Friday, March 6, 2015

लखपत में सूर्यास्त और गुरुद्वारा

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17 जनवरी 2015
साढे तीन बजे हम थान मठ से निकल गये। अब जाना था हमें लखपत। यह भारत के सबसे पश्चिमी कुछ गांवों में से एक है और दुनिया का सर्वप्रथम गुरुद्वारा भी यहीं है। पश्चिमी होने के कारण यहां का सूर्यास्त देखना बनता था। इसलिये हमें छह बजे से पहले लखपत पहुंच जाना था।
शीघ्र ही हम भुज-लखपत मुख्य सडक पर थे। खाली चौडी सडक पर जब हम 70 की रफ्तार से बढे जा रहे थे, तो हमें एक ऐसी चीज दिखी कि आपातकालीन ब्रेक लगाने पडे। यह था- कर्करेखा यहां से गुजरती है। मैंने पहले भी कहा था कि अपनी इस यात्रा में मुझे कई बार कर्करेखा पार करनी पडी। हिम्मतनगर-अहमदाबाद के बीच, भुज-खावडा के बीच, खावडा-नखत्राणा के बीच, नखत्राणा-लखपत के बीच, लखपत-नलिया के बीच और भचाऊ-रापर के बीच। लेकिन सूचना-पट्ट सिर्फ यहीं पर दिखा। सडक पर सफेद रेखा भी खिंची थी कि यह है कर्करेखा।

Wednesday, March 4, 2015

थान मठ, कच्छ

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फॉसिल पार्क से डेढ-दो किलोमीटर आगे थान मठ है। एक धर्मनाथ नाम के योगी थे जिन्होंने बारह वर्ष तक सिर के बल खडे होकर तपस्या की थी। कहते हैं कि उनकी तपस्या से भगवान प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा। उन्होंने वर तो मांगा नहीं, बल्कि अ-वर मांग लिया- मैं सीधा होकर जहां भी देखूं, वो स्थान बंजर हो जाये। भगवान ने कहा तथास्तु और कच्छ का एक बडा इलाका बंजर हो गया।
यह मठ एक पहाडी के नीचे बना हुआ है। इस पहाडी का नाम है धीणोधार पहाडी। यह एक ज्वालामुखी था जो अब सुप्त हो चुका है। सैटेलाइट से देखने पर इसकी चोटी पर ज्वालामुखी जैसा मुख भी दिखता है हालांकि लाखों साल बीत जाने के कारण काफी टूट-फूट हो चुकी है। ऊपर पहाडी पर भी एक मन्दिर बना है जहां केवल पैदल ही जाया जा सकता है। एक रास्ता तो यहां मठ से ही है जो लम्बा है। इसके अलावा दूसरा रास्ता पहाडी के दूसरी तरफ से है जो छोटा और सुविधाजनक है। समयाभाव के कारण हम वहां नहीं जा पाये। कच्छ आने का दूसरा बहाना मिल गया।

Monday, March 2, 2015

डायरी के पन्ने- 30 (विवाह स्पेशल)

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।

1 फरवरी: इस बार पहले ही सोच रखा था कि डायरी के पन्ने दिनांक-वार लिखने हैं। इसका कारण था कि पिछले दिनों मैं अपनी पिछली डायरियां पढ रहा था। अच्छा लग रहा था जब मैं वे पुराने दिनांक-वार पन्ने पढने लगा।
तो आज सुबह नाइट ड्यूटी करके आया। नींद ऐसी आ रही थी कि बिना कुछ खाये-पीये सो गया। मैं अक्सर नाइट ड्यूटी से आकर बिना कुछ खाये-पीये सो जाता हूं, ज्यादातर तो चाय पीकर सोता हूं।। खाली पेट मुझे बहुत अच्छी नींद आती है। शाम चार बजे उठा। पिताजी उस समय सो रहे थे, धीरज लैपटॉप में करंट अफेयर्स को अपनी कापी में नोट कर रहा था। तभी बढई आ गया। अलमारी में कुछ समस्या थी और कुछ खिडकियों की जाली गलकर टूटने लगी थी। मच्छर सीजन दस्तक दे रहा है, खिडकियों पर जाली ठीकठाक रहे तो अच्छा। बढई के आने पर खटपट सुनकर पिताजी भी उठ गये।
सात बजे बढई वापस चला गया। थोडा सा काम और बचा है, उसे कल निपटायेगा। इसके बाद धीरज बाजार गया और बाकी सामान के साथ कुछ जलेबियां भी ले आया। मैंने धीरज से कहा कि दूध के साथ जलेबी खायेंगे। पिताजी से कहा तो उन्होंने मना कर दिया। यह मना करना मुझे बहुत खराब लगा। बेड पर बैठे थे, नीचे आंखें गडाये हुए गर्दन हिला दी; बस।

