Saturday, November 1, 2014

डायरी के पन्ने-24

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। इनसे आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। कृपया अपने विवेक से पढें।

1.  दो फिल्में देखीं- ‘हैदर’ और ‘मैरीकॉम’। दोनों में वैसे तो कोई साम्य नहीं है, बिल्कुल अलग-अलग कहानी है और अलग अलग ही पृष्ठभूमि। लेकिन एक बात समान है। दोनों ही उन राज्यों से सम्बन्धित हैं जहां भारत विरोध होता रहता है। दोनों ही राज्यों में सेना को हटाने की मांग होती रहती है। हालांकि पिछले कुछ समय से दोनों ही जगह शान्ति है लेकिन फिर भी देशविरोधी गतिविधियां होती रहती हैं।
लेकिन मैं कुछ और कहना चाहता हूं। ‘हैदर’ के निर्माताओं ने पहले हाफ में जमकर सेना के अत्याचार दिखाए हैं। कुछ मित्रों का कहना है कि जो भी दिखाया है, वो सही है। लेकिन मेरा कहना है कि यह एक बहुत लम्बे घटनाक्रम का एक छोटा सा हिस्सा है। हालांकि सेना ने वहां अवश्य ज्यादातियां की हैं, नागरिकों पर अवश्य बेवजह के जुल्म हुए हैं लेकिन उसकी दूसरी कई वजहें थीं। वे वजहें भी फिल्म में दिखाई जानी थीं। दूसरी बात कि अगर दूसरी वजहें नहीं दिखा सकते थे समय की कमी आदि के कारण तो सेना के अत्याचार भी नहीं दिखाने चाहिये थे। कश्मीर मामला पहले से ही संवेदनशील मामला है, इससे गलत सन्देश जाता है।
फिर दूसरे हाफ में एक नाटकीय परिवर्तन आया। पहले जहां यह एक समाजप्रधान कहानी लग रही थी, पूरे कश्मीर की कहानी लग रही थी, दूसरे हाफ में यह व्यक्तिप्रधान कहानी बन गई। सेना तुरन्त गायब हो गई और हैदर अपनी मनमानी करता रहा। कभी वो सीमा पार चला जाता, कभी वो अपने बाप की मौत का बदला लेने की फिराक में रहता। सेना गायब। बकवास कहानी।
एक चीज अच्छी लगी जो कि अक्सर फिल्मों में होता नहीं है। पूरी शूटिंग कश्मीर में हुई है। कश्मीरी पृष्ठभूमि, कश्मीरी पहनावा, कश्मीरी मौसम।
‘मैरी कॉम’ इससे बहुत शानदार फिल्म है। भारत और मणिपुर के उग्रवादी संगठनों के बीच होने वाली किसी भी लडाई को इसमें नहीं दिखाया। हालांकि जब मैरीकॉम गर्भवती थी, उस समय शहर भर में कर्फ्यू लगा था, यह इसी लडाई की वजह से लगा था। उनकी गाडी को उग्रवादी संगठनों ने घेर लिया था, लेकिन उनका नेता मैरी को जानता था, इसलिये जाने दिया। इसके अलावा कोई और दंगे फसाद वाला दृश्य नहीं आया। आज भी इन संगठनों की वजह से मणिपुर में हिन्दी फिल्में नहीं चलतीं। मैरीकॉम पर बनी फिल्म को उसी के राज्य वाले नहीं देख सकते।

2.  महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा के चुनाव सम्पन्न हुए। नतीजे आये। हरियाणा में तो भाजपा स्पष्ट बहुमत से जीत गई है लेकिन महाराष्ट्र में मामला कुछ पेचीदा दिख रहा है। पहले स्थान पर भाजपा, दूसरे पर शिवसेना, तीसरे पर कांग्रेस और चौथे पर एनसीपी। इसमें तो कोई दो-राय नहीं कि चुनावों से पहले भाजपा और शिवसेना में कितने भी मतभेद रहे हों लेकिन आखिरकार राज्य में सरकार यही दोनों दल मिलकर बनाने वाले हैं। हालांकि एनसीपी ने भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने की बात कही है। एनसीपी के समर्थन से भाजपा को किसी और समर्थन की जरुरत नहीं है। लेकिन भाजपा ऐसा कभी नहीं करने वाली। शिवसेना उसकी पुरानी सहयोगी रही है, कुछ वाद-विवाद के बावजूद, कुछ लेन-देन के बावजूद, कुछ नफे-नुकसान के बावजूद गठबन्धन शिवसेना से ही करना पडेगा। हां, एनसीपी को साथ लेकर चलने में कोई परेशानी नहीं है। इससे सबसे बडा फायदा यह होगा कि शिवसेना काबू में रहेगी।
कुछ लोग कह रहे हैं कि भाजपा को किसी भी हालत में ‘कमीनी’ एनसीपी से समर्थन नहीं लेना चाहिये। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि ‘कमीनेपन’ के बावजूद भी इस पार्टी के 41 विधायक अगले पांच साल के लिये विधानसभा में जाने वाले हैं। ये 41 और कांग्रेस के 42 विधायक और 20 अन्य विधायक यानी कुल लगभग 100 विधायक सरकार के विरोध में रहेंगे। बेवजह सदन में हल्ला और शोर शराबा करेंगे। एनसीपी समर्थन दे रही है, ले लो। आगे चलकर विरोध कम ही होगा। सरकार तो बन ही चुकी है, कांग्रेस से भी शिष्टाचार के नाते समर्थन मांगा जा सकता है। जिस तरह मोदी के प्रधानमन्त्री बनने पर नवाज शरीफ को दिल्ली आने का निमन्त्रण दिया गया था और वो बेचारा मुश्किल में पड गया था कि जाऊं या न जाऊं और आखिरकार उसे आना पडा; इसी तरह कांग्रेस भी मुश्किल में पडेगी। आखिरकार आना पडेगा। इस समय गंगाजी भाजपा के साथ साथ बह रही है और बहती गंगा में हाथ धो लेने में ही समझदारी है।
उधर केजरीवाल दिल्ली में भाजपा को ललकार रहा है। कह रहा है कि भाजपा इसलिये चुनाव नहीं कराना चाह रही क्योंकि उसे आम आदमी पार्टी से हार जाने का खतरा है। आज जब यह खबर पढी तो बडी देर तक हंसी आती रही।

3.  फेसबुक पर एक वार्तालाप पढा। काम का था, इसलिये सबके साथ साझा कर रहा हूं।
अमित कुमार पाठक ने अपनी वॉल पर लिखा -‘‘आज एक गिनीज बुक वाला रिकार्ड बना है। 22 यानी कल दिल्ली से गोरखपुर जाने वाली सारी 12 ट्रेनों की सारी तत्काल सीटें 180 सेकण्ड में फुल। रोजी रोटी के लिये घर से निकले लोगों को कोई हक नहीं है अपने मां-बाप के साथ दिवाली मनाने का।”
इस पर कुछ लोगों ने जवाब भी दिये। चुनिन्दा जवाब भी साझा कर रहा हूं।
शरद अहलावत जी ने कहा –“तो तुमको क्या लगता है वो टिकट वहां पर जाकर हनीमून मनाने वालों ने या वहां पर जाकर पिकनिक मनाने वालों ने बुक की है? जिन्होंने बुक की हैं वो भी रोजी-रोटी कमाकर ही मां-बाप के पास जा रहे होंगे। अब डिमांड ही इतनी बढा रखी है तो सप्लाई भी कितना करें?... वैसे ये भी हो सकता है कि ये साजिश पाकिस्तान या चीन वालों की हो। सारी सीट बुक करा ली हों, जिससे गोरखपुर में कोई दिवाली न मना पाए।”
अमित कुमार पाठक –“यहां पे ये सब तर्क ठीक है। लेकिन गलती से पूर्वांचल जा रही ट्रेनों में जनरल बोगी में न चढ पाये लोगों को अगर ज्ञान दिया तो LIC भी क्लेम रिजेक्ट कर देगी।”
शरद अहलावत –“यही तो कल हम भी बोल रहे थे। अब तुमने भी स्वीकार कर लिया। जब तुमने बोला था कि एक बिहारी मेट्रो में टिकट ले लेता है पर ट्रेन में नहीं लेता है तो ये मैनेजमेण्ट फेल्यॉर है। पर अब उनको अगर ज्ञान दो तो LIC क्लेम की धमकी? और बिहार में ट्रेन में रेलवे पुलिस व टीटीई के साथ क्या होता है, वो सबको पता है। बस यहां ये ज्ञान देने से भी काम नहीं चलता है कि आज रिकार्ड बना 180 सेकण्ड में सीट फुल होने का। कभी जनसंख्या या भ्रष्टाचार के बारे में भी बात करो। लोगों को बस दूसरों को दोष देना आता है। कभी अपनी गलतियां नजर नहीं आतीं।... रेलवे मिनिस्टर भी जिन आंकडों के आधार पर ट्रेन चलाता होगा, वो उसको अफसर या नौकरशाह ही देते होंगे। वो तो पूर्वांचल में जाकर लोगों की गिनती करके तो नहीं लाता होगा ना? और ये भी जगजाहिर है कि ऐसी नौकरियों में सबसे ज्यादा लोग पूर्वांचल या बिहार से हैं। फिर आज तक वहां के ही किसी आईएएस/आईपीएस/नौकरशाह ने क्यों वहां की माली हालत नहीं सुधारने की कोशिश की? क्यों वहां पर पैदा होकर, पढ लिख कर, अफसर बन कर सेटल कहीं और हो जाते हैं? ... समस्याएं बहुत हैं वहां और समाधान नहीं मिला है, पर इसका मतलब यह नहीं है कि गलती सारी सिस्टम की है। वहां के लोग भी उतने ही जिम्मेदार हैं। खाने के लिये कुछ मिले या न मिले, मनोरंजन पूरा होना चाहिये और मनोरंजन क्या होता है, वो तो बोलने की जरुरत नहीं है।”
अमित कुमार चौधरी –“दिवाली पर कभी कभी घर वालों को बुला लिया करो। बार-बार घर क्यों जाते हो?”
अमित कुमार पाठक –“अमित चौधरी, तुम्हारा बस चले तो वैष्णों माता से बोल दे कि एक-दो ब्रांच दिल्ली में खोल दें, जम्मू जाने में बहुत परेशानी होती है।”
शरद अहलावत –“अमित पाठक, तुम्हारे लॉजिक से तो भाई वैष्णों माता के दर्शन बस नवरात्रों में ही करने चाहिये। किसी और दिन करोगे तो मां मुंह फेर लेगी और आपकी यात्रा सिस्टम में इनवैलिड मार्क कर दी जायेगी। ... भाई, कभी मां बाप को बुलाओ, कभी तुम जाओ। कभी कभी यहां भी त्यौहार मनाओ। मां-बाप से मिलने ऑफ सीजन में जाओ। रेलवे की इज्जत का भी ख्याल रखो भाई।”
हालांकि मैंने इस वार्तालाप में कुछ लिखा तो नहीं लेकिन अच्छा लगा। एक मित्र हैं आशीष शाण्डिल्य। यहीं पास में सरकारी क्वार्टर में रहते हैं। दिल्ली के ही रहने वाले हैं। घर पर उनके अच्छे सम्बन्ध हैं लेकिन कभी भी दिवाली पर कुछ किलोमीटर दूर अपने घर नहीं जाते। कहते हैं- दिवाली पर हमें अपने घर के दरवाजे बन्द नहीं रखने चाहिये। यहां हम रहते हैं, हमारा परिवार है। भले ही किराये का हो, लेकिन है तो घर ही। है तो ठिकाना ही। फिर क्यों यहां के दरवाजे बन्द करें? पूरा साल पडा है बाहर आने जाने के लिये, मां-बाप रिश्तेदारों से मिलने के लिये लेकिन दिवाली पर हमें वहीं होना चाहिये जहां हम पूरे साल सपरिवार रहते आये हैं।
मैं शरद अहलावत जी की प्रत्येक टिप्पणी से सहमत हूं।

