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Thursday, January 19, 2017

राष्ट्रीय मरु उद्यान - डेजर्ट नेशनल पार्क

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18 दिसंबर 2016
इस नेशनल पार्क से हमारा सामना अचानक अपने आप ही हो गया। असल में हमारी योजना थी - मुनाबाव से तनोट जाना। सीधा रास्ता है जैसलमेर के रास्ते जाओ। लेकिन मैं चाहता था कि सीमा के नज़दीक-नज़दीक ही रहें। एक सड़क म्याजलार से पश्चिम में जाती है और आगे सम के पास कहीं जाकर निकलती है। इसका और अन्य कई सड़कों का मैंने सैटेलाइट से अच्छी तरह अध्ययन किया। चूँकि इंटरनेट पर इस इलाके के बारे में, इसकी सड़कों के बारे में कुछ भी जानकारी उपलब्ध नहीं थी, सैटेलाइट इमेज पर भरोसा करके तय कर लिया था कि इस सड़क से पश्चिम में जायेंगे। यह कच्ची सड़क नहीं थी और सैटेलाइट से देखने पर काली लकीर स्पष्ट दिख रही थी, जिससे इतना तो पक्का हो गया कि एक साल पहले तक या दो साल पहले तक यहाँ पक्की सड़क थी। गूगल में सैटेलाइट इमेज एक-दो साल पुरानी होती हैं। ट्रैफिक नहीं होता और बारिश नहीं होती, इसलिये सड़क ख़राब होने की कोई संभावना नहीं।

Monday, January 16, 2017

खुड़ी - जैसलमेर का उभरता पर्यटक स्थल

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17 दिसंबर 2016
एक घंटे में ही म्याजलार से 56 किलोमीटर दूर खुड़ी आ गये। यहाँ से जैसलमेर लगभग 50 किलोमीटर है। खुड़ी अपने रेत के टीलों के लिये प्रसिद्ध है। चारों तरफ़ टैंट कालोनियाँ ही थीं। अब हम फिर से ‘सभ्यता’ में आ गये थे। अगर हम यहाँ अपने टैंट लगाते, तो किसी भी तरह की परेशानी की बात नहीं थी। यहाँ खूब पर्यटक आते हैं और खुड़ी वालों के लिये हमारे टैंट असामान्य नहीं होते। लेकिन मैं इरादा कर चुका था कि अपना टैंट नहीं लगाना। थोड़े-बहुत पैसे खर्च होंगे, लेकिन नर्म बिस्तर पर पैर फैलाकर सोने की सुविधा होगी, हगने-मूतने की सुविधा होगी और ‘प्राइवेसी’ होगी। टैंट तो आपातकाल के लिये होते हैं। सुमित के लिये टैंट नयी चीज थी, इसलिये वह टैंट ही लगाना चाहता था, लेकिन उसने भी हमारा साथ दिया।
एक रिसॉर्ट वाले के यहाँ बात की। जानते थे कि ये बहुत महँगे होते हैं, फिर भी बात कर ली।

Thursday, January 12, 2017

थार के सुदूर इलाकों में : किराडू - मुनाबाव - म्याजलार

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17 दिसंबर 2016
किराडू से साढ़े ग्यारह बजे चले। अगला लक्ष्य था मुनाबाव में भारत-पाक सीमा देखना। सड़क सिंगल है, लेकिन ट्रैफिक न होने के कारण कोई दिक्कत नहीं होती। कभी-कभार कोई ट्रक या कोई जीप सामने से आ जाती।
रामसर एक बड़ा गाँव है। अच्छी चहल-पहल थी।
गड़रा रोड़ से दो किलोमीटर पहले सड़क किनारे लगे एक सूचना-पट्ट पर निगाह गयी - “शहीद स्मारक लोको पायलट, 1965 भारत पाक युद्ध।” तुरंत बाइक रोकी और मुख्य सड़क से लगभग 100 मीटर दूर रेलवे लाइन के किनारे ले गये। यहाँ एक स्मारक बना है। गौरतलब है कि 1965 के भारत-पाक युद्ध में कश्मीर से लेकर गुजरात तक लड़ाई छिड़ी हुई थी। इतनी लंबी सीमा में कभी भारतीय सेना पाकिस्तान के अंदर जाकर कब्जा कर लेती, तो कभी पाकिस्तानी सेना भारत के अंदर। मुनाबाव रेलवे स्टेशन पाकिस्तान के कब्जे में आ गया था। उसी दौरान बाड़मेर से मुनाबाव जाती एक ट्रेन पर 10 सितंबर की रात साढ़े दस बजे गड़रा रोड़ के पास पाकिस्तान ने निशाना साधा। इसके गार्ड़ और फायरमैन समेत कई कर्मचारी शहीद हो गये। थोड़ा आगे इंजीनियरिंग स्टाफ का शहीद स्मारक भी है।

Monday, January 9, 2017

किराडू मंदिर - थार की शान

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17 दिसंबर 2016
सूरज की पहली किरण निकलने से पहले ही हमने टैंट उखाड़कर पैक कर लिये थे। हम नहीं चाहते थे कि उत्सुक ग्रामीण यहाँ आयें और पूछताछ करें। थोड़े-से फोटो खींचे और निकल पड़े।
बाड़मेर बाईपास पर एक जगह चाय-नाश्ता किया और मुनाबाव वाली सड़क पर चल दिये। सीमा सड़क संगठन द्वारा लगाया गया हरे रंग का बोर्ड़ कह रहा था - “प्रोजेक्ट चेतक बाड़मेर-गड़रा-मुनाबाव सड़क पर आपका स्वागत करता है।” साथ ही दूरियाँ भी लिखी थीं - मारुडी 10 किलोमीटर, जसई 20 किलोमीटर, हतमा 34 किलोमीटर, रामसर 59 किलोमीटर, गड़रा 85 किलोमीटर और मुनाबाव 125 किलोमीटर।
मारुडी में दो पेट्रोल पंप हैं। हमने टंकियाँ फुल करा लीं। आगे मुनाबाव तक या जैसलमेर तक 250-300 किलोमीटर तक कोई पेट्रोल पंप हो या न हो। बाद में पता चला कि रामसर में भी पेट्रोल पंप है और शायद गड़रा में भी।