Friday, February 27, 2015

फॉसिल पार्क, कच्छ

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17 जनवरी 2015
अब हमारा लक्ष्य था लखपत। खावडा से लखपत जाने के लिये भुज जाने की आवश्यकता नहीं है। उससे पहले ही एक ग्रामीण रास्ता सीधा नखत्राणा जाता है। भीरंडीयाला से 27 किलोमीटर भुज की तरफ चलने पर यह रास्ता दाहिने मुडता है। हम इसी पर हो लिये। इस रास्ते पर निरोना, बीबर आदि गांव आते हैं। देवीसर से कुछ पहले एक रास्ता दाहिने जाता है। यह आगे फॉसिल पार्क और थान मोनेस्ट्री चला जाता है। मेरी इच्छा इन दोनों स्थानों को देखने की थी।
आपको फॉसिल पार्क का पता भी नहीं चलेगा अगर आप सावधान न हुए। मैंने पहले ही गूगल मैप का अध्ययन कर रखा था इसलिये मालूम था कि उस मोड के पास यह पार्क है। जैसे ही वह मोड आया, हमारी रफ्तार कम हो गई। झाडियों में इसका एक सूचना-पट्ट लगा था, हमने तुरन्त बाइक उधर ही मोड दी।

Wednesday, February 25, 2015

इण्डिया ब्रिज, कच्छ

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इण्डियाब्रिज काला डोंगर से लगभग 20 किलोमीटर दूर है। उनकी बुलेट में पेट्रोल कम था। पेट्रोल पम्प खावडा में था जोकि इण्डियाब्रिज के विपरीत दिशा में है। तय हुआ कि अगर रास्ते में पेट्रोल समाप्त हो गया तो वे मेरी बाइक से निकालेंगे। मैं राजी था। हालांकि इसकी आवश्यकता नहीं पडी।
आप कच्छ का नक्शा देखेंगे तो इसकी पूरी उत्तरी सीमा पाकिस्तान से मिलती है। लेकिन सीमा के इस तरफ एक बहुत बडा प्राकृतिक अवरोध भी है। यह है कच्छ का विशाल रन जहां साल में ज्यादातर समय पानी भरा रहता है या दलदल रहता है। इसी में एक उपयुक्त स्थान पर सडक भी निकाली गई है जो बिल्कुल सीमा तक जाती है। यह वही सडक है। यह भुज से वीघाकोट को जोडती है। वीघाकोट सीमावर्ती चौकी है। लेकिन आम नागरिकों के लिये सीमा तक जाना सरल नहीं होता। उससे कुछ ही पहले तक बेरोकटोक जाया जा सकता है, फिर आगे जाने के लिये परमिट लेना होता है।

Monday, February 23, 2015

काला डोंगर- कच्छ का उच्चतम स्थान

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16 जनवरी 2015
खावडा से काला डूंगर की दूरी करीब बीस किलोमीटर है। आठ किलोमीटर आगे एक तिराहा है जहां से एक सडक तो सीधी चली जाती है और एक दाहिने मुड जाती है। यही दाहिने वाली काला डूंगर जाती है। सीधी सडक इण्डिया ब्रिज होते हुए विघाकोट जाती है। विघाकोट अर्थात भारत-पाक सीमा। विघाकोट जाने के लिये भुज से आज्ञापत्र बनवाना होता है। उसकी चर्चा अभी बाद में करेंगे जब इण्डिया ब्रिज चलेंगे। अभी फिलहाल काला डूंगर चलते हैं। चलिये, दाहिनी तरफ मुड जाते हैं।
एक गांव आता है और इसे पार करते ही सडक पतली सी हो जाती है। चूंकि काला डूंगर कच्छ की सबसे ऊंची चोटी है तो यहां जाने के लिये कुछ चढाई भी करनी पडेगी। शीघ्र ही चढाई भी शुरू हो जाती है लेकिन यह छोटी सी चढाई काफी ‘ट्रिकी’ है। फिर साढे चार सौ मीटर की ऊंचाई पर जाकर दत्तात्रेय मन्दिर के पास चढाई समाप्त हो जाती है। पौने छह बज चुके थे। सूर्यास्त में अभी देर थी। उधर ‘देश’ में सूर्यास्त हो चुका होगा, यहां यह काम देर से होता है। काफी पर्यटक कैमरे लिये सूर्यास्त को कैद करने के लिये तैयार खडे थे।