4.  पिछले दिनों प्रधानमन्त्री ने ‘मेक इन इण्डिया’ का कॉन्सेप्ट दिया। जिस तरह हमारे यहां बाहर की बनी चीजें आती हैं, मेड इन चाइना, मेड इन जापान आदि तो उसी तरह बाहर भी मेड इन इण्डिया चीजें जायें। कॉन्सेप्ट तो अच्छा है लेकिन हमारे यहां एक बडी भारी मुसीबत की प्रथा चली आ रही है और वो प्रथा है- जुगाड। इसे हम भारतीय बडी शान से देखते हैं, लेकिन वास्तव में यह एक कलंक है। जुगाड का अर्थ है आपने विज्ञान की, इंजीनियरी की मां-बहन कर दी।
एक वाकया याद आ रहा है। कुछ दिन पहले हम कश्मीरी गेट पर एक प्रसिद्ध दुकान पर कुछ टर्फर टेस्ट करने गये थे। टर्फर भारी वजन उठाने की एक मशीन होती है जिसे हाथ से चलाया जाता है। इसमें कुछ इस तरह का सिस्टम होता है कि प्रयोगकर्ता मशीन के हैण्डल को पकडकर आगे-पीछे करता रहता है और टनों का लोड उठता चला जाता है। टर्फर कई क्षमताओं के होते हैं। हमें अपनी आवश्यकतानुसार पौन टन, डेढ टन और तीन टन के टर्फर को टेस्ट करना था। पौन टन का अर्थ है कि वो टर्फर पौन टन यानी 750 किलो के वजन को उठाने के लिये बनाया गया है, डेढ टन का 1500 किलो और तीन टन का टर्फर 3000 किलो वजन को उठायेगा। इनमें कुछ सुरक्षात्मक उपाय भी किये जाते हैं जिससे अगर भूल-चूक से तय क्षमता से ज्यादा वजन उठ जाये तो जान-माल की हानि न हो। अक्सर जो क्षमता मशीनों पर दिखाई जाती हैं, वास्तव में मशीनें उससे कुछ ज्यादा क्षमता के लिये डिजाइन की जाती हैं।
वैसे तो हमें टेस्ट करके कि मशीनें ठीक काम कर रही हैं, वापस आ जाना चाहिये था लेकिन निर्माणकर्ता ने जब अपनी शेखी बघारनी शुरू की और चीनी मशीनों की आलोचना शुरू की तो मेरा माथा ठनका। मैं कुछ देर और रुक गया। कई नतीजे सामने आये। पूछताछ की तो पता चला कि इन तीनों में तकनीकी तौर पर कोई अन्तर ही नहीं था। डेढ टन वाले और तीन टन वाले में मात्र एक बोल्ट का फर्क था। डेढ टन वाले में वो बोल्ट यहां लगा है तो तीन टन वाले में उससे इंच भर दूर। तीन और पौन टन में चेन का अन्तर था। एक में मोटी चेन लगी थी तो दूसरे में कुछ पतली। अगर हम डेढ टन वाले में भी मोटी चेन लगा देते तो वो तीन टन के बराबर हो जाता।
निर्माणकर्ता ने बताया कि जो विदेशी टर्फर होते हैं, वे वजन में इतने हल्के होते हैं कि कब फेल हो जाये, कुछ नहीं कह सकते। वे बॉडी शीट मेटल की बनाते हैं और हम पूरी बॉडी कास्टिंग करते हैं। उनकी मशीन में छोटे छोटे पुर्जे लगे होते हैं, हम बडे पुर्जे लगाते हैं ताकि फेल होने की गुंजाइश न रहे। उसने एक गियर दिखाया- यह विदेशी मशीन का गियर है। ये देखो, इसमें दांते भी बहुत छोटे हैं, क्या ये दांते इतना भारी वजन उठा लेंगे। मैंने देखा कि उस विदेशी और इनके भारतीय गियर में कम से कम तीन किलो का फर्क था। मैंने विदेशी मशीन देखने की इच्छा जाहिर की तो वो उनके पास नहीं थी। केवल गियर था, ताकि वे ग्राहकों को वो नन्हा सा नाजुक सा गियर दिखाकर भ्रम में डाले रहें।
जब हम प्रत्येक मशीन की क्षमता टेस्ट कर रहे थे तो एक गडबडी और सामने आई। हाथ से संचालित होने वाली मशीन से तीन टन वजन उठाने के लिये कुछ विशेष तामझाम की जरुरत होती है। विशेष मैकेनिज्म की जरुरत होती है। उनके पास था ये मैकेनिज्म। एक बडी सी तराजू जैसा प्रबन्ध था। इसके एक सिरे पर ठोस लोहे का बडा सा गुटका लगा था, दूसरी तरफ डण्डे पर थोडी थोडी दूरी पर कई हुक थे। हर हुक पर उसकी क्षमता लिखी थी। टर्फर की रस्सी को इस हुक में लगायेंगे तो यह पौन टन के बराबर होगा, इसमें लगायेंगे तो यह एक टन होगा, उससे अगला डेढ टन, उससे अगला, दो टन। इसी तरह इसी ‘तराजू’ में दस टन तक का वजन उठा सकते थे। इसी हुक वाले डण्डे के नीचे करीब एक मीटर की दूरी पर दो पुली लगी थीं, जिनसे आवश्यकतानुसार टर्फर वाली रस्सी डाली जाती थी।
खैर, उन्होंने टेस्ट करना शुरू किया। बीच में ही उन्होंने रस्सी एक पुली से हटाकर दूसरी पुली पर डाल दी। मैंने पूछा कि ऐसा क्यों किया? बोले कि इससे कुछ नहीं होगा। मैंने कहा कि होगा क्यों नहीं? पहले रस्सी हुक वाले डण्डे पर नब्बे डिग्री के कोण पर जुडी थी, अब साठ डिग्री के कोण पर है। पता है इससे वजन में कितना फर्क नहीं पडेगा? बोले कि सर, ज्यादा फर्क नहीं पडेगा। मैंने कहा कि दोगुना फर्क पडेगा। अब आप तीन टन नहीं बल्कि छह टन वजन उठा रहे हो। उसने तुरन्त कहा कि अच्छी बात तो है।
भले ही हमें यह अच्छी बात लगती हो कि विदेशी मशीनें, चीनी मशीनें कम वजन पर फेल हो जाती हैं, वहीं हमारी भारतीय मशीनें दोगुना तीन गुना वजन भी उठा लेती हैं। लेकिन यह बडी शर्मनाक बात है। मशीनों का वर्गीकरण किया ही इसलिये जाता है कि हर मशीन तय वजन ही उठाये। प्रयोगकर्ता को तो पता ही होता है कि वो कितना वजन उठाने जा रहा है, इसलिये वह उसी क्षमता वाली मशीन लेगा। 800 किलो के लिये 750 की क्षमता वाली मशीन कभी नहीं लगायेगा, हालांकि 750 वाली अपनी क्षमता के कम से कम डेढ गुने तक के लिये सुरक्षित डिजाइन की गई होती है। अगर आपको 500 किलो वजन उठाना है और आपके पास 750, 1500 व 3000 की क्षमता वाली मशीनें हैं तो आप तीनों में से कोई भी प्रयोग करने को स्वतन्त्र हो। ऐसे में जाहिर है आप 750 वाली मशीन ही प्रयोग करेंगे।
लेकिन समस्या यही है कि तीनों भारतीय मशीनें तकनीकी तौर पर एक ही हैं। उन पर बस ठप्पा लगा है ताकि आप पहचान सको। अगर गलती से 750 वाली पर 3000 का ठप्पा लग जाये तो यकीन मानिये कि वो 3000 किलो वजन भी उठा लेगी। जबकि विदेशी मशीनें जो हल्की होती हैं, 1000 पर ही फेल हो जायेंगी। वास्तव में मशीनों पर अगर तय क्षमता से ज्यादा वजन डालेंगे तो उन्हें फेल हो जाना चाहिये अन्यथा वर्गीकरण करने का क्या औचित्य? क्यों फिर इतनी अलग-अलग तरह की मशीनें बना रखी हैं? फिर तो बस एक सबसे मजबूत मशीन बना लो, वही सारे काम कर लेगी। क्या 3000 किलो की क्षमता वाला टर्फर 500 किलो वजन नहीं उठा सकता? निश्चित ही उठा लेगा। फिर क्यों अलग-अलग क्षमता के टर्फर बना रखे हैं? अगर आपको अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में टिकना है तो इन चीजों का ध्यान रखना पडेगा। इसी वजह से चीनी वस्तुएं वैश्विक बाजार पर कब्जा करती जा रही हैं।
एक और उदाहरण। पिछले दिनों मध्य प्रदेश के एक बच्चे ने एक मॉडल बनाया कि अगर ट्रेनों पर पवनचक्कियां लगा दी जायें तो उनसे काफी बिजली बनाई जा सकती है। बच्चे तो बच्चे हैं जी। उन्हें क्या पता कि बाहर वास्तव में हवा नहीं चल रही है? चल तो ट्रेन रही है। जितनी ताकत इंजन लगायेगा, उतनी ही तेज ट्रेन चलेगी और उतनी ही तेज हवा भी लगेगी। ट्रेन को हवा को काटते हुए आगे बढना होता है।
तेज चलने वाली चीजें इसी तरह डिजाइन की जाती हैं कि उन पर हवा का कम से कम प्रतिरोध हो। हवा अगर सामने से आ रही है तो आपको ज्यादा ताकत लगानी पडेगी और अगर पीछे से आपको धकेल रही हो तो कम ताकत लगानी पडेगी। प्रतिरोध कम से कम होना चाहिये। कारें, हाई-स्पीड ट्रेनें, हवाई-जहाज आदि इसी एयर-डायनेमिक मॉडल से बनाये जाते हैं। हवा कम से कम लगनी चाहिये। ऐसे में अगर ट्रेन पर पवनचक्कियां लगा दी जायें, तो हवा का प्रतिरोध बढेगा, ट्रेन की गति कम हो जायेगी और इंजन को ज्यादा ताकत लगानी पडेगी। जितनी ऊर्जा पवनचक्कियों से मिलती, उससे भी ज्यादा ऊर्जा इंजन को अतिरिक्त खर्च करनी पडेगी।
बच्चे हैं... उसने सोचा कि हवा से पवनचक्कियां चलती हैं, ट्रेन में हवा बहुत लगती है तो ट्रेन पर पवनचक्की ही लगा दो। निश्चित रूप से बच्चे को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। कुछ सोच तो रहा है। नहीं तो हमारे यहां बच्चों को कुछ भी सोचने की आजादी नहीं है। लेकिन इसे वास्तव में ट्रेन पर लगाना बेवकूफी होगी। मैंने पढा है कि इस दिशा में बडे लोग विचार-विमर्श कर रहे हैं। अरे, इसमें तो विचार-विमर्श करने की जरुरत ही नहीं है।
मेक इन इण्डिया तभी साकार होगा, जब हमें ‘जुगाड’ से छुटकारा मिलेगा। दो पढे लिखे मित्र बात कर रहे थे। विषय था मोटरसाइकिलें। मुझे मोटरसाइकिलों की कोई जानकारी नहीं है, तो ध्यान नहीं कि वे किस-किस की तुलना कर रहे थे। सुविधा के लिये मान लेते हैं कि वे बजाज और होण्डा की मोटरसाइकिलों की तुलना कर रहे थे। एक मित्र कह रहा था कि बजाज की मोटरसाइकिलें अच्छी होती हैं। दूसरे ने विरोध किया कि बजाज अपनी बाइकों में हल्के पुर्जे लगाता है, होण्डा अच्छे पुर्जे लगाता है। हल्के और घटिया होने की वजह से बजाज की बाइकें सस्ती भी हैं।
तभी मैं बीच में कूद पडा- बजाज हल्के और सस्ते पुर्जे लगाता है तो बुराई क्या है। सभी अपने यहां रिसर्च और डेवलपमेण्ट करते हैं। बाजार में प्रतियोगिता इतनी है कि कोई भी स्थापित ब्राण्ड रिस्क नहीं लेना चाहेगा। जो आपको हल्के पुर्जे लग रहे हैं, वे पुराने भारी पुर्जों से भी मजबूत हैं। ऊपर से सस्ते भी। आपको और क्या चाहिये?

