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Wednesday, December 29, 2010

बद्रीनाथ नहीं, मदमहेश्वर चलो

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16 नवम्बर 2010 की दोपहर लगभग तीन बजे मैं और मेरा गाइड भरत ऊखीमठ के पास देवरिया ताल के किनारे बैठे थे। भरत चाहता था कि मैं आज की रात दुगलबिट्टा में टेंट में बिताऊं लेकिन मैं खर्चा बचाने के लिये आज ऊखीमठ में ही रुकना चाहता था। भरत ने मेरा विचार मान लिया। यहां ताल से एक सीधा रास्ता सात-आठ किलोमीटर लम्बा ऊखीमठ भी जाता है लेकिन भरत ने कहा कि हम दो हैं और वो रास्ता पूरी तरह जंगली है। जानवरों का डर है। इसलिये जिस रास्ते से आये थे, उसी से वापस जायेंगे यानी सारी के रास्ते से।
कल 17 तारीख है। हमारा कार्यक्रम कल तुंगनाथ-चंद्रशिला देखने का है। परसों जोशीमठ या बद्रीनाथ जाकर कपाट बन्द करवाने हैं। 18 को बन्द हो रहे हैं। उत्तराखण्ड में चार धाम हैं- यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ। पांच केदार हैं- केदारनाथ, मदमहेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वर। इसी तरह पांच बद्री भी हैं- बद्रीनाथ, आदि बद्री, भविष्य बद्री, योग-ध्यान बद्री और वृद्ध बद्री। इनमें से बद्रीनाथ और मदमहेश्वर को छोडकर सभी के कपाट बन्द हो चुके हैं। बद्रीनाथ 18 को बन्द होंगे और मदमहेश्वर 22 को।

Monday, December 27, 2010

ऊखीमठ के पास है देवरिया ताल

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16 नवम्बर 2010 की दोपहर लगभग ग्यारह बजे मैं ऊखीमठ में रुद्रप्रयाग जाने वाली जीप की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी पीछे से किसी ने आवाज लगाई। पीछे मुडकर देखा तो एक 27-28 साल का गढवाली युवक एक दुकान में बैठा मुझे बुला रहा था। पूछा कि आप टूरिस्ट है। मुझे टूरिस्ट शब्द से चिढ है, इसलिये मैंने कहा कि नहीं, घुमक्कड हूं। यहां घूमने आया हूं। लेकिन तुम अपनी सुविधा के हिसाब से टूरिस्ट कह सकते हो।
बोला कि आपके बैग में पानी की बोतल लटकी है, इसलिये मैंने पहचान लिया। आपको जाना कहां है?
मैं घूमने के दौरान अक्सर चुपचाप ही रहता हूं और अपना कार्यक्रम किसी को बताना पसंद नहीं करता। फिर भी उसे बता दिया कि रुद्रप्रयाग जा रहा हूं।
“उसके बाद?”
“क्यों?”

Wednesday, December 22, 2010

मदमहेश्वर यात्रा- रुद्रप्रयाग से ऊखीमठ तक

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16 नवम्बर 2010 की सुबह थी। मैं उस सुबह रुद्रप्रयाग में था। बद्रीनाथ जा रहा था, चलते-चलते मतलब जाते-जाते अंधेरा हो गया तो रुद्रप्रयाग में ही रुक गया। अब सोचा कि अगर सुबह-सुबह इस समय हरिद्वार से चलते तो शाम होने तक बद्रीनाथ जा पहुंचते। बद्रीनाथ ना भी पहुंचते तो जोशीमठ तो पहुंच ही जाते। यानी यहां से अगर दोपहर बाद भी चलेंगे तब भी शाम होने तक आराम से जोशीमठ तक पहुंच जायेंगे। देवप्रयाग तो पीछे छूट गया, रुद्रप्रयाग में मैं इस समय हूं, आगे तीन प्रयाग और हैं। धीरे-धीरे तीनों के दर्शन करते चलते हैं।
फिर सोचा कि नहीं, पहले ऊखीमठ चलते हैं। केदारनाथ के कपाट बन्द हो गये हैं। केदार बाबा की पूजा जाडों भर ऊखीमठ में होती है। ऊखीमठ से एक रास्ता गोपेश्वर और आगे चमोली तक चला जाता है। उसी गोपेश्वर मार्ग पर एक जगह है- चोपता। यहां से तीन-चार किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद तुंगनाथ आता है। तुंगनाथ से भी आगे चंद्रशिला है। मैं आज शाम तक तुंगनाथ घूमकर गोपेश्वर तक जा सकता हूं। गोपेश्वर या चमोली में रात बिताकर कल बडे आराम से जोशीमठ चला जाऊंगा। प्रयागों में घूमने से अच्छा है कि चोपता तुंगनाथ घूमा जाये।

Monday, December 20, 2010

मदमहेश्वर यात्रा

15 नवम्बर 2010, दिन सोमवार। सुबह छह बजे नाइट ड्यूटी से फारिग हुआ और छह बजकर तीन मिनट पर अहमदाबाद से हरिद्वार जाने वाली 9105 हरिद्वार मेल पकड ली। रात्रि जागरण के कारण नींद आ रही थी। जनरल डिब्बे में बैठने की ही जगह मिल जाये तो गनीमत है। इसलिये सीधे शयनयान में एक ऊपर वाली बर्थ कब्जाई, नौ बजे का अलार्म लगाया और सो गया। नौ बजे के लगभग यह गाडी मुजफ़्फ़रनगर पहुंचती है। हरिद्वार जाने के लिये मैं मुज़फ़्फ़रनगर तक ट्रेन का इस्तेमाल करता हूं और इससे आगे बस का।
परसों यानी 17 को बद्रीनाथ धाम के कपाट बन्द हो रहे हैं। कल शाम तक मैं वहां पहुंच जाऊंगा और उस उत्सव का हिस्सा बनूंगा; यही सोचकर मैं निकला था। उत्तराखण्ड में रात को बसें नहीं चलतीं। बद्रीनाथ जाने वाली बसें भी हरिद्वार और ऋषिकेश से सुबह-सुबह निकलती हैं और शाम तक वहां पहुंचती हैं। ग्यारह-साढे ग्यारह बजे हरिद्वार से बद्रीनाथ तो क्या जोशीमठ की बस भी मिलनी मुश्किल है। फिर भी देखते हैं कहां की बस मिलेगी और कहां तक पहुंच पाते हैं आज। श्रीनगर तक तो पहुंच ही सकता हूं, आगे रुद्रप्रयाग? देखा जायेगा।

Wednesday, December 15, 2010

भाखडा बांध और भाखडा रेल

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BHAKRA DAMनैना देवी से फुरसत पाकर मैं वापस नंगल जाने लगा तो रास्ते में भाखडा बांध पडता है। मैं वही उतर गया। सतलुज नदी पर बना है गोविन्द सागर और इस पर है भाखडा बांध। निकट ही भाखडा गांव है जिसके नाम पर बांध को यह नाम मिला। इस बार बडा शानदार मानसून आया था इसलिये गोविन्द सागर ऊपर तक भर गया था। पानी इतना ज्यादा था कि बांध के चारों आपातकालीन गेट खोल दिये गये थे और चारों गेट फुल भरकर चल रहे थे।

Monday, December 13, 2010

नैना देवी

6 सितम्बर, 2010 को मैं अचानक नंगल डैम जा पहुंचा। असल में निर्मला कपिला जी यही की रहने वाली हैं और उनका काफी दिन से तकादा चल रहा था कि नंगल आओ, नंगल आओ। आखिरकार 6 सितम्बर को जाना ही पडा।
अगले दिन यानी 7 तारीख को श्री कपिला जी मुझे नंगल डैम के बस अड्डे पर छोड गये और कह दिया कि वो खडी नैना देवी जाने वाली बस और वहां घूमकर आओ। उनके लिये मेरे साथ जाना शारीरिक रूप से मुश्किल था इसलिये साथ नहीं गये।
नैनादेवी हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में हिंदुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। सती की एक आंख यहां गिरी थी। पता नहीं दाहिनी या बायीं। दूसरी आंख नैनीताल में गिरी थी।

