यूटर में कौन सा संस्करण दिखता है। मेरे लैपटॉप में नया वर्जन दिखता है तो ऑफिस वाले में पुराना। पुराने वर्जन को जब आप खोलोगे तो नीचे दाहिने कोने में एक लिंक मिलेगा- edit in map maker. इस पर क्लिक करेंगे तो मैप मेकर आपके सामने खुल जायेगा। अगर आपने गूगल पर पहले से ही लॉगिन नहीं कर रखा है तो अब आपको लॉगिन करना पडेगा। लॉगिन करते ही आप गूगल मैप में कुछ भी एडिट करने को स्वतन्त्र हो। जी हां, कुछ भी।
अगर आपको edit in map maker नहीं मिला है तो इस लिंक पर क्लिक करके आप सीधे मैप मेकर पर जा सकते हैं।
गूगल मैप बहुत ही भरोसेमन्द और उपयोगी चीज है। कोई भी इसमें बदलाव कर सकता है तो यह बन्दर के हाथ में उस्तरा पकडाने के बराबर होगा। लेकिन गूगल इतना मूर्ख नहीं है कि किसी भी बदलाव को एकदम स्वीकार कर ले। जब आप पहली बार कुछ बदलाव करोगे तो आपका बदलाव तुरन्त नहीं दिखेगा बल्कि इसे रिव्यू में डाल दिया जायेगा। दूसरे एडिटर जो इस स्थान के बारे में जानते हैं, वे इस परिवर्तन से समहत होंगे, तभी आपका बदलाव गूगल मैप पर दिखने लगेगा। मेरे सामने भी बहुत से रिव्यू आते हैं, आपके सामने भी आयेंगे।
आपके बदलाव अगर ठीक होते जायेंगे तो आपकी विश्वसनीयता भी बढती जायेगी और आपको और ज्यादा अधिकार मिलते जायेंगे। फिर एक समय ऐसा आयेगा कि आपको कोई गांव स्थापित करने या सडक बनाने के लिये किसी रिव्यू की जरुरत नहीं होगी। इधर आप कोई चीज मैप मेकर में अपडेट करोगे, उधर वह गूगल मैप में दिखने लगेगी।
अब मैं इसी दौर में पहुंच चुका हूं। चूंकि मेरे बदलावों को अब किसी रिव्यू की जरुरत नहीं होती इसलिये मैं कुछ भी कर सकता हूं। चाहूं तो गंगोत्री से सीधे चालीस-पचास किलोमीटर की सडक बनाकर बद्रीनाथ को जोड दूं या केदारनाथ को जोड दूं। अब यह मेरी ईमानदारी है कि मैं गलत एडिट न करूं। गूगल मैप पर बहुत से स्थान व बहुत सी सडकें अभी भी गलत हैं। ये सब ऐसे ही लोगों द्वारा अपडेट की गई हैं। आपसे भी गुजारिश है कि आप कभी भी गलत अपडेट न करें। गूगल मैप सबके लिये उतना ही उपयोगी है, जितना आपके लिये। किसी भी यात्रा की प्लानिंग गूगल मैप के बिना नहीं हो सकती। जो जगह आपने देख रखी है, जिसके बारे में आपको पक्का पता है, केवल वही जगह अपडेट करें और केवल उसी जगह का रिव्यू दें। इसी तरह कोई जगह या सडक गलत है तो उसे डिलीट भी किया जा सकता है।
मोबाइल व जीपीएस उपकरणों से जीपीएस की सहायता से किसी सडक व स्थान का एकदम सटीक नक्शा बनाया जाता है। इससे यह नक्शा आपके मोबाइल या जीपीएस डिवाइस में सेव हो जाता है। इससे KMZ फाइल बनती है। इस फाइल को भी गूगल मैप मेकर पर अपलोड किया जा सकता है और सटीक रास्ता बनाया जा सकता है। मैंने कभी ऐसा नहीं किया है, तो इसकी मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है।
ताजा अपडेट: पिछले सप्ताह मैंने बीकानेर से फलोदी तक रेलयात्रा की थी। गूगल मैप पर यह रेलमार्ग पूरा नहीं बना था और काफी कुछ गलत भी बना था। मैंने पहले तो गलत लाइनों को हटाना शुरू किया, फिर वर्तमान लाइन बनानी शुरू की। लेकिन गूगल महाराज ने मुझे अभी इतने अधिकार नहीं दिये हैं कि मैं कितने भी अपडेट बिना रिव्यू के करता रहूं। फलतः कुछ अपडेटों के बाद मेरे अपडेट रिव्यू में जाने लगे। कोई दूसरा उसका सकारात्मक रिव्यू देगा, तभी वह गूगल मैप पर दिखेगा। लेकिन एक मूर्ख ने मेरे एक अपडेट पर नकारात्मक रिव्यू दे दिया। सैटेलाइट में रेगिस्तान के बीच रेलवे लाइन स्पष्ट दिख रही थी, फिर भी अन्धे को वह नहीं दिखी और कह दिया कि यहां ऐसा कुछ नहीं है। हालांकि मैंने दोबारा कोशिश की, सफल भी हो गया लेकिन गूगल मैप में मेरी विश्वसनीयता कम हो गई। पहले मेरे दस-बारह तक अपडेट बिना रिव्यू के छप जाते थे, अब हरेक अपडेट रिव्यू में जाने लगा। दूसरा कोई उस पर सकारात्मक रिव्यू देगा, तभी अपडेट होगा।

2. अक्सर मित्र पूछते हैं कि ब्लॉग कैसे बनाया जाता है। वास्तव में ब्लॉग बनाना बहुत आसान है। यह बिल्कुल फ्री होता है। इसके लिये आपको अलग से कुछ भी खर्च नहीं करना होता। मैंने अभी तक बहुत सारे मित्रों को ब्लॉग बनाना सिखाया है। उनमें से कुछ बुलन्दियों पर पहुंच गये हैं, कुछ ने ब्लॉग बनाकर उसके बाद कुछ लिखा ही नहीं। अगर आप वास्तव में ब्लॉगिंग में आगे बढना चाहते हैं तो ब्लॉग बनाये, अन्यथा अपना और दूसरों का समय नष्ट करने से क्या फायदा?
ब्लॉगिंग के दो मुख्य प्लेटफार्म हैं- ब्लॉगर और वर्डप्रेस। मेरा यह ब्लॉग ब्लॉगर पर है। हालांकि वर्डप्रेस पर भी एक ब्लॉग है लेकिन वहां मेरी गतिविधि नहीं के बराबर है, इसलिये मेरे लिये यह कहना मुश्किल है कि ब्लॉगर और वर्डप्रेस में कौन उत्तम है। आप http://blogger.com और http://wordpress.com पर क्लिक करके किसी भी प्लेटफार्म पर जाकर ब्लॉगिंग शुरू कर सकते हैं।
ब्लॉगर गूगल की सेवा है। इसके लिये आपको गूगल खाते की आवश्यकता होगी। एक बार आप http://blogger.com पर जाओगे, और अगर वास्तव में लिखना चाहते हैं तो आपको एक-एक स्टेप बताने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी अगर किसी तकनीकी सहायता की जरुरत हो तो जरूर पूछें। ब्लॉगिंग मुबारक हो।

3. लगभग दो साल पहले मेरे एक मित्र को हमारे गांव हमारे घर पर आना था। वे दिल्ली से मेरठ स्थित गांव के लिये प्रस्थान कर गये। गूगल मैप की लैटीट्यूड सुविधा का इस्तेमाल किया। मैं मोबाइल में गूगल मैप खोलकर गांव में अपने घर के बाहर खुले में खडा हो गया ताकि जीपीएस ठीक काम करे। उधर उनके मोबाइल में भी लैटीट्यूड चालू था। इससे मुझे उनकी लोकेशन पता चलती रही और उन्हें मेरी। कुछ समय बाद वे गांव के टेढे-मेढे रास्तों को पार करते हुए ठीक हमारे घर पहुंच गये। इस दौरान हमारी कोई बात नहीं हुई और वे पहले कभी हमारे घर नहीं आये थे।
हालांकि अब लैटीट्यूड सुविधा बन्द हो गई है। नई सुविधा के बारे में मुझे कोई ज्यादा जानकारी नहीं है। लेकिन इतना निश्चित है कि यह नई सुविधा लैटीट्यूड सुविधा से ज्यादा उन्नत ही होगी। यह गूगल प्लस पर काम करती है, इससे ज्यादा मुझे नहीं पता। धीरे-धीरे पता लगाने की कोशिश कर रहा हूं।
लोकेशन शेयरिंग बडे काम की चीज है। एक उदाहरण तो अभी बताया है। और भी उदाहरण हो सकते हैं। कुल मिलाकर उद्देश्य इतना ही है कि एक मित्र की लोकेशन दूसरे मित्र को पता चलती रहे। परिजनों को परिवार के सदस्यों की सटीक लोकेशन पता चलती रहे। जयपुर जाना है, रिश्तेदारी में, यार-दोस्तों के पास; रास्ता नहीं पता तो बार-बार फोन करके रास्ता पूछने की जरुरत नहीं है। आपका मोबाइल आपको खुद-ब-खुद रास्ता बताता जायेगा और आप पेचीदा अनजान रास्तों पर चलते हुए अपने ठिकाने पर पहुंच जाओगे। और तो और, आपका मोबाइल खो गया है, आप उसकी भी लोकेशन जान सकते हो।
प्रत्येक एण्ड्रॉयड फोन में जीपीएस होता है। आप एकाध थर्ड पार्टी एप्लीकेशन इंस्टाल करके यह काम कर सकते हैं। मैंने फिलहाल दो एप्लीकेशन डाउनलोड कर रखे हैं। लेकिन अभी तक उनका परीक्षण नहीं किया है। परीक्षण करके शीघ्र ही इसके नतीजों के बारे में आपको बताऊंगा।
मोबाइल सिर्फ फोन करने, फिल्में डाउनलोड करने या व्हाट्स ऐप इस्तेमाल करने के लिये ही नहीं होते।