Friday, February 20, 2015

सफेद रन

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16 जनवरी 2015
बारह बज चुके थे और मैं भुज में था। अभी तक कुछ खाया भी नहीं था। सुबह पच्चीस-तीस रुपये की पूरी-सब्जी खाई थीं एक ठेले पर। ठेला समझकर यह मत सोचना कि मैं गन्दगी में जा घुसा। गन्दगी वाला ठेला होता तो दस रुपये में ही काम चल जाता। वह लडका पार्ट टाइम के तौर पर सुबह नाश्ते के लिये पूरी-सब्जी बेचता है, बाद में कुछ और काम करता है। सफाई अच्छी थी। दो तरह की आलू की सब्जियां थीं- सूखी और तरीदार। दोनों में फर्क बस इतना ही था कि एक में तेल कुछ कम था, दूसरी में तेल ही तेल था। गुजराती सब्जियों में लगता है पानी की बजाय तेल डाला जाता है। इतना तेल हो जाता है कि अगर आप एक कटोरी आलू की तरीदार सब्जी में से आलू खा जायें तो आधा कटोरी तेल बचा रहेगा। उधर हम दिल्ली वालों के लिये तेल का बडा परहेज होता है।
हां, तो मैं कह रहा था कि बारह बज गये थे। आज मुझे काला डूंगर जाना था जो यहां से करीब सौ किलोमीटर दूर है। अर्थात ढाई तीन घण्टे लगेंगे। रास्ते में कहीं रुककर खाना भी खाना था तो चार घण्टे लगेंगे। पांच बजे के बाद दिन छिपना शुरू हो जायेगा। हालांकि यह भारत का पश्चिमतम इलाका है, दिन यहां देर से छिपता है।

Wednesday, February 18, 2015

भुज के दर्शनीय स्थल

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16 जनवरी 2015
कल जब सोया था तो योजना थी कि आज पहले माण्डवी जाऊंगा और वहां से फिर लखपत के लिये निकल जाऊंगा। लेकिन इसके लिये सुबह जल्दी उठना पडता और यही अपनी कमी है। साढे आठ बजे उठा। सूरज सिर पर चढ आया था। माण्डवी के लिये काफी विलम्ब हो चुका था। फिर आज ही लखपत जाना सम्भव नहीं था। जाता भी तो भागमभाग करनी पडती और अन्धेरे में भी बाइक चलानी पडती। रास्ता भी पता नहीं कैसा हो। इसलिये अब माण्डवी जाने का विचार छोड दिया। इसके बजाय अब काला डूंगर जाऊंगा।
काला डूंगर जाऊंगा तो वापसी में भुज नहीं आऊंगा। पहले मुझे क्लोकवाइज कच्छ देखना था, अब एण्टी-क्लोकवाइज देखूंगा। रूट वही रहेगा। वापस भुज नहीं आऊंगा। इसलिये भुज शहर में जो दर्शनीय स्थल हैं, उन्हें अभी ही देख लेता हूं। कमरे का ताला लगाया, बाइक यहीं छोडकर पैदल ही निकल पडा।

Monday, February 16, 2015

फोटोग्राफी चर्चा- 2

बडी बेइज्जती हो रही है फोटोग्राफी चर्चा करने में। कारण यही है कि मैं भद्दे तरीके से चर्चा करता हूं। बात तो ठीक है लेकिन करूं भी क्या? हमेशा कहता आया हूं कि आप जो भी फोटो भेजते हो, उसके बारे में चार लाइनें भी लिखकर भेज दिया करो। बहुत सहायता मिलती है इन चार लाइनों से। अन्यथा आपके फोटो पर मैं अपना अन्दाजा ही लगाता रहूंगा और आपको लगेगा कि बेइज्जती हो रही है।
खैर, इस बार एक फोटो आया है चर्चा के लिये। इसे भेजा है सुधाकर मिश्रा जी ने। साथ में लिखा है: “ये चित्र मैंने नैनीताल में डोरोथी सीट के रास्ते से कहीं लिया था। पेडों की लाइन, उसके ऊपर छोटे पहाड और फिर बर्फीली चोटियां मुझे अच्छी लगी थीं। आप अपनी राय दीजिये।”

Friday, February 13, 2015

कच्छ की ओर- अहमदाबाद से भुज

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15 जनवरी 2015
सुबह आठ बजे उठा। रात अच्छी नींद आई थी, इसलिये कल की सारी थकान समाप्त हो गई थी। अभी भी भुज यहां से लगभग साढे तीन सौ किलोमीटर दूर है, इसलिये आज भी काफी बाइक चलानी पडेगी। रास्ते में मालिया में उमेश जोशी मिलेंगे। फिर हम दो हो जायेंगे, मन लगा रहेगा।
लेकिन जोशी जी को फोन किया तो कहानी कुछ और निकली। पिछले दिनों वे जामनगर के पास समुद्र में कोरल देखने गये थे। वहां उन्हें काफी चोट लग गई और अभी भी वे बिस्तर पर ही थे, चल-फिर नहीं सकते थे। उन्होंने बडा अफसोस जताया कि साथ नहीं चल सकेंगे। फिर कहने लगे कि जामनगर आ जाओ। लेकिन मेरे लिये जानमगर जाना सम्भव नहीं था। अगली बार कभी सौराष्ट्र घूमने का मौका मिलेगा, तो जामनगर जाऊंगा।
अब पक्का हो गया कि मुझे कच्छ यात्रा अकेले ही करनी पडेगी। लेकिन जोशी जी ने भचाऊ के रहने वाले अपने एक मित्र के बारे में बता दिया। वहां बात की तो लंच करना तय हो गया।

