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Monday, February 27, 2017

अंडमान यात्रा - दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर

संक्षेप में इस यात्रा को लिखेंगे। काम का बहुत दबाव है और समय की भारी कमी।
प्रत्येक सरकारी कर्मचारी को देश घूमने के लिये सरकार खर्चा देती है। इसे एल.टी.सी. कहते हैं। इसे लेने के इतने सारे नियम होते हैं कि किसी के लिये सभी नियम याद रख पाना संभव नहीं होता। फिर कुछ नियम ऐसे भी हैं जो समय-समय पर बदलते रहते हैं या आगे कुछ समय के लिये विस्तारित होते रहते हैं। मैं एल.टी.सी. के नियम ज्यादा नहीं जानता। वैसे भी चार साल में एक बार या दो बार इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं। अपना चार साल में पचास बार बाहर जाने का काम है। एक बार खर्चा सरकार दे देगी, तो उनचास बार अपनी जेब से ही सब खर्चा करना होता है। तो सरकार द्वारा दी जाने वाली इस सुविधा को मैं अक्सर भूल जाता हूँ।
एल.टी.सी. का एक मास्टर सर्कुलर है अपने यहाँ। मैंने इसे ही पढ़ लिया और इसी के अनुसार टिकट बुकिंग कर ली। यह सर्कुलर कहता है कि अंडमान जाने के लिये आपको दिल्ली से पहले कोलकाता ट्रेन से जाना पड़ेगा और उसके बाद हवाई जहाज से। बाद में ... वापस लौटकर पता चला कि एक अस्थायी नियम भी चल रहा है जिसके अनुसार हम दिल्ली से सीधे पोर्ट ब्लेयर की फ्लाइट भी ले सकते हैं। लेकिन पहले मुझे इस नियम का पता नहीं था, इसलिये कोलकाता तक ट्रेन में बर्थ बुक कर ली और उसके बाद फ्लाइट।

Thursday, February 23, 2017

उमेश पांडेय की चोपता तुंगनाथ यात्रा - भाग दो

उमेश पांडेय जी की चोपता-तुंगनाथ यात्रा का पहला भाग पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें

तीसरा दिन:
अपने अलार्म के कारण हम सुबह 5 बजे उठ गए। ठंड़ बहुत थी इसलिए ढाबे वाले से गरम पानी लेकर नहाया। फटाफट तैयार हो कर कमरे से बाहर निकले और ॐ नमः शिवाय बोल कर मंदिर की ओर प्रस्थान किया। यात्रा शुरुआत में तो ज्यादा मुश्किल नहीं थी, पर मेरे लिए थी। इसका कारण था मेरा 90 किलो का भारी शरीर। देबाशीष वैसे तो कोई नशा नहीं करते, पर उन्होंने सिगरेट जलायी। समझ नहीं आ रहा था कि ये सिगरेट पीने के लिए जलायी थी या सिर्फ फोटो के लिए। यात्रा की शुरुआत में घना जंगल है। सुबह 5:30 बजे निकलने के कारण अँधेरा भी था। इसलिए मन में भय था कि किसी भालू जी के दर्शन हो गए तो? पर ऐसा नहीं हुआ।
थोड़ी देर में ही उजाला हो गया। 1 किलोमीटर जाने पर एक चाय की दुकान मिली जिसे एक वृद्ध महिला चला रही थी। वहाँ नाश्ता किया। वहीं एक लाल शरबत की बोतल देखी । पूछने पर पता चला कि यह बुरांश का शरबत है। बुरांश उत्तराखंड़ में पाया जाने वाला फूल है । इसे राजकीय पुष्प का दर्जा भी प्राप्त है। अगर आप मार्च - अप्रैल के महीने में उत्तराखंड़ आये तो बुरांश के लाल फूल बिखरे हुए मिलेंगे।