Monday, December 6, 2010

उदयपुर- पिछौला झील

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अपनी उदयपुर यात्रा में मैंने दो दिन उदयपुर में बिताये। मैं श्रीमति अजित गुप्ता जी का मेहमान था। पहले दिन तो उन्होने मुझे भेज दिया नाथद्वारा और हल्दीघाटी। अगले दिन पहले चरण में फतेहसागर झील के आसपास का इलाका छान मारा जिसमें मोती मगरी और सहेलियों की बाडी मुख्य हैं।
शाम को पांच बजे के लगभग चेतक एक्सप्रेस चलती है, इसी में मेरा स्लीपर का रिजर्वेशन था। श्रीमति गुप्ता जी ने कहा कि अब दोपहर बाद आज के दूसरे चरण में पिछौला झील देख लो। उसके आसपास जो कुछ भी देख सकते हो, वो भी देख लेना; वहां से स्टेशन नजदीक ही है।

Wednesday, December 1, 2010

उदयपुर- मोती मगरी और सहेलियों की बाडी

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अगस्त में उदयपुर वासी डॉ. (श्रीमति) अजित गुप्ता जी ने अपने ब्लॉग पर लिखा- उदयपुर का आमन्त्रण देती कुछ तस्वीरें, आयेंगे ना? मैने हामी भर दी। 18 अगस्त को उदयपुर चला गया। उन दिनों मानसून अपने चरम पर था। मानसून में उदयपुर के तो कहने ही क्या? उन्नीस की सुबह को श्रीमति गुप्ताजी ने मुझे नाथद्वारा भेज दिया। लगे हाथों मैं हल्दीघाटी भी घूम आया। इतना घूमने के बाद भी समय बच गया तो कांकरोली चला गया। यहां मुझे राजसमंद और एकाध मन्दिर देखने थे। लेकिन बारिश इतनी जोर से आयी कि मैं कांकरोली जाने वाली बस से उतरकर वापस उदयपुर आने वाली बस में बैठ गया।

Monday, November 29, 2010

हल्दीघाटी- जहां इतिहास जीवित है

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हल्दीघाटी एक ऐसा नाम है जिसको सुनते ही इतिहास याद आ जाता है। हल्दीघाटी के बारे में हम तीसरी चौथी कक्षा से ही पढना शुरू कर देते हैं: रण बीच चौकडी भर-भर कर, चेतक बन गया निराला था। राणा प्रताप के घोडे से, पड गया हवा का पाला था।
18 अगस्त 2010 को जब मैं मेवाड (उदयपुर) गया तो मेरा पहला ठिकाना नाथद्वारा था। उसके बाद हल्दीघाटी। पता चला कि नाथद्वारा से कोई साधन नहीं मिलेगा सिवाय टम्पू के। एक टम्पू वाले से पूछा तो उसने बताया कि तीन सौ रुपये लूंगा आने-जाने के। हालांकि यहां से हल्दीघाटी लगभग पच्चीस किलोमीटर दूर है इसलिये तीन सौ रुपये मुझे ज्यादा नहीं लगे। फिर भी मैंने कहा कि यार पच्चीस किलोमीटर ही तो है, तीन सौ तो बहुत ज्यादा हैं। बोला कि पच्चीस किलोमीटर दूर तो हल्दीघाटी का जीरो माइल है, पूरी घाटी तो और भी कम से कम पांच किलोमीटर आगे तक है। चलो, ढाई सौ दे देना। ढाई सौ में दोनों राजी।

Wednesday, November 24, 2010

रोहतक ब्लॉगर मिलन के बाद

21 नवम्बर को रोहतक में ब्लॉगर मिलन सम्पन्न हुआ। तीस के आसपास ब्लॉगर इकट्ठे हुए। इसमें ना तो कोई मुख्य अतिथि था, ना ही कोई मुद्दा। कुर्सी डालकर गोल घेरे में बैठ गये और बातों का सिलसिला शुरू हुआ। सभी को अपने विचार रखने के लिये समय ही समय था।
तय समय पर नाश्ता, लंच और शाम का हल्का नाश्ता हुआ। वैसे तो इस बारे में सभी ने कुछ ना कुछ लिख ही दिया है, फिर भी कुछ फोटो मैंने खींचे हैं; उन्हें भी देख लिया जाये।

Monday, November 22, 2010

नाथद्वारा

shrinathji
नाथद्वारा राजस्थान के राजसमन्द जिले में उदयपुर जाने वाली रोड पर स्थित है। इसकी उदयपुर से दूरी लगभग 48 किलोमीटर है। कहा जाता है कि मुगल बादशाह औरंगजेब के काल में मथुरा-वृन्दावन में भयंकर तबाही मचाई जाती थी। उस तबाई से मूर्तियों की पवित्रता को बचाने के लिये श्रीनाथ जी की मूर्ति यहां लायी गई। यह काम मेवाड के राजा राजसिंह ने किया। जिस बैलगाडी में श्रीनाथजी लाये जा रहे थे, इस स्थान पर आकर गाडी के पहिये मिट्टी में धंस गये और लाख कोशिशों के बाद भी हिले नहीं। तब पुजारियों ने श्रीनाथजी को यही स्थापित कर दिया कि जब उनकी यहीं पर रहने की इच्छा है तो उन्हें यही रखा जाये।
यहां श्रीनाथजी के दर्शनों का समय निर्धारित है। आठ दर्शन होते हैं: मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थपन, भोग, आरती और शयन।

Wednesday, November 17, 2010

बीना - कोटा पैसेंजर रेल यात्रा

उस दिन तारीख थी 26 जुलाई 2010. मुझे उदयपुर जाना था। कोई रिजर्वेशन नहीं था। दसेक दिन पहले ही अमरनाथ से आया था। जल्दबाजी इतनी कि कोई योजना भी नहीं बनी। सोचा कि किसी तरह 27 की सुबह तक उदयपुर पहुंच जाऊंगा। दिन भर घूमकर शाम सात-शाढे सात बजे तक वापस कोटा चला जाऊंगा। कोटा से वापसी का रिजर्वेशन कराया मेवाड एक्सप्रेस का। यह वैसे तो उदयपुर से ही आती है और कोटा आधी रात को पहुंचती है। अच्छा, इस दौरान दिनेशराय द्विवेदी जी से भी मिलने की चिट्ठी लिख दी।
छब्बीस की सुबह को निजामुद्दीन से ताज एक्सप्रेस पकडी। मथुरा उतर गया। एक दोस्त का तकादा था। उससे सुलटने में दिनभर लग गया। रात को साढे नौ बजे फिर स्टेशन पर पहुंचा। पता चला कि उदयपुर जाने वाली मेवाड एक्सप्रेस अभी-अभी निकली है। मन परेशान तो हुआ लेकिन मायूस नहीं। पीछे ही मालवा एक्सप्रेस आ रही थी। इन्दौर जाती है। सोचा कि इससे कोटा चला जाता हूं। कोटा से उदयपुर के लिये कोई ना कोई गाडी मिल ही जायेगी। हां, उस समय मेरा अन्दाजा था कि कोटा से उदयपुर की दूरी सौ किलोमीटर के लगभग होगी।

Monday, November 15, 2010

ताऊ की घुमक्कड पहेलियों का शतक

अभी पिछले दिनों ताऊ पहेलियों का शतक पूरा हो गया है। ताऊ पहेलियां घुमक्कडों को घुमक्कडी और पर्यटकों को पर्यटन के रास्ते बताती हैं।
इस मौके पर एक नजर पहेलियों पर भी मार लेते हैं कि कब किस स्थान के बारे में बताया गया।

Wednesday, November 10, 2010

पटनीटॉप में एक घण्टा

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अमरनाथ से लौटते हुए एक रात तो हमने गुजारी सोनमर्ग में, दूसरी रात गुजारी श्रीनगर में। सुबह उठकर श्रीनगर से चल पडे। नाश्ता भी नहीं किया था। नाश्ता व खाना एक साथ किया अनन्तनाग के पास आकर। फिर जवाहर सुरंग भी पार कर ली और कुछ देर में पहुंच गये पटनीटॉप।
पटनीटॉप जम्मू कश्मीर राज्य में जम्मू इलाके का एक प्रसिद्ध हिल स्टेशन है। यहां हमेशा पर्यटकों की भीड रहती है। ज्यादातर पर्यटक वैष्णों देवी के दर्शन करके यहां आते हैं। जब हम पटनीटॉप पहुंचे, मेरी आंख लगी हुई थी। यहां पहुंचकर सबने मुझे जगाया। बोले कि पटनीटॉप पहुंच गये।