Wednesday, February 11, 2015

कच्छ की ओर- जयपुर से अहमदाबाद

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13 जनवरी 2015
सुबह आठ बजे विधान के यहां से निकल पडा। उदयपुर यहां से चार साढे चार सौ किलोमीटर दूर है। आज का लक्ष्य उदयपुर पहुंचने का ही रखा। असल में मुझे अहमदाबाद के रास्ते कच्छ जाना था। इसका एक कारण था कि मौका मिलते ही कहीं छोटा रन भी देख लेना चाहता था। मलिया में उमेश जोशी मिलने वाले थे। और अहमदाबाद के रहने वाले अमित गौडा से भी मिलने का वादा कर रखा था।
जयपुर से अहमदाबाद जाने के मुख्य तीन रास्ते हैं। पहला, जयपुर से किशनगढ बाईपास, चित्तौडगढ, उदयपुर होते हुए; दूसरा, अजमेर, कांकरोली, उदयपुर होते हुए और तीसरा, अजमेर, ब्यावर, पाली, सिरोही, आबू रोड होते हुए। मैंने चलने से पहले मित्रों से पूछा भी था कि इनमें से कौन सा रास्ता सर्वोत्तम है। पता चला कि कांकरोली वाले रास्ते को चार लेन का बनाया जा रहा है। यानी वहां काम चल रहा है। पाली, आबू रोड वाले पर भी बताया गया कि काम चल रहा है। इसलिये चित्तौडगढ वाला रास्ता निर्विरोध चुन लिया गया। वैसे वापस मैं पाली के रास्ते आया हूं। वो रास्ता बर और ब्यावर के बीच में थोडा खराब है, बाकी एक नम्बर का है। पहले पता होता तो मैं उसी रास्ते जाता।

Monday, February 9, 2015

कच्छ नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा

कच्छ नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा- यह तुकबन्दी मुझे बडा परेशान कर रही थी कई दिनों से। पिछले साल एक बार साइकिल से जाने की भी योजना बनाई थी लेकिन वह ठण्डे बस्ते में चली गई। कच्छ में दो मुख्य रेल लाइनें हैं- अहमदाबाद-भुज और पालनपुर-समखियाली; दोनों पर कभी यात्रा नहीं की गई। बस फोटो देख-देखकर ही कच्छ दर्शन किया करता था।
लेकिन ऐसा कब तक होता? कभी न कभी तो कच्छ जाना ही था। मोटरसाइकिल ली, गढवाल की एक छोटी सी यात्रा भी कर ली; फिर सर्दी का मौसम; कच्छ के लिये सर्वोत्तम। इस बार चूक जाता तो फिर एक साल के लिये बात आई-गई हो जाती।
पिछले दिनों डिस्कवरी चैनल पर कच्छ से सम्बन्धित एक कार्यक्रम आया- यह कार्यक्रम कई दिनों तक आता रहा। मैंने कई बार इसे देखा। इसे देख-देखकर पक्का होता चला गया कि कच्छ तो जाना ही है। लेकिन समस्या थी दिल्ली से भुज ट्रेन से जाऊं या बाइक से। पहले तो तय किया कि जामनगर तक ट्रेन से जाऊंगा, बाइक या तो ट्रेन में ही रख लूंगा या फिर उमेश जोशी से ले लूंगा। जोशी जी ने भी साथ चलने की स्वीकृति दे दी।

Friday, February 6, 2015

मेरी कुछ प्रमुख ऊंचाईयां

बहुत दिनों से इच्छा थी एक लिस्ट बनाने की कि मैं हिमालय में कितनी ऊंचाई तक कितनी बार गया हूं। वैसे तो इस लिस्ट को जितना चाहे उतना बढा सकते हैं, एक एक गांव को एक एक स्थान को इसमें जोडा जा सकता है लेकिन मैंने इसमें केवल चुनिन्दा स्थान ही जोडे हैं जैसे कि दर्रे, झील, मन्दिर और कुछ अन्य प्रमुख स्थान।