तो नौ बजे बाड़मेर से हम चल दिये - गर्मागरम बनी कचौड़ियाँ चाय के साथ खाकर। ट्रैफिक बहुत कम था, लेकिन जितनी उम्मीद कर रखी थी, उससे ज्यादा ही था। बाड़मेर से 35 किलोमीटर आगे एक जगह रुक गये। यहाँ से हमें यह सड़क छोड़कर दाहिने मुड़ना था - किराडू जाने के लिये, जो यहाँ से 2 किलोमीटर दूर था।
एक बंद दरवाजे के सामने बाइक रोक दी। आवाज लगायी, तो चौकीदार निकलकर आया और दरवाजा खोला। बाइक और सामान यहीं छोड़कर और 50-50 रुपये के टिकट लेकर हम अंदर घुस गये। हमारे अलावा कोई भी नहीं था। कोई होगा भी क्यों? किराडू अभी प्रसिद्ध नहीं हो पाया है।
“किराडू 11-12वीं शताब्दी में एक समृद्ध नगरी थी। यहाँ के परमार एवं चौहान शासक गुजरात के सोलंकी राजाओं के अधीन थे। विदेशी आक्रांताओं के फलस्वरूप यह नगरी उजड़ गयी। इस नगरी में 11वीं शताब्दी ई. में अनेक भव्य मंदिरों के निर्माण हुए, जो आज भी हमारे प्राचीन गौरव के प्रतीक हैं। वर्तमान में मरु-गुर्जर शैली के मात्र पाँच शैव-वैष्णव मंदिरों के भग्नावशेष ही अवशिष्ट हैं। इनमें सोमेश्वर मंदिर सर्वाधिक अनूठा है। गर्भगृह, अंतराल, महामंडप तथा द्वारमंडप कक्षों से युक्त यह मंदिर विभिन्न कलापूर्ण अभिव्यक्तियों, प्रतिमाओं आदि से अलंकृत है।”
एक कथा भी है। कोई साधु अपने शिष्य के साथ यहाँ रहता था। एक बार साधु शिष्य को इस मंदिर की देखभाल के लिये छोड़कर तीर्थयात्रा पर चला गया। वापस लौटा तो देखा कि शिष्य बीमार था और किसी भी ग्रामीण ने उसकी देखभाल नहीं की थी, सिवाय एक कुम्हारिन के। साधु ने क्रोधित होकर पूरे गाँव को श्राप दे दिया कि सभी मनुष्य पत्थर के हो जायें। उस कुम्हारिन से कहा कि तूने चूँकि इसकी सेवा की है, इसलिये तू यहाँ से चली जा। लेकिन अगर पीछे मुड़कर देख लिया तो तू भी पत्थर की हो जायेगी। कुम्हारिन जाने लगी, लेकिन कुछ दूर जाकर अपनी जन्मभूमि को आख़िरी बार देखने पीछे मुड़ गयी। वह भी पत्थर की हो गयी। कहते हैं कि उसकी भी प्रतिमा पास के गाँव में है, जिसे हम नहीं देख पाये।
खैर, वजह कुछ भी हो। किराडू के ये मंदिर आपको अपने गौरवशाली अतीत की भी याद दिलाते हैं और इनके भग्नावशेष आपको परेशान भी करते हैं। पाँच ही मंदिर बचे हैं। मतलब पाँच ही मंदिरों के भग्नावशेष बचे हैं। बाकी सब रेत में, झाड़ियों में, काँटों में टूटे-फूटे दबे पड़े हैं। हमने प्रत्येक मंदिर के प्रत्येक कोण से जमकर फोटो लिये।
मुझे मूर्तिकला की ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन यहाँ की मूर्तिकला देखकर ऐसा पागल-सा हो गया, जैसे कोई गरीब स्वर्ण-भंडार में पहुँच गया हो और उसे स्वर्ण उठाने की पूरी आज़ादी हो। हालाँकि समय की मार के आगे पत्थर स्वतः भी कमजोर पड़ने लगे हैं, लेकिन मैं और दीप्ति इन पर उकेरी मूर्तियों, उनकी कथाओं की चर्चा करते रहे। प्रत्येक मंदिर का गर्भगृह खाली था और उनमें चमगादड़ों के मल की बू आ रही थी। कुछ में मेंगनी भी पड़ी थी, जिसका अर्थ था कि यहाँ बकरियाँ आकर धूप से बचने की कोशिश करती हैं।
कुछ मूर्तियाँ काम-क्रिया पर भी केंद्रित हैं, जिनके कारण किराडू को ‘राजस्थान का खजुराहो’ भी कह दिया जाता है।
कई जगह मूर्तियों से अलग कुछ ज्यामितीय संरचनाएँ भी हैं, जिनका अर्थ मुझे नहीं पता।
यहाँ आप रात भी रुक सकते हैं, कमरे बने हुए हैं। हालाँकि कोई रुकता नहीं है। चौकीदार ने बताया कि इनकी बुकिंग जोधपुर से होती है। अगर आप यहाँ रात रुकने की योजना बना रहे हैं, तो कुछ असुविधाओं के लिये तैयार रहिये। आसपास और दूर-दूर तक कोई भी बाज़ार नहीं है। आपसे पहले कोई यहाँ पता नहीं कितने महीने पहले रुका होगा, तो बंद कमरों की अजीब बदबू भी परेशान करेगी। बेहतर वही है, जो बाकी यात्री करते हैं। बाड़मेर से सुबह आईये और घूम-घामकर उसी दिन वापस चले जाइये।
ऊपर पहाड़ी पर चामुंडा माता का मंदिर है। वहाँ से इन मंदिरों के भग्नावशेष बड़े शानदार दिखते होंगे, लेकिन तेज धूप और आगे लंबी दूरी तय करने के दबाव में हम वहाँ नहीं गये।
सार्वजनिक वाहनों से जाना थोड़ा मुश्किल है। बसें बहुत कम चलती हैं। बस आपको ढाई-तीन किलोमीटर दूर मेन रोड़ पर छोड़ देगी, फिर आपको पैदल आना पड़ेगा। रेलवे स्टेशन तो निःसंदेह बाड़मेर ही है। बाड़मेर-मुनाबाओ रेलवे लाइन मंदिरों के नज़दीक से ही गुजरती है, लेकिन आसपास कोई स्टेशन नहीं है। ट्रेन पंद्रह किलोमीटर दूर भाचभर में रुकती है।