Monday, February 20, 2017

उमेश पांडेय की चोपता तुंगनाथ यात्रा - भाग एक

मित्र उमेश पांडेय अपनी चोपता तुंगनाथ की यात्रा हम सबके साथ साझा कर रहे हैं। कुछ मामूली करेक्शन के बाद मैंने उनकी संपूर्ण पोस्ट को ज्यों का त्यों प्रकाशित किया है। यह उनका पहला लेख है और अच्छा लिखा है। आप भी आनंद लीजिये।
मानव शुरू से ही घुमक्कड़ प्रजाति का प्राणी रहा है। आदि काल से ही मानव ने नए-नए स्थानों की खोज की है। इन्हीं खोजों के दौरान कई नगरों का निर्माण भी हुआ। उनमे से अधिकांश ने अपने रहने का ठिकाना बना लिया और कुछ आज भी खानाबदोशों की तरह घूम रहे हैं।
मेरी घूमने-फिरने में रुचि हमेशा से ही रही है। हमेशा प्रयास रहता है कि जैसे ही समय मिले किसी स्थान की यात्रा पर निकल जाया जाये। लेकिन कभी छुट्टी तो कभी पैसों की तंगी के कारण कम ही जा पाता हूँ। मई 2016 में चम्बा और टिहरी बांध की यात्रा की थी। उसके बारे में कभी बाद में लिखूँगा।
पिछले एक वर्ष से नीरज जी का ब्लॉग ‘मुसाफिर हूँ यारों’ फॉलो कर रहा हूँ। बहुत अच्छा लिखते हैं। ब्लॉग पर ही इनके यात्रा संस्मरण ‘लद्दाख की पैदल यात्राएँ’ जो कि एक किताब है, के बारे में पता चला और ऑर्डर कर दी। यात्रा के विचार से तो मन घूम ही रहा था, किताब पढ़ते ही घुमक्कड़ी का भूत जाग उठा। 18 सितंबर का दिन था, जब तुंगनाथ यात्रा योजना बना ली और यात्रा का दिन निर्धारित किया 29 सितंबर से 2 अक्टूबर 2016। इन चार दिनों में 2 साप्ताहिक अवकाश, 1 कैजुअल लीव और बाकी का एक दिन हाफ डे।

Thursday, February 16, 2017

बरसूड़ी - एक गढ़वाली गाँव

9 जनवरी, दिन सोमवार, रात नौ बजे के आसपास अचानक पता चला कि बीनू कुकरेती के साथ ललित शर्मा, अजय और धर्मवीर माथुर उसके गाँव बरसूड़ी जा रहे हैं। उस समय मैं नाइट ड्यूटी जाने की तैयारी कर रहा था और नहाने ही वाला था। हालाँकि मुझे बीनू और ललित जी की इस यात्रा का पहले से पता था, लेकिन अब एकदम मेरा भी जाने का मन बन गया। आज नाइट करूँगा, तो कल मंगलवार पूरे दिन फ्री रहूँगा और परसों बुधवार मेरा साप्ताहिक अवकाश रहता है। एक भी छुट्टी नहीं लेनी पड़ेगी।
उधर शिमला समेत पूरे पश्चिमी हिमालय में भारी बर्फ़बारी हो रही थी। ऐसे में हमारा भी शिमला जाने का मन बनने लगा था। लेकिन कुछ ही दिन बाद होने वाली अंडमान यात्रा के मद्देनज़र शिमला जाना रद्द कर दिया। अब जब अचानक दीप्ति से बरसूड़ी चलने के बारे में बताया तो वह खुश हो गयी।
उधर बीनू, ललित जी और माथुर साहब कश्मीरी गेट से कोटद्वार वाली बस में बैठ चुके थे। मोहननगर से अजय भी इसी बस को पकड़ेगा। जब मैंने अजय को फोन किया तो वह निकलने ही वाला था। सुबह कार से चलने के मेरे आग्रह को उसने तुरंत मान लिया और इसकी सूचना बाकियों को भी दे दी।