Wednesday, February 4, 2015

चकराता से दिल्ली मोटरसाइकिल यात्रा

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27 नवम्बर 2014
छह बजे तक चकराता से निकल लेना था लेकिन चारों सोते रह गये और सात बजे उठे। अत्यधिक ठण्डे पानी में हाथ भिगोकर मुंह पर लगाया- मुंह धुल गया। सवा सात बजे तक चकराता से निकल पडे। होटल वाले ने हमें सचेत किया कि रास्ते में ब्लैक आइस मिलेगी, सावधानी से चलना। ब्लैक आइस से मुझे बहुत डर लगता है। यह दिखती नहीं है और मोटरसाइकिल इस पर फिसलकर गिर जाती है। खैर आधे-पौने घण्टे की बात है, सहिया तक ऊंचाई काफी कम हो जायेगी, ब्लैक आइस का खतरा भी टल जायेगा।
लेकिन हर जगह यह नहीं मिलती। यह ज्यादातर ऐसे मोडों पर होती है जहां अन्धेरा और लगभग पूरे दिन छाया रहती हो। ऐसी कई जगहों पर प्रशासन ने चेतावनी बोर्ड भी लगा रखे हैं कि मोड पर बर्फ जमने का खतरा है, सावधानी से चलें। खैर, सावधानी से चलते रहे और कोई नुकसान नहीं हुआ।

Monday, February 2, 2015

डायरी के पन्ने-29

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।

1. फिल्म ‘पीके’ देखी। फिल्म तो अच्छी है, अच्छा सन्देश देती है लेकिन कुछ चीजें हैं जो अवश्य विवादास्पद हैं। मुझे जो सबसे ज्यादा आहत किया, वो दृश्य था जब पीके ‘शिवजी’ को बाथरूम में बन्द कर देता है और इसके बाद शिवजी जान बचाकर भागते हैं। दूसरी बात कि फिल्म कहीं न कहीं इस्लाम को बढावा देती महसूस हुई। मसलन बार-बार पीके का कहना कि शरीर पर धर्म का ठप्पा। इससे कहीं न कहीं यह सन्देश जाता है कि जो धार्मिक हैं, उनके शरीर पर ठप्पा होना चाहिये, अन्यथा वे धार्मिक नहीं। गौरतलब है कि मुसलमानों के शरीर पर धर्म का ठप्पा लगा होता है।
बाकी तो एक शानदार फिल्म है ही। दो भगवान होते हैं- एक, जिसने हमें बनाया और दूसरा, जिसे हमने बनाया। इसी आधार पर जो बुराईयां समाज में व्याप्त हैं, वही सब इस फिल्म में दिखाया गया है।

Friday, January 30, 2015

लाखामण्डल से चकराता- एक खतरनाक सफर

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26 नवम्बर 2014
हमारा दिमाग खराब था कि हमने लाखामण्डल से शाम सवा चार बजे चकराता जाने का फैसला किया। दूरी लगभग 70 किलोमीटर है, सडक सिंगल लेन ही है। पूरा रास्ता पहाडी। इतनी जानकारी हमें थी। जैसे हम कल से पहाडों पर चलते आ रहे थे, ऐसे ही चलते रहें तो तीन घण्टे लगने ही थे जबकि एक घण्टे बाद ही दिन छिपना शुरू हो जायेगा। उसके बाद अन्धेरा। और चकराता भी हम किसलिये जाना चाहते थे? सिर्फ रात रुकने के लिये। हमें कल वहां से सुबह ही दिल्ली के लिये निकल पडना है। यह भी जानते थे कि चकराता में होटल यहां लाखामण्डल के मुकाबले महंगे मिलेंगे, फिर भी बस बिना सोचे समझे निकल पडे।
लाखामण्डल में ही हमें बता दिया गया था कि लाखामण्डल गांव से निकलते ही एक तिराहा आयेगा। आप ऊपर वाली सडक से जाना। हालांकि दोनों ही सडकें आगे गोराघाटी में फिर से मिल जाती हैं लेकिन नीचे वाली सडक खराब है, ऊपर वाली ठीक है। यह हमें बताया गया। यह भी बताया गया कि गोराघाटी के बाद सडक अच्छी बनी है।

Wednesday, January 28, 2015

लाखामण्डल

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आठ बजे सोकर उठे। आज मेरी छुट्टी का आखिरी दिन था। लाखामण्डल यहां से लगभग सवा सौ किलोमीटर दूर है और हम लाखामण्डल जाकर रात होने तक दिल्ली किसी भी हालत में नहीं पहुंच सकते थे। इसलिये लाखामण्डल जाना रद्द कर दिया था। आज के लिये तय था कि मसूरी से देहरादून उतर जायेंगे और फिर आगे अपने घर चले जायेंगे।
लेकिन अब जब चलने की तैयारी करने लगे तो अरुण ने कहा कि एक दिन की ही बात है, लाखामण्डल चलते हैं। मेरे लिये एक दिन की छुट्टी बढवाना कोई मुश्किल नहीं था। सबसे ज्यादा मुश्किल आई सचिन को। उसने पहले ही कह रखा था कि आज शाम तक हर हाल में उसे अपने घर जाना है। हमने उसे अपना निर्णय बताया। उसने पहले तो स्पष्ट मना कर दिया। लेकिन कुछ हमारी काउंसलिंग के बाद वह इस शर्त पर चलने को राजी हो गया कि कल दोपहर तक उसे घर पहुंचना ही पहुंचना है। हम उसकी बात पर राजी हो गये हालांकि जानते थे कि उसे कल भी घर पहुंचने में शाम हो जायेगी।