5. पिछले दिनों चीनी प्रधानमन्त्री भारत दौरे पर थे तो कैलाश मानसरोवर का सडक मार्ग खोले जाने की बात जोर-शोर से उठने लगी। चीनी प्रधानमन्त्री ने इसका कुछ संकेत दिया था। फिर फेसबुक पर कुछ बुजुर्गों के अपडेट भी देखे कि वे मरने से पहले कैलाश दर्शन कर लेंगे।
वास्तव में भारत और तिब्बत के बीच कई स्थानों पर सडक मार्ग हैं। लद्दाख में है, हिमाचल में शिपकी-ला है, उत्तराखण्ड में भी माणा पास तक सडक बन गई है, सिक्किम में नाथू-ला है और अरुणाचल में तवांग में है। इनमें पर्यटकों के लिये सबसे सुगम नाथू-ला है। नाथू-ला से भारत के सिक्किम और तिब्बत की चुम्बी घाटी के बीच ट्रक भी चलते हैं। हिमाचल में तो पुरानी हिन्दुस्तान-तिब्बत सडक है ही। शिपकी-ला से उस तरफ तिब्बत है। लेकिन शिपकी-ला तक किसी भारतीय का पहुंचना ही बेहद मुश्किल है। सडक बनी है तो मुश्किल क्यों है? कई विभागों से परमिट लेने होते हैं जो कि आसानी से मिलते नहीं हैं। आपकी बहुत ऊंची पहुंच होनी चाहिये, तभी शिपकी-ला का परमिट बनता है। चले भी गये तो फोटो खींचना भीषण अपराध है। उधर नाथू-ला पर जमकर फोटोग्राफी होती है।
चीन ने तिब्बत में भी बहुत तरह के प्रतिबन्ध लगा रखे हैं। खासकर भारत से लगते इलाकों में। कोई विदेशी तो दूर, स्वयं चीनी भी अपनी मर्जी से तिब्बत भ्रमण नहीं कर सकते। उन्हें किसी चीनी सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त ट्रैवल एजेण्ट के माध्यम से ही वहां जाना होता है। यहां तक कि ल्हासा वाली ट्रेन में भी आप केवल ट्रैवल एजेण्ट के साथ ही बैठ सकते हैं। ये ट्रैवल एजेण्ट सुप्रशिक्षित होते हैं कि पर्यटकों को कहां-कहां घुमाना है और कहां-कहां नहीं, क्या-क्या बताना है और क्या-क्या नहीं। जब स्वयं चीनियों के लिये भी इतना प्रतिबन्ध है तो भारतीयों के लिये क्या हाल होगा, आप स्वयं अन्दाजा लगा सकते हैं। भारत और चीन का झगडा तिब्बत को लेकर ही है। चीन का एक नम्बर का दुश्मन दलाई लामा भारत में रहकर अपनी सरकार चला रहा है। फिर कैसे चीन इतनी आसानी से तिब्बत में अपनी सडकें भारतीयों के लिये खोल देगा?
बीसीएमटूरिंग पर एक यात्रा-वृत्तान्त पढा। कोलकाता का रहने वाला एक परिवार पूरा तिब्बत व जिनजियांग प्रान्त घूमकर आया। निश्चित ही उन्होंने करोडों खर्च किये होंगे और कई महीनों तक सौ तरह के परमिटों का इन्तजार किया होगा। वे ल्हासा भी घूमे और मंगोलिया सीमा तक गये, काशगर गये और पाकिस्तान-चीन सीमा भी देखी। काशगर से एक सडक सीधे नगारी होते हुए कैलाश मानसरोवर तक आती है। यह वही सडक है जिसे चीन में अक्साईचिन से होकर बनाया है। अक्साईचिन भारत का हिस्सा है, जिसे चीन ने कब्जा रखा है। तो उन लोगों ने एडी-चोटी का जोर लगा लिया काशगर से कैलाश जाने का लेकिन परमिट नहीं मिला। उन्होंने करोडों खर्च किये, लगभग पूरा तिब्बत देखा, महीने भर तक वहां घूमते रहे लेकिन कैलाश नहीं जा पाये। निश्चित ही उन्हें इस बात का ताउम्र मलाल रहेगा।
अभी भी भारतीय नेपाल के रास्ते सडक मार्ग से कैलाश जाते हैं। अभी भी नाथू-ला से सीमा के दोनों ओर व्यापारिक आवागमन हो रहा है। लेकिन यकीन मानिये चीन भारतीयों के लिये तिब्बत को नहीं खोलने वाला। आप कितने भी खुश हो लो, कितने भी उछल लो लेकिन तिब्बत आपके लिये बन्द ही रहेगा।

6. अब बात करते हैं पिछली डायरी से सम्बन्धित। पिछली डायरी में मैंने हरियाणवी, राजस्थानी, भोजपुरी आदि भाषाओं को अलग भाषा माना था, न कि हिन्दी की ही बोलियां। इस सन्दर्भ में जो पहली स्तरीय टिप्पणी आई, वो थी गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की-
“नीरज जी, मुझे आपके यात्रा-वृत्तान्त स्तरीय व रोचक होते हैं। आपकी यह पोस्ट काफी विस्तार लिये है। मैं केवल शुरु की एक दो बातों के बारे में कहना चाहती हूँ। पहली बात तो भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्त्व-सम्पन्न राष्ट्र है। राष्ट्रों का संघ नही। ऐसा कहना इसकी अखण्डता पर प्रश्न उठाना है। यह 29 राज्यों 7 केन्द्रशासित राज्यों का संघ है।
दूसरी बात छत्तीसगढ़ी निमाड़ी आदि हिन्दी बोलियाँ हैं, अलग भाषा नही। स्थानीय प्रभाव से परिवर्तन आना तो स्वाभाविक है। ऐसा हर भाषा के साथ होता है। देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली व समझी जाने वाली भाषा हिन्दी है।
रहा हिन्दी सीखने के विरोध की बात तो पहली बात तो किसी भी भाषा को सीखना अपने ज्ञान का दायरा बढ़ाना है। फिर आप अँग्रेजी को सीखने और अपनाने में इतने उत्सुक और गर्वित होते हैं जो कि विदेशी भाषा है तो फिर हिन्दी क्यों नही। हिन्दी के अलावा सभी भाषाएं केवल प्रान्तीय भाषाएं हैं। जैसे कि उड़िया केवल उड़ीसा में, मराठी महाराष्ट्र में, कन्नड़ कर्नाटक में वगैरा...। ये सभी भाषाएं समृद्ध हैं लेकिन जहाँ संचार भाषा का सवाल है तो भारतीय भाषाओं में केवल हिन्दी ही है। अब आप अंग्रेजी को तो राष्ट्रभाषा तो नही न बनाएंगे। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमारा ही देश है जिसकी ऐसे ही विचारों के कारण अभी तक राष्ट्रभाषा संवैधानिक रूप से घोषित नही है जो बेहद जरूरी है। हालांकि जिन्हें यह नही मालूम वे राष्ट्रभाषा हिन्दी को ही मानते हैं और इसे तो आप भी मानते होंगे कि भाषा एकता में कितनी महत्त्वपूर्ण होती है।”
एक मित्र हैं शंकर राजाराम। चेन्नई के रहने वाले हैं। घूमते बहुत हैं। जब भी दिल्ली आते हैं या यहां से गुजरते हैं तो हमारे यहां जरूर आते हैं। जाहिर है मूल रूप से तमिलभाषी हैं लेकिन हिन्दी भी बोलते हैं, हालांकि उतनी अच्छी नहीं। पुल्लिंग को बडी आसानी से स्त्रीलिंग बना देते हैं- नीरज, कैसी हो?
मैंने उनसे पूछा कि आप हिन्दी कैसे बोल लेते हो जबकि तमिलनाडु में हिन्दी का रिवाज नहीं है। बोले कि अगर आपको भारत में घूमना है, भारत को जानना है तो हिन्दी बोलनी ही पडेगी। शंकर राजाराम उन थोडे से लोगों में से एक हैं, जो हिन्दी की अहमियत जानते हैं। उन पर हिन्दी थोपी नहीं गई। अगर थोपी गई होती तो क्या पता वे हिन्दी के विरोधी ही बन जाते। थोपे जाने पर हम हर चीज का विरोध करते हैं, हर चीज का।
हिन्दी को अगर राष्ट्रभाषा बना दिया तो गैर-हिन्दीभाषी राज्यों में विरोध होगा ही। हालांकि केरल से लेकर मिजोरम तक ज्यादातर व्यक्ति हिन्दी जानते हैं। जरुरत है कि हिन्दी का महत्व इतना बढा दिया जाये, इतना बढा दिया जाये कि बाकियों को लगे कि हिन्दी सीखनी चाहिये। यह महत्व इस तरह बढाना होगा कि कहीं यह दूसरी भाषाओं का बलिदान न ले ले। इसी बलिदान, इसी डर की वजह से भाषाओं को लेकर झगडे होते हैं। असोम, महाराष्ट्र में हिन्दीभाषी पिटते हैं, कर्नाटक में पूर्वोत्तर वाले पिटते हैं, केवल भाषाई कारणों से।
हिमाचल के बौद्ध इलाकों में जैसे कि किन्नौर, लाहौल, स्पीति और लद्दाख में तिब्बती भाषा का प्रचलन है। उसका अपना साहित्य भी है। लेकिन स्वतन्त्रता के बाद भारत सरकार ने हिन्दी को बढावा दिया तो यह भाषा हाशिये पर चली गई। अब शिक्षा व्यवस्था ऐसी है कि उन्हें या तो अंग्रेजी पढनी पडेगी या फिर हिन्दी। मन में तो उनके आता होगा, विरोध भी वे करते होंगे कि वे अपने बच्चों को अपनी भाषा में क्यों नहीं पढा सकते? उन पर हिन्दी थोप दी गई। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिये था। हिन्दी जरूरी है लेकिन उनकी अपनी भाषा की बलि पर नहीं।
उनकी संख्या थोडी सी है, उनका विरोध आसानी से दब गया। लेकिन बडी जनसंख्या वालों का विरोध नहीं दबा करता। दूसरे राज्यों में ऐसा ही हो रहा है। हिन्दी जानते सभी हैं लेकिन जब उन्हें लगता है कि हिन्दी अतिक्रमण कर रही है, उनकी अपनी भाषा को खतरा है तो वे विरोध करेंगे ही। बेहतर यही है कि हिन्दी का प्रचार सुनियोजित तरीके से हो। अभी हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का समय नहीं आया है। देश इसके लिये तैयार नहीं है और न ही हिन्दी।

