Friday, April 18, 2014

गुवाहाटी से दिल्ली- एक भयंकर यात्रा

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अगले दिन सुबह साढे पांच बजे ही गुवाहाटी स्टेशन पहुंच गया। यहां से छह बजे लामडिंग पैसेंजर चलती है। लामडिंग यहां से 180 किलोमीटर दूर है। आज का काम लामडिंग तक जाकर शाम तक वापस लौटना था। स्टेशन पहुंचा तो धीरे का झटका जोर से लगा। ट्रेन पांच घण्टे की देरी से रवाना होगी। इस ट्रेन को लामडिंग पहुंचने में छह घण्टे लगते हैं। कब यह लामडिंग पहुंचेगी और कब मैं वापस आऊंगा? नहीं, अब इस ट्रेन की सवारी नहीं करूंगा। सात बजे चलने वाली बंगाईगांव पैसेंजर से बंगाईगांव जाता हूं। देखा यह ट्रेन सही समय पर रवाना होगी।
एक बात समझ नहीं आई। असोम में कोहरा नहीं पडता। कम से कम वे ट्रेनें तो ठीक समय पर चल सकती हैं जो असोम से बाहर नहीं जातीं। लामडिंग पैसेंजर ऐसी ही गाडी है। रात को यह ट्रेन लीडो इण्टरसिटी बनकर चलती है तो दिन में लामडिंग पैसेंजर। यानी लीडो इण्टरसिटी भी इतनी ही देर से चल रही होगी।
गुवाहाटी से बंगाईगांव जाने के दो रास्ते हैं। एक रंगिया होते हुए, दूसरा गोवालपारा टाउन होते हुए। रंगिया वाला रास्ता डेढ सौ किलोमीटर का है जबकि गोवालपारा वाला दो सौ किलोमीटर। इस वजह से रंगिया रूट पर ज्यादा ट्रैफिक होता है। गोवालपारा कम ही ट्रेनें जाती हैं। इसी वजह से रंगिया के रास्ते जाने वाली पैसेंजर डेढ सौ किलोमीटर को तय करने में पांच घण्टे लगाती है जबकि गोवालपारा के रास्ते जाने वाली पैसेंजर दो सौ किलोमीटर को साढे चार घण्टे में ही नाप देती है। सात बजे वाली पैसेंजर गोवालपारा के रास्ते जायेगी।
गुवाहाटी से चलकर कामाख्या जंक्शन आता है। रंगिया और गोवालपारा की लाइनें कामाख्या से अलग हो जाती हैं। कामाख्या से आजरा, मिर्जा, छयगांव, बामुणीगांव, बोको, शिंगरा, धूपधरा, रंगजुली, अमजोंगा, दूधनई, कृष्णाई, गोवालपारा टाउन, पंचरत्न, जोगीघोपा, अभयापुरी, माजगांव और न्यू बंगाईगांव जंक्शन हैं। न्यू बंगाईगांव में रंगिया की तरफ से आने वाली लाइन भी मिल जाती है और आगे कोकराझार की तरफ चली जाती है। पंचरत्न और जोगीघोपा के बीच में ब्रह्मपुत्र नदी पार करनी होती है। यहां नदी पर दो पुल ऊपर नीचे हैं, नीचे ट्रेन चलती है तो ऊपर सडक।
अब मुझे गुवाहाटी लौटना था। कामरूप एक्सप्रेस एक घण्टे की देरी से चल रही थी। यह रंगिया के रास्ते जाती है, मैंने इसी का एक जनरल टिकट ले लिया। लेकिन प्लेटफार्म पर जब कामरूप की जगह अवध असम एक्सप्रेस आई तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। नेट पर गणित लगाकर देखा तो यह 13 घण्टे की देरी से चल रही थी। उत्तर भारत में भयंकर कोहरे ने उधर की सभी ट्रेनें लेट कर रखी थीं। यह ट्रेन यहां कल रात साढे ग्यारह बजे आनी चाहिये थी, आ अब रही है।
खैर, इसी ट्रेन में चढ लिया। यह भी रंगिया के ही रास्ते जायेगी, इसलिये मैं टिकट की तरफ से निश्चिन्त था। दिन ढलने तक गुवाहाटी पहुंच गया और सीधे होटल में।
कल सुबह छह बजे मेरी पूर्वोत्तर सम्पर्क क्रान्ति एक्सप्रेस है जिससे मुझे दिल्ली जाना है। इसमें मैंने दो दिन पहले टिकट बुक कराया था जिसमें वेटिंग मिली थी। सुबह चलने वाली गाडियों का चार्ट रात को ही बन जाता है। इसलिये सोने से पहले जब नेट पर चेक किया तो पता चला कि सीट कन्फर्म नहीं हुई है। यह मेरे लिये एक बडा झटका था। दो हजार किलोमीटर की यात्रा साधारण डिब्बे में कभी भी आसान नहीं होती, खासकर पूर्वी भारत के मार्गों पर। लेकिन कोई और चारा भी तो नहीं था, जाना तो पडेगा और इसी ट्रेन से।
लगे हाथों एक शुभ काम और कर लिया। शुभ काम करने के बाद पता चला कि अब मुझे सुबह पांच बजे उठने की आवश्यकता नहीं है। आराम से दोपहर को उठूंगा। ट्रेन आठ घण्टे की देरी से रवाना होगी यानी दोपहर बाद दो बजे। कुछ विचार और भी आये। गुवाहाटी से दिल्ली के लिये मुख्यतः चार ट्रेनें हैं- सम्पर्क क्रान्ति, नॉर्थ ईस्ट, ब्रह्मपुत्र मेल और अवध असम। सम्पर्क क्रान्ति सप्ताह में तीन दिन चलती है जबकि बाकी ट्रेनें रोजाना। सम्पर्क क्रान्ति के ठहराव भी बहुत कम हैं; बिहार में तो मात्र कटिहार में ही रुकती है। इसलिये लग रहा था कि इस ट्रेन में बाकी ट्रेनों के मुकाबले कम भीड मिलेगी। इसके तीन घण्टे बाद ही यानी नौ बजे नॉर्थ ईस्ट एक्सप्रेस चलती है। फिर बारह बजे ब्रह्मपुत्र मेल। चूंकि यह ट्रेन अब दो बजे चलेगी तो इस ट्रेन की साधारण सवारियां नॉर्थ ईस्ट व ब्रह्मपुत्र मेल से चली जायेंगीं। मुझे बैठने को सीट तो मिल ही जायेगी। इस गणित से मैं खुश था।
अगले दिन ग्यारह बजे ही स्टेशन पहुंच गया। वहां पूछताछ काउण्टर पर जहां सबसे पहले मेरी निगाह पडी वो था कि नॉर्थ ईस्ट एक्सप्रेस आज रद्द है। यानी एक पूरी ट्रेन की सारी सवारियां स्टेशन पर हैं। हालांकि कुछ ही देर में ब्रह्मपुत्र मेल आने वाली है लेकिन दिल्ली और यूपी जाने वाला कौन यात्री उससे जाना पसन्द करेगा? वह मालदा और भागलपुर का एक लम्बा चक्कर काटकर आती है। यानी अब सम्पर्क क्रान्ति में भीड मिलेगी। कुछ ही समय में ब्रह्मपुत्र मेल आ गई और चली भी गई। देखा कि उसके साधारण डिब्बों में ज्यादा भीड नहीं थी। मस्तिष्क में सकारात्मक सन्देश गया कि सम्पर्क क्रान्ति में भी ज्यादा भीड नहीं मिलेगी।
दोपहर बारह बजे सूचना प्रसारित हुई कि सम्पर्क क्रान्ति अब शाम छह बजे रवाना होगी यानी बारह घण्टे लेट। गुस्सा तो बहुत आया लेकिन कर भी क्या सकता था? साइकिल साथ में थी ही। कभी मन में आता कि इसकी लगेज में बुकिंग करा दूं; कभी सोचता कि नहीं, ऐसे ही सीट के नीचे रखकर ले जाऊंगा। नेट पर चेक किया तो पाया कि सम्पर्क क्रान्ति में चार साधारण डिब्बे होते हैं- दो आगे और दो पीछे। अन्दर से आवाज आई कि काफी हैं।
अभी तक ट्रेन का प्लेटफार्म घोषित नहीं किया गया था, इसलिये मुझ समेत काफी यात्री प्लेटफार्म नम्बर एक पर ही पसरे थे। साइकिल एक कोने में खडी कर दी थी अगले कई घण्टों के लिये। इसकी तरफ देखने का अब मन भी नहीं था। अगर साइकिल न होती तो मैं गुवाहाटी से एनजेपी तक का मार्ग पैसेंजर ट्रेनों से नाप देता और सम्पर्क क्रान्ति के इस बर्ताव का मुझे बिल्कुल भी दुख नहीं होता। भगवान! कोई इसे उठाकर ले जाये। इससे दूर पन्नी बिछाकर सोया भी लेकिन इसे शायद किसी ने नहीं देखा।
बेंचों पर पेंटिंग हो रही थी। काला पेंट लगाया जा रहा था। पूरे प्लेटफार्म की सभी बेंचों को एक जगह या दो तीन जगह इकट्ठा करके उनकी पुताई कर रहे थे। बाद में एक कर्मचारी पहरा देता ताकि कोई यात्री उन पर न बैठे। लेकिन फिर भी लोग बैठ ही जाते। उनके बैठने से पहले ही कर्मचारी चिल्लाकर उन्हें टोकता, लेकिन जल्दबाज तब तक बैठ चुका होता। बैठते ही उसे भी पता चल जाता कि कुछ गडबड हो गई है। उठ जाता लेकिन तब तक उसके पीछे स्थायी ठप्पा लग चुका होता। मुझ समेत तमाशबीनों की भीड लगी रही कि कोई आये और ठप्पा लगवाये।
भूख लगी तो भोजनालय में चला गया। वेज बिरयानी का ‘टिकट’ ले लिया और एक लम्बी लाइन में जा खडा हुआ। मुझसे आगे एक बडा सा ग्रुप था। कर्मचारी उस ग्रुप को चावल देने लगा तो मुझे भी उसी का सदस्य समझ लिया और फ्री में चावल मिल गये। बिरयानी का टिकट जेब में पडा रह गया। कुछ घण्टों बाद जब मैं पुनः वहां गया और टिकट दिखाकर बिरयानी मांगी तो उन्होंने कहा कि यह टिकट प्रातःकालीन शिफ्ट का है, जो सायंकालीन शिफ्ट में नहीं चलेगा।
पांच बजे पता चला कि ट्रेन प्लेटफार्म नम्बर चार से जायेगी। सभी लोग उधर ही लपक लिये। मैं भी अपनी साइकिल को उठाकर चल पडा। जाते ही होश उड गये। प्लेटफार्म तो दूर, फुट-ओवर-ब्रिज पर भी पैर रखने की जगह नहीं। किसी तरह नीचे उतरा। बराबर वाला प्लेटफार्म नम्बर पांच भी ठसाठस भरा था। सभी यात्री सम्पर्क क्रान्ति वाले ही थे। मैंने मन ही मन कहा कि ब्रह्मपुत्र मेल खाली गई है, उससे नहीं जा सकते थे?
साइकिल खोली। इसके दोनों पहिये एक साथ बांध दिये; बाकी बॉडी, हैण्डलबार और चेन भी कपडे से मजबूती से बांध दिये। पीछे कमर पर बैग लटका था। कई बार रिहर्सल किया कि किस तरह इस भीड में मुझे साइकिल भी उठाकर डिब्बे में घुसना है।