महाबार सैंड़ ड्यून्स के पास हमारा टैंट




बाड़मेर से दूरियाँ



किराडू मंदिरों की तरफ़ जाती सड़क



































अगला भाग: थार के सुदूर इलाकों में : किराडू - मुनाबाव - म्याजलार

(प्रत्येक फोटो पर नंबर लिखे हैं। आपको कौन-सा फोटो सबसे अच्छा लगा? अवश्य बतायें।)




Friday, January 6, 2017

थार बाइक यात्रा: जोधपुर से बाड़मेर और नाकोड़ा जी

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16 दिसंबर 2016
जोधपुर से साढ़े ग्यारह बजे चले। करा-धरा कुछ नहीं, बस पड़े सोते रहे। फिर थोड़े-से नहा लिये, थोड़ा-सा खा लिया और निकल पड़े। बाइक में इंजन ऑयल कम था। पेट्रोल पंप पर टंकी फुल करायी तो इंजन ऑयल की एक बोतल भी ले ली। आगे एक मिस्त्री के पास गये तो पता चला कि मालिक थोड़ी देर में आयेगा, तब तक हमें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। उस समय तक मुझे नहीं मालूम था कि बाइक में बचा हुआ इंजन ऑयल निकालकर नया ऑयल डालना पड़ेगा। मैंने सोचा कि जितना कम है, उतना डाल देते हैं। वहीं एक आदमी ने इसे डाल दिया। डालने के बाद कहने लगा कि आपको ऑयल रिप्लेस कराना चाहिये था। मैंने कहा - अरे डाला भी तो तुमने ही है। पहले ही क्यों नहीं कहा कि रिप्लेस होता है? बाद में सुमित ने भी ऐसा कहा, लेकिन बाड़मेर पहुँचने पर - ‘नीरज, तुम तो मैकेनिकल इंजीनियर हो। क्या तुम्हें पता नहीं है कि इंजन ऑयल रिप्लेस होता है?’ मैं चिड़चिड़ा-सा हो गया - ‘ओये, तुम भी तो वहीं खड़े थे। उसी समय क्यों नहीं टोका? और अब क्यों टोक रहे हो?’
सुमित ने कहा - ‘मैंने सोचा कि तुम इंजीनियर हो। तुम्हें पता ही होगा।’
‘अरे तुम भी तो डॉक्टर हो। फिर दाँत का इलाज क्यों नहीं करते? क्यों मरीजों को डेंटिस्ट के पास भेजते हो?’

Wednesday, January 4, 2017

थार बाइक यात्रा - एकलिंगजी, हल्दीघाटी और जोधपुर

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15 दिसंबर 2016
शक्ति सिंह दुलावत अपने एक मित्र के साथ सुबह-सुबह ही उदयपुर से आ गये। साथ में ढेर सारा नाश्ता - मेरा पसंदीदा और दीप्ति का ना-पसंदीदा ढोकला भी। अब बड़ी देर तक और बड़ी दूर तक कुछ भी खाने की आवश्यकता नहीं।
एकलिंगजी में भगवान शिव का मंदिर है। यह मेवाड़ के राजाओं की निजी संपत्ति है। फोटो खींचना वर्जित है। लेकिन आठवीं शताब्दी में बने छोटे-बड़े 108 मंदिर मूर्तिकला से भरपूर हैं। मन करता है कि इन्हें देखते रहो और फोटो खींचते रहो। फोटो नहीं खींच सकते, लेकिन देख तो सकते ही हैं।
जिनका भी यह मंदिर है, उनसे मेरी प्रार्थना है कि भले ही थोड़ी-बहुत राशि ले लिया करें, लेकिन फोटोग्राफी होने दो यहाँ। फोटो खींचने से भक्तिभाव में कमी नहीं आती - यक़ीन मानिये। और जिनमें भक्तिभाव नहीं है, उनमें प्रतिबंध लगाकर यह पैदा भी नहीं की जा सकती।
फोटोग्राफी रोकने के लिये चप्पे-चप्पे पर गार्ड़ तैनात रहते हैं।

Monday, January 2, 2017

थार बाइक यात्रा - भागमभाग

यह जो सुमित है ना इंदौर वाला ... इसका ऑफ़ सीजन हो जाता है सर्दियों में ... कोई बीमार नहीं पड़ता ... बीमार पड़ता भी है तो सर्दी-जुकाम ही होते हैं ... मेडिकल स्टोर से ले आते हैं दवाई ... डॉक्टर के पास जाने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती ... मतलब सर्दियों में कोई सुमित के क्लीनिक नहीं आता ... इसके पास मक्खियाँ तक नहीं होतीं मारने को ...
तब इसे सूझती है खुराफ़ात ... घुमक्कड़ी की खुराफ़ात ... कहने लगा थार जाऊँगा ... बाइक से ... दिसंबर में ... मैंने मना किया ... रहने दे भाई ... मुझे जनवरी में अंड़मान जाना है ... दिसंबर में मुश्किल हो जायेगी ... और अगर दिसंबर में छुट्टियाँ मिल गयीं तो जनवरी में मुश्किल होगी ... बोला ... नहीं मानूँगा ... हमने भी कह दिया ... नहीं मानेगा तो ठीक ... चलेंगे हम भी ... 12 तारीख़ को ईद थी ... खान साहब मेहरबान हो गये ... बिना झगड़े छुट्टियाँ मिल गयीं ... और हमारी बाइक पर सारा सामान लद गया ...
दीप्ति को ... मतलब निशा को ... मतलब पिछले साल तक वह निशा थी ... अब के बाद उसे उसके वास्तविक नाम दीप्ति से पुकारा करेंगे ... तो दीप्ति को वसंत विहार जाना पड़ गया ... बहुत सारे काम होते हैं ... उसका मायका है वहाँ ... एक काम बैंक से पैसे निकालना भी था ... रास्ते में पैसे ख़त्म हो गये तो कहीं ए.टी.एम. की लाइन में थोड़े ही खड़े होंगे?