Monday, November 8, 2010

दिल्ली में राष्ट्रमण्डल खेल

बात उन दिनों की है जब दिल्ली में राष्ट्रमण्डल खेल हुआ करते थे। हालांकि इस घटना को काफी दिन बीत चुके हैं लेकिन अपने जेहन में अभी भी ताजा हैं। टीवी पर उदघाटन समारोह देखकर ही सोच लिया कि समय मिलते ही सभी गेम टीवी पर जरूर देखूंगा।
तभी एक-दो दिन बाद नितिन का फोन आया। बोला कि कैमरा चाहिये। क्यों? गेम के टिकट ले रखे हैं- गेम देखने जाना है। हां, यह नितिन अपना एक दोस्त है। दिल्ली की शान कही जानी वाली मेट्रो में नौकरी करता है। तीस हजारी स्टेशन पर स्टेशन नियन्त्रक है।

Wednesday, November 3, 2010

श्रीनगर में डल झील

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पहली जुलाई को अमरनाथ यात्रा शुरू होने से पहले ही श्रीनगर में कर्फ्यू लग गया था। 16 जुलाई को जुम्मे की नमाज के समय शान्ति रही तो कर्फ्यू हटा लिया गया। उस दिन हम सोनमर्ग में थे। खबर हम तक भी पहुंची। हमने तय किया कि आज की रात श्रीनगर में रुकेंगे। और शाम होते-होते श्रीनगर पहुंच गये। डल झील का तीन चौथाई चक्कर काटते हुए शंकराचार्य पहाडी के नीचे गगरीबल इलाके में पहुंचे। यहां अनगिनत हाउसबोट और शिकारे हैं।
यहां पहुंचते ही मनदीप और शहंशाह हाउसबोट की तरफ निकल गये। यहां झील का एक हिस्सा नहर की शक्ल में है। उस पार हाउसबोट हैं। वहां तक जाने के लिये नावें हैं- फ्री में। वापस आकर उन्होनें बताया कि 2500 रुपये में सौदा पट गया है। यह रकम खजानची कालू को बहुत ज्यादा लगी। कहने लगा कि हाउसबोट में रुकना जरूरी नहीं है, होटल में रुकेंगे। एक होटल में पता किया तो वो 1500 में मान गया- दो बडे-बडे कमरे, टीवी व गर्म पानी सहित। हालांकि वो होटल भी हाउसबोटों से ही घिरा था, जाने का रास्ता सिर्फ नाव से था। वो हाउसबोट तो नहीं था, लेकिन उससे कम भी नहीं था। उसका नाम भूल गया हूं।

Monday, November 1, 2010

सोनमर्ग से श्रीनगर तक

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यह यात्रा कथा इसी साल जुलाई की है, जब हम अमरनाथ गये थे। दर्शन करके वापस बालटाल आये तो एक रात सोनमर्ग में गुजारी। यहां पता चला कि पिछले पन्द्रह-बीस दिनों से श्रीनगर में लगा कर्फ्यू कल शाम हटा लिया गया है। अब हमारे दिमाग में एक बात आयी कि अगली रात श्रीनगर में ही गुजारेंगे। सोनमर्ग से श्रीनगर लगभग अस्सी किलोमीटर दूर है। इसलिये दोपहर बाद निकल पडे।
सोनमर्ग से चलकर कंगन, कुलान, गुण्ड जैसे कई छोटे-छोटे गांव पडते हैं। हर जगह हालांकि पहाड वाली शान्ति तो है लेकिन सन्नाटा भी है। अमरनाथ यात्रा की गाडियां और मिलिटरी की कानवाई साथ-साथ चलकर माहौल को और भी रहस्यमय बना देती हैं। किसी भी गांव में अगर गाडी की स्पीड कम हो गई तो कई लोग पीछे पड जाते हैं। नफरत और अलगाववाद के कारण नहीं, बल्कि रोजी-रोटी कमाने के लिये। मेवों, फलों और कश्मीरी शालों से दुकानें भरी हैं। लेकिन खरीदने वाले नहीं है।

Wednesday, October 27, 2010

सोनमर्ग में खच्चरसवारी

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जब जुलाई में हम छह जने अमरनाथ गये थे, तो वापसी बालटाल के रास्ते से की। बालटाल से आठ किलोमीटर श्रीनगर की ओर चलने पर सोनमर्ग आता है। यात्रा करते-करते हम सभी इतने थक गये थे कि सोनमर्ग से आगे बढ ही नहीं पाये। पच्चीस सौ रुपये में एक कमरा ले लिया। तीन तो फैल गये डबलबैड पर और बाकी तीन अतिरिक्त गद्दे बिछवाकर नीचे सो गये। सुबह आराम से उठे। उठते ही एक खबर मिली कि श्रीनगर में पिछले पन्द्रह दिनों से लगा कर्फ्यू हट गया है। अब हमारे योजनाकर्त्ताओं के दिमाग में केवल एक बात जरूर भर गयी कि आज रात श्रीनगर में हाउसबोट में ही काटेंगे। सोनमर्ग से श्रीनगर की दूरी लगभग अस्सी किलोमीटर है। यानी ढाई-तीन घण्टे लगेंगे। इसलिये आज यहां से दोपहर बाद चलेंगे। दोपहर तक घुडसवारी करते हैं।

Monday, October 25, 2010

50000 किलोमीटर की रेल यात्रा

हो गयी 50000 किलोमीटर की रेल यात्रायें पूरी। इसके लिये मुझे पूरे 2021 दिन तक ट्रेनों में धक्के खाने पडे। 2021 दिन यानी 289 सप्ताह यानी 67 से भी ज्यादा महीने यानी साढे पांच साल। पहली बार मैं ट्रेन में 8 अप्रैल 2005 को बैठा था।
जिस तरह क्रिकेट के रिकॉर्ड दिखाये जाते हैं, ठीक उसी तरह आज मैं भी अपनी रेल यात्राओं के रिकॉर्ड दिखा रहा हूं:

Wednesday, October 13, 2010

सोनामार्ग (सोनमर्ग) के नजारे

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अमरनाथ यात्रा के क्रम में जब हम दर्शन करके वापस बालटाल पहुंचे तो वहां से निकलते-निकलते शाम हो गयी थी। हममें से ज्यादातर पहली बार कश्मीर आये थे, इसलिये एक-दो दिन कश्मीर में रुकना भी चाहते थे। इरादा तो श्रीनगर में रुकने का था, लेकिन पिछले कई दिनों से वहां कर्फ्यू लगा हुआ था। अब तय हुआ कि सोनमर्ग में रुकेंगे।

सोनमर्ग बालटाल से आठ किलोमीटर दूर श्रीनगर वाले रास्ते पर है। इसे सोनामार्ग कहते हैं, जो आजकल सोनमर्ग बोला जाता है। यह इलाका घाटी के मुकाबले बिल्कुल शान्त है, इसलिये यहां रुकने में डर भी नहीं लग रहा था। जिस होटल में हम ठहरे थे, उसका मालिक एक हिन्दू था। उस होटल में काम करने वाला बाकी सारा स्टाफ मुसलमान।

Monday, October 11, 2010

अमरनाथ से बालटाल

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अमरनाथ बाबा के दर्शन कर लिये। दर्शन करते-करते दस बज गये थे। अब वापस जाना था। हम पहलगाम के रास्ते यहां तक आये थे। दो दिन लगे थे। अब वापसी करेंगे बालटाल वाले रास्ते से। हमारी गाडी और ड्राइवर बालटाल में ही मिलेंगे।

अमरनाथ से लगभग तीन किलोमीटर दूर संगम है। संगम से एक रास्ता पहलगाम चला जाता है और एक बालटाल। यहां अमरनाथ से आने वाली अमरगंगा और पंचतरणी से आने वाली नदियां भी मिलती हैं। यहां नहाना शुभ माना जाता है। लेकिन अब एक और रास्ता बना दिया गया है जो संगम को बाइपास कर देता है। यह रास्ता बहुत संकरा और खतरनाक है। इस बाइपास वाले रास्ते पर खच्चर नहीं चल सकते। घोडे-खच्चर संगम से ही जाते हैं। इस नये रास्ते के बनने से यात्रियों को यह लाभ होता है कि अब उन्हें नीचे संगम तक उतरकर फिर ऊपर नहीं चढना पडता। सीधे ऊपर ही ऊपर निकल जाते है। इस बाइपास रास्ते की भयावहता और संकरेपन का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पर कई जगह एक समय में केवल एक ही आदमी निकल सकता है। नतीजा यह होता है कि दोनों तरफ लम्बा जाम लग जाता है। इसी जाम में फंसने और निकलने की जल्दबाजी की जुगत में मैं इस खण्ड का एक भी फोटू नहीं खींच पाया।