छह बज गये, साढे छह भी बज गये और सात भी बज गये लेकिन ट्रेन का कोई अता-पता नहीं। कोई उदघोषणा भी नहीं हो रही थी। नेट पर चेक किया कि कहीं ट्रेन को और लेट तो नहीं कर दिया लेकिन वहां भी ट्रेन के प्रस्थान का समय छह बजे ही दिखता रहा। अन्धेरा हो ही चुका था। आखिरकार सवा सात बजे प्लेटफार्म के उस तरफ दूर से एक लाइट दिखनी शुरू हुई जो नजदीक आती जा रही थी। सभी यात्रियों में हलचल मच गई। ज्यादातर फौजी थे जिनके पास बडे बडे ट्रंक थे। मैंने भी साइकिल लादी और मोर्चे का सामना करने को तैयार हो गया। कुछ यात्री अपने सहयात्रियों से यह कहते हुए उस लाइट की दिशा में दौड पडे कि हम वहीं से सीट घेरकर लायेंगे। यह बात मेरे कानों में पडी तो ठीक ही लगी। मैंने भी आगे बढने की सोची लेकिन भीड की वजह से एक कदम भी आगे नहीं बढा सका। जैसे जैसे लाइट नजदीक आती गई, माहौल में उत्तेजना भी बढती गई। मैं ट्रेन में चढने के लिये अपना पूरा अनुभव झोंक देना चाहता था। मुझे पता था कि ऐसे में एक मामूली सी चूक भी भारी पड सकती है। साइकिल होने की वजह से और भी दिक्कत आने वाली थी।
आखिरकार जब लाइट इतनी नजदीक आ गई कि उसके पीछे का नजारा दिख सके तो तनावपूर्ण माहौल हल्का हो गया और सभी हंसने लगे। यह एक इंजन था। इसके पीछे कुछ भी नहीं था। लेकिन इसने दिखा दिया कि जब ट्रेन आयेगी तो माहौल कैसा होगा। मैं सिर पकडकर बैठ गया। सिर में तेज दर्द होने लगा था। क्या करूं, कुछ समझ नहीं आ रहा था। अगर ट्रेन सुबह सही समय पर चली होती तो कल दोपहर तक दिल्ली पहुंच गई होती यानी एक रात लगाती। अब यह निश्चित तौर पर दो रातें लगायेगी। रास्ते में भी कुछ लेट अवश्य होगी। ऐसे में नीरज, तू दो रातें कैसे काटेगा? साइकिल पर भी गुस्सा आ रहा था- चल तू दिल्ली, देख तेरी कैसी हालत बनाता हूं। तेरी ही वजह से मैं यहां फंसा हुआ हूं। आसामी बडे ही ईमानदार हैं, कोई साइकिल को उठाकर ही नहीं ले जा रहा। दिनभर जैसा मैंने इसके साथ बर्ताव किया है, कहीं और होती तो पक्का उठ जाती। अब के बाद साइकिलिंग बन्द। ट्रेन यात्रा करेंगे, पैदल यात्रा करेंगे, बस यात्रा करेंगे लेकिन साइकिल यात्रा अब कभी नहीं।
आठ बज गये। ट्रेन नहीं आई और न ही कोई सूचना प्रसारित की गई। यह शायद मेरे लिये अच्छा ही था। आ जाती तो मुझे इसमें चढना पडता और मैं जो अब यहां सिर पकडे बैठा सोच रहा हूं, वो नहीं सोच पाता। लोहे पर भी जब तनाव डालते हैं तो वो टूट जाता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। जब तनाव चरम पर पहुंच गया तो मैं टूट गया और वाकई बडा आराम महसूस हुआ। फैसला लिया कि ट्रेन से नहीं जाऊंगा। हवाई जहाज से जाऊंगा। यहीं बैठे बैठे मोबाइल में उंगली करनी शुरू की, कुछ देर बाद एटीएम कार्ड जेब से निकला और सारा तनाव समाप्त। साढे ग्यारह हजार रुपये तो लगे, लेकिन अब न तो कोई सिरदर्द था, न ही कोई चिन्ता। पूरे प्लेटफार्म पर शायद मैं ही अकेला यात्री था, जो अब तनावमुक्त था।
साइकिल ने पूछा- मैं? मैंने कहा- भाड में जाए तू। तुझे हवाई जहाज में तो ले जाने वाला नहीं हूं। तुझे इसी ट्रेन में रख दूंगा, तेरे नसीब में दिल्ली पहुंचना होगा, पहुंच जायेगी; नहीं होगा, मेरा पीछा छूटेगा। ट्रेन आई तो लोग पागलों की तरह उस पर टूट पडे। मेरी जानकारी के अनुसार इसमें आगे-पीछे दो-दो साधारण डिब्बे होने चाहिये थे लेकिन मैं गलत था। इसमें आगे एक ही डिब्बा था और उस पर लिखा था- फौजियों के लिये आरक्षित। ‘सिविलियन’ यह देखकर पीछे वाले डिब्बे की तरफ दौड लगाते गये। और फौजी भी कोई मजे में नहीं थे। उनकी संख्या भी बहुत ज्यादा थी, फिर भारी भरकम बडे-बडे ट्रंक। एक के ऊपर एक ट्रंक रखे गये, छत तक पहुंच गये। उनके लिये टॉयलेट जाने तक की जगह नहीं बची।
इसी के पीछे शयनयान डिब्बा था- एस वन। आरक्षित डिब्बे एक दूसरे से जुडे होते हैं लेकिन यह चूंकि पहला डिब्बा था इसलिये एक तरफ से बन्द था। यहीं मैंने साइकिल रख दी। इसकी बॉडी और दोनों पहियों को चेन से इस तरह बांधकर ताला लगा दिया कि उठाने वाले को काफी मशक्कत करनी पडे। दोनों शौचालयों के बीच में यह आराम से आ गई। मुझे कोई सम्भावना नहीं लग रही थी कि बिहार और पूरे यूपी का सफर करने के बाद यह मुझे मिलेगी, इसलिये अब विदाई के समय कुछ लगाव और दया भी महसूस हो रही थी। आखिर मेरी मिज़ोरम यात्रा इसी की वजह से तो हुई है। फिर भी चलते समय मैंने इससे हाथ मिलाया और कहा- दिल्ली मिलेंगे।
स्टेशन से बाहर निकला, एक कमरा लिया और साइबर कैफे पर जाकर हवाई टिकट का प्रिंट आउट भी। गो एयर की फ्लाइट बुक की थी। पहले सोचा था कि इस यात्रा की एलटीसी लूंगा लेकिन अब नहीं लूंगा। वैसे भी केवल एयर इंडिया के आठ हजार तक के टिकट के पैसे ही मिलते हैं। गो एयर के साढे ग्यारह हजार कभी नहीं मिलेंगे। भविष्य में लूंगा एलटीसी।
अगले दिन उठा और साढे छह बजे स्टेशन पहुंच गया। वही बंगाईगांव पैसेंजर पकडी और आजरा स्टेशन पर उतर गया। आजरा से एयरपोर्ट करीब तीन किलोमीटर दूर है। ज्यादातर दूरी पैदल तय की, कुछ ऑटो में। फ्लाइट एक बजे के आसपास थी। यह मेरी तीसरी हवाई यात्रा थी। इससे पहले मैं दिल्ली से लेह और लेह से दिल्ली की हवाई यात्रा कर चुका हूं। तय समय पर हवाई अड्डे में प्रवेश कर गया।
एक एयरलाइन वाले किसी अब्दुल नामक यात्री को ढूंढ रहे थे। अब्दुल का टिकट उस फ्लाइट में बुक था, उसने चेक-इन भी कर लिया था लेकिन विमान में नहीं चढा था। बडी देर तक कर्मचारी वेटिंग लाउंज समेत हर जगह अब्दुल-अब्दुल चिल्लाते रहे। एनाउंसमेंट भी हुआ। पता नहीं अब्दुल मिला या नहीं।
मैंने चेक-इन करते समय कह दिया था कि खिडकी के पास वाली सीट चाहिये, इसलिये मिल गई। यह फ्लाइट दिल्ली तक पहुंचने के लिये पांच घण्टे लगाती है। इसका कारण था कि यह बागडोगरा में भी रुकती है। गुवाहाटी से जब उडे तो शीघ्र ही भूटान के बर्फीले पर्वत दिखने लगे। धुंध थी, फिर भी सफेद चोटियां दिख रही थीं। नीचे सडक और कभी कभार रेलवे लाइन भी दिख जाती थी। भूटान से आने वाली कई नदियां दिखीं। उन्हीं में तीस्ता भी होगी।
बागडोगरा में कुछ यात्री उतरे तो कुछ चढे भी। यहां से उडे तो जल्दी ही ‘चिकेन नेक’ को पार कर मुख्य भूमि में प्रवेश कर गये। नीचे कुछ भी नहीं दिख रहा था। हर जगह कोहरे का साम्राज्य था। दूर नेपाल हिमालय की चोटियां दिख रही थीं। इनमें कंचनजंघा और एवरेस्ट भी होंगी।
भूख लग रही थी। उम्मीद थी कि बागडोगरा के बाद कुछ खाने को मिलेगा। खाने को मिला भी लेकिन मैं नहीं खा सकता था। वे स्नैक्स और ड्रिंक्स बेच रहे थे। बडे महंगे दामों पर। लेह की फ्लाइट याद आ गई। पौन घण्टे की उडान में फ्री में खाने को दिया था। यहां पांच घण्टे की उडान है, कुछ तो देना चाहिये था। एयर होस्ट व होस्टेस ट्रॉली लेकर विमान में चक्कर काटते रहे। मैंने पीछे सिर टिकाकर आंख बन्द कर ली। शीघ्र ही नींद आ गई।
आज दो फरवरी थी। शाम सात बजे तक मैं अपने ठिकाने पर शास्त्री पार्क पहुंच चुका था। ट्रेन की ट्रेकिंग की तो वह बीस घण्टे की देरी से चल रही थी और अभी तक पटना भी नहीं पहुंची थी। यही हाल रहा तो वह कल भी दिल्ली नहीं आने वाली। साइकिल की कोई चिन्ता नहीं थी। आ जायेगी तो ठीक, नहीं आयेगी तो पीछा छूटेगा।
अगला पूरा दिन ट्रेन देखता रहा, लगातार लेट होती जा रही थी। रात ग्यारह बजे जब यह गाजियाबाद पहुंच गई तो मैं घर से निकल पडा। कश्मीरी गेट की आखिरी मेट्रो सवा ग्यारह बजे है, वह आंखों के सामने छूट गई। बस पकडकर कश्मीरी गेट पहुंचा। जाते ही नई दिल्ली स्टेशन की बस मिल गई और बारह बजे तक मैं नई दिल्ली पहुंच गया था। मुझे प्लेटफार्म टिकट लेने की जरुरत ही नहीं थी। गुवाहाटी से लिया गया दिल्ली तक का टिकट जेब में रखा था। साधारण टिकट को तीन घण्टे के अन्दर ही रद्द करा सकते हैं, इसलिये रद्द नहीं करा सका। पूछताछ पर गया। वहां गुवाहाटी जाने वाली सम्पर्क क्रान्ति के बारे में तो लिखा था कि सुबह चार बजे जायेगी लेकिन यह कहीं नहीं मिला कि आने वाली किस प्लेटफार्म पर आ रही है?
खैर, उदघोषणा हुई। ट्रेन आई। यह 36 घण्टे की देरी से आई थी। उतर रहे यात्रियों के चेहरे देखने लायक थे और उन फौजियों के चेहरे भी। अगर मैं भी इसी से आता; खुदा न खास्ता मेरा टिकट कन्फर्म हो गया होता तो मैं भी इन्हीं की तरह इसी तरह उतरता। जब एस-वन खाली हो गया, मैं अन्दर घुसा। दोनों शौचालयों के बीच में जाकर देखा...
...साइकिल वहीं उसी तरह रखी मिली।




