Friday, August 28, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 20 (भरतपुर-केलांग)

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22 जून 2015
आज हमें केवल केलांग तक ही जाना था इसलिये उठने में कोई जल्दबाजी नहीं की बल्कि खूब देर की। मुजफ्फरनगर वाला ग्रुप लेह की तरफ चला गया था और उनके बाद लखनऊ वाले भी चले गये। टॉयलेट में गया तो पानी जमा मिला यानी रात तापमान शून्य से नीचे था। सामने ही बारालाचा-ला है और इस दर्रे पर खूब बर्फ होती है। मनाली-लेह सडक पर सबसे ज्यादा बर्फ बारालाचा पर ही मिलती है। बर्फ के कारण सडक पर पानी आ जाता है और ठण्ड के कारण वो पानी जम भी जाया करता है इसलिये बाइक चलाने में कठिनाईयां आती हैं। देर से उठने का दूसरा कारण था कि धूप निकल जाये और सडक पर जमा हुआ पानी पिघल जाये ताकि बाइक न फिसले।
लखनऊ वालों ने रात अण्डा-करी बनवा तो ली थी लेकिन सब सो गये और सारी सब्जी यूं ही रखी रही। रात उन्होंने कहा था कि सुबह वे अण्डा-करी अपने साथ ले जायेंगे लेकिन अब वे नहीं ले गये। मन तो हमारा कर रहा था कि अण्डा-करी मांग लें क्योंकि दुकानदार को भुगतान हो ही चुका था। हमें ये फ्री में मिलते लेकिन ज़मीर ने साथ नहीं दिया। दूसरी बात कि तम्बू वाले दोनों पति-पत्नी थे। इस तम्बू के सामने वाला तम्बू इसी महिला की मां संभाल रही थी। यह महिला अपने पति के प्रति बहुत आक्रामक थी और जरा-जरा सी बात पर उसे डांट देती थी। एक दुधमुंहा बच्चा भी था। अगर वो रोने लगे तो पति की खैर नहीं। कुल मिलाकर हमारे लिये बडा ही भारी माहौल था, हमने अण्डा-करी मांगना उचित नहीं समझा।

Monday, August 24, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 19 (शो कार- डेबरिंग-पांग-सरचू-भरतपुर)

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21 जून 2015
आराम से सोकर उठे- नौ बजे। नाश्ते में चाय, आमलेट के साथ एक-एक रोटी खा ली। कल जितना मौसम साफ था, आज उतना ही खराब। बूंदाबांदी भी हो जाती थी। पिछली बार यहां आया था, तब भी रात-रात में मौसम खराब हो गया था, आज भी हो गया। पेट्रोल की बात की तो दुकान वाले ने आसपास की दुकानों पर भागादौडी की लेकिन पेट्रोल नहीं मिला। कहा कि डेबरिंग में मिल जायेगा। बाइक कल ही रिजर्व में लग चुकी थी, अब बोतल का दो लीटर पेट्रोल भी खाली कर दिया।
दस बजे यहां से चल दिये। रात हमने बाइक से सामान खोला ही नहीं था। केवल टैंक बैग उतार लिया था। खोलने में तो मेहनत लगती ही है, सुबह बांधने में और भी ज्यादा मेहनत लगती है।

Friday, August 21, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 18 (माहे-शो मोरीरी-सुमडो-शो कार)

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20 जून 2015
साढे आठ बजे सोकर उठे और नौ बजे तक यहां से निकल लिये। बारह किलोमीटर आगे सुमडो है जहां खाने पीने को मिलेगा, वहीं नाश्ता करेंगे। सुमडो का अर्थ होता है संगम। गांव का नाम है पुगा और दो धाराओं के संगम पर बसा होने के कारण बन गया- पुगा सुमडो। लेकिन आम बोलचाल में सुमडो ही कहा जाता है। यहां से एक रास्ता शो मोरीरी जाता है और दूसरा रास्ता शो-कार। आपको याद होगा कि शो-कार झील लेह-मनाली रोड के पास स्थित है। हमें आज पहले शो मोरीरी जाना है, फिर वापस सुमडो तक आकर शो-कार वाले रास्ते पर चल देना है। शो-कार की तरफ चलने का अर्थ है मनाली की ओर चलना और मनाली की ओर चलने का अर्थ है दिल्ली की ओर चलना। इस प्रकार जैसे ही आज हम शो-मोरीरी से वापस मुडेंगे, दिल्ली के लिये वापसी आरम्भ कर देंगे।
सुमडो से थोडा आगे एक दुकान है। हम यहीं रुक गये। दस बजने वाले थे, हम पेट भर ही लेना चाहते थे लेकिन यहां ज्यादा कुछ नहीं मिला। चाय, बिस्कुट में काम चलाया। कोई बात नहीं, आगे शो-मोरीरी पर बहुत कुछ खाने को मिलेगा।

Wednesday, August 19, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 17 (लोमा-हनले-लोमा-माहे)