7. अभी पिछले सप्ताह ही पंजाब पैसेंजर ट्रेन यात्रा की तैयारी की थी। इसमें पंजाब की वे लाइनें देखनी थीं जहां मैंने अभी तक पैसेंजर ट्रेनों में यात्रा नहीं की थी। लेकिन जब लुधियाना पहुंच गया और फिरोजपुर वाली पैसेंजर में बैठ गया तो मन में नकारात्मक विचार आने शुरू हो गये। पैसेंजर यात्रा बन्द करने के विचार। मन में आया कि फिरोजपुर से पंजाब मेल पकडकर वापस दिल्ली चला जाऊं लेकिन चार दिनों की छुट्टियां भी दिख रही थीं। पैसेंजर यात्रा नहीं करूंगा तो ये छुट्टियां खराब हो जायेंगी। आखिरकार स्टेशन के सामने एक कमरा ले लिया और सो गया। क्या पता अगले दिन विचार बदल जाये।
अगले दिन वास्तव में विचार बदले हुए थे। कोटकपूरा पहुंचा। अब मुझे फाजिल्का जाना था और वहां से फिरोजपुर और फिर जालंधर। लेकिन मुक्तसर तक भी नहीं पहुंच पाया था कि फिर से कल वाली कहानी शुरू हो गई। मुक्तसर उतर गया और फाजिल्का से आने वाली रेवाडी पैसेंजर में बैठ गया। हिसार से गोरखधाम पकडी और रात नौ बजे तक दिल्ली। तय कर लिया कि अब पैसेंजर यात्रा नहीं करूंगा। इसमें समय बहुत लगता है, बोरियत होती है और ब्लॉग पर पाठकों का अच्छा रेस्पॉंस भी नहीं मिलता। पिछले साल साइकिल यात्रा शुरू की थी, वो बन्द कर दी। क्योंकि जहां जहां साइकिल जा सकती है, वहां मोटरसाइकिल भी जा सकती है। फिर क्यों समय-खपाऊ साइकिल यात्रा करें? नौकरीपेशा इंसान के लिये समय प्रबन्धन बहुत बडी चीज है। कभी मोटरसाइकिल लेंगे, तो जहां साइकिल से जाने की इच्छा थी, मोटरसाइकिल से चले जायेंगे। इसी तरह पैसेंजर यात्रा बन्द की। कभी मन किया तो एक्सप्रेस से चला जाया करूंगा।
दूसरी बात, कई नावों की सवारी ठीक नहीं होती। एक दौर ऐसा आता है जब हमें अपनी पसन्द, शौक पहचानने पडते हैं। मुझे ट्रेन यात्राएं भी अच्छी लगती हैं, साइकिल यात्रा भी, ट्रेकिंग भी और भविष्य में मोटरसाइकिल आ जायेगी तो वो भी अच्छी लगेगी। लेकिन इनमें से एक को चुनना हो तो बाकियों को छोडना पडेगा। साइकिल यात्रा छोड दी। हिमालय के कारण ट्रेकिंग नहीं छोड सकता तो ट्रेन यात्रा छोड दी। एक ही जगह ध्यान केन्द्रित रहे तो अच्छा है। पैसेंजर यात्राओं में फोटोग्राफी पर भी असर पडता था। फोटो चलती ट्रेन से लेने पडते थे और ऐसे फोटो ऑटोमेटिक मोड पर ही ज्यादा ठीक आते हैं। मैन्यूअल मोड पर आपको फोटो लेने हों तो स्थिरता जरूरी है।

8. पिछली बार ‘घाघरा’ स्टेशन का फोटो दिखाया था और पूछा था कि यह स्टेशन कहां है? मुझे उम्मीद थी कि बहुत सारे मित्र इसका जवाब देंगे लेकिन सभी एक नम्बर के आलसी हैं। किसी के पास इतना समय नहीं होता कि टिप्पणी ही कर सकें। फिर एक उम्मीद और थी कि सभी लखनऊ-गोण्डा के बीच में स्थित ‘घाघरा घाट’ के बारे में बतायेंगे। लेकिन ‘घाघरा घाट’ के बारे में एक ही मित्र ने बताया। ‘घाघरा’ की सही स्थिति कईयों ने बता दी। तो अपने वचन को निभाते हुए हम सही जवाब देने वाले मित्रों का नाम बडे बडे काले अक्षरों में लिख रहे हैं-

1.  रणजीत, 2. सचिन

हालांकि गोपाल लाल ने भी कहा कि यह स्टेशन झारखण्ड में होना चाहिये क्योंकि इसका नाम हिन्दी व अंग्रेजी में लिखा है। तो गोपाल जी, आपको बता दूं कि झारखण्ड पहले बिहार का हिस्सा था तो यहां स्टेशनों के नाम हिन्दी, अंग्रेजी के साथ उर्दू में भी लिखे जाते हैं। बंगाल सीमा के पास कुछ स्टेशन बंगाली में भी हैं, तो ओडिशा सीमा के पास कुछ उडिया में भी लिखे हैं। घाघरा स्टेशन टाटानगर-राउरकेला के बीच में झारखण्ड में स्थित है। यह बिल्कुल नया बना स्टेशन है, हाल्ट है। भविष्य में भले ही यहां उर्दू या उडिया भी आ जाये लेकिन अभी प्रारम्भिक दौर में हिन्दी और अंग्रेजी ही हैं।

9. अब आज का सवाल:

आपको बताना है कि यह स्टेशन किस राज्य में है, कहां है? सही उत्तर देने वालों का नाम बडे बडे काले अक्षरों में अगली डायरी में लिखा जायेगा।

Wednesday, October 29, 2014

गोमो से हावडा लोकल ट्रेन यात्रा

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें।
यह गोमो से आसनसोल जाने वाली एक मेमू ट्रेन थी जो आसनसोल में पांच मिनट रुककर बर्द्धमान के लिये चल देती है। बर्द्धमान से हावडा जाने के लिये थोडी-थोडी देर में लोकल ट्रेनें हैं जो कॉर्ड व मेन दोनों लाइनों से जाती रहती हैं। मैंने गोमो से ही सीधे हावडा का पैसेंजर का टिकट ले लिया। पूरे 300 किलोमीटर है।
सुबह सवा सात बजे ट्रेन चल पडी। गोमो से निकलकर रामकुण्डा हाल्ट था जहां यह ट्रेन नहीं रुकती। शायद कोई भी ट्रेन नहीं रुकती। पहले रुकती होगी कभी। इसके बाद मतारी, नीचीतपुर हाल्ट, तेतुलमारी, भूली हाल्ट और फिर धनबाद आता है। आठ बजकर दस मिनट पर धनबाद पहुंच गये। गोमो से यहां तक ट्रेन बिल्कुल खचाखच भरी थी। सुबह का समय और धनबाद जैसी जगह; भला ट्रेन क्यों न भरे? धनबाद में खाली हो गई और फिर नये सिरे से भर गई हालांकि इस बार उतनी भीड नहीं थी।
ट्रेन को यहां से तुरन्त ही चल देना चाहिये था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रुकी रही... रुकी रही... रुकी रही। साढे आठ... पौने नौ... नौ... सवा नौ... साढे नौ... पौने दस...। आखिरकार नौ बजकर पचास मिनट पर ट्रेन चली तकरीबन डेढ घण्टे की देरी से। अक्सर पूर्वी रेलवे की ये लोकल ट्रेनें कभी भी लेट नहीं होतीं। एक बार तो मन में आया कि इस भीड भरी ट्रेन को छोड दूं और कोडरमा से आने वाली लोकल में चढ जाऊं। कोडरमा लोकल भी बर्द्धमान तक जाती है और इसके पन्द्रह मिनट बाद ही यहां आने वाली है। इसमें इसके यात्री तो हैं ही, साथ ही कोडरमा लोकल के यात्री भी हैं, इसलिये डबल भीड है। लेकिन फिर सोचा कि ज्यादा स्यानापंती ठीक नहीं है। अभी तो गोमो लोकल ही डेढ घण्टे लेट हुई है, क्या पता कोडरमा लोकल भी यहां आकर रुक जाये। आखिरकार इसी में चढा रहा।
धनबाद से आगे डोकरा हाल्ट और प्रधान खांटा जंक्शन हैं। प्रधान खांटा से एक लाइन सिन्दरी टाउन व आगे आद्रा की तरफ जाती है। इससे अगला स्टेशन छोटा अम्बोना है। यहां स्टेशन का नाम बंगाली में भी लिखा देखकर हैरान रह गया। गौरतलब है कि धनबाद से अगला बडा स्टेशन आसनसोल है जो पश्चिमी बंगाल में स्थित है। इसका अर्थ हुआ कि धनबाद और आसनसोल के बीच में कहीं झारखण्ड और पश्चिमी बंगाल की सीमा है। फिर स्टेशनों के नाम हिन्दी, अंग्रेजी और उस राज्य की राजकीय भाषा में लिखे जाते हैं। अभी तक सभी नाम हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू में लिखे मिल रहे थे। यूपी, बिहार और झारखण्ड में उर्दू भी चलती है। अब जब छोटा अम्बोना को बंगाली में लिखा देखा तो इसका अर्थ था कि झारखण्ड पीछे छूट गया और पश्चिमी बंगाल शुरू हो गया। हैरानी इस बात की थी कि मेरी जानकारी के अनुसार पश्चिमी बंगाल इतनी जल्दी शुरू नहीं होना चाहिये था। मोबाइल में गूगल मैप और जीपीएस से अपनी सटीक स्थिति देखी तो पता चला कि मैं झारखण्ड में ही हूं और अभी भी तीस-चालीस किलोमीटर तक झारखण्ड है।
तो गलत कौन है? गूगल मैप में अक्सर त्रुटियां मिल जाती हैं लेकिन राज्यों की सीमाओं में कोई त्रुटि नहीं मिलती। अर्थात गूगल मैप गलत नहीं हो सकता। असल में यह सारा खेल रेलवे जोन व डिवीजन का है। प्रधान खांटा तक पूर्व मध्य रेलवे की धनबाद डिवीजन है और इसके बाद पूर्वी रेलवे की आसनसोल डिवीजन शुरू हो जाती है। पूर्वी रेलवे मुख्यतः पश्चिमी बंगाल में है तो उसने अपने अन्तर्गत आने वाले सभी स्टेशनों को बंगाली में भी लिख दिया है।
चलिये, आगे बढते हैं। छोटा अम्बोना के बाद कालुबथान, थापरनगर, मुगमा, कुमारधुबी, बराकर, कुलटी, सीतारामपुर जंक्शन, बराचक जंक्शन और आसनसोल जंक्शन हैं। कुमारधुबी और बराकर के बीच से बराकर नदी बहती है जो यहां झारखण्ड-बंगाल सीमा बनाती है। इस प्रकार कुमारधुबी झारखण्ड में है और बराकर पश्चिमी बंगाल में। सीतारामपुर से एक लाइन जसीडीह और आगे पटना तक जाती है, बराचक से एक लाइन इधर-उधर होती हुई आगे अण्डाल में इसी लाइन में मिल जाती है और आसनसोल से एक लाइन आद्रा, पुरुलिया जाती है।
वैसे तो यह ट्रेन (63542) आसनसोल तक ही थी लेकिन यही डिब्बे नये नम्बर (63516) से बर्द्धमान भी जाते हैं। इसलिये मुझे इससे उतरने की जरुरत नहीं थी। आसनसोल से आगे के स्टेशन हैं- काली पहाडी, रानीगंज, अण्डाल जंक्शन, वारिया, दुर्गापुर, राजबांध, पानागढ, मानकर, पाराज, गलसी, इशान चण्डी हाल्ट, खाना जंक्शन, तालित और बर्द्धमान जंक्शन। अण्डाल जंक्शन से एक लाइन बराचक तो जाती ही है, साथ ही दूसरी लाइन सिउडी भी जाती है। खाना जंक्शन से आप रामपुरहाट और आगे भागलपुर वाली लाइन पर यात्रा कर सकते हैं। जबकि बर्द्धमान इसलिये जंक्शन है क्योंकि यहां से एक नैरो गेज की लाइन कटवा जाती है। कटवा नैरो गेज लाइन पर कुछ ही दूर तक नैरो गेज की ट्रेन चलती है, फिर गेज परिवर्तन हो चुका है और ब्रॉड गेज की ट्रेन चल चुकी है।
आसनसोल से रानीगंज और दुर्गापुर तक एक औद्योगिक क्षेत्र है। साथ ही यहां कोयले की खानें भी हैं। बडे-बडे ताप बिजलीघर हैं। इसलिये इस मुख्य लाइन के अलावा भी अनगिनत छोटी-छोटी लाइनें यहां बिछी हैं। इनमें से बहुत सी लाइनें इसलिये भी बन्द हो चुकी हैं क्योंकि उनके नीचे से कोयला निकाल-निकालकर जमीन खोखली और कमजोर हो चुकी है। फिर भी यहां रेल की लाइनें देख-देखकर हैरानी होती हैं। गूगल मैप में इस पूरे रेल नेटवर्क को आसानी से देखा जा सकता है। सौ सौ किलोमीटर तक की ऐसी लाइनें हैं जहां केवल कोयला ढोने वाली मालगाडियां ही चलती हैं, कोई यात्री गाडी नहीं चलती।
बर्द्धमान में मेरे पास लगभग एक घण्टा था। यहां से हावडा के लिये लोकल ट्रेनों की कोई कमी नहीं है। दो लोकल ट्रेनें (37838 और 36842) अभी भी खडी थीं। इनमें से एक मेन लाइन से जायेगी और दूसरी कॉर्ड के रास्ते से।
बर्द्धमान से हावडा जाने की दो लाइनें हैं- एक मेन लाइन और दूसरी कॉर्ड (Cord) लाइन। कॉर्ड को हिन्दी में जीवा कहते हैं। यह एक गणितीय शब्द है। किसी वृत्त में परिधि पर किन्हीं भी दो बिन्दुओं को मिलाने वाली सीधी रेखा को जीवा कहा जाता है। इसी तरह बर्द्धमान से हावडा जाने का एक तो परिधीय मार्ग है जो बैण्डेल होते हुए जाता है। इसकी लम्बाई करीब 110 किलोमीटर है। दूसरा बिल्कुल सीधा मार्ग है जो करीब 90 किलोमीटर लम्बा है। दोनों ही मार्गों पर लोकल ट्रेनें चलती हैं।
मैंने गोमो से अब तक कुछ भी नहीं खाया था। भूख लग रही थी। सारी यात्रा दरवाजे पर खडे हुए ही तय की थी, इसलिये पैर भी दुख रहे थे। बहुत थकान हो रही थी। इसलिये तय किया कि एक घण्टे बाद जो लोकल (37840) आयेगी, उसमें जाऊंगा। स्टेशन से बाहर निकल आया। एक होटल में निरामिष दाल भात खाये। चालीस रुपये लगे। बंगाल मैं कई बार जा चुका हूं। जमकर हिन्दी बोलता हूं। लेकिन परदेशी समझकर किसी ने न तो कभी ठगने की कोशिश की और न ही हिन्दी बोलने से मना किया। बंगाल को मैं विशेष इज्जत से देखता हूं क्योंकि बंगालियों के माथे एक ठप्पा लगा हुआ है कि यह कौम भारत में सबसे ज्यादा घूमती है। हिमालय पर दुर्गम स्थानों पर ट्रैकिंग हो या किसी सुगम स्थान पर मौजमस्ती; बंगाली अवश्य मिलते हैं।
तीन बजकर पांच मिनट वाली लोकल (37840) मेन लाइन से जायेगी और तीन बजकर दस मिनट वाली (36844) कॉर्ड से। मैंने मेन लाइन से जाने का फैसला किया। हालांकि कॉर्ड वाली हावडा जल्दी पहुंचती है लेकिन मुझे कोई जल्दी नहीं थी। दोनों लोकल एक ही प्लेटफार्म से रवाना होती हैं। जब मेन लाइन वाली लोकल प्लेटफार्म पर खडी थी तो इसके चलने से पहले ही कॉर्ड वाली भी इसके पीछे आकर लग गई। पीछे वाली इतनी पास आकर रुकी कि फर्क करना मुश्किल था कि ये दो अलग अलग ट्रेनें हैं। किसी नये आदमी को अगर मेन लाइन पर जाना हो तो वह आसानी से भूलवश कॉर्ड वाली में चढ सकता था। इसी तरह अगर कॉर्ड लाइन पर जाना हो तो वह मेन लाइन वाली में चढ सकता था। लेकिन नया होने के बावजूद भी मुझे तो फर्क पता था, इसलिये मेन वाली में जा चढा। ठीक समय पर ट्रेन चल पडी।
बर्द्धमान से हावडा तक मेन लाइन के सभी स्टेशन इस प्रकार हैं- बर्द्धमान जंक्शन, गांगपुर, शक्तिगढ, पालसिट, रसूलपुर, निमो, मेमारी, बागिला, देबीपुर, बैंची, बैंचीग्राम, सिमलागड, पाण्डुया, खन्यान, तालाण्डु, मगरा, आदि सप्तग्राम, बैण्डेल जंक्शन, हुगली, चुचुडा, चन्दन नगर, मानकुण्डु, भद्रेश्वर, बैद्यबाटी, सेवडाफुली जंक्शन, श्रीरामपुर, रिसडा, कोननगर, हिन्द मोटर, उत्तरपाडा, बाली, बेलूड, लिलुआ और हावडा।
शक्तिगढ से मेन लाइन और कॉर्ड लाइनें अलग-अलग होती हैं। बैण्डेल से एक लाइन मालदा टाउन चली जाती है और एक लाइन हुगली पार करके सियालदह जाती है। इसी तरह सेवडाफुली जंक्शन से तीसरी लाइन ताडकेश्वर जाती है। ताडकेश्वर वाली लाइन कॉर्ड लाइन को पुल के द्वारा नब्बे डिग्री के कोण पर कमारकुण्डु में काटती है। इसी तरह बाली में भी कॉर्ड लाइन से सीधे सियालदह जाने वाली लाइन पुल के द्वारा इस मेन लाइन को काटती है। बाली में ही कॉर्ड और मेन लाइनें फिर से एक हो जाती हैं।
हावडा जायें और स्टेशन से बाहर निकलकर हावडा पुल न देखें? असम्भव है। इस पुल को बस देखते रहने का मन करता है। फोटो में यह बहुत छोटा नजर आता है। इसी कारण मैंने इसका बहुत साधारण सा एक ही फोटो लिया। पूरी तरह लोहे से बने इस पुल की विशालता का एहसास बस खडे होकर देखते रहने में है। साथ ही हावडा स्टेशन की विशालकाय इमारत भी हैरतअंगेज है।
शाम सात बजकर दस मिनट पर हावडा-अमृतसर मेल (13005) चलती है। इसमें मेरा पटना तक का आरक्षण था। ट्रेन प्लेटफार्म नम्बर आठ पर आई। साधारण डिब्बों के सामने पुलिस वाले यात्रियों को लाइन में खडा कर रहे थे और पैसे लेकर उन्हें डिब्बे में प्रवेश करने दे रहे थे। लम्बी दूरी की ट्रेनों में हमेशा ऐसा देखने को मिलता है। साधारण टिकटधारियों को बैठने के लिये सीट चाहिये होती है। पुलिस वाले इसी का फायदा उठाते हैं। एक नम्बर की कुत्ती कौम है पुलिस।
रात साढे ग्यारह बजे ट्रेन जसीडीह पहुंचेगी। वहां मित्र आशीष गुटगुटिया ने मिलने को कहा है। दिन भर का थका हुआ हूं, सुबह सवेरे फिर उठना है; इसलिये आज मैं आधी रात को नहीं जगना चाहता। हालांकि फेसबुक पर मैंने उन्हें मिलने से मना कर दिया था, लेकिन फिर भी वे मिलने को उत्सुक हैं। अभी तक उन्होंने फोन नहीं किया कि किस डिब्बे में हूं। हो सकता है कि आधी रात को फोन करके पूछें। इसलिये इसे साइलेण्ट कर लेता हूं। सुबह सवा चार बजे ट्रेन पटना पहुंचेगी, इसलिये सवा चार बजे का अलार्म लगा लेता हूं। फोन साइलेण्ट हो या स्विच ऑफ, अलार्म तो बज ही जाता है।
हालांकि आधी रात को उनका फोन नहीं आया।