Monday, December 26, 2016

2016 की यात्राओं का लेखा-जोखा

यह साल बड़ा ही उलट-पुलट भरा रहा। जहाँ एवरेस्ट बेस कैंप जैसी बड़ी और यादगार यात्रा हुई, वहीं मणिमहेश परिक्रमा जैसी हिला देने वाली यात्रा भी हुई। इस वर्ष बाकी वर्षों के मुकाबले ऑफिस से सबसे ज्यादा छुट्टियाँ लीं और संख्यात्मक दृष्टि से सबसे कम यात्राएँ हुईं। केवल नौ बार बाहर जाना हुआ, जिनमें छह बड़ी यात्राएँ थीं और तीन छोटी। बड़ी यात्राएँ मलतब एक सप्ताह या उससे ज्यादा। इस बार न छुटपुट यात्राएँ हुईं और न ही उतनी ट्रेनयात्राएँ। जबकि दो-दिनी, तीन-दिनी छोटी यात्राएँ भी कई बार बड़ी यात्रा से ज्यादा अच्छे फल प्रदान कर जाती हैं। 
ज्यादा न लिखते हुए मुख्य विषय पर आते हैं:

Monday, December 5, 2016

चोपता से दिल्ली बाइक यात्रा

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3 नवंबर 2016
सुबह नौ बजे जब मैं कमरे से बाहर निकला और बाइक के पास गया तो होश उड़ गये। इसकी और अन्य बाइकों की सीटों पर पाला जमा हुआ था। मतलब बर्फ़ की एक परत जमी थी। हाथ से नहीं हटी, नाखून से भी नहीं खुरची जा सकी। बमुश्किल लकड़ी व टूटे हुए प्लास्टिक के एक टुकड़े से इसे हटाया। पास में ही कुछ बंगाली ऊपर तुंगनाथ जाने की तैयारी कर रहे थे। आठ-दस साल का एक लड़का मेरे पास आया - ‘क्या यह बर्फ़ है?’ मैंने कहा - ‘हाँ।’ सुनते ही उसने बाकी बच्चों को बुला लिया - इधर आओ सभी, बर्फ़ देखो।
मुझे इसी बात का डर था। मैं शाम के समय ही चोपता आना चाहता था और शाम के समय ही यहाँ से जाना चाहता था। कल तुंगनाथ से लौटने में विलंब हो गया था, तो यहीं रुकना पड़ा। अब रास्ते में ब्लैक आइस मिलेगी। मुझे बड़ा डर लगता है ब्लैक आइस से।

Friday, November 18, 2016

तुंगनाथ और चंद्रशिला की यात्रा

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2 नवंबर, 2016
पता नहीं क्या बात थी कि हमें चोपता से तुंगनाथ जाने में बहुत दिक्कत हो रही थी। चलने में मन भी नहीं लग रहा था। हालाँकि चोपता से तुंगनाथ साढ़े तीन किलोमीटर दूर ही है, लेकिन हमें तीन घंटे लग गये। तेज धूप निकली थी, लेकिन उत्तर के बर्फ़ीले पहाड़ बादलों के पीछे छुपे थे। धूप और हाई एल्टीट्यूड़ के कारण बिलकुल भी मन नहीं था चलने का। यही हाल निशा का था।
थोड़ा-सा चलते और बैठ जाते और दस-पंद्रह मिनट से पहले नहीं उठते।
दूसरे यात्रियों को देखा, तो उनकी भी हालत हमसे अच्छी नहीं थी। तुंगनाथ के पास एक कृषि शोध संस्थान है। मैं सोचने लगा कि जो भी कृषि-वैज्ञानिक इसमें रहते होंगे, वे खुश रहते होंगे या इसे काला पानी की सज़ा मानते होंगे। हालाँकि सरकारी होने के कारण उन्हें हर तरह की सुविधाएँ हासिल होंगी, पैसे भी अच्छे मिलते होंगे, इनसेंटिव भी ठीक मिलता होगा, लेकिन फिर भी उन्हें अकेलापन तो खलता ही होगा। 

Monday, November 14, 2016

देवरिया ताल

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1 नवंबर, 2016
सुबह पौड़ी से बिना कुछ खाये-पीये चले थे, अब भूख लगने लगी थी। लेकिन खाना खायेंगे तो नींद आयेगी और मैं इस अवस्था में बाइक नहीं चलाना चाहता था। पीछे बैठी निशा को बड़ी आसानी से नींद आ जाती है और वह झूमने लगती है। इसलिये उसे भी भरपेट भोजन नहीं करने दूँगा। इसलिये हमारी इच्छा थी थोड़ी-बहुत पकौड़ियाँ चाय के साथ खाना। रुद्रप्रयाग में हमारी पकौड़ी खाने की इच्छा पूरी हो जायेगी।
लेकिन रुद्रप्रयाग से आठ किलोमीटर पहले नारकोटी में कई होटल-ढाबे खुले दिखे। चहल-पहल भी थी, तो बाइक अपने आप ही रुक गयी। स्वचालित-से चलते हुए हम सबसे ज्यादा भीड़ वाले एक होटल में घुस गये और 60 रुपये थाली के हिसाब से भरपेट रोटी-सब्जी खाकर बाहर निकले। यहाँ असल में लंबी दूरी के जीप वाले रुकते हैं। जीप के ड्राइवरों के लिये अलग कमरा बना था और उनके लिये पनीर-वनीर की सब्जियाँ ले जायी जा रही थीं। बाकी अन्य यात्रियों के लिये आलू-गोभी की सब्जी, दाल-राजमा, कढी और चावल थे। हाँ, खीर भी थी। खीर एक कटोरी ही थी, बाकी कितना भी खाओ, सब 60 रुपये में। 

Friday, November 11, 2016

खिर्सू के नज़ारे

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1 नवंबर 2016
सुबह सात बजे जब उठे तो बाहर हल्की धुंध थी, अन्यथा पौड़ी से चौखंबा समेत कई चोटियाँ बहुत नज़दीक दिखायी देती हैं। फिर भी चौखंबा दिख रही थी। आज हमें चोपता तक जाना था। दूरी ज्यादा नहीं थी, इसलिये आराम-आराम से चलेंगे।
पौड़ी से वापस बुवाखाल आये। यहाँ से एक रास्ता तो वही है, जिससे कल हम आये थे - कोटद्वार वाला। एक अन्य रास्ता भी पता नहीं कहाँ जाता है। हम इसी ‘पता नहीं कहाँ’ वाले पर चल दिये। थोड़ा आगे जाकर इसमें से खिर्सू वाला रास्ता अलग हो जायेगा।
रास्ता धार के साथ-साथ है, इसलिये दाहिने भी और बायें भी नज़ारों की कोई कमी नहीं। दाहिने जहाँ सतपुली की घाटी दिखती है, वही बायें चौखंबा।
कुछ ही आगे खिर्सू वाला रास्ता अलग हो गया। अब जंगल शुरू हो गया और इस मौसम में मुझे जंगल में एक चीज से बहुत डर लगता है - ब्लैक आइस से। यह ऐसे कोनों में आसानी से बनती है, जहाँ धूप अक्सर नहीं पहुँचती। गनीमत थी कि ब्लैक आइस नहीं मिली। वैसे मुझे काफ़ी हद तक ‘ब्लैक-आइस-फोबिया’ भी है।
रास्ते में एक गाँव पड़ा - चोपट्टा। हमने आज की यात्रा का नाम रखा - चोपट्टा से चोपता तक।