ब्रह्मपुत्र नदी पार करने के लिये सडक और रेल पास आते हुए।


ब्रह्मपुत्र पुल




हवाई जहाज से दिखते भूटान के पहाड


बागडोगरा एयरपोर्ट पर

बिहार में कोहरे की चादर

जायें कहीं भी, आना आखिर दिल्ली ही है।


मिज़ोरम साइकिल यात्रा
1. मिज़ोरम की ओर
2. दिल्ली से लामडिंग- राजधानी एक्सप्रेस से
3. बराक घाटी एक्सप्रेस
4. मिज़ोरम में प्रवेश
5. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- आइजॉल से कीफांग
6. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- तमदिल झील
7. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- तुईवॉल से खावजॉल
8. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- खावजॉल से चम्फाई
9. मिज़ोरम से वापसी- चम्फाई से गुवाहाटी
10. गुवाहाटी से दिल्ली- एक भयंकर यात्रा

Wednesday, April 16, 2014

डायरी के पन्ने-20

मित्रों के आग्रह पर डायरी के पन्नों का प्रकाशन पुनः आरम्भ किया जा रहा है।
ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। ये आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाओं को आहत कर सकते हैं। कृपया अपने विवेक से पढें।

1. पप्पू ने नौकरी बदली है। पहले वह गुडगांव में कार्यरत था, अब गाजियाबाद में काम करेगा।  पप्पू कॉलेज टाइम में मेरा जूनियर था और हम करीब छह महीनों तक साथ-साथ रहे थे। मैंने जब गांव छोडा, बाहर किराये के कमरे पर रहना शुरू किया तो शुरूआत पप्पू के ही साथ हुई। उसी से मैंने खाना बनाना सीखा। तब मैं फाइनल ईयर में था। पेपर होने के बाद हम दोनों अलग हो गये। मैंने नौकरी की तो उसने बी-टेक की। बी-टेक के बाद वह गुडगांव में मामूली वेतन पर काम कर रहा था। मुझसे कम से कम पांच साल बडा है। कभी-कभार बात हो जाती थी।
अब जब वह गाजियाबाद आ गया तो उसे मैं याद आया। कुछ दिन हमारे यहां से ऑफिस जाया करेगा, तब तक वहीं आसपास कोई ठिकाना ढूंढ लेगा।
अब उसकी व्यक्तिगत जिन्दगी में झांकते हैं। उसकी उम्र तीस साल से ऊपर हो चुकी है। अभी तक विवाह नहीं हुआ। घरवाले पिछले सात-आठ सालों से उसके विवाह की कोशिशों में लगे हैं, वह स्वयं भी इसके लिये तैयार है लेकिन कहीं बात नहीं बन रही। अभी तक तो मुझे इसकी वजह मालूम नहीं थी लेकिन अब इस बारे में उससे बात करके सबकुछ मालूम हो गया। सारी गलती पप्पू और इसके घरवालों की ही है। हालांकि वह अपनी गलती कभी नहीं मान सकता। उसकी नजर में उन पच्चीस-तीस लडकियों और उनके परिजनों की ही गलती है जिनसे बात हुई और आगे नहीं बढी।
पप्पू ने पहले बीएससी की, फिर मैकेनिकल का तीन साल का डिप्लोमा किया और उसके बाद बीटेक। इतना कर चुकने के बाद पिछले दो सालों से वह गुडगांव में गाडियों के किसी निजी शोरूम में बारह-तेरह हजार की नौकरी कर रहा था। अब नई नौकरी भी उसी तरह की है लेकिन यहां पैसे कुछ ज्यादा मिलेंगे। शायद पन्द्रह हजार या सोलह-सत्रह हजार। यह प्रोफाइल एक बीटेक होल्डर के लिये बिल्कुल भी आकर्षक नहीं है। इसके अलावा उसका कोई शौक भी नहीं है, कोई बिजनेस नहीं है और न ही आधुनिक सोच। इकलौता लडका है, दो बहनें है। तीनों बहन-भाई घरवालों के कडे अनुशासन में पले-बढे हैं। या यूं कहिये कि हमेशा से घरवालों के पंजे के नीचे रहे हैं। उन्हें नहीं पता कि खुली हवा क्या होती है, आसमान में कैसे उडा जाता है? यह सब पप्पू से बात करने पर साफ पता चलता है। और तो और, उसे कम्प्यूटर और इंटरनेट जैसी बेसिक चीजों तक की जानकारी नहीं है। हालांकि किसी तरह वह फेसबुक खाता बनाने में सफल हो गया। अब उसके लिये फेसबुक का अर्थ अनजान लडकियों को फ्रेण्ड रिक्वेस्ट भेजना ही है। ... जाट है। बाप पब्लिक सेक्टर में है, अच्छी आमदनी है। अच्छी खेती है। लेकिन कोई लडकी वाला न तो बाप की आमदनी देखता है, न खेती को पूछता है और न उन्हें इकलौते होने से मतलब है। उन्हें लडके से मतलब होता है। लडका इतना पढने के बाद भी ऐसी नौकरी कर रहा है, जाहिर है कि लडके में काबिलियत नहीं है। अपने ‘ना-काबिल’ लडके के लिये उन्हें ‘काबिल’ लडकी चाहिये, जो सम्पन्न परिवार से हो, बेहद सुन्दर हो, अच्छी पढी लिखी हो, घर के सारे काम जानती हो और...
... कभी लडके के साथ रहने को न कहे। लडका दिल्ली रहता है, लडकी को गांव में रहना पडेगा।
यही गलती हो जाती है। अच्छे घर की पढी-लिखी लडकी... सोचती तो होगी कि इन्हें बहू की नहीं, नौकरानी की जरुरत है। उधर अच्छे घर का पढा लिखा लडका परिवर्तन को तैयार नहीं है। आज भी उनकी नजर में पति पत्नी का साथ रहना असामाजिक है।