Monday, January 26, 2015

मोटरसाइकिल यात्रा- ऋषिकेश, नीलकण्ठ और कद्दूखाल

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सवा ग्यारह बजे हम बरनावा से निकल गये। अब हमें सीधे ऋषिकेश जाना था। यहां से सरधना लगभग 20 किलोमीटर है। बरनावा की सीमा से निकलते ही हिण्डन नदी पार की और हम बागपत जिले से मेरठ जिले में प्रवेश कर गये। सडक की जितनी तारीख की जाये, कम है। यूपी में ऐसी सडकें मिलती नहीं हैं। भूनी चौराहा पार करते करते सरधना पांच किलोमीटर रह जाता है। भूनी में मेरठ-शामली सडक इस बडौत-सरधना सडक को काटती है। भूनी से मेरा गांव दबथुवा लगभग 8 किलोमीटर मेरठ रोड पर है।
सरधना में बेतरतीब भीड ने हमारा स्वागत किया। सरधना से भी हमारा गांव आठ किलोमीटर दूर ही है। यहां एक बडा प्रसिद्ध चर्च है। सरधना से इतना नजदीक होने के बावजूद भी मैं आज तक यह चर्च नहीं देख सका। इस बार भी नहीं देखा।
सचिन को गूगल मैप के अनुसार चलने का शौक है। मैं चाहता था कि सरधना से दौराला जाया जाये और फिर नेशनल हाईवे से होते हुए मुजफ्फरनगर और रुडकी होते हुए हरिद्वार। लेकिन सचिन ने कहा कि गंगनहर के रास्ते चलेंगे। मैं इस रास्ते से नहीं जाना चाहता था क्योंकि यह सिंगल रोड है। इस पर अब काफी ट्रैफिक भी रहने लगा है और गन्ने से लदी बुग्गियां व ट्रैक्टर ऐसे रास्तों पर बडा परेशान करते हैं। दौराला के रास्ते आठ-दस किलोमीटर का चक्कर जरूर पडेगा लेकिन ऐसी कोई समस्या नहीं आयेगी। लेकिन सचिन की जिद व अरुण की स्वीकृति के कारण गंगनहर के रास्ते चलने की मंजूरी देनी पडी।

Friday, January 23, 2015

लाक्षागृह, बरनावा

नई बाइक ली और अगले ही दिन लाइसेंस के लिये पहुंच गया लोनी रोड। वहां जो लम्बी लाइन देखी, तत्काल वापस भाग आया। फिर अगले दिन गया कडकडडूमा के पास सूरजमल विहार। यहां बिल्कुल लाइन नहीं थी। मोटरसाइकिल के लाइसेंस की फीस 30 रुपये जमा की और उसी दिन लर्निंग लाइसेंस लेकर लौट आया। अब इन्तजार था कि कब एक महीना पूरा हो और कब मैं परमानेंट लाइसेंस लेने जाऊं। लेकिन इस दौरान मुझे बाइक चलानी भी सीखनी थी। अब से पहले मैंने कभी भी बाइक नहीं चलाई थी। एक महीने बाद जब मैं ड्राइविंग टेस्ट देने पहुंचा तो घबराहट होनी स्वाभाविक थी। मेरे देखते ही देखते कई बाइक वाले असफल भी घोषित हुए।
आखिरकार मैं सफल हुआ। शनिवार 22 नवम्बर को परमानेंट लाइसेंस घर आ गया। अब निश्चित हो गया कि सोमवार को यात्रा पर निकलूंगा। पहले ही बता चुका हूं कि मेरी पहली पैदल हिमालय यात्रा नीलकण्ठ महादेव की थी, पहली साइकिल यात्रा भी नीलकण्ठ की ही थी तो तय कर लिया कि पहली बाइक यात्रा भी नीलकण्ठ की ही होगी। इसे और ज्यादा आकर्षक बनाने के लिये नाम दिया- लाक्षागृह से लाखामण्डल। लाक्षागृह बडौत के पास है और लाखामण्डल चकराता के पास। दोनों की कहानी एक ही है कि कौरवों ने लाख का एक महल बनवाया था और उसमें पाण्डवों को रहने के लिये राजी कर लिया। जब पाण्डव रहने लगे तो कौरवों ने धोखे से उसमें आग लगा दी। पाण्डव किसी तरह सुरंगों के रास्ते बचकर निकले। यही सब देखने के लिये लाक्षागृह और लाखामण्डल जाना था।