Wednesday, November 9, 2016

बाइक यात्रा: मेरठ-लैंसडौन-पौड़ी

Kotdwar Pauri Road31 अक्टूबर 2016
कल देश-दुनिया में दीपावली थी, लेकिन हमारा गाँव थोड़ा ‘एड़वांस’ चलता है। परसों ही दीपावली मना ली और कल गोवर्धन पूजा। हर साल ऐसा ही होता है। एक दिन पहले मना लेते हैं। गोवर्धन पूजा के बाद एक वाक्य अवश्य बोला जाता है - “हो ग्या दिवाली पाच्छा।” अर्थात दीपावली बीत गयी।
मेरी चार दिन की छुट्टियाँ शेष थीं, तो मैंने इन्हें दीपावली के साथ ही ले लिया था। ‘दिवाली पाच्छा’ होने के बाद आज हमने सुबह ही बाइक उठायी और निकल पड़े। चोपता-तुंगनाथ जाने की मन में थी, तो घरवालों से केदारनाथ बोल दिया। वे तुंगनाथ को नहीं जानते। 4 नवंबर को वापस दिल्ली लौटेंगे।
कल ही सारा सामान पैक कर लिया था। लेकिन गाँव में दिल्ली के मुकाबले ज्यादा ठंड़ होने के कारण अपनी पैकिंग पर पुनर्विचार करना पड़ा और कुछ और कपड़े शामिल करने पड़े। जिस वातावरण में बैठकर हम यात्रा की पैकिंग करते हैं, सारी योजनाएँ उसी वातावरण को ध्यान में रखकर बनायी जाती हैं। पता भी होगा, तब भी उस वातावरण का बहुत प्रभाव पड़ता है। चोपता-तुंगनाथ में भयंकर ठंड़ मिलेगी, लेकिन कपड़े पैक करते समय मानसिकता दिल्ली के वातावरण की ही रही, इसलिये उतने कपड़े नहीं रखे। यहाँ गाँव में ठंड़ ज्यादा थी, तो पुनर्विचार करना पड़ा।

Monday, November 7, 2016

भोपाल-इंदौर-रतलाम पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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30 सितंबर 2016, भोपाल
सुबह 06:40 बजे की ट्रेन थी। सुमित ने साढ़े चार बजे ही उठा दिया। उठाया, तब तो गुस्सा नहीं आया। लेकिन जब समय देखा, बड़ा गुस्सा आया। साढ़े पाँच का अलार्म लगा रखा था। सुमित को कहकर फिर से सो गया।
पता नहीं साढ़े पाँच बजे पहले अलार्म बजा या पहले विमलेश जी फोन आया। उनका उद्देश्य मुझे जगाने का ही था। जैसे ही मैंने ‘हेलो’ कहा, उन्होंने ‘हाँ, ठीक है’ कहकर फोन काट दिया।
स्टेशन आये, टिकट लिया और वेटिंग रूम में जा बैठे। इसी दौरान मैं नहा भी आया और धो भी आया। मेरे आने के बाद सुमित गया तो दो मिनट बाद ही बाहर निकला। यह देखकर कि यह ‘पुरुष प्रसाधन’ ही है, फिर से जा घुसा।

Monday, October 10, 2016

खंड़वा से बीड़ ट्रेन यात्रा

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हमें खंड़वा से बीड़ जाना था। वैसे तो बीड़ नामक एक जिला महाराष्ट्र में भी है। महाराष्ट्र वाले बीड़ में अभी रेल नहीं पहुँची है, काम चल रहा है। लेकिन हमें महाराष्ट्र वाले बीड़ नहीं जाना था।
नर्मदा पर जब इंदिरा सागर बाँध बना, तो हरसूद शहर और उसके आसपास की रेलवे लाइन को भी डूब क्षेत्र में आ जाना था। यह मुम्बई-इटारसी वाली रेलवे लाइन ही थी - ब्रॉड़ गेज डबल ट्रैक इलेक्ट्रिफाइड़। तो रेलवे लाइन का दोबारा एलाइनमेंट किया गया। बाँध के दक्षिण में कुछ ज्यादा चक्कर लगाकर - तलवड़िया से खिरकिया तक। नये मार्ग से ट्रेनें चलने लगीं और पुराने मार्ग का काफी हिस्सा बाँध में डूब गया। फिर भी तलवड़िया से बीड़ तक का पुराना मार्ग डूबने से बचा रह गया। बीड़ में एक पावर प्लांट भी है, जिसके कारण वहाँ नियमित रूप से मालगाड़ियाँ चलती हैं। खंड़वा से बीड़ तक दिन में तीन जोड़ी पैसेंजर ट्रेनें भी चलती हैं - रविवार छोड़कर। बीड़ से छह-सात किलोमीटर आगे रेल की पटरियाँ पानी में डूब जाती हैं। सैटेलाइट से इन्हें डूबते हुए और फिर उस तरफ निकलते हुए स्पष्ट देखा जा सकता है।

Friday, October 7, 2016

मीटरगेज ट्रेन यात्रा: महू-खंड़वा

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29 सितंबर 2016
सुबह साढ़े पाँच बजे इंदौर रेलवे स्टेशन पर मैं और सुमित बुलेट पर पहुँचे। बाइक पार्किंग में खड़ी की और सामने बस अड्ड़े पर जाकर महू वाली बस के कंडक्टर से पूछा, तो बताया कि सात बजे बस महू पहुँचेगी। क्या फायदा? तब तक तो हमारी ट्रेन छूट चुकी होगी। पुनः बाइक उठायी और धड़-धड़ करते हुए महू की ओर दौड़ लगा दी।
खंड़वा जाने वाली मीटरगेज की ट्रेन सामने खड़ी थी - एकदम खाली। सुमित इसके सामने खड़ा होकर ‘सेल्फी’ लेने लगा, तो मैंने टोका - ज़ुरमाना भरना पड़ जायेगा। छह चालीस पर ट्रेन चली तो हम आदतानुसार सबसे पीछे वाले ‘पुरुष डिब्बे’ में जा चढ़े। अंदर ट्रेन में पन्नी में अख़बार में लिपटा कुछ टंगा था। ऐसा लगता था कि पराँठे हैं। हम बिना कुछ खाये आये थे, भूखे थे। सुमित ने कहा - नीरज, माल टंगा है कुछ। मैंने कहा - देख, गर्म है क्या? गर्म हों, तो निपटा देते हैं। हाथ लगाकर देखा - ठंड़े पड़े थे। छोड़ दिये।