2. पिछले दिनों रोजाना की तरह अखबार पढ रहा था। दैनिक भास्कर में ‘महाराष्ट्र-गुजरात’ पृष्ठ पर चुनावी खबरों के बीच एक छोटी सी खबर पर निगाह पडी- प्रसिद्ध हास्यकवि अलबेला खत्री का निधन। मैं सन्न रह गया। तुरन्त फेसबुक पर ऑनलाइन हुआ। पाबला साहब और ललित शर्मा के प्रोफाइल पर भी यही था कि खत्री साहब नहीं रहे। अगर मैं उनके सम्पर्क में न आता तो यह खबर मेरे लिये कोई मायने नहीं रखती। वे लाफ्टर चैलेंज के विजेता भी रह चुके हैं और ‘बडे आदमी’ थे। हम दो बार मिले थे। एक बार रोहतक में और दूसरी बार सांपला में। दोनों बार उन्हें दिल्ली तक छोडने की जिम्मेवारी मेरी थी। सूरत में रहते थे। एक बार मैंने उन्हें सूरत फोन किया तो आवाज सुनते ही पहचान गये। मुझे लग रहा था कि बताना पडेगा कि नीरज बोल रहा हूं... वे कहते कौन नीरज... नीरज जाट... कौन नीरज जाट? तब मैं उन्हें रोहतक और सांपला के बारे में बताता। तब शायद उन्हें याद आ जाता। ऐसा ही सोचकर मैंने उन्हें फोन किया था। बडे लोगों को कौन फोन नहीं करना चाहेगा?
कई साल पहले राज भाटिया साहब जर्मनी से अपने पैतृक स्थान रोहतक आये थे। वे ब्लॉग दुनिया में एक सम्मानित ब्लॉगर हैं। मुझ समेत काफी सारे ब्लॉगर उनके भारत आने की खबर सुनकर उनसे मिलने को आतुर हो गये थे। तब रोहतक में तिलयार झील के किनारे एक ब्लॉगर सम्मेलन का आयोजन किया गया था। यह सुनते ही दिल्ली तो दिल्ली, मुम्बई और रांची-जमशेदपुर तक से ब्लॉगर रोहतक आये। तब तक अलबेला खत्री भी ब्लॉगिंग में काफी प्रसिद्ध हो चुके थे। उनके ब्लॉग पर हम जैसे लोग टिप्पणी करते थे और उसका वे जवाब देते थे, तो उनके जवाब में ‘धन्यवाद नीरज’ जैसे शब्द देखकर ऐसा लगता था जैसे अमिताभ बच्चन ने अपने घर पर मुझे डिनर पर आमन्त्रित कर दिया हो।
तो उस सम्मेलन में खत्री साहब के भी आने की हवा उड गई। हां, यह हवा ही थी। मैंने भाटिया साहब से पूछा था कि क्या वाकई खत्री साहब आ रहे हैं तो उन्होंने जवाब दिया कि कहा तो है लेकिन मुश्किल है उनका आना। लेकिन हवा उडी ही रही। सम्मेलन जबरदस्त सफल रहा, काफी ब्लॉगर आये। लेकिन जब दोपहर तक खत्री साहब नहीं आये तो निराशा भी देखी गई। फिर एक खबर आई कि वे आ रहे हैं, दिल्ली पहुंच रहे हैं... रोहतक पहुंच चुके हैं... होटल में नहाने गये हैं। शाम के पांच बज चुके थे। लोग फिर भी रुके थे।
वे आये। सबसे मिले, मुझसे भी। कवितापाठ भी हुआ। एक ब्लॉगर ने पूछ लिया कि आप दो घण्टे पहले रोहतक आ चुके थे, फिर होटल चले गये, नहाने और कपडे बदलने। इससे अच्छा होता कि यहां सीधे आ जाते। बोले- मैं एक कलाकार हूं। कला मेरी रोजी-रोटी है। कलाकार को कलाकार की तरह दिखना चाहिये।
रात वे भाटिया साहब के घर पर ही रुके। सुबह देखा कि खाना बनाने वाली बाई अपने बच्चे को भी लाई थी। बच्चे को कुछ शारीरिक समस्या थी। सारी समस्या सुनकर खत्री साहब ने उसे अपना नम्बर दिया- मेरे सूरत और मुम्बई में कुछ जानकार डॉक्टर हैं। मैं उनसे इस बारे में बात करूंगा। तुम लगातार भाटिया साहब और अन्तर सोहिल के सम्पर्क में रहना। जैसे ही तुम्हें बुलाऊं, तुरन्त आना पडेगा। मुम्बई पहुंचाने तक की जिम्मेवारी राज और अन्तर की है, उसके बाद सारी जिम्मेवारी और खर्चा मेरा।
जब भाटिया साहब के निवास से रिक्शा पर बैठकर मैं और खत्री साहब बस अड्डे की तरफ चले तो उन्होंने मुझसे कहा- ‘नीरज, तुम बहुत घूमते हो। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना कि इन रिक्शा वालों से कभी मोलभाव मत करना। मोलभाव करोगे तो ज्यादा से ज्यादा तुम्हारे दस रुपये बचेंगे। ये दस रुपये तुम्हारे लिये उतने अहम नहीं हैं जितने इनके लिये।’ जब भी मैं रिक्शा पर बैठता हूं तो मुझे उनकी यह बात याद आ जाती है।

3. 10 अप्रैल को दिल्ली में लोकसभा के लिये वोटिंग हुई। मैंने भी वोट दिया। इस बार निःसन्देह हवा भाजपा के पक्ष में चल रही है। इसका सारा श्रेय नरेन्द्र मोदी को जाता है। भाजपा ने मोदी को प्रधानमन्त्री पद का प्रत्याशी बनाकर ठीक ही किया है। वैसे वहां इस पद के लिये मोदी से भी वरिष्ठ आडवाणी जैसे दावेदार थे। मौलिक रूप से मुख्यमन्त्री और प्रधानमन्त्री के कार्यों में कोई अन्तर नहीं होता। दोनों के लिये चुनावी प्रक्रिया से लेकर सबकुछ एक सा होता है। मुख्यमन्त्री के काम करने का दायरा जहां एक राज्य होता है, वहीं प्रधानमन्त्री के लिये कई राज्य यानी पूरा देश। बस यही अन्तर होता है। मोदी इस मामले में आडवाणी से ज्यादा अनुभवी हैं।
आम आदमी पार्टी ने अवश्य कुछ समय पहले जबरदस्त उलटफेर किया था। लग रहा था कि इस उलटफेर की गूंज भारत के दूर-दराज के गांव-देहातों में भी पहुंचेगी और यह पार्टी लोकसभा चुनावों में भी एक सशक्त पार्टी के तौर पर उभरेगी। लेकिन केजरीवाल के दिल्ली में घटिया शासन ने इस पार्टी की गरिमा को भयंकर क्षति पहुंचाई है। अब यह पार्टी भले ही दिल्ली में अपना रुतबा खो चुकी हो, लेकिन गांव-देहातों में अभी भी इसका अच्छा नाम है। सीधे-साधे लोग केजरीवाल के त्यागपत्र को बलिदान मानते हैं। ... और ज्यादातर मतदाता सीधे-साधे ही हैं।
सभी बडी पार्टियां मोदी के विरोध में है। मोदी चूंकि लम्बे समय से गुजरात के मुख्यमन्त्री रहे हैं, इसलिये मोदी के विरोधी गुजरात विरोधी भी बन गये हैं। यह स्थिति देश के लिये खतरनाक है। हर राज्य के शासक अपने राज्य और गुजरात की तुलना कर रहे हैं और गुजरात को देश का सबसे घटिया राज्य सिद्ध करने में लगे हैं। इसका नुकसान मोदी या भाजपा को हो या न हो, लेकिन गुजरात को अवश्य होगा और साथ ही देश को भी। दूसरों के रास्ते में गड्ढे खोदने से बेहतर है कि अपने रास्ते के गड्ढे ठीक किये जायें।
इसी बीच सोच रहा हूं कि अगर मैं प्रधानमन्त्री होता तो क्या करता। इसका जवाब मेरे लिये बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है क्योंकि जिसकी जैसी जरुरतें होती हैं, वह सत्ता में आने पर उसी के अनुसार काम करने लगता है। मैं भी अपनी जरुरतों के अनुसार ही काम करता। मुझे दो-तीन चीजें बहुत कचोटती हैं। पहली है आरक्षण। आरक्षण यानी हर नागरिक के लिये अलग मापदण्ड। हर नागरिक में भेदभाव। योग्यता को कोई महत्व नहीं।
नम्बर दो, धारा 370 यानी कश्मीर को भारत से अलग करके देखा जाना। वैसे तो हर राज्य में कुछ न कुछ ऐसे कानून हैं जो शेष भारत में नहीं हैं लेकिन कश्मीर का यह कानून ज्यादा चर्चित है। इसे चर्चित होने की कोई वजह नहीं है। अमेरिका में तो पचास राज्य हैं और सभी का अपना अलग संविधान है। हमारे ही यहां पूर्वोत्तर की स्थिति बडी बदहाल है। मुझे आश्चर्य होता है कि भारत उनसे दुश्मनों जैसा व्यवहार करता है, वे फिर भी भारतीय बने रहना चाहते हैं। न वहां रेल है, न सडक है। वहां रेलवे लाइनें बिछे, अच्छी सडकें बनें, थोडा बहुत इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास हो। एक आम उत्तर भारतीय सुदूर दक्षिण में केरल जाना शान समझता है जबकि पूर्वोत्तर के सुदूरवर्ती राज्यों में नहीं जाता। कारण सिर्फ इतना है कि केरल तक हर तरह की ट्रेनें जाती हैं।
तीन, पुलिस को भंग करता। पुलिस भंग होते ही अपराधों में कमी आयेगी। फिर भी छोटी मोटी वारदातों को संभालने के लिये दूसरे बहुत से बल मौजूद हैं। पुलिस असभ्य लोगों का वह झुण्ड है जो सभ्य लोगों को सभ्यता सिखाने के लिये बनाया गया है।