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19 जून 2015
भारतीय सेना के अपनेपन से अभिभूत होकर सुबह सवा नौ बजे हमने हनले के लिये प्रस्थान किया। जरा सा आगे ही आईटीबीपी की चेकपोस्ट है और दो बैरियर भी हैं। यहां से एक रास्ता सिन्धु के साथ-साथ उप्शी और आगे लेह चला जाता है, एक रास्ता वही है जिससे हम आये हैं यानी चुशुल वाला और तीसरा रास्ता सिन्धु पार जाने के लिये है। सिन्धु पार होते ही फिर दो रास्ते मिलते हैं- एक सीधा हनले जाता है और दूसरा बायें कोयुल होते हुए देमचोक। देमचोक ही वो स्थान है जहां से सिन्धु तिब्बत से भारत में प्रवेश करती है। गूगल मैप के भारतीय संस्करण में देमचोक को भारत का हिस्सा दिखाया गया है, अन्तर्राष्ट्रीय संस्करण में इसे विवादित क्षेत्र बताया है जो भारतीय दावे और चीनी दावे के बीच में है और चीनी संस्करण में इसे चीन का हिस्सा दिखाया है। लेकिन फिलहाल जमीनी हकीकत यह है कि देमचोक भारतीय नियन्त्रण में है। देमचोक का परमिट बिल्कुल नहीं मिलता है। अगर आपकी सैन्य पृष्ठभूमि रही है तो शायद आप वहां जा सकते हैं अन्यथा नहीं। हालांकि लोमा में सिन्धु पार करके देमचोक वाली सडक पर कोई नहीं था, आप भूलवश कुछ दूर तक जा सकते हैं, शायद कोयुल तक भी।

Monday, August 17, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 16 (मेरक-चुशुल-सागा ला-लोमा)

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18 जून 2015
दोपहर के पौने दो बजे हम पेंगोंग किनारे स्थित मेरक गांव से चले। हमारा आज का लक्ष्य हनले पहुंचने का था जो अभी भी लगभग 150 किलोमीटर दूर है। मेरे पास सभी स्थानों की दूरियां थीं और यह भी ज्ञात था कि कितनी दूर खराब रास्ता मिलेगा और कितनी दूर अच्छा रास्ता। इन 150 किलोमीटर में से लगभग 60 किलोमीटर खराब रास्ता है, बिल्कुल वैसा ही जैसा हमने स्पांगमिक से यहां तक तय किया है। इन 60 किलोमीटर को तय करने में तीन घण्टे लगेंगे और बाकी के 90 किलोमीटर को तय करने में भी तीन ही घण्टे लगेंगे; ऐसा मैंने सोचा था। यानी हनले पहुंचने में अन्धेरा हो जाना है। अगर कुछ देर पहले वो बुलेट खराब न होती तो हम उजाला रहते हनले पहुंच सकते थे।

Friday, August 14, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 15 (पेंगोंग झील: लुकुंग से मेरक)

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17 जून 2015
दोपहर बाद साढे तीन बजे हम पेंगोंग किनारे थे। अर्थात उस स्थान पर जहां से पेंगोंग झील शुरू होती है और लुकुंग गांव है। इस स्थान को ‘पेंगोंग’ भी कह देते हैं। यहां खाने-पीने की बहुत सारी दुकानें हैं।
पूरे लद्दाख में अगर कोई स्थान सर्वाधिक दर्शनीय है तो वो है पेंगोंग झील। आप लद्दाख जा रहे हैं तो कहीं और जायें या न जायें लेकिन पेंगोंग अवश्य जायें। अगर शो-मोरीरी छूट जाये तो छूटने दो, नुब्रा छूटे तो छूटने दो लेकिन पेंगोंग झील नहीं छूटनी चाहिये।
यह एक साल्टवाटर लेक है यानी नमक के पानी की झील है। नमक का पानी होने का यह अर्थ है कि इसका पानी रुका हुआ है, बहता नहीं है। हिमालय में अक्सर बहते पानी के रास्ते में कोई अवरोध आता है तो वहां झील बन जाती है। जब पानी का तल अवरोध से ऊंचा होने लगता है तो पानी बह निकलता है, रुकता नहीं है। लेकिन पेंगोंग ऐसी झील नहीं है। इसमें चारों तरफ से छोटे छोटे नालों से पानी आता रहता है और जाता कहीं नहीं है। तेज धूप पडती है तो उडता रहता है और खारा होता चला जाता है।

Wednesday, August 12, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 14 (चांग ला - पेंगोंग)