4. कुछ समय पहले एक मित्र ने इस ब्लॉग का ‘ऐप’ बनाया था। उस समय मेरे पास एण्ड्रॉयड फोन नहीं था, इसलिये मुझे नहीं पता था कि यह क्या बला होती है। अब ‘ऐप’ नाम की चीजों से पाला पडना शुरू हुआ है, तो इनके बारे में पता भी चलने लगा है। अपने ब्लॉग का ऐप होना भी एक अच्छी बात होती। फिर अब मैं भूल गया हूं कि वे मित्र कौन थे। अगर आप इसे पढ रहे हैं तो कृपया बतायें और यह भी बतायें कि वो ऐप अब मुझे कैसे मिलेगा? धन्यवाद।

5. अब थोडी चर्चा रेलवे की भी कर लेते हैं। लगभग एक साल पहले तक दिल्ली से जोधपुर तक तीन ट्रेनें थीं, वो भी रात में- मण्डोर (12461/62), सम्पर्क क्रान्ति (12463/64) और जैसलमेर इंटरसिटी (14659/60)। फिर काठगोदाम से दिल्ली के बीच चलने वाली रानीखेत एक्सप्रेस (15013/14) को जोधपुर के पास भगत की कोठी तक बढाया गया। अब इसमें फिर से परिवर्तन करके इसे जैसलमेर तक कर दिया गया है। हालांकि यह अजमेर, मारवाड का लम्बा चक्कर लगाकर जोधपुर जाती है और दिल्ली से सुबह सवेरे साढे चार बजे निकलती है इसलिये दिन में जोधपुर जाने के लिये यह ज्यादा काम की नहीं है।
उधर सराय रोहिल्ला से रतनगढ तक एक ट्रेन (14705/06) चलाई गई जिसे शीघ्र ही सुजानगढ तक बढा दिया गया। इस ट्रेन को पिछले सप्ताह ही सुजानगढ से बढाकर जोधपुर व भगत की कोठी तक कर दिया गया है। सराय रोहिल्ला से यह सुबह सात बजे चलती है और लगभग बारह घण्टे बाद शाम को जोधपुर पहुंच जाती है।
लगे हाथों एक बात और बता दूं, आपके सामान्य ज्ञान की वृद्धि करेगी। अभी भी बहुत से लोग यही मानते हैं कि भारत की सबसे लम्बी दूरी की ट्रेन जम्मू तवी और कन्याकुमारी के बीच चलने वाली हिमसागर एक्सप्रेस (16317/18) है जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। पिछले कई सालों से हिमसागर एक्सप्रेस का यह दर्जा समाप्त हो गया है। अब भारत की सबसे लम्बी दूरी की ट्रेन है विवेक एक्सप्रेस (15905/06) जो डिब्रूगढ और कन्याकुमारी के बीच चलती है और 4273 किलोमीटर की दूरी तय करती है जबकि हिमसागर 3715 किलोमीटर की दूरी तय करती थी।
एक बात और। भारत की सबसे लम्बी दूरी की दैनिक ट्रेन कौन सी है? जाहिर है आप केरल एक्सप्रेस (12625/26-3036 किलोमीटर) का नाम लेंगे। लेकिन अब भूलकर भी इसका नाम मत लेना। अब यह दर्जा अवध असम एक्सप्रेस (15909/10- 3073 किलोमीटर) के पास चला गया है। अवध असम एक्सप्रेस कुछ समय पहले तक लालगढ से गुवाहाटी के बीच चलती थी। अब इसे न्यू तिनसुकिया तक बढा दिया गया है जिससे यह केरल एक्सप्रेस से ज्यादा दूरी तय करने लगी है।
लालगढ से याद आया। पिछले सप्ताह मैं बीकानेर में था। बीकानेर के पास ही लालगढ है और ट्रेनों का एक बडा यार्ड भी है। यहां से सुबह जैसलमेर के लिये एक ट्रेन (14704) चलती है। जैसलमेर जाकर यह रात होने का इन्तजार करती है। रात को यह (22479) बीकानेर के लिये चल देती है और सुबह तक बीकानेर पहुंच जाती है। बीकानेर से फिर यह जयपुर इंटरसिटी (12467) बनकर जयपुर चली जाती है। जयपुर से (12468) अगली सुबह चलती है और शाम तक बीकानेर, रात को बीकानेर से चलकर (22480) सुबह तक जैसलमेर और दोपहर को जैसलमेर से चलकर (14703) शाम तक लालगढ। इस तरह यह अपनी यात्रा पूरी करती है। ज्यादातर ट्रेनें इसी तरह चलती हैं।
दिल्ली सराय रोहिल्ला में सुबह कई ट्रेनें आती हैं। बीकानेर से ट्रेन (12458) आती है तो उसे (14705) सुजानगढ भेज दिया जाता है। अब यह भगत की कोठी तक जाने लगी है। उदयपुर से चेतक एक्सप्रेस (12982) आती है तो उसे बीकानेर (22472) भेज देते हैं। छिन्दवाडा से पातालकोट एक्सप्रेस (14009) आती है तो उसे (14625) फिरोजपुर भेज देते हैं। इसी तरह शाम को ये सभी ट्रेनें क्रमशः भगत की कोठी, बीकानेर और फिरोजपुर से सराय रोहिल्ला वापस आ जाती हैं और अपनी रात्रिकालीन यात्रा पर क्रमशः बीकानेर, उदयपुर और छिन्दवाडा के लिये चली जाती हैं।

6. 4 दिसम्बर को केरल पर्यटन की तरफ से एक मेल आई। ये लोग एक ऐसा आयोजन कर रहे हैं जिसमें विश्व के सर्वश्रेष्ठ यात्रा ब्लॉगर भाग लेंगे। यात्रा दो सप्ताहों की होगी और सारा खर्च केरल पर्यटन विभाग उठायेगा। जाहिर है कि पूरी यात्रा लग्जरी ही होगी। पता नहीं उन्होंने कितनों को आमन्त्रण भेजा है लेकिन वे इनमें से सर्वश्रेष्ठ 25 का चुनाव करेंगे। इसके लिये पहले हमें उनकी वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन करना होगा। वे उसका रिव्यू करेंगे। वहां से स्वीकृति मिलने पर वोटिंग होगी। जिन 25 यात्रा ब्लॉगरों को सबसे ज्यादा वोट मिलेंगे, उन्हें वे दो सप्ताहों के लिये केरल बुलायेंगे। मैंने उसी दिन रजिस्ट्रेशन कर दिया था।
लेकिन पूरा एक सप्ताह बीत गया, अभी तक उन्होंने मेरा रजिस्ट्रेशन कन्फर्म नहीं किया है। मैंने उन्हें मेल भी भेजी कि पहले तो आमन्त्रण दिया कि रजिस्ट्रेशन कर लो, अब रजिस्ट्रेशन कर दिया तो क्यों उसे कन्फर्म नहीं कर रहे हो? जवाब आया कि जब भी रिव्यू हो जायेगा, उसकी सूचना ट्विटर पर दी जायेगी। पता नहीं कब करेंगे?
जैसा कि बाद में तिवारी जी ने लिखा- “यानि घुमक्कड़ी की कोई वैल्यू नही.. जिसके दोस्त ज्यादा होंगे उतने ज्यादा वोट मिलेंगे... यानि कम्पीटीशन घुमक्कड़ी या ब्लागिंग का नहीं दोस्तो व वोटों का है।” असल में यह सब खेल मार्केटिंग का है। केरल पर्यटन घुमक्कडों को सम्मानित नहीं कर रहा है बल्कि अपना प्रचार कर रहा है। अब प्रचार तो वे ही ब्लॉगर करेंगे, जिनका दायरा बडा हो। इसीलिये वोटिंग हो रही है।
भईया केरल वालों, एक बार रिव्यू कन्फर्म तो करो, फिर देखना हिन्दी वालों की मार्केटिंग। वोटिंग 31 दिसम्बर को समाप्त हो रही है, पांच दिन पहले भी कन्फर्म करोगे तो भी दिखा दूंगा हिन्दी वालों की ताकत। अंग्रेजी या दूसरी विदेशी भाषाएं ही इस मामले में आगे नहीं हैं, हिन्दी भी अब बहुत आगे चल रही है।