4. योगेन्द्र सोलंकी साहब जो गुडगांव में रहते हैं, के मुजफ्फरनगर स्थित गांव में एक विवाह है। काफी दिनों पहले ही उन्होंने न्यौता दे दिया था। मैं भूल जाता था। अगली बार वे फिर पूछते थे कि आयेगा कि नहीं। मैं पूछता था कि कहां, क्यों? वे फिर याद दिलाते थे। 16 अप्रैल का विवाह है। बुधवार है। मेरी छुट्टी मंगलवार को रहती है। मंगल को ड्यूटी करके बुध की भी छुट्टी ले सकता हूं लेकिन इधर आजकल मेरी खान साहब से खटपट चल रही है जिस वजह से मैंने बुध की आकस्मिक छुट्टी लगा दी। यह पास भी हो गई। अब मंगल को गांव जाऊंगा और बुध को मुजफ्फरनगर।

5. जैसे जैसे सर्दी कम होती जा रही है, मच्छर भी बढते जा रहे हैं। मेरा ठिकाना यानी शास्त्री पार्क भी मच्छर बाहुल्य क्षेत्र में स्थित है। एक तरफ तो यमुना है, दूसरी तरफ सीलमपुर की झुग्गियां। अन्धेरा होते ही मच्छरों की फौज भयंकर प्रहार करने लगती है। रात को कमरे में रासायनिक धुआं करने पर भी मच्छर नहीं भागते।
इसी रासायनिक धुएं के बाद सुबह उठा तो गले में मामूली सी खराश मालूम हुई। शाम होते-होते यह बढ गई। निगलने पर गले में दर्द होता। न खांसी थी, न ही जुकाम। सोचा कि एक-दो दिन में अपने आप ठीक हो जायेगा। अगली रात मच्छरदानी लगाकर सोया। सुबह उठा तो गले का दर्द बढा हुआ था। दवाई लेनी पडी, साथ ही परहेज की हिदायत भी। तला-भुना नहीं खा सकते और न ही दही। आज 14 तारीख है, कल के मुकाबले कुछ आराम है। लेकिन जैसे जैसे गले का दर्द कम होता जा रहा है, खांसी और जुकाम बढता जा रहा है। लग रहा है कि मुज़फ्फरनगर जाना रद्द करना पडेगा। सचिन त्यागी आये थे, उनसे इस बारे में विमर्श किया तो उन्होंने कहा- न जाओ तो बेहतर है। क्योंकि वे अगर तुम्हारे ज्यादा अज़ीज़ हैं तो उन्हें तुम्हारे गले से हमदर्दी होगी, वे भी न आने के लिये तुमसे सहमत ही होंगे लेकिन अगर वे तुम्हारे न जाने से नाराज हो गये तो समझ लेना कि उन्हें तुमसे और तुम्हारी सेहत से कोई मतलब नहीं।

6. सचिन त्यागी आये। आभासी दुनिया यानी फेसबुक और ब्लॉग पर तो हमारा मिलना होता रहता है लेकिन वास्तविक दुनिया में मिलना पहली बार हुआ है। बडे खुश थे। उन्होंने भी एक ब्लॉग बनाया है। चाहते थे कि मैं उन्हें कुछ तकनीकी जानकारियां दूं। लैपटॉप पर उनका ब्लॉग खोला, जो परिवर्तन वे चाहते थे, वे कर दिये। उन्होंने बताया कि कैसे वे मुझ तक पहुंचे। काफी पहले वे नेट पर यात्रा सम्बन्धी लेख पढा करते थे। अचानक उन्हें सन्दीप पंवार के ब्लॉग की जानकारी मिली। फिर मेरे ब्लॉग की और उसके बाद मनु के ब्लॉग की। बताते हैं कि जिसके बारे में सबसे बाद में पता चला, उससे सबसे पहले मुलाकात हो गई और सन्दीप भाई से अभी तक मिलना नहीं हुआ। सचिन अपना खुद का ब्लॉग भी बनाना चाहते थे। उन्होंने मनु से इस बारे में पूछा तो मनु ने कहा कि लेख लिखकर उन्हें भेज दो, वे अपनी वेबसाइट पर गेस्ट-पोस्ट के तौर पर छाप देंगे। अब सचिन को किसी तरह ब्लॉग बनाना आ गया और अब वे अपने ब्लॉग पर लिखते हैं। हालांकि सचिन के नये-ताजे ब्लॉग पर अभी कोई ट्रैफिक नहीं है, न ही कोई टिप्पणी आती लेकिन फिर भी वे अपने प्रदर्शन से खुश हैं।
सचिन ने पूछा कि आपको सबसे पहले ब्लॉग बनाने का विचार कैसे आया। यह बात मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूं कि जब मैं हरिद्वार में नौकरी करता था तो मेरे पास एक कम्प्यूटर और इंटरनेट हुआ करता था। उस फैक्टरी में बनने वाली चीजों की ड्राइंग बनाना, उन्हें जरुरत के हिसाब से अपडेट करना और प्रिंट आउट निकालना मेरा काम था। छोटी सी फैक्टरी थी, मैं ज्यादातर समय खाली बैठा रहता था। आपके सामने अच्छी स्पीड वाला नेट हो, आप क्या करोगे? शुरू शुरू में आप उस पर भूखों की तरह टूट पडोगे; ये देखोगे, वो देखोगे। लेकिन एक समय के बाद मन भर जायेगा। छोडकर जा नहीं सकते तो नये नये विचार मन में आने शुरू हो जायेंगे। वहीं इसी तरह का एक विचार आया कि फ्री में वेबसाइट कैसे बनाई जाये। वेबसाइट तो नहीं बनी लेकिन ब्लॉग बन गया।
सचिन की इच्छा स्लीपिंग बैग और टैंट देखने की थी। कमरे में ही टैंट लगाकर दिखा दिया। इस बहाने कई महीनों से बन्द पडे इन दोनों सामानों को भी कुछ ताजी हवा मिल जायेगी।

7. काफी दिनों से ब्लॉग पर डोनेट बटन लगाने का मन था। कई वेबसाइटों पर देखा था कि डोनेट बटन पर क्लिक करके आप तयशुदा राशि या अपनी मर्जी की राशि दान कर सकते थे। पे-पल के माध्यम से एक इस तरह का बटन मिल भी गया लेकिन यह अपने किसी प्रोडक्ट को बेचने जैसा था। जैसे ही डोनेट पर क्लिक करते, पे-पल का पेज खुलता। उसमें प्रोडक्ट की डिटेल भरी जाती, पता भरा जाता कि यह सामान कहां पहुंचाना है, फिर क्रेडिट या डेबिट कार्ड की डिटेल भरकर पैसे दे दिये जाते। इधर मुझे तो कोई सामान बेचना ही नहीं है और न ही किसी के घर पर पहुंचाना है। पैसे तो मुझे मिल जायेंगे लेकिन डर है कि कोई शिकायत न कर दे कि हमारे घर पर फलां सामान नहीं पहुंचा।
इस बारे में फेसबुक पर लिखा। जानकार मित्रों ने बताया कि पे-पल केवल विदेश से पैसा मंगाने के काम आता है। अगर कोई भारतीय पैसा देना चाहे तो नहीं दे सकता। इस वजह से पे-पल का विचार छोड दिया। कुछ मित्रों ने दूसरी साइटों का भी नाम लिया। कुछ ने कहा कि अपने बचत खाते की डिटेल ब्लॉग पर लिखकर छोड दो, जिसकी इच्छा होगी, दे देगा।
वैसे तो डोनेट बटन और इस तरह बचत खाते की डिटेल ब्लॉग पर लिखने में कोई अन्तर नहीं है लेकिन एक मूलभूत अन्तर यह है कि डोनेट बटन पर क्लिक करके आपके पास विकल्प आयेगा कि आपका कौन सा बैंक है। फिर आपको आपके बैंक के पेज पर ट्रांसफर कर दिया जाता है और वहां से लेन-देन कर सकते हैं। जबकि दूसरे तरीके में आपको यह सारा काम स्वयं करना पडेगा। फिर अकेले डेबिट कार्ड से पैसे नहीं भेजे जा सकते। आपकी नेट बैंकिंग या मोबाइल बैंकिंग एक्टिवेट होनी चाहिये। दस तरह के और झंझट होते हैं, तब जाकर आप पैसे भेज सकते हैं।
फिर ‘डोनेट’ बटन किसी मन्दिर में रखे दान-पात्र जैसा है और खाते की डिटेल चौराहे पर कटोरे जैसी। आत्मसम्मान बीच में आ जाता है। कुछ समय पहले लगा दी थी अपने खाते की डिटेल और कुछ पैसे आये भी थे लेकिन मित्रों ने ऐसा लताडा कि उसे हटाना पडा- घूमने की औकात नहीं है तो घूमना जरूरी है क्या?