Wednesday, January 21, 2015

जांस्कर यात्रा का कुल खर्च

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यह एक बेहद खर्चीली यात्रा रही। इसका खर्च विधान के माध्यम से काफी चर्चा में रहा। मैं बताता हूं हमारा कहां-कहां कितना खर्च हुआ।
दिल्ली से श्रीनगर फ्लाइट खर्च= 4200 रुपये
(विधान और प्रकाश जी दूसरी फ्लाइट से गये थे। उनकी फ्लाइट सस्ती थी। उनके 3000-3000 रुपये के आसपास दिल्ली से श्रीनगर का खर्च आया।)
घर से निकला, शास्त्री पार्क से नई दिल्ली तक मेट्रो से गया, जेब से कुछ नहीं लगा, अपना स्टाफ कार्ड काम करता है। इसके बाद एयरपोर्ट लाइन पर अपना यह कार्ड काम नहीं करता, इसलिये टिकट लेना पडा।

Monday, January 19, 2015

फोटोग्राफी चर्चा- 1

फोटोग्राफी पर चर्चा के लिये मित्रों से फोटो आमन्त्रित किये थे। काफी संख्या में फोटो आये। कुछ फोटो की पिछली डायरियों में चर्चा की थी, बाकी की इस बार कर देते हैं। 
बहुत मुश्कित है किसी के काम में कमियां निकालना। चर्चा के बहाने असल में कमियां ही निकाली जाती हैं। कमी न भी हो, तब भी... जबरदस्ती। असल में जब कोई भी मित्र अपने सैंकडों हजारों फोटो में से दो-चार फोटो भेजेगा तो निश्चित ही वह अपने सर्वोत्तम फोटो ही भेजेगा। इस बात में कोई शक नहीं कि सभी फोटो बेहद शानदार हैं। लेकिन फोटो आमन्त्रित करने का मकसद उन फोटो की वाहवाही करना नहीं है। इस काम का मकसद ही है कमियां निकालना तथा और ज्यादा प्रयोग करने की सलाह देना। मैं सभी मित्रों को यही सलाह देता हूं कि फोटो तो ठीक है लेकिन अगर ऐसा होता तो ये होता, वैसा होता तो वो होता। वास्तव में फोटोग्राफी कैमरे को क्लिक क्लिक करना भर नहीं होता। इसमें आपको बहुत प्रयोग भी करने होते हैं।
लेकिन मुश्किल यही है कि सर्वोत्तम फोटो होने के बाद भी थोडी बहुत कमियां निकाली जायेंगी तो फोटोग्राफर थोडा-बहुत आहत भी होता है। निश्चित ही आहत जरूर होगा। यही सोचकर अब इस काम को बन्द करने का निश्चय कर लिया (नहीं किया) है। 

Friday, January 16, 2015

शिंगो-ला से दिल्ली वापस

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अगले दिन यानी 18 अगस्त को सुबह आठ बजे सोकर उठा। चाय पी, कुछ बिस्कुट खाये और जैम के साथ लद्दाखी रोटी भी। हालांकि अब मैं हिमाचल में था, लाहौल में था लेकिन यह लद्दाख से ज्यादा भिन्न नहीं है। साढे आठ बजे यहां से चल पडा।
आज मुझे अपने बाकी दोनों साथियों से मिलना है। पुरने में जब हम अलग हुए थे, तब यही तय हुआ था कि हम चार दिन बाद दारचा में मिलेंगे। सुबह वे लेह से चले होंगे, मैं यहां से चलूंगा। देखते हैं कौन पहले दारचा पहुंचता है?
लामाजी द्वारा बनवाई जा रही सडक लगभग शिंगो-ला तक पहुंच चुकी है। वह सडक यहां से बस कुछ ही ऊपर थी। नीचे पगडण्डी थी। मुझे अभी भी इतनी थकान थी कि मैं करीब सौ मीटर ऊपर सडक पर नहीं जाना चाहता था। लेकिन इसका भी अपना नुकसान था। ऊपर सडक बनी तो मलबा नीचे तक आ गया था। उससे पगडण्डी भी प्रभावित हुई थी, इसलिये चलने में समस्या आ रही थी। एक बार हिम्मत करके ऊपर सडक तक पहुंच गया और बाकी पैदल यात्रा मजे में कटी।