Monday, February 13, 2017

बाइक यात्रा: रामदेवरा - बीकानेर - राजगढ़ - दिल्ली

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21 दिसंबर 2016
हमारी आज की योजना थी कि पहले फलोदी के पास खींचण गाँव जायेंगे और वहाँ प्रवासी पक्षियों को देखेंगे। खींचण के निवासी इन पक्षियों को मेहमान की तरह मानते हैं और उसी तरह इनकी देखभाल करते हैं। उसके बाद रात होने तक बीकानेर पहुँचेंगे और कुलवंत जी के यहाँ रुकेंगे। कल देशनोक में करणी माता का मंदिर देखेंगे, जिसे चूहों का मंदिर भी कहा जाता है। परसों यानी 23 तारीख़ को दिल्ली पहुँचकर ड्यूटी जॉइन कर लूँगा।
लेकिन इस कार्यक्रम में परिवर्तन करना पड़ा। कारण था कि 24 और 25 दिसंबर को झाँसी के पास ओरछा में एक घुमक्कड़ सम्मेलन होना था। इनमें बहुत सारे मेरे मित्र थे और इनमें भी कई तो सपरिवार आने वाले थे। मेरा दिल्ली से झाँसी जाने का आरक्षण नहीं था, लेकिन झाँसी से दिल्ली वापस आने का आरक्षण था और झाँसी में रेलवे विश्राम गृह में एक कमरा भी बुक था। हालाँकि आयोजकों ने ओरछा में भी कमरों की व्यवस्था कर रखी थी, लेकिन ये हमारे बजट से बाहर थे। तो इस तरह मैं 23 की दोपहर तक दिल्ली पहुँचता, लगातार 16 घंटों की ड्यूटी करता और ओरछा के लिये निकल जाता। एक लंबी बाइक यात्रा के तुरंत बाद इतनी लंबी ड्यूटी करना, वो भी रात में, बेहद मुश्किल कार्य है। यही सब सोचकर तय किया कि एक दिन पहले ही दिल्ली पहुँचना ठीक रहेगा। खींचण जाना रद्द कर दिया।

Saturday, February 11, 2017

थार बाइक यात्रा: वीडियो-6

आज की वीड़ियो... वही अपनी थार में बाइक राइड़िंग की... अच्छा लगता है ऐसी सड़कों पर बाइक चलाना...


Friday, February 10, 2017

थार बाइक यात्रा: वीडियो-5

थार मरुस्थल में खुद को धूप से बचाने का भेड़ों का यह व्यवहार हमें पसंद आया:

Thursday, February 9, 2017

वुड़ फॉसिल पार्क, आकल, जैसलमेर

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20 दिसंबर 2012
हम तनोट में थे। सुबह उठे तो मंदिर में आरती समाप्त होने वाली थी। जाकर एक बार फिर दर्शन किये और प्रसाद लिया। कैंटीन में चाय पी और निकल पड़े - अपने दिल्ली वापसी के सफ़र पर। तनोट से निकलते ही घंटियाली माता का मंदिर है। रेत का ऊँचा धोरा भी है। अच्छी लोकेशन पर है यह मंदिर। इसकी भी देखरेख बी.एस.एफ. ही करती है। इसलिये फोटो लेने पर कोई रोक नहीं।
सड़क दो-लेन की है, बेहद शानदार बनी है। पिछली बार जब मैं साइकिल से आया था, तो यह सिंगल थी और इसे दोहरा बनाने का काम चल रहा था।
रास्ते में रणाऊ गाँव आता है। यह भी रेत के टीलों से घिरा है और इसकी स्थिति भी फोटोग्राफी के लिये शानदार है। कहते हैं कि यहाँ कुछ फिल्मों की भी शूटिंग हो चुकी है।

Wednesday, February 8, 2017

थार बाइक यात्रा: वीडियो-4

म्याजलार सड़क पर रेत के टीले के बीच से निकलती सड़क पर बाइक चलाने की वीड़ियो:


Monday, February 6, 2017

जैसलमेर से तनोट - एक नये रास्ते से

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19 दिसंबर 2016
आज हम यात्रा करेंगे जैसलमेर से तनोट तक, लेकिन परंपरागत रास्ते से नहीं बल्कि निहायत नये और अनछुए रास्ते से।
जैसलमेर-सम रोड़ पर जहाँ से लोद्रवा की सड़क अलग होती है, वहाँ कुछ दूरियाँ लिखी थीं। इनमें प्रमुख था आसूतार 94 किलोमीटर। हमारी योजना इसी सड़क पर आसूतार, घोटारू, लोंगेवाला होते हुए तनोट जाने की थी। मैं सैटेलाइट से पहले ही इस सड़क की स्थिति देख चुका था। यह पूरी सड़क पक्की बनी है। इंटरनेट पर इसका कोई भी यात्रा-वृत्तांत नहीं मिलता।
लोद्रवा से आगे छत्रैल है और फिर कुछड़ी है। कुछड़ी में एक टी-पॉइंट है - बाये सड़क सम जाती है और दाहिने आसूतार। अगर कल हम सम रुकते, तो शायद सीधे इधर ही आते। हम दाहिने मुड़ गये।
थोड़ा आगे हाबुर गाँव है। यहाँ से सीधी सड़क जैसलमेर-तनोट रोड़ में मोकल के पास जाकर मिल जाती है और बायें जाने वाली सड़क आसूतार जाती है। यहाँ से हम भी आसूतार का पीछा करते-करते बायें मुड़ गये।
दो-लेन की यह सड़क सीमा सड़क संगठन ने बनायी है और बेहद शानदार बनी है। राजस्थान के इस सुदूर इलाके में जरा भी यातायात नहीं है। कभी-कभार कोई जीप आ जाती, जिससे स्थानीय निवासी आना-जाना करते हैं। बस कोई नहीं दिखी।

Saturday, February 4, 2017

थार बाइक यात्रा: वीडियो-2

थार बाइक यात्रा का एक और वीडियो सामने आया है...