7. साल समाप्त होने वाला है। कुछ छुट्टियां बची हैं। दिसम्बर समाप्त होने से पहले ये छुट्टियां लेनी पडेंगी, अन्यथा ये भी साल के साथ ही स्वतः समाप्त हो जायेंगीं। कुल मिलाकर पांच दिन हाथ में हैं। भीषण सर्दी पडनी शुरू हो गई है लेकिन मोटरसाइकिल का मोह नहीं छूट रहा। जनवरी में मोटरसाइकिल से कच्छ यात्रा करनी है, इसलिये कुछ उसके भी अभ्यास के लिये दिसम्बर में जाना जरूरी लग रहा है। फिलहाल दिल्ली से बीकानेर, देशनोक, फलोदी, ओसियां, जोधपुर, पुष्कर, अजमेर और जयपुर का चक्कर लगाने की योजना है। बीकानेर जाने में रास्ते में झुंझनूं आयेगा। तो दिल्ली से झुंझनूं जाने के रास्ते के बारे में कुछ स्पष्ट नहीं है। एक मित्र ने बताया है कि रेवाडी-नारनौल वाला रास्ता खराब है। तो शायद झज्जर के रास्ते जाना पडे। जिसे जानकारी हो, कृपया बतायें।

8. सचिन त्यागी ने सुझाव दिया कि फोटोग्राफी के लिये अलग से पोस्ट लिखा करो। निःसन्देह यह सुझाव विचारणीय है। लेकिन किसी विषय पर विशेष पोस्ट के लिये उस विषय में विशेषज्ञता भी चाहिये। मैं फोटोग्राफी में विशेषज्ञ नहीं हूं। फिर भी इस बार जितने फोटो चर्चा के लिये आये हैं, इनसे लग रहा है कि एक अलग से पोस्ट ही ठीक है। पहले तो सोचा कि जिस दिन डायरी प्रकाशित हुआ करेगी, उससे अगले दिन फोटोग्राफी वाली पोस्ट प्रकाशित कर दिया करूंगा लेकिन इससे मुझ पर ही अतिरिक्त दबाव पडेगा।
तो अब तय यह हुआ है कि हर महीने के पहले सोमवार को डायरी के पन्ने प्रकाशित हुआ करेंगे और तीसरे सोमवार को फोटोग्राफी पर चर्चा। यानी अब डायरी के पन्ने प्रत्येक महीने की पहली और सोलह तारीख को प्रकाशित नहीं हुआ करेंगे बल्कि पहले सोमवार को डायरी व तीसरे सोमवार को फोटोग्राफी। फिर भी पिछले दिनों आये कुछ फोटो पर इस बार भी चर्चा कर लेते हैं। शर्त यही है कि मैं फोटोग्राफी का विशेषज्ञ नहीं हूं। मेरी आदत है कि मैं अपने खींचे हर फोटो को देखकर कहता हूं कि कुछ अधूरापन है, इससे भी अच्छा फोटो आ सकता था। उस अधूरेपन को पहचानने की कोशिश करता हूं और अगली बार उसकी पूर्ति करता हूं। आपके भेजे फोटो देखकर बस यही बताऊंगा कि अगर मैं होता तो किस तरह फोटो लेता। हो सकता है कि मेरी कही कोई बात आपको बुरी लग जाये, इसके लिये पहले ही क्षमा मांगता हूं।


अमित सिंह 1: फोटो अच्छा है। बर्फबारी के बाद धूप निकली है, पर्यटक आनन्द ले रहे हैं और पैराग्लाइडिंग भी हो रही है। लेकिन इतनी शानदार लोकेशन होने के बावजूद कुछ ‘मिसिंग’ सा लग रहा है, लग रहा है कि कुछ अधूरापन है, वो बात नहीं जो होनी चाहिये थी। ऐसा मुझे ही लग रहा है या आपको भी लग रहा है? ये तो नहीं बता सकता कि क्या अधूरापन है लेकिन शायद आपको अपने खडे होने की इस परम्परागत लोकेशन को बदलना था या फिर किसी एक सब्जेक्ट को पिन पॉइंट करना था। आपने सबकुछ एक ही फोटो में लेने की कोशिश की है और शायद यही चूक हो गई। आपको उन बडे बडे गुब्बारों पर फोकस करना था, या आसमान में उडती हिमाच्छादित पर्वत श्रंखलाओं के साये में पैराग्लाइडर को फोकस करना था, या आनन्द मनाते पर्यटकों को फोकस करना था; मतलब किसी एक सब्जेक्ट को अपने इस फोटो का विषय बनाना था, न कि सभी को।


अमित सिंह 2: फिर से वही बात। इसमें भी कुछ अधूरापन लग रहा है। न ताजी गिरी बर्फ का सौन्दर्य निखरकर आ रहा है, न उन इमारतों का सौन्दर्य अलग दिख रहा है और न ही प्राकृतिक सौन्दर्य। फोटो का निचला आधा हिस्सा बिल्कुल गैर-जरूरी है। आपको थोडा आगे बढकर एक क्लिक और करना था। यह निचला आधा हिस्सा मलबा ही लग रहा है। प्राकृतिक नजारों का फोटो लेते समय आपको गन्दगी, कूडे और मलबे से बचना चाहिये।

सचिन जांगडा 1: जबलपुर के पास नर्मदा नदी पर धुआंधार जलप्रपात। जलप्रपात हमेशा ही शानदार होते हैं लेकिन फिर भी कुछ ‘मिसिंग’ सा लग रहा है। क्या मिसिंग हो सकता है? पहली चीज तो यही कि प्रपात ही नहीं दिख रहा। दिखना चाहिये कि हां, पानी गिर रहा है ऊपर से नीचे तक। हो सकता है कि ऐसी कोई जगह ही न हो कि प्रपात के सामने खडा हुआ जा सके। दूसरी बात, बैकग्राउण्ड में सूखे कगार और भीड भी ध्यान भंग कर रहे हैं। आपको इनसे बचना था। जाहिर है कि आपको अपनी लोकेशन बदलनी थी। जिस जगह आप खडे हो, यह जगह इस प्रपात का फोटो खींचने के लिये उपयुक्त जगह नहीं है।
सचिन जांगडा 2: इस फोटो के लिये तो मैं आपकी पूरी आलोचना करूंगा। फोटो ले रहे हो और इतनी तसल्ली भी नहीं कि एक मिनट के लिये रुक जायें? चलती गाडी से फोटो ले लिया। इसमें आपने पहाडी भू-भाग में शानदार सडक दिखाने की कोशिश की है लेकिन असफल हो गये। सडक पर जमा गोबर सारा ध्यान आकर्षित कर रहा है। आपको ऐसी जगह चुननी थी जहां गोबर न्यूनतम हो और रुककर फोटो लेना था। सडक के मध्य में खडे होते तो और भी अच्छा होता।

सुमित कुमार: अगर कोई वस्तु हमारे कद से छोटी है तो हमें खडे होकर उसका फोटो नहीं लेना चाहिये। बैठ जाना चाहिये या उस वस्तु के कद के बराबर में कैमरा होना चाहिये। दूसरी बात, पीछे चबूतरे पर रखा बोरा ध्यान भंग कर रहा है, उसे हटा देना था। तीसरी बात, अगर मन्दिर को केन्द्र में रखते हुए बैकग्राउण्ड को और ज्यादा दिखाते तो और भी अच्छा होता।

उमेश जांगिड: अगर आपकी जगह मैं होता तो मैं भी शायद ऐसा ही फोटो लेता। फिर भी यहां कुछ प्रयोग किये जा सकते थे। मसलन, कैमरे को जूम-आउट करके इस टापू को और छोटा करके बैकग्राउण्ड को थोडा ज्यादा स्थान देना। इससे यह टापू थोडा रहस्यमय हो जाता और झील में तैरता जहाज जैसा लगता।

विमलेश चन्द्रा 1: चूंकि आप चलती ट्रेन में नहीं हैं इसलिये आपके पास प्रयोग करने के लिये पर्याप्त समय था। आप दोनों लाइनों के बीच में खडे होकर एक ज्यामितीय साम्यता बनाते हुए फोटो ले सकते हैं। या फिर इस पुल के प्रवेश द्वार के पास खडे होकर विशाल लोहे के प्रवेश द्वार को फोकस कर सकते हैं। या फिर थोडा और दूर जाकर इस पुल का बाहर से फोटो ले सकते हैं। थोडा और इन्तजार करके किसी ट्रेन को पुल पर प्रवेश करते हुए दिखा सकते हैं। बहुत सारे प्रयोग कर सकते हैं।