नाम भले ही बंगाली में भी लिखा हो, लेकिन यह झारखण्ड में है।

बराकर इस लाइन पर पश्चिमी बंगाल का पहला स्टेशन है।










हावडा स्टेशन
अगले भाग में जारी...

Monday, October 27, 2014

मुगलसराय से गोमो पैसेंजर ट्रेन यात्रा

दिल्ली से मुगलसराय
1 सितम्बर 2014, सोमवार
सितम्बर की पहली तारीख को मेरी नंदन कानन एक्सप्रेस छूट गई। सुबह साढे छह बजे नई दिल्ली से ट्रेन थी और मुझे ऑफिस में ही सवा छह बज गये थे। फिर नई दिल्ली जाने की कोशिश भी नहीं की और सीधा कमरे पर आ गया। इस बार मुझे मुगलसराय से हावडा को अपने पैसेंजर ट्रेन के नक्शे में जोडना था। ऐसा करने से दिल्ली और हावडा भी जुड जाते। दिल्ली-मुम्बई पहले ही जुडे हुए हैं। पहले भी हावडा की तरफ जाने की कोशिश की थी लेकिन पीछे हटना पडता था। इसका कारण था कि भारत के इस हिस्से में ट्रेनें बहुत लेट हो जाती हैं। चूंकि स्टेशनों के फोटो भी खींचने पडते थे, इसलिये सफर दिन में ही कर सकता था। इस तरह मुगलसराय से पहले दिन चलकर गोमो तक जा सकता था और दूसरे दिन हावडा तक। हावडा से वापस दिल्ली आने के लिये वैसे तो बहुत ट्रेनें हैं लेकिन शाम को ऐसी कोई ट्रेन नहीं थी जिससे मैं अगले दिन दोपहर दो बजे से पहले दिल्ली आ सकूं। थी भी तो कोई भरोसे की नहीं थी सिवाय राजधानी के। राजधानी ट्रेनें बहुत महंगी होती हैं, इसलिये मैं इन्हें ज्यादा पसन्द नहीं करता।
इसका तरीका निकाला कि हावडा से रातोंरात पटना आया जाये। दिन में पटना से मुगलसराय तक पैसेंजर यात्रा की जाये और शाम को वाराणसी से चलकर अगले दिन सुबह तक दिल्ली लौटा जाये। इसमें मुझे एक और अतिरिक्त छुट्टी लेनी पडेगी। लेकिन सुकून इस बात का रहेगा कि दिल्ली और पटना भी जुड जायेंगे।
अब कैसे मुगलसराय जाऊं? एक बार तो मन में आया कि साधारण डिब्बे में चलता हूं। लेकिन रातभर का जगा होने के कारण व बिहार रूट होने के कारण साधारण डिब्बे में चढना ही पाप था। कमरे पर आकर ट्रेनों में सीटें देखीं तो तीन ट्रेनों में खाली सीटें मिली- रांची राजधानी, भुवनेश्वर राजधानी और भागलपुर गरीब रथ में चेयरकार। गरीब रथ का कोई भरोसा नहीं था कि पांच बजे से पहले मुगलसराय पहुंच जायेगी या नहीं। इसका रिकार्ड आजकल भी छह छह घण्टे विलम्ब से चलने का है, तो इससे जाने का इरादा बदल लिया। अब बची राजधानियां। वैसे तो मैं पंजाब या राजस्थान भी जा सकता था। वहां अभी भी मेरे अनदेखे कई रेलमार्ग बचे हुए हैं, लेकिन ऐसा करने से मुगलसराय-हावडा मार्ग एक बार फिर अनछुआ रह जायेगा। आखिर जी कडा करके भुवनेश्वर राजधानी में आरक्षण करा लिया। लगभग 1500 रुपये लगे।
शाम चार सवा चार बजे नई दिल्ली से भुवनेश्वर राजधानी चलती है। इस समय नई दिल्ली से कई राजधानियां निकलती हैं। बराबर वाले प्लेटफार्म पर पटना राजधानी खडी थी जो भुवनेश्वर के बाद चलेगी।
तय समय पर गाडी चल पडी। चलने से पहले मैंने प्लेटफार्म से ‘मॉंक हू सोल्ड हिज फेरारी’ का हिन्दी अनुवाद खरीद लिया। बर्थ ऊपर वाली थी और जाकर लेट गया और किताब पढने लगा। समय पर खाने-पीने को आता रहा।
यह मेरी राजधानी ट्रेन में दूसरी यात्रा थी। पहली यात्रा भी कोई ज्यादा अच्छी नहीं रही थी। और इस यात्रा में ट्रेन की हालत देखकर तरस आ गया। राजधानी भारत की सबसे वीआईपी ट्रेन है। सुना है कि पूर्व की तरफ जाने वाली राजधानियां खराब हालत में हैं और दक्षिण व पश्चिम की तरफ जाने वाली शानदार हालत में। देखते हैं उन शानदार राजधानियों में बैठने का मौका कब मिलेगा? इस ट्रेन में टॉयलेट गन्दगी से भरा हुआ था और ट्रेन के हिलने से गन्दगी फर्श पर फैल भी रही थी। डिब्बे की छत की शीट जगह-जगह से थोडी उखडी भी थी।
वातानुकूलित ट्रेनों में सबसे बेकार की चीज मुझे जो लगती है, वो है अटेंडेंट। अटेंडेंट समाज के सबसे घटिया समुदाय का आदमी होता है यानी अनपढ समुदाय का। फिर राजधानियों में ‘बडे’ लोग यात्रा करते हैं तो वो अनपढ आदमी स्वयं को सबका बॉस समझने लगता है। कुछ काम न करना और सबको हिदायतें देते रहना उसका काम होता है।
इसी कूपे में एक साहब भी यात्रा कर रहे थे। ये महाशय कोई बडे सरकारी अधिकारी थे। इनके साथ एक नौकर भी था। मैंने पूछा तो नहीं लेकिन बोलचाल से साफ पता चल जाता है। नीचे बैठे दूसरे लोगों से वे बात कर रहे थे और बिना पीएम, सीएम और गवर्नर के बात नहीं कर रहे थे। मसलन, मुझे गवर्नर साहब को अटैंड करने जाना था, गवर्नर साहब से इतनी देर बात हुई आदि। बडे लोगों के हावभाव तो अपने ही आप बदल जाते हैं लेकिन ये सभ्य बडे आदमी थे। सामने वाले से शालीनता से बात कर रहे थे। बाद में मैंने भी कुछ बातें कीं, तब भी वही शालीनता बरकरार रही। अच्छा लगता है जब कोई बडा आदमी इस तरह बात करता है।
रात दो बजे गाडी मुगलसराय पहुंची। इसके तुरन्त बाद ही बराबर वाले प्लेटफार्म पर पटना राजधानी भी आ गई। उत्तर मध्य रेलवे की इलाहाबाद डिवीजन के इस मार्ग पर केवल राजधानी ट्रेनों की ही इज्जत है। बाकी सभी ट्रेनें लेट चलती हैं, सिवाय उत्तर-मध्य रेलवे की गाडियों को छोडकर जैसे प्रयागराज और कालिन्दी।