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17 जून 2015
शोल्टाक से हम सवा दस बजे चले। तीन किलोमीटर ही चले थे कि दाहिनी तरफ एक झील दिखाई दी। इसका नाम नहीं पता। हम रुक गये। यह एक काफी चौडी घाटी है और वेटलैण्ड है यानी नमभूमि है। चांगला और अन्य बर्फीली जगहों से लगातार पानी आता रहता है और नमी बनी रहती है। साथ ही हरियाली भी। ऐसी जगहें लद्दाख में कई हैं। मनाली रोड पर डेबरिंग तो विश्व प्रसिद्ध है। डेबरिंग की पश्मीना भेडों का बडा नाम है। कहीं भेडपालन होता है, कहीं याकपालन। यहां जहां रात हम रुके थे, वहां याकपालन हो रहा था। पानी के रास्ते में थोडा सा अवरोध आते ही वो झील का रूप ले लेता है। यहां भी इसी तरह की झील बनी है। अच्छी लगती है। हो सकता है कि पेंगोंग के चक्कर में आपने यह झील न देखी हो। अगली बार पेंगोंग जाना हो तो इसे अवश्य देखना। पेंगोंग अपनी जगह है लेकिन यह भी खूबसूरती में कम नहीं है।
इससे आगे रास्ता भी बेहद खूबसूरत है। हरी घास कालीन की तरह बिछी है और लद्दाख के बंजर में आंखों को अच्छी लगती है। थोडा ही आगे यह नदी दुरबुक की तरफ से आती एक नदी में मिल जाती है और दोनों सम्मिलित होकर श्योक में मिलने चल देती हैं। जहां इसका और श्योक का संगम होता है, वहां श्योक नामक गांव भी है। श्योक भी बडी दूर से आती है और दिस्कित के पास नुब्रा नदी इसमें मिल जाती है। श्योक आगे बढती है और पाक अधिकृत कश्मीर में स्कार्दू के पास सिन्धु में मिल जाती है।

Monday, August 10, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 13 (लेह-चांग ला)

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(मित्र अनुराग जगाधरी जी ने एक त्रुटि की तरफ ध्यान दिलाया। पिछली पोस्ट में मैंने बाइक के पहियों में हवा के प्रेशर को ‘बार’ में लिखा था जबकि यह ‘पीएसआई’ में होता है। पीएसआई यानी पौंड प्रति स्क्वायर इंच। इसे सामान्यतः पौंड भी कह देते हैं। तो बाइक के टायरों में हवा का दाब 40 बार नहीं, बल्कि 40 पौंड होता है। त्रुटि को ठीक कर दिया है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद अनुराग जी।)
दिनांक: 16 जून 2015
दोपहर बाद तीन बजे थे जब हम लेह से मनाली रोड पर चल दिये। खारदुंगला पर अत्यधिक बर्फबारी के कारण नुब्रा घाटी में जाना सम्भव नहीं हो पाया था। उधर चांग-ला भी खारदुंगला के लगभग बराबर ही है और दोनों की प्रकृति भी एक समान है, इसलिये वहां भी उतनी ही बर्फ मिलनी चाहिये। अर्थात चांग-ला भी बन्द मिलना चाहिये, इसलिये आज उप्शी से शो-मोरीरी की तरफ चले जायेंगे। जहां अन्धेरा होने लगेगा, वहां रुक जायेंगे। कल शो-मोरीरी देखेंगे और फिर वहीं से हनले और चुशुल तथा पेंगोंग चले जायेंगे। वापसी चांग-ला के रास्ते करेंगे, तब तक तो खुल ही जायेगा। यह योजना बन गई।

Saturday, August 8, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 12 (लेह-खारदुंगला)

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16 जून 2015
एक बात मैं अक्सर सोचता हूं। हम मैदानों में बाइक के पहियों में हवा लगभग 35 पौंड पर भरते हैं। जब हम लद्दाख जैसी ऊंची जगहों पर पहुंचते हैं तो वातावरण में हवा का दबाव कम होने के कारण पहियों में हवा का दाब बढ जाता है। जैसे कि मान लो लेह में हवा का दाब दिल्ली के मुकाबले आधा है, तो दिल्ली में भरी गई 35 पौंड की हवा लेह में 70 पौंड का प्रभाव पैदा करेगी। यह खतरनाक हो सकता है। बाइकों में अधिकतम 40 पौंड तक ही हवा भरी जाती है, उससे ज्यादा हवा अगर भरी गई तो टायर के फटने का डर हो जाता है। लेकिन ऊंचाईयों पर पहुंचने पर दाब 70 पौंड तक भी पहुंच जाता है, जो निश्चित रूप से अत्यधिक खतरनाक है। ऐसे में अत्यधिक दाब वाली हवा ट्यूब पर, पहिये पर दबाव डालती है और ट्यूब जहां से भी कमजोर होती है, वहीं से पंचर हो जाती है।
लद्दाख में दर्रों के आसपास पंचर ज्यादा होते हैं। केवल इसीलिये।
इसलिये जरूरी था कि हवा चेक की जाये। यह काम हम कल नहीं करा सके, सोचा कि आज चलते समय करायेंगे। लेकिन आज सुबह नौ बजे हम चल पडे, लेह से बाहर निकल गये लेकिन हवा चेक नहीं कराई। यह खतरनाक तो था लेकिन जो होगा देखा जायेगा।