Monday, April 7, 2014

मिज़ोरम से वापसी- चम्फाई से गुवाहाटी

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29 जनवरी 2014
मिज़ोरम साइकिल यात्रा का सत्यानाश हो चुका था। अब दिल्ली वापस लौटने का फैसला कर चुका था। अगर सबकुछ ठीक-ठाक चलता तो मेरे 12 फरवरी को मिज़ोरम से कोलकाता तक फ्लाइट और उसके बाद दिल्ली तक दूरोन्तो में टिकट बुक थे। रात दोनों टिकट रद्द कर दिये। अब 1 फरवरी को पूर्वोत्तर सम्पर्क क्रान्ति में वेटिंग टिकट बुक किया।
इस यात्रा का मुख्य आकर्षण बर्मा स्थित रीह-दिल झील देखना था। वहां केवल भारतीय नागरिक ही जा सकते हैं। किसी वीजा-पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं होती। सीमा पर निर्धारित मामूली शुल्क देकर एक दिन के लिये बर्मा में घूमने का आज्ञापत्र मिल जाता है। बडा उत्साह था अपने इस पडोसी देश को देखने का। लेकिन अब मानसिकता ऐसी थी कि कहीं भी जाने का मन नहीं था। एक तरह से मैं सदमे में था।
सचिन को विदा किया और दस बजे आइजॉल के लिये चलने वाली सूमो में बैठ गया। वह शेष यात्रा पूरी करेगा।
भले ही मैं और सचिन साथ-साथ घूम रहे थे लेकिन दोनों के उद्देश्य अलग-अलग थे। मेरा साध्य था मिज़ोरम भ्रमण और साधन साइकिल जबकि सचिन की साध्य थी साइकिल और साधन मिज़ोरम। बिल्कुल विपरीत लक्ष्य। उसे मिज़ोरम में ‘साइकिलिंग’ करनी थी ताकि बाद में इस यात्रा का प्रस्तुतीकरण देकर वह अपने ग्रुप में दुस्साहसी साइकिलिस्ट की सम्मानपूर्ण पदवी पा सके। वह पिछले साल अकेला लद्दाख गया था, कुछ महीने पहले अरुणाचल, फिर मुम्बई से कन्याकुमारी और अब मिज़ोरम।
जबकि मुझे मिज़ोरम देखना था। मुझे दूरी से कोई मतलब नहीं था। हालांकि रोज के हिसाब से योजना बनाकर अवश्य गया था लेकिन सचिन से पहले ही बता दिया था कि यह अन्तिम योजना नहीं है। अगर हम इस योजना से पिछडते चले गये तो आखिरी दिन साइकिल को बस या सूमो पर लादकर एयरपोर्ट ले जायेंगे। सचिन न ज़ोते गुफाएं देखने गया और न ही बर्मा बल्कि सीधा खावबुंग की ओर चला गया।
खैर, आइजॉल से चम्फाई की दो सौ किलोमीटर की दूरी हमने चार दिनों में तय की थी। अब चम्फाई से आइजॉल जाते हुए इन चार दिनों का फ्लैश-बैक देख रहा था। छह किलोमीटर पर वो जगह देखी जहां कल मैंने सामान उतारकर पुनः बांधा था ताकि साइकिल का सन्तुलन ठीक हो सके। तुईपुई में सूमो उस दुकान के सामने पांच मिनट खडी रही जहां हमने ढेर सारी आलू की पकौडियां खाई थीं। खावजॉल में वन विभाग के रेस्ट हाउस देखे जहां रेंजर के घर पर रात रुके थे। कालकुल में उस होटल पर सूमो आधे घण्टे रुकी और सभी यात्रियों ने लंच किया जहां एक लडकी ने सचिन से मेरे बारे में कहा था कि तुम्हारा मित्र काफी हैंडसम है। मैं यहां सूमो से नहीं उतरा। डर था कि कहीं वो दारूबाज आदमी पुनः न मिल जाये जिससे मैंने पीछा छुडाने की गरज से कहा था कि वापस लौटते समय आपको कैमरा बेच दूंगा। तब क्या मालूम था कि दो दिन बाद ही यहां आना पडेगा?
दुल्ते में सत्तर रुपये के एक दर्जन केले लिये। ये बिल्कुल भी स्वादिष्ट नहीं थे। मिज़ो लोग कभी दिल्ली आते होंगे और केले खाते होंगे तो मीठे, नरम और सस्ते केले खा-खाकर पागल हो जाते होंगे। इन्होंने उन नरम केलों को मिज़ोरम में लगाने की कोशिश तो की होगी लेकिन बांस की भूमि पर केले में भी कठोरता आ ही जाती है।
वो जगह देखी जहां हम नहाये थे और कपडे धोये थे। अब उस घर में ताला लगा था। हमारे समय में वह खुला था, वहां कोई नहीं था और अन्दर से एक बोतल उठाकर उसे काटकर हमने उसका मग्गा बनाया था। गृह मालिक ने गालियां तो अवश्य दी होंगी। उससे आगे तुईवॉल पुल पर मन्दिर भी देखा जहां हमने टैंट लगाया था और रात गुजारी थी।
कीफांग में सूमो नहीं रुकी। फिर भी तीन किलोमीटर आगे वो होटल मुझे दिख ही गया जहां हम भूखों ने शाही भोजन किया था। पांच किलोमीटर और आगे वह शेड देखा जहां हमने पहली रात को टैंट लगाया था। सेलिंग में सूमो आधे घण्टे को फिर रोक दी कुछ खाने-पीने को। मैंने उबले अण्डे और चाय लिये। सेलिंग मिज़ोरम के एकमात्र राष्ट्रीय राजमार्ग पर है। यहां हिमाचल के तीन-चार ट्रक दिखे। इन्हें देखकर मन में आया कि दौडकर इन्हीं पर चढ जाऊं।
जब तक आइजॉल पहुंचे, सूरज ढल चुका था और शहर में बत्तियां जलने लगी थीं। शहर में प्रवेश करते समय यह नजारा बेहद खूबसूरत था। फोटो तो इसका नहीं लिया। फिर कभी आऊंगा, तब के लिये पता चल गया है कि शाम को दिन ढलने के बाद यह शहर यहां राष्ट्रीय राजमार्ग से कितना खूबसूरत लगता है। मैंने आज तक ऐसा कभी नहीं देखा कि घने बसे शहर में बत्तियां भी जल चुकी हों और पीछे बैकग्राउण्ड में डूब चुके सूरज की बची-खुची रोशनी भी हो। वाकई शानदार नजारा था वह।
मन में आया कि यहां पांच सौ रुपये का कमरा लेने से बेहतर है कि सिल्चर जाया जाये। शाम के छह बज चुके थे। अन्धेरा हो चुका था। सूमो ने मुझे उस स्थान पर उतार दिया जहां से सिल्चर की सूमो मिलती हैं। इस भले मानस ने साइकिल चम्फाई से आइजॉल तक फ्री में पहुंचा दी। कोई पैसा नहीं लिया। जब सिल्चर वाली सूमो के ड्राइवर से बात करने लगा तो उसने साइकिल के सौ रुपये मांगे। मैंने बिल्कुल मना नहीं किया। सिल्चर से आइजॉल यह दो सौ में आई थी।
शहर भर का चक्कर काटकर इसने सवारियां एकत्र की, कुछ सामान भी उठाया और जब आइजॉल छोडा, रात के नौ बज चुके थे। मुझे सोना था, इसलिये मैंने पीछे कोने वाली सीट ली।