मुगलसराय से गोमो
सुबह साढे पांच बजे आसनसोल पैसेंजर है। पूरे दिन उसी ट्रेन में बैठे रहना है। नींद आयेगी। मैंने एक गलती कर दी कि ओढने बिछाने को कुछ भी नहीं लाया अन्यथा पैदल पार पथ पर अच्छी हवा लग रही थी। सबसे पहले गोमो का टिकट लिया और उसके बाद डेढ सौ रुपये देकर डोरमेट्री में एक बिस्तर ले लिया और सो गया। पांच बजे उठा। जब तक नहाया, तब तक ट्रेन मुगलसराय आ चुकी थी।
ठीक समय पर गाडी यहां से चल पडी। हां, अब मैं भोजपुरी भाषी प्रदेश में हूं तो कहना चाहिये कि गाडी ठीक समय पर खुल गया। लेकिन अगले स्टेशन गंज ख्वाजा पहुंचते पहुंचते एक घण्टे लेट हो चुकी थी। इसके बाद चन्दौली मझवार और सैयद राजा स्टेशन हैं। सैयद राजा उत्तर प्रदेश का आखिरी स्टेशन है। इसके बाद बिहार आरम्भ हो जाता है और बिहार का पहला स्टेशन है कर्मनाशा। यह नाम इसी नाम की नदी के कारण पडा। बहुत समय पहले ‘कर्मनाशा की बाढ’ नाम की एक कहानी पढी थी, पाठ्यक्रम में थी। मुझे पक्का तो याद नहीं लेकिन उसमें एक ऐसी महिला की कहानी है जो विवाह से पहले ही मां बन गई थी। उसके बाद कर्मनाशा में बाढ आ गई तो अन्धविश्वासी गांव वालों ने इस बाढ का जिम्मेदार उस महिला को ही माना। इसके बाद तो ध्यान नहीं क्या हुआ लेकिन शायद यह एक सुखान्त कहानी थी।
इसके बाद तो स्टेशन आते गये, जाते गये लेकिन भीड नहीं बढी। बाहर चारों तरफ केवल एक ही फसल दिखाई दे रही थी और वो थी धान। बिहार, बंगाल, झारखण्ड, ओडिशा और पूरे पूर्वोत्तर में धान ही मुख्य फसल है। धान का अर्थ है कि यहां पानी की कोई कमी नहीं है। लेकिन अगर बारिश में थोडा भी विलम्ब हो जाये तो यहां सूखा पडते भी देर नहीं लगती। मैं अक्सर शेष भारत की खेती की तुलना पश्चिमी यूपी, हरियाणा और पंजाब से करता हूं। जाहिर है यहां भी करूंगा। वहां धान मुख्य फसल नहीं है बल्कि मुख्य फसल है गेहूं। गेहूं शुष्क जलवायु की फसल होती है। ऐसा पुराने काल से होता आ रहा है। फिर मानसून की मामूली सी जानकारी रखने वाला भी जानता है कि भारत में मानसून दो चरणों में प्रवेश करता है। पहले चरण में पश्चिमी घाट यानी केरल कर्नाटक से शुरू होकर दक्षिणी प्रायद्वीप को लांघकर बंगाल की खाडी में चला जाता है। दूसरे चरण में बंगाल की खाडी से पुनः प्रकट होता है बंगाल-ओडिशा में। यहां से यह उत्तर की ओर बढता है और हिमालय के कारण पश्चिमोत्तर दिशा में बढने लगता है। इसी मार्ग में सम्पूर्ण धान प्रदेश आ जाता है यानी बिहार भी। हरियाणा-पंजाब तक पहुंचते पहुंचते जाहिर है मानसून बिहार-बंगाल के मुकाबले क्षीण ही होता है। इसलिये हरियाणा-पंजाब में हमेशा बिहार-बंगाल के मुकाबले कम बारिश होती है।
मेरा इतना सब कहने का मतलब है कि बिहार फिर क्यों इतना पिछडा है? मौसम मेहरबान, जमीन उपजाऊ, मेहनतकश लोग; फिर क्या वजह है कि बिहार भारत का बदतम प्रदेश है? पंजाब और बिहार में प्राकृतिक तौर पर बडी समानताएं हैं। दोनों ही राज्य पूर्ण मैदानी हैं, दोनों के उत्तर में हिमालय है। हिमालय से नदियां निकलकर सीधे दोनों राज्यों में प्रवेश करती हैं और जमीन को उपजाऊ बनाती हैं। दोनों राज्यों में पर्यटन भी कोई ज्यादा नहीं है। एक में जहां ले-देकर अमृतसर है तो दूसरे में बोधगया। इनके अलावा कुछ नहीं। सामाजिक परिवेश की मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है लेकिन दोनों में पहले जमींदारी प्रथा थी। एक जमींदार होता था और कई-कई गांव उसकी हद में होते थे।
फिर क्यों इतनी असमानताएं हैं? इसका जवाब अमृतसर और कटिहार के बीच चलने वाली आम्रपाली एक्सप्रेस देगी। इसमें कम से कम नब्बे प्रतिशत यात्री बिहारी होते हैं। दूसरे राज्यों में पलायन करना बिहारियों में भर-भर कर भरा होता है। और पलायन भी किसलिये? मजदूरी करने... गोबर ढोने... पत्थर कूटने... चिनाई करने। इस बारे में अजीत सिंह कुछ इस प्रकार लिखते हैं-
“एक आदमी बेचारा अनपढ गंवार अंगूठा टेक ... उसके पास दो बीघा खेत हैं सूखा बंजर... न दाना न पानी... न वर्षा न नहर न कुआं... घास का तिनका तक नहीं उगता कि बकरी ही खा के पेट भर ले... उसके बच्चे भूखे मरते हैं... दर दर की ठोकरें खाते हैं... लोगों की गालियां सुनते हैं... ऐसे आदमी को आप क्या कहेंगे... उससे आप सिर्फ सहानुभूति ही जता सकते हैं।
एक दूसरा आदमी है जिसके पास दुनिया का सबसे उपजाऊ खेत... भरपूर बारिश... जमीन में बीस फीट पे पानी... शानदार मौसम... सभी फसलों के लिये उपयुक्त जमीन और जलवायु... ऊपर से पढा लिखा अफलातून... उसके बाप दादा सब अरस्तू और सुकरात... उसके दादा के दरवाजे पर हाथी झूमता था... परदादा उसका दुनिया पे राज करता था... अब उसके बच्चे अगर भूखे मरते हों... दुनिया भर में दर दर की ठोकरें खाते हों... दुनिया भर में तिरस्कृत हों... धिक्कारे जायें... तो ऐसे आदमी को आप क्या कहेंगे?... गाली देंगे कि नहीं?... यही ना कहेंगे कि अबे तुझे तो दुनिया का सबसे सम्पन्न आदमी होना चाहिये और तेरे बच्चे ठोकरें खा रहे हैं?
यही हाल है हमारे यूपी बिहार का... मैं जब भी यूपी बिहार पे कोई पोस्ट लिखता हूं युद्ध शुरू हो जाता है... लोग तलवार निकाल लेते हैं... अरे भैया गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र जाकर देखो... सूखा बियावान बंजर... न पानी न खेती बाडी... फिर भी हमसे कितना आगे हैं... और एक हम... गंगा किनारे वाले... धरती का सबसे उपजाऊ प्रदेश... अनाज छींटा दो बस खेत में... सोना उगलने वाली धरती... प्रचुर मात्रा में पानी... दोनों फसलें मिलती हैं... दलहन तिलहन सब होता है... फल सब्जियों का भण्डार... ऊपर से इतने मेधावी... इतने आईएएस देने वाले... पढे लिखे... बाप हमारे मगध पाटलिपुत्र से दुनिया पे राज कर गये... और हम साले यहां लोगों का गोबर फेंक रहे हैं पंजाब, हरियाणा, गुजरात में?... जूठे बर्तन मांजते हैं 3000 रुपये में?... रिक्शा खींचते हैं... मजदूरी करते हैं और फिर भी धिक्कारे जाते हैं।
दुनिया पे राज करने वाले आज फकीर बने घूमने को मजबूर... अरे भैया हमने तो सिर्फ याद दिलाया है कि बेटा तुम्हारे बाप के दरवाजे हाथी झूमता था... तुम साले सिक्कड लिये हमारे ही पीछे दौड पडते हो...
लालू मुलायम मायावती से बचो भैया... फिर हाथी झूमेगा तुम्हारे दुआरे... तुम्हारे लडके भी घी खायेंगे दाल में डाल के...”
गौरतलब है कि अजीत सिंह ‘बिहारी’ हैं।
चलिये, बहुत हो गया। नहीं तो बिहारी मित्र जो इसे पढ रहे हैं, वे नाराज हो जायेंगे। अरे हां, एक खास बात और रह गई। पंजाब में जो नदियां हैं, वे हिमाचल से आती हैं यानी भारत का पानी भारत में। हिमाचल में बडे बडे बांध बने हैं। सारा नियन्त्रण हमारे ही हाथ में है। जबकि बिहार की हिमालयी नदियों का पानी नेपाल से आता है। नेपाल ने जो दे दिया, उसी से गुजर-बसर करनी है। ज्यादा दे दिया तो बाढ भी झेलनी है। लेकिन यह समस्या सरकारों को सुलझानी थी। न भारत सरकार इस मामले में कुछ कर रही है और बिहार सरकार तो... माशा अल्लाह।
सासाराम जंक्शन एक घण्टे की देरी से पहुंची। सासाराम से एक लाइन आरा भी जाती है। सासाराम से आगे करवन्दिया और पहलेजा के बाद डेहरी ऑन सोन स्टेशन है। यह सोन नदी के किनारे स्थित है। डेहरी का अर्थ क्या हुआ? डेहरी अर्थात देहरी यानी द्वार। डेहरी ऑन सोन यानी सोन के द्वार पर। सही नाम है।
सोन नदी पार करके सोन नगर जंक्शन स्टेशन है। यहां से एक लाइन दक्षिण की ओर झारखण्ड में गढवा रोड और बरवाडीह की ओर चली जाती है। बडा भयंकर नक्सली इलाका है वह। लेकिन अगर रेलवे को झारखण्ड जैसे राज्यों से आर्थिक लाभ उठाना है तो ऐसे इलाकों में ट्रेन तो चलानी ही पडेगी। वहां रेलगाडियों को रोकना, उडाना बिल्कुल आम बात है। कुछ समय पहले राजधानी एक्सप्रेस भी नक्सलियों ने बन्धक बना ली थी। इसके अलावा लोको पायलटों और गार्डों को भी बन्धक बना लिया जाता है। कई-कई दिन बाद छोडा जाता है अक्सर तब जब उनकी कोई मांग मान ली जाती है।