विमलेश चन्द्रा 2: जैसे ही इस फोटो को देखते हैं, सारा ध्यान आसमान आकर्षित कर लेता है। वहां से फुरसत मिलती है, तब जाकर ट्रेन दिखती है। फिर पता चलता है कि वह ट्रेन किसी स्टेशन से छूट रही है। अब ये आपके ऊपर निर्भर है कि फोटो खींचते समय आपका मुख्य सब्जेक्ट क्या था- आसमान या ट्रेन? अगर आसमान दिखाना ही आपके जेहन था तब तो यह फोटो शानदार है, लेकिन अगर ट्रेन आपकी सब्जेक्ट थी तो आप असफल हो गये।

विमलेश चन्द्रा 3: लहरों का फोटो खींचने का मुझे ज्यादा मौका नहीं मिला है इसलिये इनका अनुभव नहीं है। फिर भी सोच रहा हूं कि यहां क्या किया जा सकता था? फोटो बेशक अच्छा लग रहा है... लेकिन.... नहीं, अच्छा है।

विमलेश चन्द्रा 4: अक्सर बिजली के तार किसी फ्रेम में आने अच्छे नहीं होते लेकिन यहां खम्भे और तार मिलकर फोटो को गहराई प्रदान कर रहे हैं। मेरा ध्यान सबसे पहले बिजली के खम्भों पर ही गया है, उनके बाद नीचे दाहिने कोने में पडे मलबे पर और इसके बाद गायों पर। आसमान बिल्कुल भी प्रभावित नहीं कर रहा। आपको थोडा सा आगे बढकर मलबे से बचना था, इससे बिजली का सबसे बायां खम्भा और बायें आ जाता, तारों की दूर तक जाती पंक्ति और स्पष्ट दिखती और गायें भी। इसके पिक्सल ठीक हों तो इसे बनाये गये पैटर्न के अनुसार क्रॉप भी कर सकते हैं।

अभी भी काफी फोटो चर्चा करने से बच गये हैं। उन्हें अगली बार फोटोग्राफी विशेषांक में प्रकाशित किया जायेगा। आप भी इस चर्चा में शामिल हो सकते हैं। जो फोटो ऊपर दिखाये गये हैं, उन पर चर्चा कर सकते हैं। अपने फोटो भी भेज सकते हैं। शर्त केवल इतनी है कि फोटो आपके द्वारा खींचा गया हो। फोटो का साइज 250 केबी से कम हो। हालांकि इस बार कुछ फोटो 500 केबी तक के भी आये, लेकिन उससे मेरा काम बढ गया। इस बार एक परिवर्तन यह भी किया है कि आप अपना व्यक्तिगत फोटो व ग्रुप फोटो भी भेज सकते हैं। आखिर हैं तो वे भी फोटो ही। लेकिन हां, पासपोर्ट साइज फोटो मत भेज देना।
फोटो केवल neerajjaatji@gmail.com पर केवल JPG या JPEG फॉरमेट में ही भेजें। फोटो के बारे में कुछ वर्णन भी कर दें तो और अच्छा।

Sunday, December 14, 2014

ओशो चर्चा

हमारे यहां एक त्यागी जी हैं। वैसे तो बडे बुद्धिमान, ज्ञानी हैं; उम्र भी काफी है लेकिन सब दिखावटी। एक दिन ओशो की चर्चा चल पडी। बाकी कोई बोले इससे पहले ही त्यागी जी बोल पडे- ओशो जैसा मादर... आदमी नहीं हुआ कभी। एक नम्बर का अय्याश आदमी। उसके लिये रोज दुनियाभर से कुंवाई लडकियां मंगाई जाती थीं।
मैंने पूछा- त्यागी जी, आपने कहां पढा ये सब? कभी पढा है ओशो साहित्य या सुने हैं कभी उसके प्रवचन? तुरन्त एक गाली निकली मुंह से- मैं क्यों पढूंगा ऐसे आदमी को? तो फिर आपको कैसे पता कि वो अय्याश था? या बस अपने जैसों से ही सुनी-सुनाई बातें नमक-मिर्च लगाकर बता रहे हो?
चर्चा आगे बढे, इससे पहले बता दूं कि मैं ओशो का अनुयायी नहीं हूं। न मैं उसकी पूजा करता हूं और न ही किसी ओशो आश्रम में जाता हूं। जाने की इच्छा भी नहीं है। लेकिन जब उसे पढता हूं तो लगता है कि उसने जो भी प्रवचन दिये, सब खास मेरे ही लिये दिये हैं।
असल में ओशो ने कोई भी पुस्तक नहीं लिखी। केवल प्रवचन दिये और बाद में उसके अनुयायियों ने उनकी पुस्तकें बना दीं। सभी प्रवचन oshoworld.com से मुफ्त में डाउनलोड भी किये जा सकते हैं। मुझे प्रवचन सुनना अच्छा नहीं लगता इसलिये पुस्तकें पढता हूं। अच्छा लगता है इसलिये आज आपके साथ भी साझा कर रहा हूं।
अगर आपमें से कोई ओशो विरोधी है, उसका नाम लेते ही उसे गालियां देता है, उसकी सम्भोग सम्बन्धी बातों की आलोचना करता है, तो मेरा बस आपसे एक ही कहना है कि बिना जाने किसी की आलोचना मत कीजिये। हंसराज रहबर ने ‘गांधी बेनकाब’ और ‘नेहरू बेनकाब’ पुस्तकें लिखीं। इन पुस्तकों में उसने इन दोनों नेताओं की जबरदस्त आलोचना की। और ऐसा नहीं है कि आलोचना अपनी इच्छा से की। उसने पहले पूरा गांधी और नेहरू साहित्य पढा। दूसरों की गांधी-नेहरू से सम्बन्धित पुस्तकें पढीं। तब उनमें खामियां निकालीं और उन्हें ढूंढ-ढूंढकर अपनी पुस्तक में रखा। आज रहबर पर कोई उंगली नहीं उठा सकता कि उसने गांधी-नेहरू को अपमानित किया।
आप भी ओशो की आलोचना कीजिये, जितना मन करे उतनी कीजिये लेकिन पहले थोडा उसके बारे में जान लेंगे तो अच्छा रहेगा। त्यागी जैसे मत बनिये कि कहीं ओशो-चर्चा चल रही हो और आप कूद पडे उसमें अपनी गालियां लेकर। निश्चित ही वो आलोचना का पात्र है। लेकिन मजा तब आयेगा, जब आप उसे पढेंगे। पढिये, उसकी एक-एक गलतियां निकालिये और तब देखिये; कितना मजा आता है।
वैसे तो सैंकडों पुस्तकें हैं लेकिन मैं तीन पुस्तकों के नाम लेना चाहता हूं- ‘मैं मृत्यु सिखाता हूं’, ‘सम्भोग से समाधि की ओर’ और ‘दीया तले अन्धेरा’। अगर आप सामाजिक कारणों से अपने घर पर उसकी पुस्तक नहीं ला सकते तो ये तीनों पुस्तकें मेरे पास उपलब्ध हैं। आपका स्वागत है।
कुछ ओशो समर्थक भी हैं। उनमें कमी ये है कि वे ओशो को भूल गये हैं और ओशो के नाम से चलने वाली दुकानों पर जा बैठते हैं। उन दुकानों की वजह से उसका नाम और खराब होता है। सुना है ओशो के नाम से चलने वाली सबसे बडी दुकान पुणे में है। हालांकि इसकी शुरूआत स्वयं ओशो ने ही की थी, लेकिन इसे दुकान बनाया उसके बाद उसके अनुयायियों ने।
इतनी प्रस्तावना काफी है। अभी हाल ही में मैंने ‘दीया तले अन्धेरा’ पढी। इससे मैं बडा प्रभावित हुआ। इतना प्रभावित कि इसके कुछ उद्धरण आपके साथ साझा करना चाहता हूं। ध्यान रहे कि जो भी लाइनें मैं साझा करूंगा, वे लम्बे प्रवचन का छोटा सा हिस्सा है। बहुत कुछ उस लाइन से पहले कहा जा चुका है, बहुत कुछ बाद में कहा जायेगा। वास्तव में वह एक लाइन पूरी तरह पर्याप्त नहीं है। हो सकता है कि कोई लाइन समझ में न आये।

“हवा आयेगी तो वृक्षों में कम्पन्न होगा। होना ही चाहिये। सिर्फ मरा हुआ वृक्ष नहीं हिलेगा जिसके सब पत्ते सूख गये हैं। जीवित वृक्ष तो कंपेगा, और जोर से कंपेगा। और कम्पन से कोई नुकसान नहीं होने वाला है। हवा चली जायेगी, धूल झड जायेगी, वृक्ष ताजा और नया होगा। रोना, जब रोना हो। हंसना, जब हंसना हो। स्वाद लेना। जीवन में कुछ भी छोडने जैसा नहीं है। छोडने जैसा होता तो परमात्मा उसे बनाता ही नहीं। तुम परमात्मा से ज्यादा बुद्धिमान होने की कोशिश में लगे हो। जीवन में सभी अपरिहार्य हैं, अनिवार्य हैं। उन सबसे गुजरना लेकिन केन्द्र पर बने रहना। सब छुए, फिर भी न छू पाये।”