Wednesday, September 15, 2010

श्री अमरनाथ दर्शन

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आठ जुलाई 2010 की शाम को हम पंचतरणी से गुफ़ा की ओर चले। पवित्र गुफा यहाँ से छह किलोमीटर दूर है। सारी यात्रा चढ़ाई भरी है। शुरूआती तीन किलोमीटर की चढ़ाई तो वाकई हैरतअंगेज है। लगभग तीन-चार फीट चौड़ा रास्ता, उस पर दोनों ओर से आते-जाते खच्चर और यात्री। ज्यादातर समय यह रास्ता एकतरफ़ा ही रहता है। ऐसे में एक तरफ़ से आने वालों को रोक दिया जाता है और दूसरी तरफ़ वालों को जाने दिया जाता है। इसलिये इस पर हमेशा जाम और लंबी लाइन लगी रहती है।
शाम हो रही थी। आज हमें यही पर रुकना था। इरादा था कि कल सुबह नहा-धोकर दर्शन करेंगे और दस बजे तक बालटाल वाले रास्ते पर बढ़ चलेंगे।

Wednesday, September 8, 2010

पंचतरणी- यात्रा की सुन्दरतम जगह

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पौषपत्री से चलकर यात्री पंचतरणी रुकते हैं। यह एक काफ़ी बड़ी घाटी है। चारों ओर ग्लेशियर हैं तो चारों तरफ़ से नदियाँ आती हैं। कहते हैं कि यहाँ पाँच नदियाँ आकर मिलती हैं, इसीलिये इसे पंचतरणी कहते हैं। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। इस घाटी में छोटी-बडी अनगिनत नदियाँ आती हैं। चूँकि यह लगभग समतल और ढलान वाली घाटी है, इसलिये पानी रुकता नहीं है। अगर यहाँ पानी रुकता तो शेषनाग से भी बड़ी झील बन जाती।
इन पाँच नदियों को पाँच गंगा कहा जाता है। यहाँ पित्तर कर्म भी होते हैं। यहाँ भी शेषनाग की तरह तंबू नगर बसा हुआ है। अमरनाथ गुफ़ा की दूरी छह किलोमीटर है। दो-ढाई बजे के बाद किसी भी यात्री को अमरनाथ की ओर नहीं जाने दिया जाता। सभी को यही पर रुकना पड़ता है। हम इसीलिये शेषनाग से जल्दी चल पड़े थे और बारह बजे के लगभग यहाँ पहुँचे थे। हमारा इरादा आज की रात गुफ़ा के पास ही बिताने का था।

Monday, September 6, 2010

पौषपत्री का शानदार भण्डारा

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अमरनाथ यात्रा में महागुनस चोटी को पार करके एक स्थान आता है- पौषपत्री। जहां महागुनस (महागणेश) चोटी समुद्र तल से 4276 मीटर की ऊंचाई पर है वहीं पौषपत्री की ऊंचाई 4114 मीटर है। यहां से एक तरफ बरफ से ढकी महागुनस चोटी दिखाई देती है, वही दूसरी ओर दूर तक जाता ढलान दिखता है। पौषपत्री से अगले पडाव पंचतरणी तक कहीं भी चढाई वाला रास्ता नहीं है। टोटल उतराई है।
पौषपत्री का मुख्य आकर्षण यहां लगने वाला भण्डारा है। देखा जाये तो पौषपत्री पहुंचने के दो रास्ते हैं। एक तो पहलगाम से और दूसरा बालटाल से पंचतरणी होते हुए। यह शिव सेवक दिल्ली वालों द्वारा लगाया जाता है। मुझे नहीं लगता कि इतनी दुर्गम जगह पर खाने का सामान हेलीकॉप्टर से पहुंचाया जाता होगा। सारा सामान खच्चरों से ही जाता है। हमें यहां तक पहुंचने में डेढ दिन लगे थे। खच्चर दिन भर में ही पहुंच जाते होंगे, वो भी महागुनस की बर्फीली चोटी को लांघकर।

Wednesday, September 1, 2010

अमरनाथ यात्रा- महागुनस चोटी

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15 जुलाई 2010 की सुबह थी। हम छह अमरनाथ यात्री शेषनाग झील के किनारे तम्बू में सोये पडे थे। यह झील समुद्र तल से 3352 मीटर की ऊंचाई पर है। चारों ओर ग्लेशियरों से घिरी है यह। सुबह को बाकी सब तो उठ गये लेकिन मैं पडा रहा। पूरी रात तो मैं पेट गैस लीकेज की वजह से परेशान रहा, अब नींद आ रही थी। सभी फ्रेश हो आये, तब उन्होनें मुझे आवाज लगाई। दिन निकल गया था। आज का लक्ष्य था 12 किलोमीटर चलकर दोपहर दो बजे से पहले पंचतरणी को पार कर लेना। नहीं तो उसके बाद पंचतरणी में बैरियर लगा दिया जाता है। वहां भी तम्बू नगरी है। वहां से गुफा छह किलोमीटर रह जाती है।

Monday, August 30, 2010

शेषनाग झील

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अमरनाथ यात्रा में शेषनाग झील का बहुत महत्त्व है। यह पहलगाम से लगभग 32 किलोमीटर दूर है, और चन्दनवाडी से लगभग 16 किलोमीटर। तो इस प्रकार सोलह किलोमीटर की पैदल यात्रा करके इस झील तक पहुंचा जा सकता है। यह झील सर्दियों में पूरी तरह जम जाती है। यात्रा आते-आते पिघलती है। कभी-कभी तो यात्रा के सीजन में भी नहीं पिघलती। इसके चारों ओर चौदह-पन्द्रह हजार फीट ऊंचे पर्वत हैं।
कहते हैं कि जब शिवजी माता पार्वती को अमरकथा सुनाने अमरनाथ ले जा रहे थे, तो उनका इरादा था कि इस कथा को कोई ना सुने। अगर कोई दूसरा इसे सुन लेगा, तो वो भी अमर हो जायेगा और सृष्टि का मूल सिद्धान्त गडबड हो जायेगा। सभी इसे सुनकर अमर होने लगेंगे। इसी सिलसिले में उन्होनें अपने असंख्य सांपों-नागों को अनन्तनाग में, बैल नन्दी को पहलगाम में, चन्द्रमा को चन्दनवाडी में छोड दिया था।

Monday, August 23, 2010

अमरनाथ यात्रा- पिस्सू घाटी से शेषनाग

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अमरनाथ यात्रा की पैदल चढाई चन्दनवाडी से शुरू होती है। चन्दनवाडी पहलगाम से सोलह किलोमीटर आगे है। चन्दनवाडी से कठिन चढाई चढकर यात्री पिस्सू टॉप पहुंचते हैं। पिस्सू टॉप तक का रास्ता काफी मुश्किल है, आगे का रास्ता कुछ कम मुश्किल है। कुछ दूर तक तो उतराई ही है। अधिकतर यात्री चन्दनवाडी से यहां तक खच्चर से आते हैं। आगे की यात्रा पैदल करते हैं। लेकिन कुछ यात्री ऐसे भी होते हैं, जो पिस्सू टॉप तक पैदल आते हैं और इस मुश्किल चढाई में उनका मामला गडबड हो जाता है। आगे चलने लायक नहीं रहते। इसलिये उन्हे आगे के अपेक्षाकृत सरल रास्ते में खच्चर करने पडते हैं। हमारे दल में मनदीप भी ऐसा ही था। पिस्सू टॉप तक पहुंचने में ही पैर जवाब दे गये और आगे शेषनाग के लिये खच्चर करना पडा।