Friday, February 3, 2017

थार बाइक यात्रा: वीडियो-1

मुनाबाव - म्याजलार - जैसलमेर सड़क पर सुमित जी डाक्टर साहब की बुलेट राइडिंग...



Thursday, February 2, 2017

लोद्रवा - थार में एक जैन तीर्थ

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19 दिसंबर 2016
आज ज्यादा कुछ नहीं लिखेंगे। कुछ फोटो हैं, वे देख लेना और थोड़ा-सा लिख भी देता हूँ, इसे पढ़ लेना। काफ़ी रहेगा।
याद तो आपको होगा ही कि कल सुमित सम चला गया था और अपना टैंट लगाकर सोया था। हम दोनों जैसलमेर आ गये थे और एक गंदे-से होटल में अच्छी नींद ली। सुबह सुमित से व्हाट्स-एप पर बातचीत हुई, हमने अपनी लोकेशन उसे शेयर कर दी और कुछ ही देर में दरवाजे पर खटखटाहट हुई। सुमित आ गया था।

Monday, January 30, 2017

कुलधरा: एक वीरान भुतहा गाँव

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18 दिसंबर 2016
कुलधरा - पता नहीं आपने इस स्थान का नाम सुना है या नहीं, लेकिन मैं मानता हूँ कि सुना भी होगा और देखा भी होगा। जैसलमेर से ज्यादा दूर नहीं है और सम जाने के रास्ते से थोड़ा-सा ही हटकर है।
जब हम वहाँ पहुँचे तो पाँच बज चुके थे और जल्दी ही सूरज छिपने वाला था। यह मरुभूमि को देखते हुए काफ़ी बड़ा गाँव था और इसे योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया था। गाँव के अंदर सीधी सड़कें इसकी पुष्टि करती हैं। फिर किसी कारण से यह उजड़ गया और अब यहाँ कोई नहीं रहता। कोई कहता है कि इसका कारण पानी की तंगी था, कोई कहता है कि जैसलमेर के किसी वज़ीर के कारण उजड़ा और ज्यादा मान्यता है कि यह शापित और भुतहा है।

Thursday, January 26, 2017

धनाना में ऊँट-सवारी

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18 दिसंबर 2016
जब हम धनाना से लौट रहे थे और दो-तीन किलोमीटर ही चले थे, देखा कि सामने से एक ऊँटवाला अपने ऊँट पर बैठा आ रहा था। सुमित हमेशा की तरह हमसे आगे था। सुमित ने बाइक रोक ली और उसके फोटो लेने लगा। ऊँटवाला और ऊँट दोनों मँजे हुए खिलाड़ी की तरह ‘पोज़’ दे रहे थे। कभी सड़क के दाहिनी तरफ़ आ जाते, कभी बायीं तरफ़ और कभी सड़क घेरकर खड़े हो जाते तो कभी सड़क से नीचे उतर जाते। वे जानते थे कि किस तरह खड़े होना है ताकि अच्छे फोटो आयें।
ऊँटवाले का नाम मुबारक अली था और ये धनाना के रहने वाले थे। इनके पास कई ऊँट हैं और सभी ऊँट और बेटे सम में काम करते हैं - पर्यटकों को ऊँट-सवारी कराने का काम। इनके बाकी सभी ऊँट सम जा चुके हैं। दो ऊँटों को इनका एक बेटा थोड़ी देर पहले ही यहाँ से सम लेकर गया है। कल यह भी सम जायेगा।