सोन नगर के बाद चिरैला पौथू है और उसके बाद पुनपुन नदी। पुनपुन पार करते ही एक बोर्ड दिखाई देता है जिस पर लिखा है- अनुग्रह नारायण रोड घाट स्टेशन। यहां ट्रेन नहीं रुकी और अगले स्टेशन अनुग्रह नारायण रोड पर रुकी। यह घाट स्टेशन कभी आबाद स्टेशन रहा होगा या फिर आज भी किसी तीज त्यौहार के अवसर पर रुकती भी होगी। इसी तरह का एक और गुमनाम स्टेशन है- देवरिया कुरम्हा नरेश हाल्ट, जो अनुग्रह नारायण रोड से अगला स्टेशन है। इसका भी जिक्र किसी रेलवे साइट पर नहीं मिलता। फिर तो ट्रेन चलती रही, रुकती रही, स्टेशन निकलते गये, यात्री चढते रहे, उतरते रहे- फेसर, बघोई कुसा, जाखिम, देव रोड, रफीगंज, इस्माइलपुर, गुरारू, परैया, कष्ठा और गया जंक्शन। ट्रेन गया बिल्कुल ठीक समय पर पहुंची यानी पौने बारह बजे। गया से एक लाइन पटना भी जाती है। सुना है उस पर बडी भारी भीड होती है ट्रेनों में। भीड वाली ट्रेनों में यात्रा करते मेरे होश उडते हैं।
गया से साढे बारह बजे प्रस्थान किया यानी आधे घण्टे विलम्ब से। ट्रेन में भीड बिल्कुल नहीं थी। अगला स्टेशन है शहीद ईश्वर चौधरी हाल्ट। जितने हाल्ट आपको बिहार में मिलेंगे, उतने शायद ही किसी और राज्य में मिलें। बताते हैं कि यह सब लालू की करामात है। लालू जब रेलमन्त्री थे, तब उन्होंने ऐसा किया। यात्री अपने गांवों के सामने ट्रेन की चेन खींच देते थे। लालू ने ऐसे स्थानों को हाल्ट बना दिया। इससे ट्रेनें आधिकारिक तौर पर रुकने लगीं और टिकट काउण्टर खोल देने से रेलवे को आमदनी भी बढी। वैसे पैसेंजर ट्रेनों से रेलवे को कोई आमदनी नहीं होती। जितने ज्यादा स्टेशनों पर ट्रेन रुकेगी, उसका प्रचालन खर्च उतना ही ज्यादा बढेगा। इससे अच्छा होता कि ट्रेनों से चेन स्थायी रूप से ही निकलवा देते। खींचो बेटा, अब क्या खींचोगे?
मानपुर जंक्शन से एक लाइन कियूल की तरफ चली जाती है। फिर बन्धुआ, टनकुप्पा, बंशीनाला हाल्ट, पहाडपुर, गुरपा स्टेशन आते हैं। गुरपा के बाद छोटा नागपुर की पहाडियां शुरू हो जाती हैं। बिहार-झारखण्ड सीमा इन्हीं छोटा नागपुर की पहाडियों से होकर ही जाती है। यहां पूरा पहाडी मार्ग है और ट्रेनों की गति साठ किलोमीटर प्रति घण्टा होती है। बीच बीच में ब्लॉक हट बने हुए हैं। पता नहीं ब्लॉक हट का क्या अर्थ है लेकिन ये यहां पैसेंजर ट्रेनों के लिये हाल्ट का काम करते हैं। लगातार तीन ब्लॉक हट हैं- यदुग्राम ब्लॉक हट, बसकटवा ब्लॉक हट और नाथगंज ब्लॉक हट। फिर दिलवा स्टेशन आता है। देश में दूसरी जगहों पर भी ब्लॉक हट हैं लेकिन वहां ट्रेनें नहीं रुकतीं। यहां कोई प्लेटफार्म नहीं था और न ही स्टेशन का बोर्ड लगा था। बस घोर जंगल में रेलवे लाइन के किनारे एक घर सा बना था और उसी की दीवार पर नाम लिखा था। ट्रेन रुकती और चल देती। मैं बडा किंकर्तव्यविमूढ रहा कि इन ब्लॉक हटों को अपनी स्टेशन-लिस्ट में शामिल करूं या न करूं। बाद में जब झारखण्ड और आगे बंगाल में बाकायदा ब्लॉक हट व ब्लॉक हाल्ट के स्टेशन देखे, बोर्ड देखे तो तय कर लिया कि इन्हें अपनी लिस्ट में शामिल करूंगा।
यहां फोन नेटवर्क नहीं था, इसलिये पता चलना मुश्किल था कि बिहार से झारखण्ड में कब प्रवेश कर गये? गुरपा बिहार में है और दिलवा झारखण्ड में। लेकिन बीच में जो तीन ब्लॉक हट हैं, वे किस राज्य में हैं, यह पता नहीं चल सका। एक-दो यात्रियों से पूछा भी लेकिन सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिला। आखिरकार उन्हें बिहार में मान लिया गया। तो इस प्रकार दिलवा झारखण्ड का पहला स्टेशन बन गया। मैं दिलवा में नीचे प्लेटफार्म पर उतरा और पहली बार झारखण्ड की धरती को देखने के लिये ईश्वर को धन्यवाद दिया।
दिलवा में पुरी जाने वाली पुरुषोत्तम एक्सप्रेस और हटिया जाने वाली झारखण्ड स्वर्ण जयन्ती एक्सप्रेस निकलीं। बराबर में यात्री बातें कर रहे थे। भाषा भिन्नता होने के बावजूद भी ज्यादातर बात मेरी समझ में आ रही थी। विषय राजनीति ही था। लालू की भर्त्सना की जा रही थी। एक ने कहा कि लालू की छोटी सोच का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने गरीब रथ चलाई, जबकि मोदी बुलेट ट्रेन चलवायेंगे। दूसरे ने कहा कि यह तो कुछ भी नहीं है। लालू ने फुलवरिया के लिये पैसेंजर ट्रेन की घोषणा की थी और कहा था कि हम अपने गांव पैसेंजर ट्रेन से जायेंगे। होते-होते बात बिहार के वर्तमान मुख्यमन्त्री जीतन राम पर आ गई। उसने हाल ही में कहा था कि बाढ पीडित चूहे खाकर गुजारा करें, मैंने भी चूहे खाये हैं। बडी आलोचना होती रही।
दिलवा से आगे लालबाग ब्लॉक हट, गझंडी, कोडरमा, लाराबाद ब्लॉक हट, हीरोडीह, सरमाटांड, यदुडीह ब्लॉक हाल्ट, परसाबाद, दरसा ब्लॉक हाल्ट, चौबे, केशवारी ब्लॉक हाल्ट, हजारीबाग रोड, गडिया बिहार, चिचाकी, करमाबाद, चौधरीबान्ध, चेगरो ब्लॉक हट, पारसनाथ, निमियाघाट, भोलीडीह ब्लॉक हाल्ट और आखिरकार गोमो जंक्शन पहुंचते हैं। गोमो का पूरा नाम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जंक्शन गोमोह है।
गोमो से करीब चालीस किलोमीटर दूर बोकारो है जहां मित्र अमन मलिक जी रहते हैं। मैंने इस यात्रा की जानकारी फेसबुक पर सार्वजनिक कर दी थी। वे लगातार सम्पर्क में थे। सबसे पहले जब उन्होंने पूछा कि गोमो में कहां रुकोगे तो मैंने कहा कि या तो किसी होटल में या फिर स्टेशन पर ही। बोले कि गोमो में तो कोई होटल ही नहीं है। फिर कहा कि वे भी गोमो आ रहे हैं और साथ ही कहीं रुक जायेंगे। पूरे गोमो में उनके जानकार और रिश्तेदार हैं। यही बात मुझे परेशान करने लगी कि वे अपने चार काम छोडकर मेरे लिये गोमो आयेंगे जबकि मुझे वहां से सुबह-सुबह आगे के लिये निकल जाना है।
कुछ देर बाद फिर फोन आया कि जिनके यहां रुकना था, वे आज गोमो में नहीं हैं तो तुम धनबाद चले जाओ। वहां रुकने की कोई समस्या नहीं है। मैंने उन्हें बताया कि मैं आज धनबाद नहीं जा सकता क्योंकि गोमो पहुंचते-पहुंचते ही अन्धेरा हो जायेगा और मैं गोमो से धनबाद के बीच के स्टेशनों के फोटो नहीं ले पाऊंगा। हां, ऐसा करूंगा कि पारसनाथ रुक जाता हूं। वह बडा जैन तीर्थ है और दिल्ली-कोलकाता हाइवे पर भी है तो होटल मिल ही जायेंगे। फिर भी उन्होंने धनबाद जाने का दबाव डाले रखा। मैंने यहीं एक गलती कर दी। मुझे कह देना चाहिये था कि ठीक है, धनबाद ही चला जाऊंगा। वे कम से कम निश्चिन्त तो हो जाते। और रुक पारसनाथ में जाता। मैं भी अडा रहा कि नहीं, आज धनबाद नहीं जाऊंगा। फिर उन्होंने समाधान निकाला और कुछ देर बाद कहा कि गोमो ही आ जाओ। वहीं मिलते हैं। रुकने को हो जायेगा।
आखिरकार आधे घण्टे की देरी से सवा छह बजे ट्रेन गोमो पहुंच गई। मैंने जब अमन जी को बताया कि गोमो पहुंच चुका हूं तो वे रास्ते में थे और कहा कि उन्हें आधा घण्टा और लगेगा। उन्होंने मेरा नम्बर अपने मित्र को दिया और मित्र स्टेशन के बाहर पहले से ही तैनात थे। ज्यादा देर नहीं हुई फिर अमन साहब को आने में। गोमो असल में रेलवे की जमीन पर स्थित है। यह काफी बडा जंक्शन है और यहां से चारों दिशाओं में मालगाडियां आने-जाने में लगी ही रहती हैं। यात्री गाडियां तो हैं ही।
काफी लम्बा लेख हो गया। अब ये बताने की जरुरत नहीं है कि अमन के और भी कई मित्र व सम्बन्धी एकत्र हो गये। एक ढाबे पर तीन घण्टे तक खाना-पीना होता रहा और आखिरकार गोमो से करीब आठ-दस किलोमीटर दूर अमन के एक ठिकाने पर जाकर सो गये।