जब तक मिज़ोरम में रहे, सूमो कूदती ही रही। कभी कभी तो सिर छत से जा टकराता। असोम में आते ही अच्छी सडक मिल गई और गाडी की रफ्तार भी बढ गई। वैसे तो यहां से सिल्चर चालीस किलोमीटर के आसपास ही है लेकिन यहां सभी रात्रिकालीन सूमो दो-तीन घण्टे के लिये रुकती हैं। जिसे कुछ खाना हो, वह खा लेता है और जिसे सोना होता है, वह सो लेता है। मैंने दाल-चावल खाये और सूमों में ही जाकर सो गया। बाकी यात्री स्थानीय थे। उन्हें मालूम था कि कहां जाकर सोना है। मैं दो घण्टे तक सूमो में अकेला ही सोता रहा।
जब सिल्चर उतरे, तो साढे तीन बजे थे। काफी ठण्ड थी और सभी दुकानें बन्द थीं। इस समय किसी होटल में कमरा लेने का सवाल ही नहीं उठता। सुबह होगी तो गुवाहाटी वाली सूमो पकडूंगा। गुवाहाटी से यहां तक ट्रेन से आया था। एक बार सडक मार्ग भी देख लूं। यह बेहद घटिया निर्णय था। सिल्चर से सुबह वाली ट्रेन से ही निकल जाना था। अब सडक मार्ग से यात्रा करने के बाद मैं दूसरों को यही सलाह देता हूं कि कभी भी गुवाहाटी और सिल्चर की दूरी सडक से तय मत करना खासकर पब्लिक वाहनों में। ट्रेन से हालांकि ज्यादा समय लगता है लेकिन उत्तम है।
तो साढे तीन बजे सिल्चर में कोई हलचल नहीं थी। मेरे अलावा कुछ यात्री और भी थे जिन्हें गुवाहाटी जाना था। यहीं एक ट्रैवल एजेंट की दुकान के चबूतरे पर बैठे थे। धीरे धीरे सभी यात्री कुछ बिछाकर तो कुछ ओढकर लेटने लगे। मैंने भी अपना स्लीपिंग बैग निकाल लिया और चबूतरे पर ही सो गया।
पांच बजे जब ट्रैवल एजेंसी खुली तो मुझे उठाया गया। कहने लगे कि भाई, अन्दर चलो और वहां सो जाओ। ट्रैवल वालों की ही दुकान में अन्दर कुछ खाली जगह थी। इस समय मुझे इतनी तेज नींद आ रही थी कि मैंने कहा कि मुझे मत जगाओ। कहने लगे कि बहुत सर्दी हो रही है। मैंने कहा कि मुझे नहीं लग रही है। लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी और मुझे साइकिल समेत अन्दर ही जाना पडा। लेकिन जाकर पुनः सोने से पहले आठ बजे चलने वाली सूमो में गुवाहाटी का एक टिकट बुक करा दिया।
नौ बजे सूमो चली। मुझे अब लगातार यात्रा करते हुए लगभग चौबीस घण्टे हो चुके थे और अभी भी बारह घण्टे की यात्रा बाकी थी। सिल्चर से गुवाहाटी पहुंचने में बारह घण्टे लगते हैं। जब तक गाडी असोम में रही तो अच्छी सडक मिली और रफ्तार भी अच्छी रही। लेकिन मेघालय में घुसते ही रफ्तार पर ब्रेक लग गया। सडक इतनी ज्यादा खराब थी कि धूल के बीच सडक ढूंढना मुश्किल हो जाता था। दक्षिणी असोम, त्रिपुरा, मिज़ोरम और मणिपुर को मुख्य भारत से जोडने वाली यह एक महत्वपूर्ण सडक है। इस पर ट्रकों की जबरदस्त आवाजाही रहती है। एक तो खराब सडक, फिर ट्रकों के कारण यह और भी खराब होती जाती है। धूल इतनी कि गाडी के सभी शीशे बन्द कर लेने पर भी सांस लेना मुश्किल होने लगता।
अब दिल्ली को कोसने का मन कर रहा है- देश की राजधानी को। यह इलाका सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से बाकी देश से बिल्कुल भिन्न है। देखा जाये तो यहां से पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) जाना ज्यादा आसान है। इस इलाके को देश से जोडने वाली रेल लाइन भी देख ली और सडक भी। दोनों बेहद घटिया हालत में हैं।... और लग रहा है कि यहां गधे निवास करते हैं। अपनी छोटी छोटी बातों के लिये कभी असोम बन्द तो कभी पूर्वोत्तर बन्द कर देते हैं। देशवासियों और हिन्दीभाषियों को मारते हैं। लेकिन सडक और रेल के लिये कभी आन्दोलन नहीं करते। बल्कि तोड जरूर देते हैं। रहो बिना सडक के, बिना रेल के। दिल्ली, तू ठीक ही है। जिन्हें सडक की जरुरत नहीं है, उन्हें सडक देनी भी नहीं चाहिये। देते हैं तो तोड देते हैं। संस्कार बडे शक्तिशाली होते हैं। मिशनरियों ने इन्हें ईसाई बनाकर सभ्य और आधुनिक बनाने की कोशिश जरूर की है लेकिन जंगली और आदिवासी संस्कार आसानी से नहीं जायेंगे।
तो यह था मेरा मेघालय से पहला साक्षात्कार। देश के खूबसूरत राज्यों में मेघालय का नाम आता है। यहां सबसे ज्यादा बारिश होती है। लेकिन बारिश का भी एक मौसम होता है। बिना मौसम के यहां धूल उडती है। इस सडक से हटकर भले ही मेघालय अभी भी उतना ही खूबसूरत हो लेकिन फिलहाल यह मेरे लिये धूल भरी सडकों पर रेंग रेंग कर चलते वाहनों वाला राज्य है।
शिलांग के एक यात्री की वजह से अन्दर शहर से होकर जाना पडा, नहीं तो ड्राइवर बाइपास से जाने वाला था। इस बहाने शिलांग की एक झलक भी देख ली। अच्छा लगा। आऊंगा कभी।
भारत में सडकों पर हमेशा काम चलता रहता है लेकिन कभी पूरा नहीं होता। शिलांग-गुवाहाटी सडक अब महा-मार्ग बनने वाली है। चौडीकरण का काम चल रहा है। जैसे जैसे गुवाहाटी नजदीक आता जा रहा था, ट्रैफिक भी बढता जा रहा था। पूर्वोत्तर में मैंने इतने ट्रैफिक की कल्पना नहीं की थी।
मिज़ोरम से ही एक फौजी भी आ रहे थे। उन्हें दिल्ली जाना था अवध असम एक्सप्रेस से। उन्हें लग रहा था कि ट्रेन रात नौ बजे चलती है। लेकिन जब मैंने नेट पर देखकर बताया कि ट्रेन का समय नौ बजे नहीं, बल्कि दस बजे है तो उनकी जान में जान आई। हालांकि ड्राइवर ने गाडी चलाने में अपनी पूरी सामर्थ्य लगाई, फिर भी गुवाहाटी पहुंचते पहुंचते साढे नौ बज गये। अब वे साहब आसानी से ट्रेन पकड सकते हैं। हालांकि आज इस ट्रेन के समय में ढाई घण्टे का परिवर्तन किया गया था और अब यह साढे बारह बजे चलेगी।
स्टेशन के पास ही एक कमरा ले लिया। सबसे पहले भरपेट स्वादिष्ट भोजन किया। आज तीस जनवरी थी। मेरी ट्रेन परसों हैं। यानी कल पूरे दिन मैं गुवाहाटी में ही रहूंगा। घूमने की इच्छा नहीं थी और न ही कामाख्या मन्दिर देखने की। एक इच्छा थी कि गुवाहाटी से सुबह छह बजे चलने वाली लामडिंग पैसेंजर से लामडिंग जाऊं और शाम तक लौट आऊं।
 