Monday, January 23, 2017

धनाना: सम से आगे की दुनिया

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18 दिसंबर 2016
जब हम गूगल मैप में जैसलमेर से सम की सड़क देखते हैं, तो इस पर लिखा आता है - जैसलमेर-सम-धनाना रोड़। ज़ाहिर है कि इसी सड़क पर सम से भी आगे कहीं धनाना है। गौर से देखें तो यह सड़क आगे भारत-पाक सीमा तक जाती है। मतलब कहीं न कहीं बी.एस.एफ. वाले बैठे होंगे ताकि आम नागरिक सीमा तक न जा सकें। मेरी इच्छा उस बैरियर तक जाने की थी। पता नहीं वो बैरियर कहाँ होगा। इंटरनेट पर भी इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी। इसके बाद ज्यादा ध्यान देकर सैटेलाइट इमेज देखीं तो पता चला कि हरनाऊ तक और उससे भी आगे तक पक्की सड़क बनी हुई है। यह सड़क पश्चिम में होती हुई उत्तर में मुड़ जाती है और आगे लोंगेवाला जा पहुँचती है और 150 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी है। लेकिन बीच में 14 किलोमीटर का छोटा-सा टुकड़ा कच्चा दिख गया। शायद यह सैटेलाइट इमेज दो साल पुरानी हो, शायद अब उस 14 किलोमीटर में पक्की सड़क बन गयी हो, लेकिन यह तय कर लिया कि भले ही सम से आगे 100 किलोमीटर निकलकर वापस सम लौटना पड़े, लेकिन किसी भी हालत में उस कच्चे रास्ते पर बाइक नहीं चलायेंगे।

Thursday, January 19, 2017

राष्ट्रीय मरु उद्यान - डेजर्ट नेशनल पार्क

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18 दिसंबर 2016
इस नेशनल पार्क से हमारा सामना अचानक अपने आप ही हो गया। असल में हमारी योजना थी - मुनाबाव से तनोट जाना। सीधा रास्ता है जैसलमेर के रास्ते जाओ। लेकिन मैं चाहता था कि सीमा के नज़दीक-नज़दीक ही रहें। एक सड़क म्याजलार से पश्चिम में जाती है और आगे सम के पास कहीं जाकर निकलती है। इसका और अन्य कई सड़कों का मैंने सैटेलाइट से अच्छी तरह अध्ययन किया। चूँकि इंटरनेट पर इस इलाके के बारे में, इसकी सड़कों के बारे में कुछ भी जानकारी उपलब्ध नहीं थी, सैटेलाइट इमेज पर भरोसा करके तय कर लिया था कि इस सड़क से पश्चिम में जायेंगे। यह कच्ची सड़क नहीं थी और सैटेलाइट से देखने पर काली लकीर स्पष्ट दिख रही थी, जिससे इतना तो पक्का हो गया कि एक साल पहले तक या दो साल पहले तक यहाँ पक्की सड़क थी। गूगल में सैटेलाइट इमेज एक-दो साल पुरानी होती हैं। ट्रैफिक नहीं होता और बारिश नहीं होती, इसलिये सड़क ख़राब होने की कोई संभावना नहीं।

Monday, January 16, 2017

खुड़ी - जैसलमेर का उभरता पर्यटक स्थल

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17 दिसंबर 2016
एक घंटे में ही म्याजलार से 56 किलोमीटर दूर खुड़ी आ गये। यहाँ से जैसलमेर लगभग 50 किलोमीटर है। खुड़ी अपने रेत के टीलों के लिये प्रसिद्ध है। चारों तरफ़ टैंट कालोनियाँ ही थीं। अब हम फिर से ‘सभ्यता’ में आ गये थे। अगर हम यहाँ अपने टैंट लगाते, तो किसी भी तरह की परेशानी की बात नहीं थी। यहाँ खूब पर्यटक आते हैं और खुड़ी वालों के लिये हमारे टैंट असामान्य नहीं होते। लेकिन मैं इरादा कर चुका था कि अपना टैंट नहीं लगाना। थोड़े-बहुत पैसे खर्च होंगे, लेकिन नर्म बिस्तर पर पैर फैलाकर सोने की सुविधा होगी, हगने-मूतने की सुविधा होगी और ‘प्राइवेसी’ होगी। टैंट तो आपातकाल के लिये होते हैं। सुमित के लिये टैंट नयी चीज थी, इसलिये वह टैंट ही लगाना चाहता था, लेकिन उसने भी हमारा साथ दिया।
एक रिसॉर्ट वाले के यहाँ बात की। जानते थे कि ये बहुत महँगे होते हैं, फिर भी बात कर ली।