“तुम कुछ भी ठीक से नहीं देख पाते, क्योंकि हर चीज के बीच में तुम्हारी धारणाएं खडी हो जाती हैं।”

“तुम अति मत चुनना, अन्यथा मुश्किल में पडोगे। और जीवन में हर जगह हर चीज का मध्य खोजना। कठिन नहीं है। क्योंकि जब तुम अति खोज लेते हो, मध्य खोजना कैसे कठिन होगा? दोनों अतियों के बीच में रुक जाना। न तो भोग के पीछे पागल हो जाना, न त्याग के पीछे पागल हो जाना। न शरीर के गुलाम हो जाना, न शरीर के दुश्मन हो जाना।”

“जागो! कोई तुम्हें भटका नहीं रहा है। तुम भटक रहे हो तो तुम्हीं कारण हो। न कोई स्त्री तुम्हें खींच रही है, न कोई धन तुम्हें पुकार रहा है। न कोई पद तुम्हारे लिये आतुर है कि आओ और विराजो। कोई तुम्हें परेशान नहीं कर रहा है। तुम खुद ही परेशान हो रहे हो। और जब तुम परेशान हो जाते हो तो तत्क्षण तुम विपरीत चुन लेते हो। अब तुम विपरीत से परेशान होओगे।
इधर लोगों को मैं देखता हूं स्त्रियों से परेशान हैं। उधर मैं साधुओं को देखता हूं, वे स्त्रियों के न होने से परेशान हैं। साधु मेरे पास आते हैं, वे कहते हैं- क्या करें, स्त्री कठिनाई है। और मेरे पास गृहस्थ आते हैं, वे भी यही कहते हैं- क्या करें, स्त्री कठिनाई है।”

“ईश्वर के सम्बन्ध में अब तक तय नहीं हो पाया है कि वह है या नहीं। करोडों वर्षों से आदमी लड रहा है। न आस्तिक नास्तिक को हरा पाता है, न नास्तिक आस्तिक को हरा पाता है। जरूर बात कुछ ऐसी है कि वह मूढतापूर्ण है और तय नहीं हो सकती। कुछ प्रश्न ही ऐसा है कि उसमें कोई भी उत्तर देने से गडबड होगी।
जैसे यह समझो कि कोई तुमसे पूछने लगे कि लाल रंग की सुगंध क्या है? प्रश्न तो बिल्कुल ठीक लगता है। भाषाशास्त्री कोई गलती नहीं निकाल सकते। व्याकरण साफ-सुथरी है- लाल रंग की सुगन्ध क्या है? और दो जवाब देने वाले मिल जायेंगे। वे हमेशा मिल जायेंगे। फिर विवाद शुरू हो जायेगा और हल कुछ भी न हो पायेगा।”

“प्रतिभाशाली सदा लीक से हटता है। सिर्फ जडबुद्धि लीक पर चलता है।”

“समाज दूध के साथ जहर पिलाता है। वह सब अनजाने चल रहा है। जिस ढांचे में बाप है, मां है, समाज है, गुरू है, उसी ढांचे में वे बच्चे को ढालेंगे। बिना इस बात की फिक्र किये कि वह ढांचा बुनियादी रूप से गलत था। इस जमीन को गौर से देखो। अगर ये ढांचे गलत न हों तो क्यों इतनी जरुरत है युद्धों की? हर दस वर्ष में एक महायुद्ध जरूरी हो जाता है। करोडों लोग जब तक मारे न जायें हर दस वर्ष में, तब तक आदमियत को चैन नहीं। और बेहूदा कारणों से मारे जाते हैं। ऐसे कारण कि तुम भी अगर थोडे होश में होओगे तो हंसोगे।
एक डंडे पर कपडा लटका रखा है, उसको झंडा कहते हो। उसको किसी ने झुका दिया, इसमें युद्ध हो सकता है। कपडे का टुकडा है, इसमें लाखों लोग मर सकते हैं। तुमने एक मन्दिर बना रखा है, वहां एक भगवान की प्रतिमा तुम बाजार से खरीद लाये हो, उसे स्थापित कर दी, किसी ने उसको फोड दिया, दंगे हो जायेंगे। छोटे बच्चे भी इतने बचकाने नहीं। उनकी गुड्डी तोड दो तो थोडा शोरगुल करेंगे, फिर भूल जायेंगे। लेकिन तुम्हारे दंगे जीवन भर चलेंगे। जन्मों-जन्मों चलेंगे। पीढी दर पीढी दोहराये जायेंगे क्योंकि किसी ने मन्दिर तोड दिया है।
क्या परमात्मा का कोई मन्दिर तोडा जा सकता है? यह सारा अस्तित्व उसका मन्दिर है। तुम्हारे मन्दिर तोडे जा सकते हैं, जो तुमने बनाये हैं। क्योंकि वे परमात्मा के मन्दिर नहीं हैं। जो तोडा जा सकता है उससे ही सिद्ध हो गया कि वो परमात्मा का नहीं है।”

“बाप चाहेगा बेटा मेरे जैसा हो, बिना इसकी फिक्र किये कि मैंने क्या पा लिया? मैं तो था ‘मेरे जैसा’, क्या मिला?”

“मन्दिर कोई भौगोलिक, बाह्य घटना नहीं है; आन्तरिक घटना है। तुम अगर वृक्ष के नीचे बैठ कर या दुकान के छप्पर के नीचे बैठकर भी विवेक को उपलब्ध हो जाओ तो वही मन्दिर है। और तुम मन्दिरों में घण्टे बजाते रहो, क्रियाकाण्ड करते रहो, और विवेक उपलब्ध न हो; तो वहां भी दुकान है।”

“तुम सोचते हो, सब तुम्हीं चला रहे हो। तुम न होओगे तो शायद सारी दुनिया रुक जायेगी। तुम्हारे होने पर जैसे सब जगह ठहरा हुआ है। तुम उस छिपकली की भांति हो, जो छप्पर से अलग नहीं होती थी। उसके किसी मित्र, प्रियजन ने बुलाया कि आओ जरा बाहर! आकाश बडा सुन्दर है। उसने कहा कि बहुत मुश्किल! क्योंकि मैं हट जाऊं, मकान गिर जायेगा। इस छप्पर को मैं ही सम्हाले हूं।”

“धार्मिक आदमी है; पूजा करता है, उपवास करता है, प्रार्थना करता है, उससे भी अहंकार भरता है। उससे उसकी अकड और गहरी हो जाती है। सारी दुनिया को पापी समझता है। जो आदमी मन्दिर गया, उसकी आंखें देखें। उसकी आंखें तुम्हें नरक भेज रही हैं। जिसने एक दिन का उपवास कर लिया, उसके लिये सारी दुनिया पापी है। जो रोज सुबह गीता पढ लेता है, या राम की माला जप लेता है, या कागज पर राम-राम-राम-राम लिख लेता है, वह सोचता है कि स्वर्ग उसका निश्चित! बाकी बेचारों का क्या होगा?”

“तथाकथित महात्माओं की अकड देखते हो? साधारण संसारी में भी वैसी अकड नहीं होती। और उनकी अकड और भी दयायोग्य है, क्योंकि रस्सी जल गई और फिर भी अकड न गई। अभी रस्सी जली नहीं है जिनकी, उनकी अकड समझ में आती है। लेकिन जिनकी रस्सी जल गई, जो कहते- हम संसार छोड चुके, और उनमें फिर भी अकड बनी रहती है। उनकी अकड समझ के बाहर है।”

‘‘परम्परा को लोग चुपचाप मान लेते हैं। न तो तर्क करने की मेहनत करनी पडती है, न विचार करने की झंझट उठानी पडती है। तुम्हें कुछ करना ही नहीं पडता। दूसरे चबाया हुआ भोजन तुम्हें दे देते हैं, और तुम पचा लेते हो।”

“अगर आनन्द भी बंट रहा हो मस्जिद में, तुम वहां से न ले सकोगे क्योंकि तुम मन्दिर के यात्री हो। अगर परमात्मा भी मन्दिर में आकर बैठ जाये आज, तो भी तुम मस्जिद में ही नमाज पढोगे। क्योंकि मन्दिर तुम कैसे जा सकते हो?”