Monday, October 3, 2016

पैसेंजर ट्रेन-यात्रा: गुना-उज्जैन-नागदा-इंदौर

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27 सितंबर, 2016
स्थान: अनंत पेट
गाड़ी एक घंटे से भी ज्यादा विलंब से चल रही थी। ग्वालियर में कुछ नहीं खा पाया। ऊपर लेटा रहा और जब तक पता चलता कि यह ग्वालियर है, तब तक देर हो चुकी थी। तेज भूख लगी थी। अब अच्छी-खासी चलती गाड़ी को अनंत पेट पर रोक दिया। दो ट्रेनें पास हुईं, तब इसे पास मिला।
अनंत पेट... पता नहीं इनमें से भूखे कितने हैं? मुझे तो एक पेट का ही पता है। इससे अच्छा तो थोड़ा आगे डबरा में रोक देते। कम से कम खाने को कुछ तो मिल जाता। वैसे यह कितनी मजेदार बात है - अनंत पेट में भूखे रहे और ‘डबरे’ में भोजन मिल जाता। है ना?
खैर, झाँसी में टूट पड़ना है खाने पर। इधर ट्रेन में भी कुछ नहीं। चौबीस घंटे चिल्लाते रहने वाले किसी वेंड़र की कोई आवाजाही नहीं। अच्छा है। ऐसी ही शांतिपूर्ण होनी चाहिये रेलयात्रा।

Wednesday, September 21, 2016

मणिमहेश ट्रैक पर क्या हुआ था?

यह एक दुखांत यात्रा रही और इसने मुझे इतना विचलित किया है कि मैं अपना सामाजिक दायरा समेटने के बारे में विचार करने लगा हूँ। कई बार मन में आता कि इस यात्रा के बारे में बिलकुल भी नहीं लिखूँगा, लेकिन फिर मन बदल जाता - अपने शुभचिंतकों और भावी यात्रियों के लिये अपने इस अनुभव को लिखना चाहिये।

यात्रा का आरंभ
हमेशा की तरह इस यात्रा का आरंभ भी फेसबुक से हुआ। मैं अपनी प्रत्येक यात्रा-योजना को फेसबुक पर अपडेट कर दिया करता था। इस यात्रा को भी फेसबुक इवेंट बनाकर 24 जुलाई को अपडेट कर दिया। इसमें हमें 4800 मीटर ऊँचा जोतनू दर्रा पार करना था। हिमालय में इतनी ऊँचाई के सभी दर्रे खतरनाक होते हैं, इसलिये इस दर्रे का अनुभव न होने के बावज़ूद भी मुझे अंदाज़ा था कि इसे पार करना आसान नहीं होगा। लेकिन चूँकि यह मणिमहेश परिक्रमा मार्ग पर स्थित था और आजकल मणिमहेश की सालाना यात्रा आरंभ हो चुकी थी, तो उम्मीद थी कि आते-जाते यात्री भी मिलेंगे और रास्ते में खाने-रुकने के लिये दुकानें भी। दुकान मिलने का पक्का भरोसा नहीं था, इसलिये अपने साथ टैंट और स्लीपिंग बैग भी ले जाने का निश्चय कर लिया। यही सब फेसबुक पर भी अपडेट कर दिया। साथ ही यह भी लिख दिया कि जिसने पहले कभी ट्रैकिंग नहीं की है, वह इस यात्रा पर न चले।

Monday, August 8, 2016

नचिकेता ताल

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18 फरवरी 2016
आज इस यात्रा का हमारा आख़िरी दिन था और रात होने तक हमें कम से कम हरिद्वार या ऋषिकेश पहुँच जाना था। आज के लिये हमारे सामने दो विकल्प थे - सेम मुखेम और नचिकेता ताल। 
यदि हम सेम मुखेम जाते हैं तो उसी रास्ते वापस लौटना पड़ेगा, लेकिन यदि नचिकेता ताल जाते हैं तो इस रास्ते से वापस नहीं लौटना है। मुझे ‘सरकुलर’ यात्राएँ पसंद हैं अर्थात जाना किसी और रास्ते से और वापस लौटना किसी और रास्ते से। दूसरी बात, सेम मुखेम एक चोटी पर स्थित एक मंदिर है, जबकि नचिकेता ताल एक झील है। मुझे झीलें देखना ज्यादा पसंद है। सबकुछ नचिकेता ताल के पक्ष में था, इसलिये सेम मुखेम जाना स्थगित करके नचिकेता ताल की ओर चल दिये।
लंबगांव से उत्तरकाशी मार्ग पर चलना होता है। थोड़ा आगे चलकर इसी से बाएँ मुड़कर सेम मुखेम के लिये रास्ता चला जाता है। हम सीधे चलते रहे। जिस स्थान से रास्ता अलग होता है, वहाँ से सेम मुखेम 24 किलोमीटर दूर है। 
उत्तराखंड के रास्तों की तो जितनी तारीफ़ की जाए, कम है। ज्यादातर तो बहुत अच्छे बने हैं और ट्रैफिक है नहीं। जहाँ आप 2000 मीटर के आसपास पहुँचे, चीड़ का जंगल आरंभ हो जाता है। चीड़ के जंगल में बाइक चलाने का आनंद स्वर्गीय होता है। 