Thursday, January 12, 2017

थार के सुदूर इलाकों में : किराडू - मुनाबाव - म्याजलार

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17 दिसंबर 2016
किराडू से साढ़े ग्यारह बजे चले। अगला लक्ष्य था मुनाबाव में भारत-पाक सीमा देखना। सड़क सिंगल है, लेकिन ट्रैफिक न होने के कारण कोई दिक्कत नहीं होती। कभी-कभार कोई ट्रक या कोई जीप सामने से आ जाती।
रामसर एक बड़ा गाँव है। अच्छी चहल-पहल थी।
गड़रा रोड़ से दो किलोमीटर पहले सड़क किनारे लगे एक सूचना-पट्ट पर निगाह गयी - “शहीद स्मारक लोको पायलट, 1965 भारत पाक युद्ध।” तुरंत बाइक रोकी और मुख्य सड़क से लगभग 100 मीटर दूर रेलवे लाइन के किनारे ले गये। यहाँ एक स्मारक बना है। गौरतलब है कि 1965 के भारत-पाक युद्ध में कश्मीर से लेकर गुजरात तक लड़ाई छिड़ी हुई थी। इतनी लंबी सीमा में कभी भारतीय सेना पाकिस्तान के अंदर जाकर कब्जा कर लेती, तो कभी पाकिस्तानी सेना भारत के अंदर। मुनाबाव रेलवे स्टेशन पाकिस्तान के कब्जे में आ गया था। उसी दौरान बाड़मेर से मुनाबाव जाती एक ट्रेन पर 10 सितंबर की रात साढ़े दस बजे गड़रा रोड़ के पास पाकिस्तान ने निशाना साधा। इसके गार्ड़ और फायरमैन समेत कई कर्मचारी शहीद हो गये। थोड़ा आगे इंजीनियरिंग स्टाफ का शहीद स्मारक भी है।

Monday, January 9, 2017

किराडू मंदिर - थार की शान

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17 दिसंबर 2016
सूरज की पहली किरण निकलने से पहले ही हमने टैंट उखाड़कर पैक कर लिये थे। हम नहीं चाहते थे कि उत्सुक ग्रामीण यहाँ आयें और पूछताछ करें। थोड़े-से फोटो खींचे और निकल पड़े।
बाड़मेर बाईपास पर एक जगह चाय-नाश्ता किया और मुनाबाव वाली सड़क पर चल दिये। सीमा सड़क संगठन द्वारा लगाया गया हरे रंग का बोर्ड़ कह रहा था - “प्रोजेक्ट चेतक बाड़मेर-गड़रा-मुनाबाव सड़क पर आपका स्वागत करता है।” साथ ही दूरियाँ भी लिखी थीं - मारुडी 10 किलोमीटर, जसई 20 किलोमीटर, हतमा 34 किलोमीटर, रामसर 59 किलोमीटर, गड़रा 85 किलोमीटर और मुनाबाव 125 किलोमीटर।
मारुडी में दो पेट्रोल पंप हैं। हमने टंकियाँ फुल करा लीं। आगे मुनाबाव तक या जैसलमेर तक 250-300 किलोमीटर तक कोई पेट्रोल पंप हो या न हो। बाद में पता चला कि रामसर में भी पेट्रोल पंप है और शायद गड़रा में भी।

Friday, January 6, 2017

थार बाइक यात्रा: जोधपुर से बाड़मेर और नाकोड़ा जी

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16 दिसंबर 2016
जोधपुर से साढ़े ग्यारह बजे चले। करा-धरा कुछ नहीं, बस पड़े सोते रहे। फिर थोड़े-से नहा लिये, थोड़ा-सा खा लिया और निकल पड़े। बाइक में इंजन ऑयल कम था। पेट्रोल पंप पर टंकी फुल करायी तो इंजन ऑयल की एक बोतल भी ले ली। आगे एक मिस्त्री के पास गये तो पता चला कि मालिक थोड़ी देर में आयेगा, तब तक हमें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। उस समय तक मुझे नहीं मालूम था कि बाइक में बचा हुआ इंजन ऑयल निकालकर नया ऑयल डालना पड़ेगा। मैंने सोचा कि जितना कम है, उतना डाल देते हैं। वहीं एक आदमी ने इसे डाल दिया। डालने के बाद कहने लगा कि आपको ऑयल रिप्लेस कराना चाहिये था। मैंने कहा - अरे डाला भी तो तुमने ही है। पहले ही क्यों नहीं कहा कि रिप्लेस होता है? बाद में सुमित ने भी ऐसा कहा, लेकिन बाड़मेर पहुँचने पर - ‘नीरज, तुम तो मैकेनिकल इंजीनियर हो। क्या तुम्हें पता नहीं है कि इंजन ऑयल रिप्लेस होता है?’ मैं चिड़चिड़ा-सा हो गया - ‘ओये, तुम भी तो वहीं खड़े थे। उसी समय क्यों नहीं टोका? और अब क्यों टोक रहे हो?’
सुमित ने कहा - ‘मैंने सोचा कि तुम इंजीनियर हो। तुम्हें पता ही होगा।’
‘अरे तुम भी तो डॉक्टर हो। फिर दाँत का इलाज क्यों नहीं करते? क्यों मरीजों को डेंटिस्ट के पास भेजते हो?’