Wednesday, August 5, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 11 (खालसी-लेह)

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14 जून 2015,
आज रविवार था और हम खालसी में थे। हमें आगे की यात्राओं के लिये चुशुल, हनले और चुमुर के परमिट की आवश्यकता थी। लेकिन आज परमिट नहीं बन सकता। इसलिये योजना थी कि आज खारदुंगला पार करके पनामिक तक पहुंचने की कोशिश करेंगे। कल तुरतुक और परसों वारी-ला के रास्ते कारू पहुंचेंगे, टंकी फुल करायेंगे और परमिट बनवाने लेह आ जायेंगे। उसके बाद फिर कारू और आगे पेंगोंग की तरफ चले जायेंगे।
लेकिन नौ बजे सोकर उठे। जब तक यहां से चले, तब तक दस बज चुके थे। यहां से लेह सौ किलोमीटर दूर है और शानदार टू लेन सडक बनी है। काफी रास्ता समतल है इसलिये तीन घण्टे में लेह पहुंच जाने का इरादा था।
रास्ता सिन्धु के साथ साथ है। ससपोल से आगे ऊपर चढकर जहां से लिकिर गोम्पा के लिये रास्ता अलग होता है, हम रुक गये। यहां काफी लम्बा-चौडा मैदान है। अच्छा लगता है। दस मिनट यहां रुके, फिर चल पडे।
बारह बजे तक निम्मू पार कर लिया। यहां सिन्धु में जांस्कर नदी आकर मिलती है। जांस्कर एक बहुत बडे इलाके का पानी अपने साथ लाती है। इसका जल-प्रवाह क्षेत्र इतना दुर्गम है कि आज तक वहां ढंग की सडक भी नहीं बन पाई है। इसी जांस्कर घाटी में सर्दियों में चादर ट्रेक होता है। नदी जम जाती है और इस पर ट्रैकिंग की जाती है।

Monday, August 3, 2015

डायरी के पन्ने- 33

नोट: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।

1. हमारा एक व्हाट्स एप ग्रुप है- `घुमक्कडी... दिल से'। इसमें वे लोग शामिल हैं जो घूमते हैं और फिर उसे ब्लॉग पर लिखते भी हैं। लेकिन इसमें कुछ ऐसे भी लोग हैं जो साल में एकाध यात्रा-पोस्ट डाल देते हैं। इनमें दर्शन कौर धनोए प्रमुख हैं। कुछ तो ऐसे भी लोग हैं जो न लिखते हैं और न ही कहीं घूमने जाते हैं। ये लोग बेवजह आकर बेकार की बातें करते थे। मुझे इन लोगों से आपत्ति थी और एक बार ग्रुप छोड भी दिया था लेकिन एडमिन साहब अपने बेहद नजदीकी हैं, इसलिये पुनः शामिल हो गया।
एक दिन प्रदीप चौहान ने अपने ब्लॉग का लिंक शेयर किया- safarhaisuhana.blogspot.in। उधर रीतेश गुप्ता जी के ब्लॉग का यूआरएल है- safarhainsuhana.blogspot.in। जाहिर है कि दोनों में एक N का फर्क है। रीतेश गुप्ता भी इस ग्रुप में शामिल हैं। प्रदीप ने हम सबसे अपना ब्लॉग पढने और टिप्पणी करने की गुजारिश की थी। मेरा दूसरों के यात्रा-वृत्तान्त पर टिप्पणी करने का कडवा अनुभव रहा है, इसलिये आजकल मैं न कोई यात्रा ब्लॉग पढता हूं और न ही टिप्पणी करता हूं; एकाध को छोडकर। मैं जब कोई यात्रा-वृत्तान्त पढता हूं तो उसमें कमियां निकालने की कोशिश करता हूं। अक्सर कमियां मिल भी जाती हैं। सामने कमी होते हुए मुझसे वाहवाही नहीं होती। मैं उस कमी को उघाड देता हूं। यही गडबड हो जाती है। लेखक आरोप लगा देता है कि तू ज्यादा स्याणा बन रहा है। कई बार ऐसा हो चुका है, तो अब पढना बन्द कर रखा है।

Friday, July 31, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 10 (शिरशिरला-खालसी)