Wednesday, August 11, 2010

पहलगाम से पिस्सू घाटी

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चौदह जुलाई 2010 की सुबह हम पहलगाम से निकल पडे। ड्राइवर से बोल दिया कि तू यहां से बालटाल चला जा और हम परसों तुझे बालटाल में ही मिलेंगे। चाहे तो तू भी अमरनाथ दर्शन कर लेना। आज शाम तक बालटाल पहुंच जायेगा, कल चढाई करके परसों वापस आ जाना। ड्राइवर ने कहा कि हां, देखूंगा।
छह-साढे छह के करीब हमने पहलगाम से एक गाडी ली और चन्दनबाडी पहुंच गये। चन्दनबाडी (या चन्दनवाडी) के रास्ते में एक जगह पडती है – बेताब घाटी। इसी घाटी में बेताब फिल्म की शूटिंग हुई थी। लगभग पूरी फिल्म यही पर शूट की गयी थी। ऊपर सडक से देखने पर बेताब घाटी बडी मस्त लग रही थी।

Monday, August 9, 2010

पहलगाम- अमरनाथ यात्रा का आधार स्थल

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बारह जुलाई की शाम को पांच बजे दिल्ली से चले थे और अगले दिन शाम को पांच बजे पहलगाम पहुंचे। चौबीस घण्टे के लगातार सफर के बाद। इसमें भी हैरत की बात ये है कि ड्राइवर रवि ही पूरे रास्ते भर गाडी चलाता रहा। ना तो रात को सोया ना ही आज सुबह से अब तक पलक झपकी।
अनन्तनाग से शुरू हो जाता है सुरक्षा बलों और सेना का पहरा। सडक पर कर्फ्यू सा लगा हुआ था। दुकानें बन्द थीं। कुछ लोग इधर-उधर घूम रहे थे। लगभग हर बन्द दुकान के सामने जवान तैनात था। पहलगाम तक यही सिलसिला रहा। हां, लिद्दर नदी भी अनन्तनाग से ही साथ दे रही थी। एक अकेली लिद्दर ही है, जो पहलगाम में जान डाल देती है।

Wednesday, August 4, 2010

अमरनाथ यात्रा

अमरनाथ यात्रा वृत्तान्त शुरू करने से पहले कुछ आवश्यक जानकारी जरूरी है। मित्रों का आग्रह था कि मैं ये जानकारियां यहां जोड दूं।
रास्ता
वैसे तो आप आगे पढेंगे तो सारी जानकारी विस्तार से मिलती जायेगी, लेकिन फिर भी संक्षिप्त में:
यात्रा पहलगाम से शुरू होती है। पहलगाम जम्मू और श्रीनगर से सडक मार्ग से अच्छी तरह जुडा है।
पहलगाम (2100) से चन्दनवाडी (2800)= 16 किलोमीटर सडक मार्ग
चन्दनवाडी (2800) से शेषनाग झील (3700)=16 किलोमीटर पैदल
शेषनाग झील (3700) से महागुनस दर्रा (4200)=4 किलोमीटर पैदल
महागुनस दर्रे (4200) से पंचतरणी (3600)=6 किलोमीटर पैदल
पंचतरणी (3600) से अमरनाथ गुफा (3900)=6 किलोमीटर पैदल
अमरनाथ गुफा (3900) से बालटाल (2800)=16 किलोमीटर पैदल

Monday, August 2, 2010

खीरगंगा और मणिकर्ण से वापसी

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चलिये आज खीरगंगा और मणिकर्ण से वापस चलते हैं। इसकी वजह से अमरनाथ यात्रा के प्रकाशन में विलम्ब हो रहा है। फिर अमरनाथ यात्रा का धारावाहिक छपेगा।
मैं जून 2010 के महीने में अकेला ही मणिकर्ण गया था। लगे हाथों खीरगंगा भी चला गया। जब खीरगंगा से वापस चलने लगा तो नीचे मणिकर्ण से एक दल और आ गया। कुल छह जने थे। पंजाब के थे। मैने उनसे कहा कि इस गरम कुण्ड में थोडी देर नहा लो, दस किलोमीटर पैदल सफर की थकान उतर जायेगी। जल्दी करना, फिर मैं भी तुम्हारे साथ ही वापस चलूंगा। भले मानस थे, मेरी बात मान ली। यह दल पुलगा तक मोटरसाइकिल से आया था। शेष दस किलोमीटर पैदल का रास्ता है। इनकी मोटरसाइकिलें पुलगा में ही सडक किनारे खडी थीं, लावारिसों की तरह। एक यह भी कारण था कि ये सभी फटाफट नहाये और फटाफट वापस चल पडे।

Monday, July 26, 2010

अनछुआ प्राकृतिक सौन्दर्य – खीरगंगा

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हिमाचल प्रदेश में कुल्लू जिले में एक स्थान है- मणिकर्ण। मणिकर्ण से 15 किलोमीटर और आगे बरशैणी तक बस सेवा है। बरशैणी से भी एक-डेढ किलोमीटर आगे पुलगा गांव है जहां तक मोटरमार्ग है। इससे आगे भी गांव तो हैं लेकिन वहां जाने के लिये केवल पैरों का ही भरोसा है। पुलगा से दस किलोमीटर आगे खीरगंगा नामक स्थान है। खीरगंगा पार्वती नदी की घाटी में है। अगर पुलगा से ही पार्वती के साथ-साथ चलते जायें तो चार किलोमीटर पर इस घाटी का आखिरी गांव नकथान आता है। नकथान के बाद इस घाटी में कोई गांव नहीं है। हां, आबादी जरूर है। वो भी भेड-बकरी चराने वाले गद्दियों और कुछ साहसी घुमक्कडों की।

Wednesday, July 21, 2010

खीरगंगा - दुर्गम और रोमांचक

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पिछली बार पढा कि मणिकर्ण से खीरगंगा 25 किलोमीटर दूर है। 15 किलोमीटर दूर पुलगा तक तो बस सेवा है, आगे शेष 10 किलोमीटर पैदल चलना पडता है। पुलगा से तीन-साढे तीन किलोमीटर आगे नकथान गांव है, जो पार्वती घाटी का आखिरी गांव है। इसके बाद इस घाटी में कोई मानव बस्ती नहीं है।
नकथान से निकलते ही मैं एक काफिले के साथ हो लिया। उनमें सात-आठ जने थे। सभी के पास खोदने-काटने के औजार थे। यहां से आगे ज्यादा चढाई नहीं है। कुछ दूर ही रुद्रनाग है। यहां टेढी-मेढी चट्टानों से होकर पानी नीचे आता है यानी झरना है। यह जगह स्थानीय लोगों के लिये बेहद श्रद्धा की जगह है। देवता भी यहां दर्शन करने को आते हैं। इसका सम्बन्ध शेषनाग से जोडा जाता है। यह जगह बडी ही मनमोहक है। काफी बडा घास का मैदान भी है। पास में ही पार्वती नदी पर शानदार झरना भी है।

Monday, July 19, 2010

खीरगंगा ट्रैक - मणिकर्ण से नकथान

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उस दिन शाम को जब मैं मणिकर्ण में था, तो मेरे पास एक दिन और था। कोई लक्ष्य नहीं था कि कल जाना कहां है। अन्धेरा हो गया, एक धर्मशाला में कमरा ले लिया। तभी मुनीश जी का फोन आया। पूछने लगे कि कहां हो। अपन ने शान से बताया कि मणिकर्ण में हैं। बोले कि कल का क्या प्लान है? इधर कुछ हो तो बतायें भी। तब सुझाव मिला कि कल सोलांग घाटी चले जाओ। मनाली से दस-बारह किलोमीटर दूर है। मस्त जगह है। मुनीश जी ने तो फोन काट दिया लेकिन इधर दिमाग में हलचल होने लगी। प्लान बनने लगा कल सोलांग जाने का। अगर मुनीश जी दो घण्टे पहले बता देते तो मैं उसी समय कुल्लू चला आता। दो घण्टे लग जाते हैं मणिकर्ण से कुल्लू जाने में। यानी अब सुबह को जल्दी उठना पडेगा। इधर मेरी वो वाली बात है- “खा के सो जाओ, मार के भाग जाओ।” एक बार सो गया तो सुबह को जल्दी उठना भी महाभारत है। इसलिये सुबह पांच बजे का अलार्म भरा और दो रिमाइण्डर भरे।