“तुम मुर्दा हो जाओगे अगर तुमने मुर्दों का अनुसरण किया। तुम्हारे भीतर जीवित बैठा है, उसका अनुसरण करो। तुम्हारे भीतर जीवन की धारा बह रही है, उसके पीछे चलो। अपनी आंखें खोलो। बापदादों के पीछे चलने से कुछ न होगा।”

“यही सारे सम्प्रदाय कर रहे हैं। वे कहते हैं, हमारे अतिरिक्त और कोई सत्य नहीं। ईसाई कहता है कि सिवाय जीसस के तुम परमात्मा तक न पहुंच सकोगे। जल्दी करो, समय मत गंवाओ। मुसलमान कहता है कि बिना मोहम्मद को स्वीकार किये परमात्मा का कोई द्वार खुलने वाला नहीं है। नर्क में पडोगे, दोजख में सडोगे। वही हिन्दू कहते हैं, वही जैन कहते हैं, वही बौद्ध कहते हैं। लेकिन बुद्ध ने कभी नहीं कहा। मोहम्मद ने कभी नहीं कहा। कृष्ण ने कभी नहीं कहा। लेकिन अनुयायी सदा यही कहते हैं।”

“मनुष्य जाति ने बडे से बडे पाप धर्म की रक्षा के लिये किये हैं। अब यह बडे सोचने जैसी बात है कि जिस धर्म की रक्षा के लिये पाप करना पडे, वह धर्म रक्षा के योग्य भी है? और क्या यह हो सकता है कि पाप से धर्म की रक्षा हो सके? अगर पाप से धर्म की रक्षा होती है तो फिर पुण्य से किसकी रक्षा होगी? और अगर पाप से धर्म तक की रक्षा होती है तो फिर पाप से सभी चीजों की रक्षा हो सकती है। जब धर्म तक को पाप का सहारा लेना पडता है रक्षा के लिये, जब धर्म तक निर्वीर्य है, असहाय है और पाप की सहायता मांगता है; कितना धर्म होगा यह? नपुंसक है ऐसा धर्म।”

“एक कुत्ता एक झाड के नीचे बैठा था। सपना देख रहा था। आंखें बन्द थीं और बडा आनन्दित हो रहा था। और बडा डांवाडोल हो रहा था, मस्त था। एक बिल्ली जो वृक्ष के ऊपर बैठी थी, उसने कहा कि मेरे भाई, जरूर कोई मजेदार घटना घट रही है। क्या देख रहे हो?
‘सपना देख रहा था’- कुत्ते ने कहा- ‘बाधा मत डाल। सब खराब कर दिया बीच में बोल कर। बडा गजब का सपना आ रहा था। एकदम हड्डियां बरस रही थीं। वर्षा की जगह हड्डियां बरस रही थीं। पानी नहीं गिर रहा था चारों तरफ; हड्डियां ही हड्डियां।’
बिल्ली ने कहा- ‘मूरख है तू! हमने भी शास्त्र पढे हैं, पुरखों से सुना है कि कभी कभी ऐसा होता है कि वर्षा में पानी नहीं गिरता बल्कि चूहे बरसते हैं। लेकिन हड्डियां? किसी शास्त्र में नहीं लिखा है।’
लेकिन कुत्तों के शास्त्र अलग, बिल्लियों के शास्त्र अलग। सब शास्त्र तुम्हारी इच्छाओं के शास्त्र हैं।”

“थोडी देर के लिये सोचो, अगर तुम अकेले हो सारी पृथ्वी पर, क्या करोगे? कोई भी नहीं है, तुम अकेले हो। और वही सत्य है। वही है सत्य। अभी भी तुम अकेले हो, कोई भी नहीं है। क्या करोगे? सुन्दर होने की कोशिश करोगे? किसके लिये सुन्दर होना है? क्या करोगे? सच बोलने की कोशिश करोगे? कोई है नहीं जिससे सच बोलना है। अहिंसक होने की कोशिश करोगे? कोई है नहीं जिसके प्रति अहिंसक होना है। क्या करोगे? सांस लोगे और जो हो, हो। वही स्थिति जो इस चारों तरफ भीड भरी है, इसके बीच भी साध ले, वही सिद्ध है। कुछ करने को और नहीं है- अपने में जीना; बिना दौड का, बिना महत्वाकांक्षा का जीना।”

“ज्यादा भोजन कर लेना एक अति है। उपवास करना दूसरी अति है। समझदार मध्य में खडा होता है।”

“कितनी परम्पराएं तुम माने चले जा रहे हो? और उनका सारा बोध खो गया है, अर्थ खो गया है। तुम भी जानते हो वे मूर्खतापूर्ण हैं, फिर तुम उन्हें क्यों ढो रहे हो?...
...ऐसा समझो कि बैलगाडी से हम चलते थे और अब हवाई जहाज से तुम चल रहे हो। लेकिन एक बैलगाडी का चाक अपने साथ रखे हुए हो। क्योंकि तुम कहते हो यह बडा जरूरी है। यह जरूरी था। यह बैलगाडी में जरूरी था। लेकिन अब बैलगाडी में कोई चल ही नहीं रहा। न तुम खुद चल रहे हो। हवाई जहाज पर सवार हो। लेकिन यह सोचकर कि बापदादे हमेशा एक स्पेयर चाक रखते थे। कभी टूट जाये, कुछ हो जाये; इसलिये तुम भी रखे हुए हो।”

“तुम अगर हिन्दू हो, कुरान पढो, तो तुम्हें सब गलतियां दिखाई पड जायेंगी। वे ही गलतियां गीता में भी हैं और तुम्हें कभी दिखाई नहीं पडीं। मुसलमान कुरान को पढे, उसे एक गलती न दिखाई पडेगी। उसे गीता दे दो, वह सब गलतियां खोज लेगा जो तुमने कुरान में खोजीं। बडी हैरानी की बात है, बडा चमत्कार है। यह आदमी जब गीता में देख पाता है गलती तो वही गलती कुरान में क्यों नहीं दिखती, जबकि वह वहां मौजूद है?
नहीं, हम उतना ही देखते हैं जितना हम देखना चाहते हैं। हमारा देखना भी चुनाव है। तुम वही देखना चाहते हो जो तुम्हारी पहले से मान्यता है। तुम उसी मान्यता को प्रोजेक्ट करते हो, उसी का विस्तार कर लेते हो। वही तुम्हारी व्याख्या बन जाती है।”

“उस परम-सत्य में जाने के लिये कोई नैवेद्य काम नहीं आयेगा। फूल-पत्ते चढाकर किसको धोखा दे रहे हो? वे फूल-पत्ते भी लोग बाजार से नहीं लाते। दूसरों के बगीचे से तोड लेते हैं। अगर आपका बगीचा है तो आपको पता होगा। धार्मिक आदमी सुबह ही निकल जाते हैं। वे फूल तोडने लगते हैं। उनसे आप कुछ कह भी नहीं सकते, क्योंकि पूजा के लिये तोड रहे हैं। फूल-पत्ते चढाते हो, वे भी दूसरों के तोड कर?”

तो ‘दीया तले अन्धेरा’ पुस्तक की कुछ बातें यहां साझा कीं। हो सकता है कि आपको कुछ बातें विरोधाभाषी लग रही हों, कुछ पक्षपाती लग रही हों, कुछ समझ में न आ रही हों; ऐसा इसलिये है कि ये एक बडे प्रवचन का एक छोटा सा हिस्सा हैं। इनसे पहले काफी कुछ कहा जा चुका है, काफी कुछ और कहा जायेगा। हर प्रवचन की ये चार पंक्तियां पूरी बात को समझने के लिये पर्याप्त नहीं हैं। आप चुल्लू भर पानी से बिल्कुल अन्दाजा नहीं लगा सकते कि नदी कहां से आ रही है, कहां जा रही है, उसमें कितना पानी है आदि।
आप आलोचना करने को पूरी तरह स्वतन्त हैं लेकिन पहले यह जान लेना चाहिये कि जिस बात की आप आलोचना कर रहे हैं, क्या वास्तव में ऐसा है? अक्सर हम सुनी-सुनाई बातों को और ज्यादा नमक-मिर्च लगाकर परोसते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिये।