Wednesday, August 3, 2016

चंद्रबदनी मंदिर और लंबगांव की ओर

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17 फरवरी 2016
ज्यादा विस्तार से नहीं लिखेंगे। एक तो यात्रा किये हुए अरसा हो गया है, अब वृत्तांत लिखने बैठा हूं तो वैसा नहीं लिखा जाता, जैसा ताजे वृत्तांत में लिखा जाता है। लिखने में तो मजा नहीं आता, पता नहीं आपको पढने में मजा आता है या नहीं।
तो जामणीखाल से सुबह नौ बजे बाइक स्टार्ट कर दी और चंद्रबदनी की ओर मुड गये। चंद्रबदनी मैं पहले भी जा चुका हूं - शायद 2009 में। तब जामणीखाल तक हम बस से आये थे और यहां से करीब आठ-नौ किलोमीटर दूर चंद्रबदनी तक पैदल गये थे। पक्की अच्छी सडक बनी है। आज बीस मिनट लगे हमें चंद्रबदनी के आधार तक पहुंचने में। यहां सडक समाप्त हो जाती है और बाकी एक किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी होती है।
यह दूरी भी तय हो गई। पक्का रास्ता बना है। लेकिन अच्छी चढाई है। चंद्रबदनी मंदिर की समुद्र तल से ऊंचाई करीब 2200 मीटर है। मंदिर के सामने पहुंचे तो वो नजारा दिखाई पडा, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी। किन्नौर हिमालय से लेकर नंदादेवी तक की चोटियां स्पष्ट दिखाई दे रही थीं और चौखंबा इनके राजा की तरह अलग ही चमक रही थी। कुमाऊं में किसी ऊंचाई वाले स्थान से देखेंगे तो नंदादेवी और पंचचूली चोटियों का प्रभुत्व दिखाई देता है और गढवाल में चौखम्बा का। अलग ही रुतबा है चौखम्बा का। किसी को भले ही इसकी पहचान न हो, लेकिन ध्यान अवश्य आकर्षित करती है यह। मुझे तो इसकी अच्छी तरह पहचान है।
चौखंबा ऐसे ही नगाधिपति नहीं बन गई। इसकी भौगोलिक स्थिति भी इसे अति विशिष्ट बनाती है। इसके पश्चिमी ढलान पर गौमुख ग्लेशियर का आरंभ है और पूर्वी ढाल पर सतोपंथ ग्लेशियर का। सतोपंथ ग्लेशियर को ही स्वर्गारोहिणी माना जाता है, जहां से युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग गये थे। यदि इस कथा को सत्य माना जाये, तो युधिष्ठिर चौखंबा पर ही चढ रहे थे। यदि गंगोत्री से बद्रीनाथ तक एक सीधी रेखा खींची जाये, तो चौखंबा इसी रेखा पर स्थित है और इस रेखा का सबसे ऊंचा बिंदु भी है। अर्थात इसके एक तरफ भागीरथी का जल-प्रवाह क्षेत्र है और दूसरी तरफ अलकनंदा का। वैसे तो हिमालय पर्वत श्रंखला 2400 किलोमीटर लंबाई में फैली है, लेकिन पुराणों में वर्णित स्वर्ग यही गंगोत्री और बद्रीनाथ के मध्य का क्षेत्र है। चौखंबा इसी क्षेत्र के केंद्र में है।

Friday, July 29, 2016

गढवाल में बाइक यात्रा

इसी साल फरवरी में हमारी योजना शिमला जाने की बनी। उम्मीद थी कि इन दिनों तक बर्फ पड जायेगी और हम छोटी ट्रेन में बर्फीले रास्तों का सफर तय करेंगे। साथ चलने वालों में नागटिब्बा यात्रा के साथी नरेंद्र, उसकी घरवाली पूनम और ग्वालियर से प्रशांत जी तैयार हुए। शिमला में रिटायरिंग रूम भी ऑनलाइन बुक कर लिये थे।
एक दिन पहले प्रशांत जी ने आने में असमर्थता जता दी। उनके यहां एक देहांत हो गया था। लेकिन कमाल की बात यह रही कि 15 फरवरी की दोपहर 12:10 बजे कालका से चलने वाली छोटी ट्रेन का चार्ट 13 फरवरी को ही बन गया था। इस वजह से प्रशांत जी का आरक्षण भी रद्द नहीं हो सका। हाँ, शिमला में रिटायरिंग रूम अवश्य रद्द कर दिया था।
मैं 15 की सुबह नाइट ड्यूटी करके आया। 07:40 बजे नई दिल्ली से शताब्दी में आरक्षण था। नरेंद्र और पूनम कल ही हमारे यहां आ गये थे। नहा-धोकर बिना नाश्ता किये जब घर से निकले तो 07:10 बज चुके थे। सुबह के समय मेट्रो भी देर-देर में आती है। जब नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन से बाहर निकले तो 07:40 हो चुके थे। कालका शताब्दी के लेट होने की संभावना तो थी ही नहीं। जब लंबी लाइन की सुरक्षा जांच के बाद पैदल-पार-पथ से एक के बाद एक प्लेटफार्म पार करते हुए प्लेटफार्म नंबर 2 पर पहुंचे, तो 07:50 हो गये थे और दूर शताब्दी जाती हुई दिख रही थी। कोई और ट्रेन होती, तो शायद उतना दुख न होता; लेकिन शताब्दी के छूट जाने का बहुत दुख हुआ। ऊपर से भागदौड और भीड में निशा व पूनम किसी दूसरे पैदल-पार-पथ पर जा चढीं और हम कुछ देर के लिये अलग हो गये। मैं और नरेंद्र साथ थे। चूंकि ट्रेन हमें जाती हुई दिख रही थी, तो हमें लगा कि कहीं वे दोनों ट्रेन में न चढ गई हों। यही निशा और पूनम को भी लगा। तीसरी हताशा की बात थी कि न निशा के पास फोन था और न ही पूनम के पास। अब वे ही किसी के मोबाइल से हमें फोन करेंगी और हम इंतजार करते हुए खाली पडी एक बेंच पर बैठ गये।

Monday, July 4, 2016

खम्भात-आणंद-गोधरा पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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15 मार्च 2016
जब आणंद के उस 100 रुपये वाले आलीशान कमरे में मैं गहरी नींद में सोया हुआ था तो विमलेश जी का फोन आया- उठ जाओ। चार बज गये। वैसे मैंने अलार्म भी लगा रखा था लेकिन अलार्म से अक्सर मेरी आंख नहीं खुला करती। विमलेश जी गजब इंसान हैं कि चार बजे उठ गये, केवल मुझे जगाने को। अगर मैं नींद में उनका फोन न उठाता, तो मुझे यकीन है कि स्टेशन स्टाफ आ जाता मुझे जगाने।
04:55 बजे खम्भात की ट्रेन थी। आणंद-खम्भात के बीच में सभी डेमू ट्रेनें ही चलती हैं, विद्युतीकृत मार्ग नहीं है। खम्भात के नाम पर ही खम्भात की खाडी नाम पडा। खम्भात के पास साबरमती नदी समुद्र में गिरती है। ब्रिटिश काल में इसे कैम्बे कहा जाता था, जिसकी वजह से खम्भात स्टेशन का कोड आज भी CBY है।