Wednesday, July 14, 2010

मणिकर्ण में ठण्डी गुफा और गर्म गुफा

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मणिकर्ण में दो गुफाएं प्रसिद्ध हैं। एक तो है ठण्डी और दूसरी गर्म गुफा। ठण्डी गुफा मणिकर्ण से लगभग पांच किलोमीटर ऊपर है।
असल में हुआ ये कि कहीं सही सी जगह ढूंढता-ढूंढता मैं ठण्डी गुफा जाने वाले रास्ते के पास एक पत्थर पर बैठ गया। बाजार से गुजरते समय एक किताब खरीद ली थी- मणिकर्ण के बारे में। पत्थर पर बैठा बैठा किताब पढने लगा। उस समय मुझे ये नहीं पता था कि यह रास्ता जाता कहां है। कोई लम्बा-चौडा रास्ता नहीं था, बस ऐसे ही पगडण्डी सी बनी है। मैने गौर किया कि इस रास्ते से लोगों का आना-जाना लगा है। एक से पूछा तो उसने बताया कि यह रास्ता ठण्डी गुफा जाता है। कितनी दूर है? बस एक-डेढ किलोमीटर है। चलो, निकल चलो। चढना शुरू किया।

Wednesday, July 7, 2010

मणिकर्ण के नजारे

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6 जून, 2010 को दोपहर बारह बजे के करीब मैं कुल्लू से 45 किलोमीटर दूर मणिकर्ण पहुंच गया। कहते हैं कि एक बार माता पार्वती के कान की बाली (मणि) यहां गिर गयी थी और पानी में खो गयी। खूब खोज-खबर की गयी लेकिन मणि नहीं मिली। आखिरकार पता चला कि वह मणि पाताल लोक में शेषनाग के पास पहुंच गयी है। जब शेषनाग को इसकी जानकारी हुई तो उसने पाताल लोक से ही जोरदार फुफकार मारी और धरती के अन्दर से गरम जल फूट पडा। गरम जल के साथ ही मणि भी निकल पडी। आज भी मणिकरण में जगह-जगह गरम जल के सोते हैं।
एक कथा यह भी है कि गुरू नानक देव जी यहां आये थे। उन्होंने यहां काफी समय व्यतीत किया। अगर नानक यहां सच में आये थे तो उनकी हिम्मत की दाद देनी होगी। उस समय जाहिर सी बात है कि सडक तो थी नहीं। पहाड भी इतने खतरनाक हैं कि उन पर चढना मुश्किल है। नीचे पार्वती नदी बहती है, जो हिमालय की तेज बहती नदियों में गिनी जाती है। पहले आना-जाना नदियों के साथ-साथ होता था। इसलिये नानक देव जी पहले मण्डी आये होंगे, फिर ब्यास के साथ-साथ और दुर्गम होते चले गये। भून्तर पहुंचे होंगे। यहां से पार्वती नदी पकड ली और मणिकर्ण पहुंच गये। वाकई महान घुमक्कड थे नानक जी। उन्ही की स्मृति में एक गुरुद्वारा भी है।

Monday, July 5, 2010

कुल्लू से मणिकर्ण

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6 जून, रविवार। सुबह सोकर उठा तो काफी धूप चढ गयी थी। मैं कुल्लू में था। कल सोते समय सोचा था कि सुबह जल्दी उठकर मलाना जाऊंगा। इरादा था नग्गर की तरफ से चन्द्रखनी दर्रा पार करके मलाना पहुंचूंगा। हालांकि दर्रा पार करने में पूरा दिन भी लग सकता है। लेकिन जो होगा, देखा जायेगा। अगर मलाना भी नहीं पहुंच सका, तो चन्द्रखनी दर्रा देखकर ही आ जाऊंगा। सुबह पांच बजे ही निकल पडूंगा। लेकिन सारे के सारे अन्दाजे और वादे धरे के धरे रह गये। आठ बजे के बाद आंख खुली। मलाना फिर कभी।

अभी भी मेरे पास दो दिन थे। एक विकल्प था मनाली जाने का और रोहतांग देखने का। फिर सोचा कि कभी दोस्तों के साथ ही मनाली जाऊंगा। मनाली आने के लिये सभी दोस्त तुरन्त तैयार हो जायेंगे। दूसरा विकल्प था मणिकर्ण जाने का। नहाये धोये, कपडे पहने, बस अड्डे पर दो-तीन परांठे खाये और निकल पडे मणिकर्ण की ओर। मणिकर्ण जाने के लिये कुल्लू से वापस भून्तर आना पडता है। भून्तर में ब्यास-पार्वती संगम पर पुल पार करके बायें मुडकर मणिकर्ण के लिये सडक जाती है।

Wednesday, June 30, 2010

मैं जंगल में भटक गया

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कुल्लू के पास बिजली महादेव का मन्दिर है। यहां से पूरा कुल्लू शहर और भून्तर साफ-साफ दिखाई देते हैं। जाने का एकमात्र रास्ता कुल्लू से ही है। लेकिन मैने इरादा किया भून्तर की तरफ से उतरने का। उतरने लगा तो कुछ चरवाहे मिले। उन्होने रास्ता बता दिया। उनके बताये रास्ते पर चलते हुए कुछ दूर जाने पर नीचे उतरती सीढियां मिलीं। सामने बहुत दूर पार्वती नदी दिख रही थी और मणिकर्ण जाने वाली सडक भी। सडक पर चलती हुईं कारें, बसें बहुत नन्ही-नन्ही दिख रही थीं। शाम के पांच बजे के आसपास का टाइम था। मैने अपना लक्ष्य रखा दो घण्टे में यानी सात बजे तक नीचे नदी तक उतरने का। पहाडों का जो थोडा बहुत अनुभव था, उससे अन्दाजा लगाया कि दो घण्टे में नदी तक उतरना बहुत मुश्किल काम है। इसीलिये चलने की स्पीड भी बढा दी।

Wednesday, June 23, 2010

कुल्लू के चरवाहे और मलाना

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बिजली महादेव ऐसी जगह पर है जहां से ब्यास घाटी और पार्वती घाटी दूर-दूर तक दिखाई देती है। कुल्लू और भून्तर भी दिखते हैं। यहां आने का एकमात्र रास्ता कुल्लू से ही है। मैं भी कुल्लू की तरफ से ही गया था लेकिन वापस कुल्लू की तरफ से नहीं लौटा। इरादा था कि भून्तर की तरफ से लौटूंगा। हालांकि इस तरफ कोई रास्ता नहीं है।
जब मैं भून्तर की तरफ नीचे उतरने लगा तो कुछ दूर दो चरवाहे और कुछ गायें-भैंसें दिखीं। सोचा कि ये चरवाहे कुछ ना कुछ सहायता तो कर ही देंगे। अगर इन्होंने मना कर दिया तो बिजली महादेव अभी ज्यादा दूर भी नहीं है, वापस कुल्लू चला जाऊंगा। मैने इनसे पूछा कि भाई, इधर से कोई भून्तर जाने का रास्ता है?
“रास्ता तो नहीं है, लेकिन नीचे उतरते चले जाओगे तो पहुंच जाओगे।”

Monday, June 21, 2010

बिजली महादेव

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पिछले दिनों आपने पढा कि मैं कुल्लू चला गया। फिर कुल्लू से बिजली महादेव। आज बिजली महादेव का पौराणिक वर्णन पढेंगे, जो मन्दिर के पास ही लिखा हुआ है।
“श्री भगवान शिव के सर्वोत्तम तपस्थान (मथान) 7874 फुट की ऊंचाई पर है। श्री सदा शिव इस स्थान पर तप योग समाधि द्वारा युग-युगान्तरों से विराजमान हैं। सृष्टि में वृष्टि को अंकित करता हुआ यह स्थान बिजली महादेव जालन्धर असुर के वध से सम्बन्धित है। दूसरे नाम से इसे कुलान्त पीठ भी कहा गया है। सात परोली भेखल के अन्दर भोले नाथ दुष्टान्त भावी, मदन कथा से नांढे ग्वाले द्वारा सम्बन्धित है।
यहां हर वर्ष आकाशीय बिजली गिरती है। कभी ध्वजा पर तो कभी शिवलिंग पर बिजली गिरती है। जब पृथ्वी पर भारी संकट आन पडता है तो भगवान शंकर जी जीवों का उद्धार करने के लिये पृथ्वी पर पडे भारी संकट को अपने ऊपर बिजली प्रारूप द्वारा सहन करते हैं। जिस से बिजली महादेव यहां विराजमान हैं।”