Friday, December 12, 2014

जगदलपुर से दिल्ली वापस

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जगदलपुर से रायपुर की बसों की कोई कमी नहीं है। हालांकि छत्तीसगढ में राज्य परिवहन निगम जैसी कोई चीज नहीं है। सभी बसें प्राइवेट ऑपरेटरों की ही चलती हैं। उत्तर भारत में भी चलती हैं प्राइवेट ऑपरेटरों की लम्बी दूरी की बसें लेकिन उनका अनुभव बहुत कडवा होता है। पहली बात उनका चलने का कोई समय नहीं होता, जब बस भरेगी उसके एक घण्टे बाद चलेगी। दूसरा... क्या दूसरा? सभी निगेटिव पॉइण्ट हैं। मैंने कई बार भुगत रखा है उन्हें।
लेकिन यहां ऐसा नहीं है। सभी बसों की समय सारणी निर्धारित है और बसें उसी के अनुसार ही चलती हैं। लम्बी दूरी की बसें स्लीपर हैं जिनमें नीचे एक कतार बैठने की हैं और बाकी ऊपर सोने व लेटने के लिये। किराये में कोई अन्तर नहीं है, जितना सीट का किराया है, उतना ही बर्थ का। बस में चढो, अपनी पसन्दीदा या खाली जगह पर बैठो या लेटो। जब बस चलेगी तो कंडक्टर आयेगा और आपसे किराया ले लेगा। जगदलपुर से रायपुर 300 किलोमीटर है और इस दूरी का किराया था 240 रुपये। मैं तो हैरान था ही कि इतना सस्ता; सुनील जी भी हैरान थे कि पिछली बार जब जगदलपुर आये थे तो 270 रुपये किराया था, अब बढना चाहिये था लेकिन उल्टा घट गया। मार्ग ज्यादातर तो मैदानी है लेकिन कुछ हिस्सा पर्वतीय भी है खासकर केसकल की घाटी। कोई सन्देह नहीं कि सडक शानदार बनी है। हम ऊपर जाकर लेट गये। कई दिन से बारिश होने के कारण एक जगह से पानी चू रहा था। तौलिया लटकाकर उसे सीधे अपने ऊपर टपकने से बचाया।
ललित जी का फोन आया- कहां है? रायपुर की बस में। बोले की अभनपुर उतर जाना। मतलब साफ था कि हमें आज अभनपुर रुकना है। पांच बजे शाम को जगदलपुर से चले थे, रायपुर पहुंचने में आधी रात हो जानी है। रायपुर से आधे घण्टे पहले अभनपुर आयेगा।
मुझे तो नींद आनी ही थी, आ गई। एक बार आंख केसकल की घाटी में ही खुली थी लेकिन बाहर अन्धेरा होने के कारण कुछ नहीं दिखा। बारिश होते रहने से मौसम भी ठण्डा हो गया था, सुबह किरन्दुल में जल्दी उठ गया था, इसलिये मुझे कोई होश नहीं था। फोन बजा, तब जाकर आंख खुली। ललित जी का था- कहां पहुंचा? मुझे नहीं पता था कि कहां पहुंचे। सुनील जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि कुछ देर में धमतरी पहुंचने वाले हैं। सुनील जी जगे हुए थे। ललित जी ने समझा दिया कि पेट्रोल पम्प के पास उतर जाना। समय देखा बारह बज चुके थे। गूगल मैप में देखा तो पता चला कि धमतरी तो कभी का जा चुका, दस मिनट में अभनपुर ही आने वाला है। सुनील जी को बताया तो बोले कि क्या, धमतरी कब निकल गया? पता ही नहीं चला। अच्छा हुआ कि ललित जी ने फोन कर लिया। नहीं तो रायपुर पहुंच जाते, मैं सोता रहता और सुनील जी सोचते धमतरी है।
अभनपुर उतरे तो भयंकर मूसलाधार बारिश पड रही थी। इतनी तेज बारिश थी कि हम बस से उतरे और पूरे भीग गये। थोडा ज्यादा हो गया लेकिन बारिश की भयंकरता को दिखाने के लिये ऐसा लिखना पडा। भागकर बन्द पडे पेट्रोल पम्प के एक शेड में जा घुसे। ललित जी को फोन किया तो उन्होंने कहा- अभी तो तुम धमतरी भी नहीं पहुंचे थे और दस मिनट में अभनपुर कैसे आ गये?
पेट्रोल पम्प के बगल में ही ललित जी का घर है। वे एक ही छाता लेकर आये थे। उन्हें नहीं पता था कि नीरज के साथ कोई और भी है। और उधर जैसे ही छाता मेरे हाथ में आया, मैं हवा हो गया। बाहर मुख्य दरवाजा बन्द करने के चक्कर में ललित जी पूरे भीग गये और नाराजगी भी दिखाई- तेरी वजह से आज बीस साल बाद मैं बारिश में भीगा हूं। जुलाई का महीना था, इसलिये भीगने पर कुछ नहीं हुआ अन्यथा अगर सर्दियां होती तो वे बीमार पड जाते।
ललित शर्मा को मैं एक ब्लॉगर के तौर पर ही जानता था। हम पहले भी कई बार मिले हैं लेकिन आज का मिलना शानदार रहा। वे पुरातत्ववेत्ता और इतिहासवेत्ता भी हैं। आजकल उनका फोकस छत्तीसगढ और विदर्भ के इतिहास पर है। कई पुस्तकें भी लिख चुके हैं। भविष्य में और भी पुस्तकें लिखेंगे। उन्होंने बताया कि उनके सहारनपुर के एक मित्र ने उनसे सहारनपुर और आसपास के इलाके का इतिहास लिखने को कहा है लेकिन अभी वे ऐसा नहीं कर सकते। पहली बात कि उसको शुरू से शुरू करना पडेगा और दूसरी बात कि छत्तीसगढ-विदर्भ छोडना पडेगा। उनकी ‘सिरपुर: सैलानी की नजर से’ पुस्तक का विमोचन दलाई लामा ने किया था और उसका पहला संस्करण तब बिक गया था, जब पुस्तक प्रकाशित भी नहीं हुई थी।
अगले दिन आराम से उठे और नाश्ता करके रायपुर के लिये चल पडे। वैसे यहां से नैरो गेज की ट्रेन भी रायपुर जाती है लेकिन हमने बस को वरीयता दी। सुबह का समय था, इसलिये बस में भीड थी। रायपुर पहुंचे और बिना विलम्ब किये कसडोल की बस में बैठ गये। कसडोल यहां से सौ किलोमीटर है, तीन घण्टे लगे। जब सुनील जी के घर पर पहुंचे, तब भी भारी बारिश हो रही थी। लगता था कि इन्द्रदेव बस्तर और यहां मध्य छत्तीसगढ में कोई भेद नहीं जानते।
अब ज्यादा समय नहीं लूंगा, जांस्कर यात्रा इंतजार कर रही है। सुनील जी का पूरा परिवार और यार-दोस्त सब मुझे जानते हैं। बडी शानदार खातिरदारी हुई। जैसे ही इन्द्रदेव जी कुछ मेहरबान हुए, महाराज सपरिवार मुझे लेकर सिद्धखोल प्रपात देखने चल पडे। यह प्रपात कसडोल से दस किलोमीटर दूर है और बारनावापारा अभयारण्य के अन्दर आता है। एक जगह उफनती बरसाती नदी पार करनी पडी।
अन्धेरा होने लगा था जब हम प्रपात पर पहुंचे। कुछ उजाला होता और बारिश रुकी होती तो अभयारण्य के अन्दर होना और भी आनन्ददायक होता। सारा ध्यान पत्थरों पर फिसलने से बचने और कैमरे को बारिश से बचाने पर था। जब तक इनसे मुक्ति मिली, तब तक अन्धेरा हो गया था, झरने का फोटो भी आना बन्द हो गया था। सुनील जी ने बताया कि वे अक्सर यहां आते रहते हैं और पूरी पूरी रात यहां रुक जाते हैं। हालांकि रुकने का कोई इंतजाम नहीं है। वे अपनी कार में ही रुकते होंगे। इंसान कुछ ही दूर स्थित अपना घर छोडकर ऐसे जंगल में आकर पूरी रात रुक जाये तो समझना चाहिये कि उन्हें घर से भगाया गया है। ... खैर, ऐसी बात नहीं है। उनका एक हंसता-खेलता परिवार है। यह हंसी-खेल ऐसा ही बना रहे।
अगले दिन दोपहर को भाटापारा से मेरी दिल्ली की ट्रेन थी। पता चला कि भाटापारा से करीब आठ-दस किलोमीटर पहले जमनईहा नदी इतनी चढ गई है कि उसे पार करना मुश्किल है। सुबह जब अखबार नहीं आया तो पता चला कि कसडोल व बलौदा बाजार का सम्पर्क रायपुर से भी कट गया है। कोई बस न तो रायपुर से आई है और न ही जा रही है। मेरे मन में एक बार तो धुकधुकी तो हुई कि कहीं ट्रेन न छूट जाये। लेकिन समाधान भी सुनील जी ने ही बताया। भाटापारा से दस किलोमीटर पहले जो जमनईहा नदी है, उस पर रेलवे का पुल है जो सडक से ज्यादा दूर नहीं है। उस पुल से पैदल नदी पार की जा सकती है। उस पार से भाटापारा जाने के लिये कुछ न कुछ मिल जायेगा। बलौदा बाजार जिला मुख्यालय भी है, उसका मुख्य सम्पर्क भाटापारा से ही है तो आना-जाना लगा ही रहता है। इसलिये उस तरफ से कुछ न कुछ साधन दस किलोमीटर दूर भाटापारा जाने के लिये मिल ही जायेगा।
कुछ समय बडे भाई सुधीर पाण्डेय जी के यहां भी रुके। पिछली बार जब मैं दुर्ग से लौट रहा था तो सुधीर जी सपत्नीक भाटापारा में मुझसे मिलने आये थे। ये चार भाई हैं और चारों भाईयों के कसडोल क्षेत्र में गाडियों व बाइकों के पांच शोरूम हैं। अच्छा समृद्ध परिवार है। लेकिन कंजूस भी बहुत हैं। सुनील जी घूमने के बडे शौकीन हैं। लेकिन साहब के पास अभी तक एक भी कैमरा नहीं है। वही मोबाइल से ही फोटो खींचते हैं। कहते हैं कि करना क्या है? यादगार के लिये खींच लेते हैं, वापस लौटकर यार-दोस्तों को दिखाने होते हैं तो काम मोबाइल से ही चल जाता है। खैर, मैंने समझाया तो है; देखते हैं कब लेंगे कैमरा।
गनीमत थी कि जमनईहा नदी में उतना पानी नहीं था, जितना शोर मच रहा था। सुनील जी की बुलेरो आराम से पार हो गई। मुझे स्टेशन छोडते ही तुरन्त वापस लौट गये। क्या पता कब पानी बढ जाये? और वास्तव में पानी बढ गया था। बताया कि लौटते समय पार करने में डर भी लगा था कि कहीं बह न जायें। मानसून में ऐसा होना सामान्य बात है।
दुर्ग-जम्मू तवी एक्सप्रेस ठीक समय पर आई और ठीक ही समय पर रवाना हुई। मेरी आरएसी थी, लेकिन सहयात्री कहीं और जाकर सो गया। जिस तरह छत्तीसगढ आया था, उसी तरह यहां से विदा भी हो रहा हूं।