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13 जून 2015
सवा दो बजे हम शिरशिरला पहुंच गये थे। यह स्थान समुद्र तल से 4800 मीटर ऊपर है। यहां से फोतोकसर दिख तो नहीं रहा था लेकिन अन्दाजा था कि कम से कम दस किलोमीटर तो होगा ही। रास्ता ढलान वाला है, फिर भी स्पीड में कोई बढोत्तरी नहीं होगी। हम औसतन दस किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार से यहां तक आये थे। फिर भी मान लो आधा घण्टा ही लगेगा। यानी हम तीन बजे तक फोतोकसर पहुंच जायेंगे। भूख लगी थी, खाना भी खाना होगा और गोम्पा भी देखना होगा। जल्दी करेंगे फिर भी चार साढे चार बज जाने हैं। पांच बजे तक वापस शिरशिरला आयेंगे। वापसी में दो घण्टे हनुपट्टा के और फिर कम से कम दो घण्टे ही मेन रोड तक पहुंचने के लगेंगे। यानी वापस खालसी पहुंचने में नौ बज जायेंगे। वैसे तो आज ही लेह पहुंचने का इरादा था जोकि खालसी से 100 किलोमीटर आगे है। हमारा सारा कार्यक्रम बिगड रहा है और हम लेट भी हो रहे हैं।

Tuesday, July 28, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 9 (खालसी-हनुपट्टा-शिरशिरला)

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13 जून 2015
नौ बजकर पचास मिनट हो गये थे जब हम खालसी से निकले। इससे पहले आठ बजे के आसपास हम उठ भी गये थे। कल 200 किलोमीटर बाइक चलाई थी, बहुत थकान हो गई थी। पहाडों में संकरे रास्तों पर 200 किलोमीटर भी बहुत ज्यादा हो जाते हैं। आज हमारे सामने दो विकल्प थे- एक, आज ही लेह जायें और चुशुल, हनले का परमिट लेकर खारदुंग-ला पार कर लें। दूसरा, आज फोतोकसर गोम्पा जायें और रात तक लेह पहुंच जायें। कल रविवार है, परमिट नहीं मिलेगा। इसलिये कल खारदुंग-ला पार जाकर नुब्रा घाटी देख लें और मंगलवार को वापसी में चुशुल, हनले का परमिट ले लें। पहले विकल्प में हमें फोतोकसर देखने को नहीं मिल रहा है लेकिन दूसरे में फोतोकसर भी मिल रहा है और बाकी सबकुछ भी। इसलिये दूसरा विकल्प चुना।
आलू के परांठे खाते समय होटल वाले ने पक्का कर दिया कि फोतोकसर तक बाइक चली जायेगी।

Friday, July 24, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा-8 (बटालिक-खालसी)

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12 जून 2015
सिन्धु यहां बहुत गहरी घाटी में बहती है। पहाड बिल्कुल सीधे खडे हैं। ऐसे इलाके दुर्गम होते हैं। लेकिन इसके बावजूद भी यहां कुछ बसावट है, कुछ गांव हैं। इनमें जो लोग निवास करते हैं, वे स्वयं को शुद्ध आर्य बताते हैं। इसीलिये धा और हनुथांग व अन्य गांव प्रसिद्ध हैं। वैसे तो हिमाचल के मलाणा निवासी भी स्वयं को आर्य कहते हैं लेकिन उनमें बहुत सी गन्दगी पनप गई है। यहां वो गन्दगी नहीं है। मेरी इच्छा इसी तरह के किसी गांव में रुकने की थी। लद्दाख के ज्यादातर गांवों में होम-स्टे की सुविधा मिलती है, रुकने की ज्यादा समस्या नहीं आती।
लेकिन हम चलते रहे। शाम का समय था और सूरज की किरणें अब नीचे नहीं आ रही थीं। अन्धेरा होने से पहले ही रुक जाना ठीक था। लेकिन धा गांव कब निकल गया, पता ही नहीं चला। एक निर्जन पुल के पास साइनबोर्ड अवश्य लगा था जिस पर मोटे मोटे अक्षरों में अंग्रेजी में लिखा था- धा। हो सकता है कि गांव सडक से कुछ ऊपर हो। हम इसे छोडकर आगे बढ गये। धा के बाद एक गांव और मिला। यहां एक होम-स्टे का बोर्ड भी लगा था लेकिन हम इसे भी छोडकर आगे चल दिये।

Wednesday, July 22, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 7 (द्रास-कारगिल-बटालिक)

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12 जून 2015, शुक्रवार
सुबह आराम से सोकर उठे। कल जोजी-ला ने थका दिया था। बिजली नहीं थी, इसलिये गर्म पानी नहीं मिला और ठण्डा पानी बेहद ठण्डा था, इसलिये नहाने से बच गये।
आज इस यात्रा का दूसरा ‘ऑफरोड’ करना था। पहला ऑफरोड बटोट में किया था जब मुख्य रास्ते को छोडकर किश्तवाड की तरफ मुड गये थे। द्रास से एक रास्ता सीधे सांकू जाता है। कारगिल से जब पदुम की तरफ चलते हैं तो रास्ते में सांकू आता है। लेकिन एक रास्ता द्रास से भी है। इस रास्ते में अम्बा-ला दर्रा पडता है। योजना थी कि अम्बा-ला पार करके सांकू और फिर कारगिल जायेंगे, उसके बाद जैसा होगा देखा जायेगा।
लेकिन बाइक में पेट्रोल कम था। द्रास में कोई पेट्रोल पम्प नहीं है। अब पेट्रोल पम्प कारगिल में ही मिलेगा यानी साठ किलोमीटर दूर। ये साठ किलोमीटर ढलान है, इसलिये आसानी से बाइक कारगिल पहुंच जायेगी। अगर बाइक में पेट्रोल होता तो हम सांकू ही जाते। यहां से अम्बा-ला की ओर जाती सडक दिख रही थी। ऊपर काफी बर्फ भी थी। पूछताछ की तो पता चला कि अम्बा-ला अभी खुला नहीं है, बर्फ के कारण बन्द है। कम पेट्रोल का जितना दुख हुआ था, सब खत्म हो गया। अब मुख्य रास्ते से ही कारगिल जायेंगे।