मिज़ोरम साइकिल यात्रा
1. मिज़ोरम की ओर
2. दिल्ली से लामडिंग- राजधानी एक्सप्रेस से
3. बराक घाटी एक्सप्रेस
4. मिज़ोरम में प्रवेश
5. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- आइजॉल से कीफांग
6. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- तमदिल झील
7. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- तुईवॉल से खावजॉल
8. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- खावजॉल से चम्फाई
9. मिज़ोरम से वापसी- चम्फाई से गुवाहाटी
10. गुवाहाटी से दिल्ली- एक भयंकर यात्रा

Wednesday, April 2, 2014

मिज़ोरम साइकिल यात्रा- खावजॉल से चम्फाई

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28 जनवरी 2014
सचिन ने आवाज लगाई, तब आंख खुली। रात बेहद शानदार नींद आई थी, इसलिये थोडा इधर उधर देखना पडा कि हम हैं कहां। हम खावजॉल में एक घर में थे। सचिन कभी का उठ चुका था और उसने अपना स्लीपिंग बैग बांधकर पैक भी कर लिया था। जब मैं उठा, तो घर की मालकिन ने वहीं चूल्हा रखकर एक कप चाय बनाई और मुझे दी। सचिन जब उठा था, तब उसके लिये बनाई थी।
साढे सात बजे यहां से चल पडे। कुछ आगे ही एक तिराहा था जहां से सीधी सडक ईस्ट लुंगदार जा रही थी और बायें वाली सडक चम्फाई। लुंगदार वाली सडक पर एक गांव है- बाइते। हम चम्फाई से आगे बर्मा सीमा के अन्दर बनी रीह दिल झील देखकर खावबुंग जायेंगे और वहां से बाइते और फिर आगे ईस्ट लुंगदार और फिर और भी आगे।
मिज़ोरम में कई स्थान दिशाओं के नाम पर हैं जैसे ईस्ट लुंगदार, वेस्ट लुंगदार, नॉर्थ वनलाइफाई, साउथ वनलाइफाई आदि। जरूरी नहीं कि इस तरह के ईस्ट व वेस्ट आसपास ही हों। ये पूरे मिज़ोरम में कहीं भी हो सकते हैं, कई सौ किलोमीटर दूर भी। जैसे ईस्ट लुंगदार खावजॉल से सत्तर किलोमीटर दूर है तो वेस्ट लुंगदार आइजॉल के पश्चिम में रीईक के पास। नॉर्थ वनलाईफाई यहां है तो साउथ वनलाईफाई दक्षिण मिज़ोरम में सैहा से करीब 100 किलोमीटर दूर संगाऊ के पास। इसी तरह के और भी स्थान हैं।
डेढ घण्टा लगा यहां से 17 किलोमीटर दूर तुईपुई पहुंचने में। खावजॉल 1200 मीटर पर है, तुईपुई 750 मीटर पर और उसके बाद चम्फाई 1300 मीटर की ऊंचाई पर है। तुईपुई गांव इसी नाम की एक नदी के किनारे बसा है। यहां बीआरओ का बनाया एक विशाल कंक्रीट का पुल है। नीचे घाटी में स्थित होने के कारण तुईपुई में एयरटेल का नेटवर्क नहीं है।
खावजॉल से हम बिना कुछ खाये चले थे, तुईपुई से चम्फाई तक लगातार चढाई है तो यहां कुछ खाना पडेगा। एक ढाबे में घुस गये। घुसते ही निगाह पडी आलू की टिक्कियों जैसी किसी चीज पर। मिज़ोरम में हमें आलू की सब्जी तक नहीं मिली, यहां टिक्कियां हैं; यह देखकर मन में कुछ सन्देह हुआ। पूछताछ की तो पता चल गया कि ये आलू की टिक्कियां ही हैं। उनमें पता नहीं क्या मिला रखा था कि इनके ऊपर एक पतली सी परत बनी हुई थी। इस परत का रहस्य समझ नहीं आया। साथ ही इन्हें हिन्दी टिक्कियों की तरह तवे पर नहीं बल्कि कढाई में पकौडियों की तरह तला जा रहा था। टिक्कियां बनाईं और तेल में छोड दीं। इन पर बेसन आदि नहीं लगाया गया। फिर भी इनके ऊपर बनी परत सन्देहास्पद तो थी। शायद इनमें अण्डा भी मिला हो।
कुछ भी हो, हमें यह टिक्की बेहद पसन्द आई। मिज़ो परांठे फीके होते हैं, बिल्कुल बेस्वाद। परांठे पर यह टिक्की रखकर ‘रोल’ बनाकर खाने में आनन्द आ गया। साथ में चाय ले ली। यह मिज़ोरम में अब तक का हमारा सबसे स्वादिष्ट भोजन था। दोनों ने कम से कम बीस टिक्कियां और दस परांठे खा डाले।
पिछले कई दिनों से साइकिल चलाते रहने की वजह से अब मुझे उतनी कठिनाई महसूस नहीं हो रही थी, जितनी पहले दिन हुई थी। तुईपुई से चम्फाई 19 किलोमीटर है। दस बजे जब तुईपुई से चले तो लक्ष्य था दो बजे तक चम्फाई पहुंच जाने का। इसके बाद ज़ोते जाकर गुफाएं देखते और फिर ज़ोखावतार चले जाते। ज़ोखावतार भारत-बर्मा सीमा पर है। कल सीमा पार करके रीह-दिल झील देखते।
लेकिन, जैसा सोचा जाता है वैसा अक्सर नहीं होता। होनी को कुछ और ही मंजूर होता है।
साइकिल की चेन पिछले गियर पर दूसरे से तीसरे पर, तीसरे से चौथे पर और अगर और पैडल मारते जाते तो पांचवें और छठे गियर पर जा गिरती। इसका गियर चेंजर चूंकि टूट चुका था, इसलिये चेन को नियन्त्रित करने वाला कोई नहीं था। दो दिन पहले यह दूसरे से पहले पर जा चढती तो कोई खास समस्या नहीं आती लेकिन अब ज्यादा समस्या की बात थी क्योंकि चौथा या पांचवां गियर दूसरे के मुकाबले ज्यादा स्पीड देते हैं इसलिये जोर भी ज्यादा लगाना पडता है। फिर रास्ता चढाई भरा था। चढाई वाले रास्तों पर चेन दूसरे या पहले गियर पर ही रखी जाती है। चौथे पांचवें गियर पर रखेंगे तो अत्यधिक शक्ति लगानी पडेगी। दस पांच मीटर तक तो अत्यधिक शक्ति लगाई जा सकती है लेकिन कई किलोमीटर तक नहीं। अभी भी चम्फाई आठ किलोमीटर दूर था।
जब कई बार हाथ से चेन छठे गियर पर चढा चुका और वो फिर उतर जाती तो इंजीनियरी दिमाग में आई। चेन इसी दिशा में बार बार इसलिये उतर रही है क्योंकि शायद साइकिल इस दिशा में झुकी हुई है। यानी साइकिल पर बंधा सामान कुछ दूसरी दिशा में हो गया है। इसलिये एक जगह साइकिल रोककर सारा सामान उतारकर पुनः बांधा लेकिन फिर फिर वही ढाक के तीन पात।
अब तक सचिन चम्फाई पहुंच चुका था। उसका फोन आया। मैंने समस्या बताई और कहा कि अभी छह किलोमीटर पीछे हूं, पैदल आ रहा हूं। पैदल साइकिल को लेकर चलता गया। सोचता गया- चेन इसलिये उतर रही है क्योंकि इसे कण्ट्रोल करने वाला कोई नहीं है। अभी हम आवाजाही वाले इलाके से गुजर रहे हैं। कल के बाद हमें बर्मा सीमा के साथ साथ बिल्कुल दूरस्थ इलाके में चलना है। वहां इस तरह की समस्या आती तो ज्यादा मुश्किल होती। अच्छा हुआ कि चम्फाई के पास ही ऐसा हुआ है। ठीक होना तो मुश्किल है। मेरे धीरे चलने की वजह से सचिन पहले ही परेशान है। अब और ज्यादा परेशान हो जायेगा। आखिर उसे भी अपने ‘प्रतिद्वन्द्वियों’ को सफल मिज़ोरम यात्रा दिखानी है। अब मैं और आगे नहीं बढूंगा। कल आइजॉल और दिल्ली लौट जाऊंगा।
अपना यह फैसला जब सचिन को बताया तो वो परेशान हुआ। वह स्वयं मेरी साइकिल को लेकर एक मिस्त्री के पास गया। मिस्त्री इसे ठीक करने में असमर्थ था। अगर इसका गियर चेंजर मिल जाता तो बात बन जाती, लेकिन चम्फाई जैसे छोटे कस्बे में कहां मिलेगा? नहीं मिला। अब मेरे वापस लौटने पर मोहर लग गई।
वैसे तो बर्मा सीमा पर कोई तारबन्दी नहीं है, फिर भी आधिकारिक रूप से भारत से बर्मा जाना आसान नहीं है। अरुणाचल-बर्मा सीमा पर पहले तो बीएसएफ से अनुमति लेकर जा सकते हैं जो कि आसान नहीं है, फिर उस तरफ जाया जा सकता है। मणिपुर-बर्मा सीमा पर मोरे में भी कुछ ऐसा ही है। लेकिन मिज़ोरम-बर्मा सीमा पर ऐसा नहीं है। यहां इधर से उधर बेरोकटोक आया जाया जा सकता है। जब से मैंने यह पढा था, तभी यहां आने की इच्छा होने लगी थी। यही इच्छा इस मिज़ोरम यात्रा की जननी थी।
लेकिन अब मन इतनी बुरी तरह खिन्न था कि ज़ोखावतार न जाने की सोच ली। मुझे नहीं पता कि अब कब चम्फाई आना हो या न हो। लेकिन इस महा-यात्रा के खाक में मिल जाने से कुछ भी करने का मन नहीं था। कहीं भी जाने का मन नहीं था। दो सप्ताह बाद की आइजॉल से कोलकाता की फ्लाइट कैंसिल करा दी। और तीन दिन बाद की गुवाहाटी से दिल्ली का ट्रेन टिकट पूर्वोत्तर सम्पर्क क्रान्ति में वेटिंग में बुक कर दिया। उम्मीद है कि चार्ट बनने तक सीट कन्फर्म हो जायेगी।
सचिन ने यात्रा जारी रखने का फैसला किया। वह अकेला घूम सकता है, इसलिये मुझे उसे इस तरह बीच में छोड देने का उतना दुख नहीं हुआ। साथ ही एक खुशी भी हुई कि अब उसे मेरी वजह से धीरे धीरे नहीं चलना पडेगा। अब वो अपनी प्राकृतिक स्पीड से चलेगा। दूरी-ऊंचाई का नक्शा उसे दे दिया। स्लीपिंग बैग उसके पास था ही, किसी आपातकाल के लिये टैंट भी उसे दे दिया। खरीदने से उसने मना कर दिया। मैंने कहा कि कभी मुम्बई आऊंगा, टैंट ले आऊंगा। साथ ही टैंट को हवाई जहाज में ले जाने के लिये एक हजार रुपये भी दे दिये।
चम्फाई एक बडा शहर है, जिला मुख्यालय भी है। कई होटल हैं। हमें पांच सौ रुपये का एक कमरा मिला, कमरा शानदार था। मैं कल आइजॉल जाने के लिये सूमो में एक सीट बुक कर आया। दस बजे वाली सूमो में सीट मिली। यहां सूमो काउण्टर से कई कई दिन पहले अपनी सीटें बुक कर सकते हैं।

चांगतु रेस्टॉरेंट, चम्फाई

खावजॉल में, जिनके यहां रुके थे, चाय बन रही है।


एक प्राकृतिक नजारा

तुईपुई नदी और गांव

तुईपुई पुल पर

आलू की टिक्कियां हैं या पकौडे?


आसमान में जाता एक वायुयान



चम्फाई के एक रेस्टॉरेंट में मेन्यू कार्ड


झूम खेती
मिज़ोरम में झूम खेती का प्रचलन है। इसमें जंगल के एक हिस्से को पूर्णतया साफ करके उस उत्पन्न हुई जमीन पर खेती की जाती है। उस हिस्से में जितने भी पेड होते हैं, सभी को काटकर या जलाकर समाप्त कर दिया जाता है। झाडियों और छोटे पौधों में आग लगा दी जाती है। जाहिर है कि राख से जमीन और ज्यादा उपजाऊ होती है। फिर इस पर खेती होती है। इसमें धान, फल और सब्जियां उगाई जाती हैं। कुछ समय बाद जब जमीन की उर्वरता घटने लगती है तो इसे छोड दिया जाता है और फिर किसी दूसरे हिस्से में जंगल नष्ट करके खेती योग्य जमीन बनाई जाती है।
सैंकडों वर्षों से मिज़ोरम समेत पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में ऐसा होता चला आ रहा है। इस वजह से वहां अत्यधिक वर्षा होने के बावजूद भी बडा पेड नहीं मिलता। ले-देकर बांस ही है। परती जमीन को जब छोड देते हैं तो वहां घास और झाडियां उग आती हैं। पूरे राज्य में जंगल के नाम पर इसी तरह की झाडियों का साम्राज्य है।
झूम खेती पर्यावरण के लिये अत्यधिक हानिकारक है। इस वजह से मिज़ोरम सरकार ने झूम बहिष्कार नामक योजना चला रखी है। जीविका के लिये पशुपालन पर ज्यादा जोर है खासकर सूअर-पालन पर। यह योजना हाल ही में लागू की गई है और अगले पांच वर्षों में झूम के पूर्ण बहिष्कार का लक्ष्य रखा गया है। यह योजना अगर मिज़ोरम में रफल रही तो पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों में भी इसे लागू किया जायेगा।

अगले भाग में जारी...

मिज़ोरम साइकिल यात्रा
1. मिज़ोरम की ओर
2. दिल्ली से लामडिंग- राजधानी एक्सप्रेस से
3. बराक घाटी एक्सप्रेस
4. मिज़ोरम में प्रवेश
5. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- आइजॉल से कीफांग
6. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- तमदिल झील
7. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- तुईवॉल से खावजॉल
8. मिज़ोरम साइकिल यात्रा- खावजॉल से चम्फाई
9. मिज़ोरम से वापसी- चम्फाई से गुवाहाटी
10. गुवाहाटी से दिल्ली- एक भयंकर यात्रा