Wednesday, January 4, 2017

थार बाइक यात्रा - एकलिंगजी, हल्दीघाटी और जोधपुर

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15 दिसंबर 2016
शक्ति सिंह दुलावत अपने एक मित्र के साथ सुबह-सुबह ही उदयपुर से आ गये। साथ में ढेर सारा नाश्ता - मेरा पसंदीदा और दीप्ति का ना-पसंदीदा ढोकला भी। अब बड़ी देर तक और बड़ी दूर तक कुछ भी खाने की आवश्यकता नहीं।
एकलिंगजी में भगवान शिव का मंदिर है। यह मेवाड़ के राजाओं की निजी संपत्ति है। फोटो खींचना वर्जित है। लेकिन आठवीं शताब्दी में बने छोटे-बड़े 108 मंदिर मूर्तिकला से भरपूर हैं। मन करता है कि इन्हें देखते रहो और फोटो खींचते रहो। फोटो नहीं खींच सकते, लेकिन देख तो सकते ही हैं।
जिनका भी यह मंदिर है, उनसे मेरी प्रार्थना है कि भले ही थोड़ी-बहुत राशि ले लिया करें, लेकिन फोटोग्राफी होने दो यहाँ। फोटो खींचने से भक्तिभाव में कमी नहीं आती - यक़ीन मानिये। और जिनमें भक्तिभाव नहीं है, उनमें प्रतिबंध लगाकर यह पैदा भी नहीं की जा सकती।
फोटोग्राफी रोकने के लिये चप्पे-चप्पे पर गार्ड़ तैनात रहते हैं।

Monday, January 2, 2017

थार बाइक यात्रा - भागमभाग

यह जो सुमित है ना इंदौर वाला ... इसका ऑफ़ सीजन हो जाता है सर्दियों में ... कोई बीमार नहीं पड़ता ... बीमार पड़ता भी है तो सर्दी-जुकाम ही होते हैं ... मेडिकल स्टोर से ले आते हैं दवाई ... डॉक्टर के पास जाने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती ... मतलब सर्दियों में कोई सुमित के क्लीनिक नहीं आता ... इसके पास मक्खियाँ तक नहीं होतीं मारने को ...
तब इसे सूझती है खुराफ़ात ... घुमक्कड़ी की खुराफ़ात ... कहने लगा थार जाऊँगा ... बाइक से ... दिसंबर में ... मैंने मना किया ... रहने दे भाई ... मुझे जनवरी में अंड़मान जाना है ... दिसंबर में मुश्किल हो जायेगी ... और अगर दिसंबर में छुट्टियाँ मिल गयीं तो जनवरी में मुश्किल होगी ... बोला ... नहीं मानूँगा ... हमने भी कह दिया ... नहीं मानेगा तो ठीक ... चलेंगे हम भी ... 12 तारीख़ को ईद थी ... खान साहब मेहरबान हो गये ... बिना झगड़े छुट्टियाँ मिल गयीं ... और हमारी बाइक पर सारा सामान लद गया ...
दीप्ति को ... मतलब निशा को ... मतलब पिछले साल तक वह निशा थी ... अब के बाद उसे उसके वास्तविक नाम दीप्ति से पुकारा करेंगे ... तो दीप्ति को वसंत विहार जाना पड़ गया ... बहुत सारे काम होते हैं ... उसका मायका है वहाँ ... एक काम बैंक से पैसे निकालना भी था ... रास्ते में पैसे ख़त्म हो गये तो कहीं ए.टी.एम. की लाइन में थोड़े ही खड़े होंगे?