Monday, July 20, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 6 (श्रीनगर-सोनमर्ग-जोजीला-द्रास)

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11 जून 2015
सुबह साढे सात बजे उठे। मेरा मोबाइल तो बन्द ही था और कोठारी साहब का पोस्ट-पेड नम्बर हमारे पास नहीं था। पता नहीं वे कहां होंगे? मैं होटल के रिसेप्शन पर गया। उसे अपनी सारी बात बताई। उससे मोबाइल मांगा ताकि अपना सिम उसमें डाल लूं। मुझे उम्मीद थी की कोठारी साहब लगातार फोन कर रहे होंगे। पन्द्रह मिनट भी सिम चालू रहेगा तो फोन आने की बहुत प्रबल सम्भावना थी। लेकिन उसने मना कर दिया। मैंने फिर उसका फोन ही मांगा ताकि नेट चला सकूं और कोठारी साहब को सन्देश भेज सकूं। काफी ना-नुकुर के बाद उसने दो मिनट के लिये अपना मोबाइल मुझे दे दिया।
बस, यही एक गडबड हो गई। होटल वाले का व्यवहार उतना अच्छा नहीं था और मुझे उससे प्रार्थना करनी पड रही थी। यह मेरे स्वभाव के विपरीत था। अब जब उसने अपना मोबाइल मुझे दे दिया तो मैं चाहता था कि जल्द से जल्द अपना काम करके उसे मोबाइल लौटा दूं। इसी जल्दबाजी में मैंने फेसबुक खोला और कोठारी साहब को सन्देश भेजा- ‘सर, नौ साढे नौ बजे डलगेट पर मिलो। आज द्रास रुकेंगे।’ जैसे ही मैसेज गया, मैंने लॉग आउट करके मोबाइल वापस कर दिया। इसी जल्दबाजी में मैं यह देखना भूल गया कि कोठारी साहब मुझे एक मैसेज पहले ही भेज चुके थे- ‘नीरज, कहां हो तुम? तुम्हारा मोबाइल नहीं लग रहा है। मैं घण्टाघर के पास सनातन यात्री निवास में कमरा नम्बर 307 में रुका हुआ हूं।’ अपना सन्देश भेजने के चक्कर में उनका यह सन्देश मैं नहीं देख सका। अन्यथा सीधा सनातन यात्री निवास में ही चला जाता।

Wednesday, July 15, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा-5 (पारना-सिंथन टॉप-श्रीनगर)

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10 जून 2015
सात बजे सोकर उठे। हम चाहते तो बडी आसानी से गर्म पानी उपलब्ध हो जाता लेकिन हमने नहीं चाहा। नहाने से बच गये। ताजा पानी बेहद ठण्डा था।
जहां हमने टैंट लगाया था, वहां बल्ब नहीं जल रहा था। रात पुजारीजी ने बहुत कोशिश कर ली लेकिन सफल नहीं हुए। अब हमने उसे देखा। पाया कि तार बहुत पुराना हो चुका था और एक जगह हमें लगा कि वहां से टूट गया है। वहां एक जोड था और उसे पन्नी से बांधा हुआ था। उसे ठीक करने की जिम्मेदारी मैंने ली। वहीं रखे एक ड्रम पर चढकर तार ठीक किया लेकिन फिर भी बल्ब नहीं जला। बल्ब खराब है- यह सोचकर उसे भी बदला, फिर भी नहीं जला। और गौर की तो पाया कि बल्ब का होल्डर अन्दर से टूटा है। उसे उसी समय बदलना उपयुक्त नहीं लगा और बिजली मरम्मत का काम जैसा था, वैसा ही छोड दिया।

Wednesday, July 8, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा-4 (बटोट-डोडा-किश्तवाड-पारना)