सिद्धखोल जलप्रपात




भाटापारा जाने के रास्ते में जमनईहा नदी



समाप्त।

14. जगदलपुर से दिल्ली वापस

Wednesday, December 10, 2014

तीरथगढ जलप्रपात

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बारह बजे के आसपास जगदलपुर से तीरथगढ के लिये चल पडे। इस बार हम चार थे। मेरे और सुनील जी के अलावा उनके भतीजे शनि, ममेरे भाई मनीष दुबे और भानजे प्रशान्त भी साथ हो लिये। लेकिन ये तो कुल पांच हो गये। चलो, पांच ही सही। शनि ने अपनी कार उठा ली। बारिश में भीगने का खतरा टला।
कुछ दूर तक दन्तेवाडा वाली सडक पर चलना होता है, फिर एक रास्ता बायें सुकमा, कोंटा की ओर जाता है। इसी पर चल दिये। मुडते ही वही रेलवे लाइन पार करनी पडी जिससे अभी कुछ देर पहले मैं किरन्दुल से आया था।
थोडा ही आगे चलकर कुख्यात जीरम घाटी शुरू हो जाती है जो तकरीबन चालीस किलोमीटर तक फैली है। पिछले साल नक्सलियों ने जोरदार आक्रमण करके 28 कांग्रेसी नेताओं को मौत के घाट उतार दिया था। देश हैरान रह गया था इस आक्रमण को देखकर। यह पूरा इलाका पहाडी है और घना जंगल है। तीरथगढ जलप्रपात और कुटुमसर की गुफाएं इसी घाटी में स्थित हैं।
जंगल में एक चौराहा आता है। दाहिने सडक तीरथगढ की ओर जाती है और बायें वाली कुटुमसर की गुफाओं तक। मानसून के कारण गुफाएं बन्द थीं। ये गुफाएं जमीन के अन्दर हैं, मानसून में इनमें पानी भर जाता है, इसलिये बन्द करनी पडती हैं। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान होने के कारण कुछ शुल्क देकर हम तीरथगढ की ओर मुड गये।
एक स्थान पर पहली बार जलप्रपात के दर्शन होते हैं। प्रपात यहां से बहुत दूर है लेकिन पहाडी इलाका होने के कारण वह दूर से दिख जाता है। एक व्यू पॉइण्ट भी यहां बना है। आगे बढते हैं तो एक छोटा सा बोर्ड लगा दिखता है- तीरथगढ प्रपात तक जाने का ट्रैकिंग मार्ग। जंगल में छोटी सी पगडण्डी चली गई है। और आगे बढते हैं तो प्रपात के बहुत नजदीक से होकर गुजरते हैं। यहां सडक प्रपात के ऊपरी सिरे से मिलकर आगे गई है। मुझे तो पता ही नहीं चला कि यही प्रपात है। सुनील जी ने बताया तब पता चला। लेकिन एक लम्बा चक्कर काटकर प्रपात के नीचे पहुंचा जा सकता है। हम भी पहुंचे। बारिश हो ही रही थी। कभी तेज कभी कम।
भूख लगी थी, यहां खाने पीने की कोई कमी नहीं। बारिश में चाय पकौडे का अलग ही आनन्द है। वो आनन्द हम तब तक लूटते रहे, जब तक पेट न भर गया। पैसे देने लगे तो दुकान वाले ने कहा- झरना घूमकर आ जाओ, वापसी में देते जाना। अच्छा लगा यह सुनकर। हिमालय की याद आ गई।
बारिश के कारण फिसलन हो गई थी लेकिन फिर भी प्रशासन ने अच्छा इंतजाम कर रखा है। रेलिंग लगा रखी हैं। कुछ दर्शक ऊपर थे और कुछ मूर्ख दर्शक बिल्कुल उस स्थान पर खडे थे जहां से पानी नीचे गिरता है। उन्हें रोमांच आ रहा होगा लेकिन ऐसा रोमांच जानलेवा होता है।
तीरथगढ प्रपात असल में एक के नीचे एक कई प्रपातों का समूह है। यहां यह जो भी नदी है, वो सीढीदार तरीके से नीचे गिरती है। हमें जो अभी प्रपात दिख रहा था, वो सबसे ऊपरी प्रपात था। इसके बाद पानी कुछ दूर तक एक तल में बहता है, फिर इतना ही ऊंचा दूसरा प्रपात है, फिर पानी थोडी दूर एक तल में बहता है, फिर तीसरा। ताज्जुब की बात ये है कि आप कहीं भी खडे हो जाओ, आपको हमेशा एक ही प्रपात दिखाई देगा। ऊपर खडे हो जाओ तो ऊपरी प्रपात दिखेगा। नीचे उतर जाओगे तो ऊपरी प्रपात दिखना बन्द हो जायेगा और दूसरा प्रपात दिखेगा। इसी तरह तीसरा। पता नहीं चौथा भी है या नहीं। पूरा नीचे तक जाने का रास्ता है लेकिन मानसून में पानी बढ जाने के कारण उन सीढियों पर पानी आ गया था, वे सुरक्षित नहीं थीं इसलिये हम दूसरे तल के बाद और नीचे नहीं उतरे। पहले तल से दूसरे तल तक उतरने की सीढियां भी बिल्कुल खडी थीं और फिसलन भरी थीं, सावधानी से उतरना पडा।
सुनील जी के अलावा मुझे कोई नहीं जानता था। सभी सोचते थे कि लडका पहली बार इधर आया है, इसलिये ज्यादा देखभाल भी मेरी ही हो रही थी। दुबे जी ने कहा- नीरज जी, हमारी सलाह है कि आप नीचे मत उतरो, बहुत फिसलन भरी सीढियां हैं और खडी भी बहुत हैं। आपको बडी मुश्किल होगी। मैंने तो कुछ नहीं कहा लेकिन सुनील जी ने कहा- इसे कुछ नहीं होगा। मुझे भी दुबे जी की यह बात सुनकर अच्छा लगा। उसके बाद मैं सीढियां उतरने और बाद में चढने में कुछ ऐसा दिखाने लगा ताकि उन्हें लगे कि मुझे वाकई बडी दिक्कत हो रही है। सुनील जी ने मुझसे अकेले में बाद में कहा- ये लोग तुम्हारे बारे में नहीं जानते, बुरा मत मानना। उन्हें क्या पता कि तुम हिमालयी जानवर हो। यह सुनकर और भी अच्छा लगा।
हमारे पास चार छतरियां थीं। ये हमारे बचाव के लिये नहीं, कैमरों के बचाव के लिये थीं। बूंदाबांदी अनवरत जारी थीं। यह स्थान फोटोग्राफी के लिये बहुत शानदार है। सभी के पास महंगे कैमरे थे, उनके भीगने का डर था, छतरियां बडी काम आईं।
एक मलाल रहेगा कि हम सबसे नीचे नहीं पहुंच सके। दुस्साहस करते तो जा सकते थे लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं था। बल्कि अगर कहूं कि दूसरे तल पर जहां हम खडे थे, मानसून के इस मौसम में वो जगह भी सलामत नहीं थी। संकरी जगह है वह। ऊपर से अगर अचानक पानी का रेला आ गया तो न संभलने का मौका मिलेगा और न ही इतनी जगह है। दोबारा बस्तर तो अवश्य आना है, कुटुमसर की गुफाएं देखनी हैं। और तीरथगढ को पूरा नीचे तक देखकर आना है। यही सोचता हुआ मैं सभी के साथ वापस लौट आया।

तीरथगढ प्रपात के प्रथम दर्शन







गौर कीजिये। अभी जहां मैं खडा हूं, यहां से चन्द कदम आगे पानी नीचे गिर रहा है। यह दूसरे तल का प्रपात है। इसी तरह यहां तीन या चार प्रपात हैं एक के बाद एक।

मनीष दुबे और सुनील पाण्डेय











अगले भाग में जारी...

13. तीरथगढ जलप्रपात