Wednesday, June 29, 2016

यात्रा पुस्तक चर्चा

पिछले दिनों कुछ यात्रा पुस्तकें पढने को मिलीं। इनके बारे में संक्षेप में लिख रहा हूं:

1. कर विजय हर शिखर (प्रथम संस्करण, 2016)
लेखिका: प्रेमलता अग्रवाल
प्रकाशक: प्रभात पेपरबैक्स
ISBN: 978-93-5186-574-2



दार्जीलिंग में मारवाडी परिवार में जन्मीं प्रेमलता अग्रवाल का विवाह जमशेदपुर में हुआ। संयुक्त परिवार था और उन्हें पारिवारिक दायित्वों का कडाई से पालन करना होता था। कभी घुमक्कडी या पर्वतारोहण जैसी इच्छा मन में पनपी ही नहीं। समय का चक्र चलता रहा और दो बेटियां भी हो गईं। इसके आगे प्रेमलता जी लिखती हैं:

Monday, June 27, 2016

वडोदरा-कठाणा और भादरण-नडियाद रेल यात्रा

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Nadiad-Bhadran NG Railway14 मार्च 2016, सोमवार
गुजरात मेल सुबह पांच बजे वडोदरा पहुंच गई और मैं यहीं उतर गया। वैसे इस ट्रेन में मेरा आरक्षण आणंद तक था। आणंद तक आरक्षण कराने का मकसद इतना था ताकि वहां डोरमेट्री में बिस्तर बुक कर सकूं। ऑनलाइन बुकिंग कराते समय पीएनआर नम्बर की आवश्यकता जो पडती है। आज मुझे रात को आणंद रुकना है।
सुबह पांच बजे वडोदरा पहुंच गया और विमलेश जी का फोन आ गया। मेरी इस आठ-दिनी यात्रा को वे भावनगर में होते हुए भी सोते और जगते लगातार देख रहे थे। सारा कार्यक्रम उन्हें मालूम था और वे मेरे परेशान होने से पहले ही सूचित कर देते थे कि अब मुझे क्या करना है। अब उन्होंने कहा कि अधिकारी विश्राम गृह में जाओ। वहां उन्होंने केयर-टेकर से पहले ही पता कर रखा था कि एक कमरा खाली है और उसे यह भी बता रखा था कि सवा चार बजे मेरी ट्रेन वडोदरा आ जायेगी। बेचारा केयर-टेकर सुबह चार बजे से ही जगा हुआ था। ट्रेन वडोदरा पौन घण्टा विलम्ब से पहुंची, केयर-टेकर मेरा इंतजार करते-करते सोता भी रहा और सोते-सोते इंतजार भी करता रहा। यह एक घण्टा उसके लिये बडा मुश्किल कटा होगा। नींद की चरम अवस्था होती है इस समय।
लेकिन विमलेश जी की नींद की चरम अवस्था पता नहीं किस समय होती है?
नींद मुझे भी आ रही थी। आखिर मैं भी चार बजे से जगा हुआ था। वातानुकूलित कमरा था। नहाने के बाद कम्बल ओढकर जो सोया, साढे आठ बजे विमलेश जी का फोन आने के बाद ही उठा। उन्होंने जब बताया कि मुख्य प्लेटफार्म के बिल्कुल आख़िर में उत्तर दिशा में साइड में एक प्लेटफार्म है (शायद प्लेटफार्म नम्बर एक वही है), वहां से ट्रेन मिलेगी तो होश उड गये। अभी मुझे नहाना भी था, टिकट भी लेना था, नाश्ता भी करना था और एक किलोमीटर के लगभग ट्रेन खडी थी। तो जब सारे काम करके ट्रेन तक पहुंचा तो नौ बजकर पांच मिनट हो गये थे। पांच मिनट बाद ट्रेन चल देगी। गार्ड साहब पहले ही मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। ट्रेन में बिल्कुल भी भीड नहीं थी।

Monday, June 20, 2016

मुम्बई लोकल ट्रेन यात्रा

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13 मार्च 2016
आज रविवार था। मुझे मुम्बई लोकल के अधिकतम स्टेशन बोर्डों के फोटो लेने थे। यह काम आसान तो नहीं है लेकिन रविवार को भीड अपेक्षाकृत कम होने के कारण सुविधा रहती है। सुबह चार बजे ही देहरादून एक्सप्रेस बान्द्रा टर्मिनस पहुंच गई। पहला फोटो बान्द्रा टर्मिनस के बोर्ड का ले लिया। यह स्टेशन मेन लाइन से थोडा हटकर है। कोई लोकल भी इस स्टेशन पर नहीं आती, ठीक लोकमान्य टर्मिनस की तरह। इस स्टेशन का फोटो लेने के बाद अब मेन लाइन का ही काम बच गया। नहा-धोकर एक किलोमीटर दूर मेन लाइन वाले बान्द्रा स्टेशन पहुंचा और विरार वाली लोकल पकड ली।
साढे पांच बजे थे और अभी उजाला भी नहीं हुआ था। इसलिये डेढ घण्टा विरार में ही बैठे रहना पडा। सात बजे मोर्चा सम्भाल लिया और अन्धेरी तक जाने वाली एक धीमी लोकल पकड ली।
मुम्बई में दो रेलवे जोन की लाइनें हैं- पश्चिम रेलवे और मध्य रेलवे। पश्चिम रेलवे की लाइन चर्चगेट से मुम्बई सेंट्रल होते हुए विरार तक जाती है। यही लाइन आगे सूरत, वडोदरा और अहमदाबाद भी जाती है। इसे वेस्टर्न लाइन भी कहते हैं। इसमें कोई ब्रांच लाइन नहीं है। समुद्र के साथ साथ है और कोई ब्रांच लाइन न होने के कारण इसमें भयंकर भीड रहती है। रविवार को सुबह सात-आठ बजे भी खूब भीड थी।