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9 जून 2015
हम बटोट में थे। बटोट से एक रास्ता तो सीधे रामबन, बनिहाल होते हुए श्रीनगर जाता ही है, एक दूसरा रास्ता डोडा, किश्तवाड भी जाता है। किश्तवाड से सिंथन टॉप होते हुए एक सडक श्रीनगर भी गई है। बटोट से मुख्य रास्ते से श्रीनगर डल गेट लगभग 170 किलोमीटर है जबकि किश्तवाड होते हुए यह दूरी 315 किलोमीटर है।
जम्मू क्षेत्र से कश्मीर जाने के लिये तीन रास्ते हैं- पहला तो यही मुख्य रास्ता जम्मू-श्रीनगर हाईवे, दूसरा है मुगल रोड और तीसरा है किश्तवाड-अनन्तनाग मार्ग। शुरू से ही मेरी इच्छा मुख्य राजमार्ग से जाने की नहीं थी। पहले योजना मुगल रोड से जाने की थी लेकिन कल हुए बुद्धि परिवर्तन से मुगल रोड का विकल्प समाप्त हो गया। कल हम बटोट आकर रुक गये। सोचने-विचारने के लिये पूरी रात थी। मुख्य राजमार्ग से जाने का फायदा यह था कि हम आज ही श्रीनगर पहुंच सकते हैं और उससे आगे सोनामार्ग तक भी जा सकते हैं। किश्तवाड वाले रास्ते से आज ही श्रीनगर नहीं पहुंचा जा सकता। अर्णव ने सुझाव दिया था कि बटोट से सुबह चार-पांच बजे निकल पडो ताकि ट्रैफिक बढने से पहले जवाहर सुरंग पार कर सको। अर्णव को भी हमने किश्तवाड के बारे में नहीं बताया था।

Monday, July 6, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 3 (जम्मू भ्रमण और प्रस्थान)

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8 जून 2015
आज का दिन बहुत खराब बीता और बहुत अच्छा भी। पहले अच्छाई। कोठारी साहब की बाइक स्टार्ट होने में परेशानी कर रही थी और कुछ इंडीकेटर भी ठीक काम नहीं कर रहे थे। मुझे लगा बैटरी में समस्या है। इसे ठीक कराना जरूरी था क्योंकि आगे ऊंचाईयों पर ठण्ड में यह काम करना बन्द भी कर सकती है।
चलिये, आगे की कहानी शुरू से शुरू करते हैं।
छह बजे मेरी आंख खुल गई थी हालांकि अलार्म 7 बजे का लगाया था। अभी तक निशा भी सो रही थी और कोठारी साहब भी। यह बडी अच्छी बात है कि कोठारी जी भी पक्के सोतडू हैं। उनके ऐसा होने से इतना तो पक्का हो गया कि इस यात्रा में मुझे कभी कोई नहीं उठायेगा। निशा भी इसी श्रेणी की जीव है। अगर उसे न उठाया जाये तो वह दस बजे तक भी नहीं उठने वाली।

Thursday, July 2, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 2 (दिल्ली से जम्मू)

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यात्रा आरम्भ करने से पहले एक और बात कर लेते हैं। परभणी, महाराष्ट्र के रहने वाले निरंजन साहब पिछले दो सालों से साइकिल से लद्दाख जाने की तैयारियां कर रहे थे। लगातार मेरे सम्पर्क में रहते थे। उन्होंने खूब शारीरिक तैयारियां की। पश्चिमी घाट की पहाडियों पर फुर्र से कई-कई किलोमीटर साइकिल चढा देते थे। पिछले साल तो वे नहीं जा सके लेकिन इस बार निकल पडे। ट्रेन, बस और सूमो में यात्रा करते-करते श्रीनगर पहुंचे और अगले ही दिन कारगिल पहुंच गये। कहा कि कारगिल से साइकिल यात्रा शुरू करेंगे।

खैर, निरंजन साहब आराम से तीन दिनों में लेह पहुंच गये। यह जून का पहला सप्ताह था। रोहतांग तभी खुला ही था, तंगलंग-ला और बाकी दर्रे तो खुले ही रहते हैं। बारालाचा-ला बन्द था। लिहाजा लेह-मनाली सडक भी बन्द थी। पन्द्रह जून के आसपास खुलने की सम्भावना थी। उनका मुम्बई वापसी का आरक्षण अम्बाला छावनी से 19 जून की शाम को था। इसका अर्थ था कि उनके पास 18 जून की शाम तक मनाली पहुंचने का समय था। मैंने मनाली से लेह साइकिल यात्रा चौदह दिनों में पूरी की थी। मुझे पहाडों पर साइकिल चलाने का अभ्यास नहीं था। फिर मनाली लगभग 2000 मीटर पर है, लेह लगभग 3500 मीटर पर है। मैं 2000 से 3500 मीटर पर गया था, जबकि निरंजन साहब को 3500 मीटर से 2000 मीटर पर आना था, उन्हें पहाडों पर साइकिल चलाने का अनुभव भी था। इसलिये उन्हें यह यात्रा करने में एक सप्ताह ही लगता या फिर ज्यादा से ज्यादा दस दिन। उनके पास अभी भी पन्द्रह दिन थे यानी कम से कम पांच दिन ज्यादा।

Monday, June 29, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा-1 (तैयारी)