Wednesday, October 22, 2014

मलाणा- नशेडियों का गांव

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मलाणा समुद्र तल से 2685 मीटर की ऊंचाई पर बसा एक काफी बडा गांव है। यहां आने से पहले मैं इसकी बडी इज्जत करता था लेकिन अब मेरे विचार पूरी तरह बदल गये हैं। मलाणा के बारे में प्रसिद्ध है कि यहां प्राचीन काल से ही प्रजातन्त्र चलता आ रहा है। कहते हैं कि जब सिकन्दर भारत से वापस जाने लगा तो उसके सैनिक लम्बे समय से युद्ध करते-करते थक चुके थे। सिकन्दर के मरने पर या मरने से पहले कुछ सैनिक इधर आ गये और यहीं बस गये। इनकी भाषा भी आसपास के अन्य गांवों से बिल्कुल अलग है।
एक और कथा है कि जमलू ऋषि ने इस गांव की स्थापना की और रहन-सहन के नियम-कायदे बनाये। प्रजातन्त्र भी इन्हीं के द्वारा बनाया गया है। आप गूगल पर Malana या मलाणा या मलाना ढूंढो, आपको जितने भी लेख मिलेंगे, इस गांव की तारीफ करते हुए ही मिलेंगे। लेकिन मैं यहां की तारीफ कतई नहीं करूंगा। इसमें हिमालयी तहजीब बिल्कुल भी नहीं है। कश्मीर जो सुलग रहा है, वहां आप कश्मीरी आतंकवादियों से मिलोगे तो भी आपको मेहमान नवाजी देखने को मिलेगी लेकिन हिमाचल के कुल्लू जिले के इस दुर्गम गांव में मेहमान नवाजी नाम की कोई प्रथा दूर-दूर तक नहीं है। ग्रामीणों की निगाह केवल आपकी हरकतों पर रहेंगी और मामूली सी लापरवाही आपकी जेब पर भारी पड जायेगी।
कुल्लू के अन्य गांवों की तरह यहां भी घर लकडी के बनाये जाते हैं। गांव के बीच में जमलू का मन्दिर है। और भी कई दूसरे मन्दिर हैं। यहां गैर-मलाणियों को अछूत माना जाता है। उन्हें गांव में केवल निर्धारित पथ पर ही चलना होता है। यदि आपने किसी देवस्थान या घर को स्पर्श कर लिया तो आपकी खैर नहीं। पूरा गांव एक नम्बर का निकम्मा है। निकम्मों की जमात हर घर के सामने बैठी रहती है और आने-जाने वालों पर निगाह रखती है। आपके किसी इमारत को छूने भर से ही आप पर प्रथम दृश्ट्या 2500 रुपये का जुर्माना लग जायेगा। वो तो अच्छा है कि हर घर पर तख्ती टंगी है कि छूना मना है, छूने पर 2500 रुपये का जुर्माना लगेगा। जमलू मन्दिर के बाहर तो फोटो खींचने की भी मनाही लिखी दिखी।
यह छुआछूत की बुराई तो कुछ भी नहीं। असल बुराई तो कुछ और है। यहां चरस और अफीम की खेती होती है। चरस की कीमत बाजार में कितनी है, इसे हर मलाणी जानता है। इसे यहां मलाणा क्रीम कहते हैं। आपको कदम कदम पर टोका जायेगा कि क्रीम चाहिये क्या। यहां चरस उगाने, बेचने और इस्तेमाल करने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। हालांकि मलाणा से बाहर ले जाने पर प्रतिबन्ध है। लेकिन मलाणा क्रीम आसानी से अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में पहुंच जाती है। यहां की चरस अच्छी गुणवत्ता वाली मानी जाती है, इसलिये ज्यादा महंगी भी है।
अच्छी खासी खेती होती है और हर खेत में नशा ही उगाया जाता है। जिसके पास जमीन ज्यादा, उसकी आमदनी भी ज्यादा। लालच का आलम यह है कि अभी जिस खतरनाक रास्ते से हम आये हैं, जहां खडे होने की भी जगह नहीं मिलती है, वहां भी फुट फुट भर के खेत बना रखे हैं। हालांकि सरकार चरस की खेती को हतोत्साहित कर रही है और मलाणियों को फ्री में गेहूं आदि के बीज बांट रही है लेकिन कौन अपने लाखों के कारोबार को छोडकर गेहूं उगायेगा?
मलाणा से कुछ दूर एक और गांव है रसोल। पता नहीं चरस वहां भी पैदा होती है या नहीं। मुझे यकीन है कि होती होगी। मलाणी केवल रसोल में ही विवाह सम्बन्ध बनाते हैं और रसोल वाले केवल मलाणा में। हजारों सालों से ऐसा ही होता आ रहा है। आपस में ही शादी-ब्याह। निश्चित रूप से आनुवांशिक बीमारियां पैदा हो गई होंगी।
गांव के बाहर कुछ रेस्ट हाउस बने हैं, जो निःसन्देह मलाणियों के ही हैं। यहां कोल्ड ड्रिंक से लेकर भारतीय, चाईनीज, इटैलियन, कॉंटिनेंटल, ये, वो, सब तरह का खाना मिलता है। रुकने को कमरे भी। भारतीयों से ज्यादा विदेशी यहां आते हैं। 99 प्रतिशत लोग नशेडी होते हैं। चरस को देश से बाहर ले जाने का सारा काम भी विदेशियों पर ही है। इसमें मुख्य भूमिका निभाते हैं कसोल के इजराइली। कसोल पूरी तरह इजराइलियों की बस्ती है। जी हां, वही कसोल जो मणिकर्ण से तीन-चार किलोमीटर पहले पडता है। कसोल मलाणा क्रीम की मण्डी है।
मलाणा से मलाणा नाला ज्यादा दूर नहीं है। उस तरफ सडक है। गांव से सडक की दूरी करीब ढाई-तीन किलोमीटर है। ये ढाई-तीन किलोमीटर जबरदस्त चढाई भरे हैं। नशेडियों को यहां पहुंचने के लिये खूब पसीना बहाना पडता है लेकिन उसके बाद जो उन्हें मिलता है, वो उनके लिये ज्यादा कीमती है। मलाणा नशेडियों का मक्का है। ये नशेडी जब मलाणा घूमकर वापस लौटते हैं तो इसके गुण तो गायेंगे ही। इंटरनेट पर जो भी कुछ इसकी शान में लिखा गया है, सब नशेडियों ने ही लिखा है।
भयंकर गन्दगी है यहां। न लोग साफ, न ही उनके घर व गलियां। जरुरत भी क्या है? बैठे बिठाये लाखों में खेलते हैं। अब प्रशासन को चाहिये कि मलाणा के साथ सख्ती से पेश आये। अब इन्हें गेहूं के बीज बांटना बन्द करके इनकी चरस पर ही चोट करनी चाहिये। खडी फसल को बर्बाद करते रहना चाहिये। आने-जाने वालों पर कडी नजर रखी जाये और उनकी नियमित कठोर जांच की जाये। जमलू मन्दिर को अपने नियन्त्रण में ले लेना चाहिये। हालांकि कोई हिमाचली ऐसा नहीं कर सकेगा, इसके लिये बाहर से भी बुलाया जा सकता है। इससे मलाणियों में छुआछूत की भावना कम होगी। क्रोधित होकर जमलू अगर तांडव कर दे तो उसे भी सबक सिखाया जा सकता है।
मलाणा वास्तव में हिमाचल और आखिरकार भारत पर एक कलंक है। अपनी विलक्षण संस्कृति होना ठीक है लेकिन नशा किसी भी हालत में ठीक नहीं है।

मलाणा से दिल्ली
कुल्लू से रोज यहां एक बस आती है। बाकी सारा आवागमन टैक्सियों से होता है। जरी जाने के लिये 800 रुपये में एक गाडी बुक की। ड्राइवर जरी का रहने वाला था। खफा था वो भी मलाणियों से। पूरे रास्ते इनकी आलोचना ही करता रहा।
मलाणा नाले पर एक बांध बना है और उसका पानी सुरंगों से होकर जरी के पास पावर प्लांट में जाता है। एक और बांध और भी आगे बनाया जा रहा है। यह सडक उस नये बांध तक सामान ले जाने के लिये ही बनाई गई है। लेकिन सडक बनने से पहले पुराने बांध से नये बांध तक सामान पहुंचाने के लिये रज्जु-मार्ग का प्रयोग किया जाता था। यह रज्जु मार्ग अब भी है और इसकी तारों पर जगह-जगह ट्रालियां लटकी हैं। अब यह रज्जु-मार्ग बन्द है।
जरी से हमें कुल्लू की बस मिल गई। लेकिन भून्तर के पास इसमें पंक्चर हो गया। पंक्चर ठीक कराकर आगे बढे तो जाम लगा मिला। ड्राइवर ने बस तुरन्त वापस मोड ली और ब्यास के बायें किनारे पर बनी सडक से कुल्लू पहुंच गया। भून्तर से मनाली तक ब्यास के दोनों तरफ सडकें हैं। मुख्य सडक दाहिनी तरफ वाली है। बायीं तरफ वाली मुख्य नहीं है इसलिये ट्रैफिक नहीं होता।
हम तीन दिनों से पैदल चल रहे थे, थक गये थे। इसलिये हम चाहते थे कि दिल्ली किसी वोल्वो बस से ही जायेंगे। लेकिन जब काउंटर पर जाकर पता किया तो वोल्वो तो क्या, साधारण बस के भी लाले पड गये। अगले एक सप्ताह तक सभी बसें पूरी तरह भरी हैं। यह जून का महीना था और सभी लोग छुट्टियां मनाने मनाली जाते हैं। हिमाचल की बसों में ऑनलाइन बुकिंग होती है तो बसें पहले ही भर जाती हैं।
अब क्या करें? काउंटर वाले ने बताया कि कोई हरियाणा की बस आयेगी तो उसमें चले जाना। हरियाणा की बसों में पहले से बुकिंग नहीं होती। जाओ और किसी भी खाली सीट पर बैठ जाओ। थोडा घूमे-फिर तो पता चला कि कम से कम सौ सवा सौ यात्री किसी हरियाणा की बस की प्रतीक्षा में हैं। बढिया भीड थी। अशोक ने कहा कि हममें से जो भी कोई पहले बस में चढेगा, वो बाकियों के लिये सीट घेर लेगा। लेकिन मैंने कहा- मनाली में भी ऐसा ही हाल हो रहा होगा भीड का। यहां जो भी बस आयेगी, वो मनाली से ही आयेगी। जाहिर है कि भरी ही होगी। अगर बस कुल्लू से पहले ही पूरी भर गई तो हरियाणा वाले बस को यहां नहीं लायेंगे, बाईपास से निकाल ले जायेंगे। फिर भी अगर कोई बस अगर आ भी गई तो उसमें इक्का-दुक्का सीटें ही होंगी या फिर एक सीट यहां, एक सीट वहां। एक आदमी चार सीटें नहीं घेर सकता। सभी अपनी-अपनी सीटों के लिये स्वयं जिम्मेदार होंगे।
तभी हरियाणा की एक बस आती दिखी। भीड टूट पडी। कुछ ही सीटें खाली थीं। हमने हालात का सटीक पूर्वानुमान लगाया था और प्रवेश द्वार के पास ही खडे हो गये थे, इसलिये चारों को सीटें मिल गईं।
समाप्त।

मलाणा गांव


मलाणा के बच्चे

जमलू मन्दिर


चेतावनी लिखी है कि गांव के बीच बने रास्ते पर ही चलें। किसी इमारत को न छुएं। नहीं तो 2500 रुपये जुर्माना।

जरी से मलाणा आने वाली सडक

सडक से मलाणा जाने का द्वार। पीछे मलाणा गांव दिख रहा है।

रज्जु-मार्ग और सीमेण्ट आदि ढोने वाली ट्रालियां

मलाणा जाने का एक और रास्ता
टिप्पणियां करने में कंजूसी ठीक नहीं।

चन्द्रखनी ट्रेक
1. चन्द्रखनी दर्रे की ओर- दिल्ली से नग्गर
2. रोरिक आर्ट गैलरी, नग्गर
3. चन्द्रखनी ट्रेक- रूमसू गांव
4. चन्द्रखनी ट्रेक- पहली रात
5. चन्द्रखनी दर्रे के और नजदीक
6. चन्द्रखनी दर्रा- बेपनाह खूबसूरती
7. मलाणा- नशेडियों का गांव