Wednesday, January 14, 2015

गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार

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आज तारीख थी 17 अगस्त 2014
आपको ध्यान होगा कि मैं पवित्र गोम्बोरंजन पर्वत के नीचे एक अकेले कमरे में सो गया था। रात में एकाध बार आंख भी खुली थी लेकिन मैं चूंकि सुरक्षित स्थान पर था, इसलिये कोई डर नहीं लगा। हां, एकान्त में होने का एक अजीब सा डर तो होता ही है।
साढे सात बजे आंख खुली। कुछ बिस्कुट खाये, पानी पीया, बिस्तर समेटा और सवा आठ बजे तक निकल पडा। अब ऊंचाई बढने लगी थी और रास्ता भी ऊबड खाबड होने लगा था। जिस स्थान पर मैं सोया था, वो जगह समुद्र तल से 4250 मीटर पर थी, अब जल्दी ही 4400 मीटर भी पार हो गया। वैसे तो अभी भी बडी चौडी घाटी सामने थी लेकिन इसमें छोटी छोटी कई धाराओं के कारण रास्ता बिल्कुल किनारे से था जहां बडे-बडे पत्थरों की भरमार थी।
सामने बहुत दूर खच्चरों का एक बडा दल इस घाटी को पार कर रहा था। कैमरे को पूरा जूम करके देखा तो पता चला कि उन पर कुछ राशन लदा है और कुछ लोग पैदल भी चल रहे हैं। निश्चित ही वह एक ट्रेकिंग ग्रुप होगा जो आज लाखांग में रुका होगा। आज शिंगो-ला पार कर लेगा।

Monday, January 12, 2015

पदुम-दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन

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16 अगस्त 2014
सुबह साढे आठ बजे सोकर उठा। हालांकि रात जब सोने जा रहा था तो दुकान मालकिन से यही कहकर सोया था कि सुबह छह बजे चल पडूंगा। सुबह छह बजे आंख भी खुली थी लेकिन बाहर बूंदाबांदी हो रही थी। मैं फिर सो गया। अबकी उठा तो साढे आठ बज चुके थे और तेज धूप टेंट पर पडने लगी थी। दुकान भी खुल चुकी थी। सरचू जाने वाले विदेशियों के ग्रुप का साजो-सामान उखड चुका था और खच्चरों पर लादा जा रहा था।
मैं तय कार्यक्रम से काफी पीछे था। सुबह सवेरे चलने का मकसद इतना ही था ताकि कुछ समय व दूरी की पूर्ति कर सकूं। परसों शाम तक हर हाल में दारचा पहुंचना है। दारचा में मुझे विधान व प्रकाश जी मिलेंगे, कल ही इस बारे में सबकुछ तय हो गया था। अगर मैं न पहुंचा तो वे दारचा में मेरी प्रतीक्षा करते रह जायेंगे। लेकिन बुरी आदत है देर तक सोने की, सोता ही रह गया।

Friday, January 9, 2015

पदुम- दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे

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आज देश में स्वतन्त्रता दिवस मनाया जा रहा था और हम जांस्कर के दुर्गमतम स्थान पर छोटे से गांव के छोटे से खेत में तम्बू लगाये पडे सो रहे थे। हमें तिरंगा देखना था और दो घरों के गांव पुरने में इसकी कोई सम्भावना नहीं थी। उम्मीद थी कि आगे बढेंगे तो कहीं किसी बडे गांव में स्कूल मिलेगा और हम तिरंगा देख सकेंगे।
आगे बढने से पहले थोडा सा भूतकाल में लौटते हैं। कल की बात है। जब हम फुकताल से पुरने आये तो हमें घोडे वाला मिला। यह वही घोडे वाला था जो हमें परसों शाम अनमो से चा के रास्ते में मिला था और हमने उसे सुबह पुरने में मिलने को कहा था। जिस समय हमारी घोडे वाले से बात हुई थी, उस समय हमारा इरादा पुरने रुकने का ही था लेकिन बाद में अन्धेरा हो गया तो इरादा बदल गया और हम चा रुक गये। हालत हमारी तब ऐसी थी कि हम इस वाकये को भूल गये।
अब आगे क्या हुआ, यह भी जान लीजिये। वो घोडे वाला तेंगजे का था जो पुरने से भी करीब 15 किलोमीटर आगे है। वह पहले अपने घर गया। उसे पुरने तक पहुंचने में ही अन्धेरा हो गया होगा। अपने घर वह कम से कम दस ग्यारह बजे रात को पहुंचा होगा। फिर रात को ही वहां से पुरने लौट आया और सुबह हमें ढूंढने लगा। लेकिन हम वहां होते तो उसे मिलते भी। तब हम चा में थे और फुकताल जाने वाले थे। वह हमें ढूंढता रहा लेकिन हम नहीं मिले। फिर दोपहर को प्रकाश जी और विधान का सामान लेकर एक आदमी पुरने गया। आपको याद होगा कि हमने आठ सौ रुपये में सामान चा से पुरने पहुंचाने के लिये एक आदमी को कहा था और खाली हाथ फुकताल चले गये थे। उस आदमी ने वहां हमारे बारे में बताया। उससे हमने किसी घोडे वाले को तैयार करने को भी कहा था। उसने एक घोडे वाले को तैयार कर दिया। अब पुरने में दो घोडे वाले ऐसे हो गये जो हमारा इंतजार कर रहे थे।