बुलेट निःसन्देह शानदार बाइक है। जहां दूसरी बाइक के पूरे जोर हो जाते हैं, वहां बुलेट भड-भड-भड-भड करती हुई निकल जाती है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि लद्दाख जाने के लिये या लम्बी दूरी की यात्राओं के लिये बुलेट ही उत्तम है। बुलेट न हो तो हम यात्राएं ही नहीं करेंगे।
बाइक अच्छी हालत में होनी चाहिये। बुलेट की भी अच्छी हालत नहीं होगी तो वह आपको ऐसी जगह ले जाकर धोखा देगी, जहां आपके पास सिर पकडकर बैठने के अलावा कोई और चारा नहीं रहेगा। अच्छी हालत वाली कोई भी बाइक आपको रोहतांग भी पार करायेगी, जोजी-ला भी पार करायेगी और खारदुंग-ला, चांग-ला भी।
वास्तव में यह मशीन ही है जिसके भरोसे आप लद्दाख जाते हो। तो कम से कम अपनी मशीन की, इसके पुर्जों की थोडी सी जानकारी तो होनी ही चाहिये। सबसे पहले बात करते हैं टायर की। टायर बाइक का वो हिस्सा है जिस पर सबसे ज्यादा दबाव पडता है और जो सबसे ज्यादा नाजुक भी होता है। इसका कोई विकल्प भी नहीं है और आपको इसे हर हाल में पूरी तरह फिट रखना पडेगा।

Friday, June 12, 2015

करसोग-दारनघाटी यात्रा का कुल खर्च

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दिनांक: 4 मई 2015, सोमवार
स्थानदूरीसमयखर्च
शास्त्री पार्क, दिल्ली006:05पेट्रोल- 700 (11 लीटर)
पानीपत पार10407:45-08:15परांठे- 140
पीपली16909:20-09:25साइकिल यात्रियों को- 50
अम्बाला छावनी21110:10-10:15
शम्भू बॉर्डर22510:30-10:35
खरड26611:20-11:40मौसमी जूस- 60

Wednesday, June 10, 2015

कुफरी-चायल-कालका-दिल्ली

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9 मई 2015
डेढ बजे हम कुफरी पहुंचे। हे भगवान! इतनी भीड... इतनी भीड कि निशा ने कहा- सभी लोग कुफरी ही आ गये, शिमला पास ही है, कोई शिमला क्यों नहीं जा रहा? और बदबू मची पडी पूरे कुफरी की सडकों पर गधों और घोडों की लीद की। गधे वालों में मारामारी हो रही कि कौन किसे अपने यहां बैठाये और अच्छे पढे लिखे भी सोच-विचार कर रहे कि इस गधे पर बैठे कि उस गधे पर। यह चार रुपये ले रहा है और वो तीन रुपये। जरूर इस चार रुपये वाले गधे में कुछ खास बात है, तभी तो महंगा है। (नोट: गधे को खच्चर या घोडा पढें।)
थोडी देर रुकने का इरादा था, कुफरी देखने का इरादा था लेकिन मुझसे पहले ही पीछे बैठी ‘प्रधानमन्त्री’ ने जब कहा कि कुफरी देखने की चीज नहीं है, आगे चलता चल तो मैं भी आगे चलता गया। अच्छा हुआ कि कुफरी से चायल वाली सडक पर आखिर में कुछ दुकानें थीं और उनमें से एक में हमारी बहुप्रतीक्षित कढी चावल भी थे तो हम रुक गये। बाइक किनारे खडी की नहीं कि तीस रुपये की पर्ची कट गई पार्किंग की। मुझसे ज्यादा निशा हैरान कि यह क्यों हुआ? मैंने कहा- यह टूरिस्ट-फ्रेण्डली स्थान है। ऐसी जगहों पर ऐसा ही होता है।

Monday, June 8, 2015

हाटू चोटी, नारकण्डा

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9 मई 2015
सुबह सात बजे सोकर उठे। नहा-धोकर जल्दी ही चलने को तैयार हो गये। जसवाल जी आ गये और साथ बैठकर चाय पी व आलू के परांठे खाये। परांठे बडे स्वादिष्ट थे। आलू के परांठे तो वैसे भी स्वादिष्ट ही होते हैं। यहां से जसवाल जी ने ऊपर मेन रोड तक पहुंचने का शॉर्ट कट बता दिया। यह शॉर्ट कट बडी ही तेज चढाई वाला है। नौ बजे हम नारकण्डा थे।
देखा जाये तो अब हम दिल्ली के लिये वापसी कर चुके थे। लेकिन चूंकि आज हमें एक रिश्तेदारी में कालका रुकना था, इसलिये कोई जल्दी नहीं थी। नारकण्डा से हाटू पीक की ओर मुड लिये। यहां से इसकी दूरी आठ किलोमीटर है। दो किलोमीटर चलने पर इस नारकण्डा-थानाधार रोड से हाटू रोड अलग होती है।