Wednesday, June 16, 2010

कुल्लू से बिजली महादेव

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5 जून, 2010, शनिवार। सुबह लगभग दस-ग्यारह बजे कुल्लू पहुंच गया। बस अड्डे से ब्यास के उस तरफ वाला पहाड बहुत ही आकर्षित कर रहा था। उसी पर कहीं बिजली महादेव है। बस अड्डे पर घूम ही रहा था कि ढाबे वालों ने घेर लिया कि साहब, आ जाओ। परांठे खाओ, चाय पीयो। इधर अपनी भी कमजोरी है आलू के परांठे, समोसे, ब्रेड पकौडे; या तो चाय के साथ या फिर फैण्टा-मरिण्डा के साथ। पेल दिये दो परांठे चाय के साथ। खा-पीकर आगे के लिये तैयार हुए। बिजली महादेव का ही इरादा था।
हिमाचल में मुझे यही एक बात सबसे अच्छी लगती है कि जिन रास्तों पर बस जा सकती है, बस नियमित अन्तराल पर जाती है। यही मामला बिजली महादेव का भी है। सामने दो-तीन बस वाले मनाली-मनाली चिल्ला रहे थे। और सभी में सवारियां भी भरी पडी थीं। एक से पूछा कि भाई, बिजली महादेव के लिये कोई बस मिलेगी भी या नहीं। बोला कि अभी दस मिनट पहले पौने बारह बजे निकली है। अब तो तीन घण्टे बाद पौने तीन बजे ही आयेगी। उसने मुझे टैक्सी करने की सलाह दे डाली। अब इधर हम टैक्सी से दूर ही दूर रहते हैं। जिस काम को बस बीस रुपये में कर देती है, उसके ये हजार रुपये मांगते हैं। हां, एक काम कर सकते हैं। तीन घण्टे तक कुल्लू में घूम सकते हैं। शहर में काफी मन्दिर-वन्दिर हैं। निकल पडा। बस अड्डे से बाहर निकलते ही टैक्सियां खडी थीं। चलो, एक बार पूछ लेते हैं। पूछने में क्या जाता है? उसने किराया बताया चार सौ रुपये एक तरफ का। माफ कर, भाई। गलती हो गयी जो तेरी तरफ चला आया।

Monday, June 14, 2010

मैं कुल्लू चला गया

बहुत दिन हो गये थे कहीं बाहर गये हुए। कभी अप्रैल में यमुनोत्री गया था। दो महीने होने को थे। इस बार सोचा कि हिमालय में नहीं जायेंगे, चलो राजस्थान चलते हैं। माउण्ट आबू तय हो गया, सात जून का वापसी का आरक्षण भी करा लिया। लेकिन चार जून आते-आते दिल्ली में पारा 47 डिग्री को पार कर गया। गर्मी से होश ठिकाने लग गये। राजस्थान में तो 51 पार चला गया था। ऐसे में राजस्थान में घूमना आनन्ददायक नहीं कहा जा सकता। आरक्षण कैंसिल करा दिया। अब फिर से हिमाचल या उत्तराखण्ड। गर्मी है, तो कहीं नदी घाटी में जाऊंगा। उत्तराखण्ड में उत्तरकाशी या चमोली से पहले सही नहीं लगा। यानी दिन भर का जाना और दिन भर का आना। फिर घूमने को बचेगा ही क्या। आखिरकार तय हुआ हिमाचल में मणिकर्ण। मणिकर्ण पार्वती घाटी में स्थित है। कुल्लू-मनाली जाते समय कुल्लू से जरा सा पहले भून्तर पडता है। भून्तर से ही मणिकर्ण के लिये रास्ता जाता है और यही से पार्वती घाटी शुरू हो जाती है। यहां ब्यास-पार्वती संगम भी है।

Wednesday, June 2, 2010

रेल एडवेंचर- अलवर से आगरा

हां तो, पिछली बार आपने पढा कि मैं रेवाडी से अलवर पहुंच गया। अलवर से बांदीकुई जाना था। ट्रेन थी मथुरा-बांदीकुई पैसेंजर। वैसे तो मुझे कोई काम-धाम नहीं था, लेकिन रेल एडवेंचर का आनन्द लेना था। मेरा तरीका यही है कि किसी भी रूट पर सुबह के समय किसी भी पैसेंजर ट्रेन में बैठ जाओ, वो हर एक स्टेशन पर रुकती है, स्टेशन का नाम लिख लेता हूं, ऊंचाई भी लिख लेता हूं, फोटो भी खींच लेता हूं। हर बार किसी नये रूट पर ही जाता हूं। आज रेवाडी-बांदीकुई रूट पर निकला था। अलवर तक तो पहुंच गया था, अब आगे जाना है।

Monday, May 31, 2010

रेल एडवेंचर- रेवाडी से अलवर

आज मैं आपके सामने एक सनसनीखेज खुलासा करने जा रहा हूं। आपको ये तो पता है कि इस जाट को रेल यात्रा करना पसन्द है लेकिन इस हद तक पसन्द है ये अन्दाजा नहीं होगा। अपन को एक बीमारी है कि कोई स्टेशन चुनता हूं और वहां से जाने वाली किसी सुबह वाली ट्रेन में बैठ जाता हूं और बैठा रहता हूं, बैठा रहता हूं। अगर ट्रेन लम्बी दूरी की हो तो शाम भी हो जाती है। रास्ते में ट्रेन सभी स्टेशनों पर रुकती है, सभी के नाम और समुद्र तल से ऊंचाई लिख लेता हूं। अब तो फोटो भी खींच लेता हूं। और हां, हर बार मैं नये रूट पर जाता हूं। अब तक मेरे पास 1010 स्टेशन नोट हैं। इनमें से 567 स्टेशनों की ऊंचाई भी नोट है। इन 567 में सबसे ऊंचाई वाला स्टेशन शिमला (2075 मीटर) है और सबसे कम ऊंचाई वाला स्टेशन पिताम्बरपुर (105.6 मीटर) है।

Wednesday, May 26, 2010

सहस्त्रधारा - द्रोणाचार्य की गुफा

देहरादून से 11-12 किलोमीटर दूर है सहस्त्रधारा। मैं अप्रैल में जब यमुनोत्री गया था तो समय मिलते ही सहस्त्रधारा भी चला गया। यह एक पिकनिक स्पॉट है लेकिन यहां का मुख्य आकर्षण वे गुफाएं हैं जिनमें लगातार पानी टपकता रहता है। यह पानी गन्धक युक्त होता है। नीचे पूरी चित्रावली दी गयी है सहस्त्रधारा में घूमने के लिये। तो शेष जानकारी चित्र देंगे:

नदी का पानी रोककर तालाब बनाये गये हैं जिनमें लोग मस्ती करते हैं।


Monday, May 24, 2010

तैयार है यमुनोत्री आपके लिए

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अब जबकि चारधाम यात्रा शुरू हो चुकी है, शुरूआत यमुनोत्री से की जाती है। ज्यादातर लोग टूर ऑपरेटर से ही बुकिंग कराते हैं। टूर ऑपरेटर भारी भरकम राशि लेते हैं। मुझ जैसों के लिये यह राशि देना बस से बाहर की बात है।
खैर, यात्रा हरिद्वार-ऋषिकेश से शुरू होती है। नरेन्द्रनगर, चम्बा, टिहरी होते हुए पहुंचते हैं धरासू बैण्ड। धरासू से एक रास्ता बडकोट जाता है दूसरा उत्तरकाशी या यूं कहिये कि एक रास्ता यमुनोत्री जाता है दूसरा गंगोत्री। धरासू से यमुनोत्री जाने वाला रास्ता ऊबड-खाबड है। इस पर काम भी चल रहा है। जैसे-तैसे जानकीचट्टी पहुंचते हैं। जानकीचट्टी यमुनोत्री का बेस-कैम्प है। यहां से यमुनोत्री के लिये पैदल चढाई शुरू होती है। यहां से यमुनोत्री की दूरी पांच किलोमीटर है। रास्ता ठीक-ठाक है। अब चित्र देखिये:

Wednesday, May 19, 2010

यमुनोत्री में ट्रेकिंग

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अक्षय तृतीया जा चुकी है। उत्तराखण्ड में चार धाम यात्रा भी शुरू हो चुकी है। मुसाफिरों और श्रद्धालुओं को घूमने के लिये यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसी जगहों के रास्ते खुल गये हैं। इन जगहों पर अब लोग-बाग आने-जाने शुरू हो गये हैं। जाहिर सी बात है कि सुविधायें भी मिलने लगी हैं।
पिछले महीने यानी चारधाम यात्रा शुरू होने से एक महीने पहले मैं अकेला यमुनोत्री के लिये चला था। सही-सलामत पहुंच भी गया। लेकिन वहां सब-कुछ सुनसान पडा था। ऐसा यमुनोत्री आपने कभी नहीं देखा होगा। वहां की काली कमली धर्मशाला प्रसिद्ध है। लेकिन वो भी बन्द थी, क्योंकि कोई नहीं जाता वहां कपाट बन्द रहने के दिनों में। उस रात मैं चौकीदार के यहां ठहरा था। वो सरकारी चौकीदार था, और बारहों मास यही रहता है। उसका परिवार नीचे बडकोट में रहता है। उन दिनों उसके साथ उसका लडका और एक नेपाली मजदूर रह रहे थे। मेरी इच्छा अगले दिन यमुना के उदगम स्थल सप्तऋषि कुण्ड तक जाने की थी। लेकिन बारिश ने सारे करे-कराये पर पानी फेर दिया। बारिश बन्द होने पर हम चारों मन बहलाने के लिये यमुना के साथ-साथ ऊपर की दिशा में चल दिये। उस यात्रा का विस्तृत विवरण आप पिछले भाग में पढ चुके हो।

Monday, May 17, 2010

कभी ग्लेशियर देखा है? आज देखिये

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अभी तक आपने पढा कि मैं पिछले महीने अकेला ही यमुनोत्री पहुंच गया। अभी यात्रा सीजन शुरू भी नहीं हुआ था। यमुनोत्री में उस शाम को केवल मैं ही अकेला पर्यटक था, समुद्र तल से 3200 मीटर से भी ऊपर। मेरे अलावा वहां कुछ मरम्मत का काम करने वाले मजदूर, एक चौकीदार और एक महाराज जी थे, महाराज जी के साथ दो-तीन चेले-चपाटे भी थे। मैने रात में ठहरने के लिये चौकीदार के यहां जुगाड कर लिया। चौकीदार के साथ दो जने और भी रहते थे, एक उसका लडका और एक नेपाली मजदूर। दो कमरे थे, एक में चूल्हा-चौकी और दूसरे में बाकी सामान। बातों-बातों में मैने उनके समक्ष सप्तऋषि कुण्ड जाने की इच्छा जताई। उसने बताया कि वहां जाने का रास्ता बेहद दुर्गम है, दूरी चौदह किलोमीटर है। बिना गाइड के बिल्कुल भी मत जाना, इस समय कोई गाइड भी नहीं मिलेगा। मैने पूछा कि क्या आप वहां तक कभी गये हो? उसने बताया कि हां, मैं तो कई बार जा चुका हूं।

Wednesday, May 12, 2010

जानकीचट्टी से यमुनोत्री

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जानकीचट्टी से मैने दोपहर दो बजे के करीब चढाई शुरू कर दी। तारीख थी बीस अप्रैल दो हजार दस। मैं थोडी देर पहले ही आठ किलोमीटर पैदल चलकर हनुमानचट्टी से आया था। थक भी गया था। फिर समुद्र तल से लगभग 2500 मीटर की ऊंचाई पर हवा की कमी भी महसूस होने लगती है। हल्के-हल्के चक्कर भी आ रहे थे। यहां से मेरे साथ एक परिवार और भी चल रहा था। वे लोग भरतपुर से आये थे। हरिद्वार में कुम्भ स्नान करने आये थे। समय बच गया तो ड्राइवर से कहा कि कहीं भी घुमा लाओ। ड्राइवर यमुनोत्री ले आया। ड्राइवर समेत पांच जने थे। ड्राइवर तो तेज-तेज चल रहा था लेकिन वे चारों बेहद धीरे-धीरे। दो-चार कदम चलते और सिर पकडकर बैठ जाते। उनका इरादा था कि यमुनोत्री घूम-घामकर आज ही वापस आयेंगे और कल गंगोत्री जायेंगे। उधर मेरा इरादा था कि आज रात को ऊपर यमुनोत्री में ही रुकना है। इसलिये मुझे भी तेज चलने में कोई दिलचस्पी नहीं थी।

Monday, May 10, 2010

हनुमानचट्टी से जानकीचट्टी

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20 अप्रैल, 2010। सुबह के साढे नौ बजे मैं उत्तरकाशी जिले में यमुनोत्री मार्ग पर स्थित हनुमानचट्टी गांव में था। यहां से आठ किलोमीटर आगे जानकीचट्टी है और चौदह किलोमीटर आगे यमुनोत्री। जानकीचट्टी तक मोटर मार्ग है और जीपें, बसें भी चलती हैं। बडकोट से जानकीचट्टी की पहली बस नौ बजे चलती है और वो दो घण्टे बाद ग्यारह बजे हनुमानचट्टी पहुंचती है। अभी साढे नौ ही बजे थे। मुझे पता चला कि जानकीचट्टी जाने के लिये केवल वही बस उपलब्ध है। अब मेरे सामने दो विकल्प थे – या तो डेढ घण्टे तक हनुमानचट्टी में ही बैठा रहूं या पैदल निकल पडूं। आखिर आठ किलोमीटर की ही तो बात है। दो घण्टे में नाप दूंगा। और एक कप चाय पीकर, एक कटोरा मैगी खाकर मैं हनुमानचट्टी से जानकीचट्टी तक पैदल ही निकल पडा।

Wednesday, May 5, 2010

देहरादून से हनुमानचट्टी

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अभी तक आपने पढा कि मैं केदारनाथ के लिये चला था। रास्ते में बुद्धि फिर गयी और मैं यमुनोत्री जाने लगा। देहरादून से बडकोट जाने वाली आखिरी बस निकल गयी थी। अब मैने प्रेस की गाडी से जाने का इरादा बनाया। यह पटेल नगर से रात को बारह बजे चलती है। इसमें वैसे तो अखबार के बण्डल लदे होते हैं। फिर भी ड्राइवर सवारियां बैठा लेता है। चूंकि रात का सफर था, यह सोचकर मैं देहरादून रेलवे स्टेशन पर खाली पडी बेंच पर ही सो गया। शाम को सात बजे सोया था, आंख खुली साढे दस बजे। वो भी पता नहीं कैसे खुल गयी। मन्द मन्द हवा चल रही थी, मुझे कुछ थकान भी थी और सबसे बडी बात कि मच्छर नहीं थे। हां, याद आया, सफाई वाले ने उठाया था। खाज होती है ना कुछ लोगों को। भई, तुझे झाडू मारनी थी, चुपचाप बेंच के नीचे मार लेता, मैने तो वहां जूते भी नहीं निकाल रखे हैं। औकात दिखा रहा है कि मैं भी कुछ हूं। एक रेलवे पुलिस वाले भी ऐसे ही होते हैं।

Monday, May 3, 2010

यमुनोत्री यात्रा

अप्रैल 2010 की 18 तारीख को रात को दस बजे से अगले दिन छह बजे तक मेरी नाइट शिफ्ट की ड्यूटी थी। इस नाइट का मतलब था कि 19 को फ्री, 20 का मेरा साप्ताहिक अवकाश था और 21 तथा 22 की मैने ले ली छुट्टी; देखा जाये तो कितने दिन हो गये? चार दिन। ये चार दिन घुमक्कडी में बिताने थे। हमेशा की तरह वही दिक्कत, कहां जाऊं, किसे ले जाऊ? कोई भी मित्र तैयार नहीं हुआ। अब अकेले ही जाना था। कहां? पता नहीं। खोपोली वाले नीरज गोस्वामी जी को फोन मिलाया। वैसे तो वे हमेशा और सभी से कहते हैं कि खोपोली आओ, लेकिन आज उन्होनें सिरे से पत्ता साफ कर दिया। बोले कि यहां मत आओ, बहुत गर्मी पड रही है। मैने कहा कि साहब, गरमी-सरदी देखने लगे तो हो ली घुमक्कडी। बोले कि बरसात के मौसम में आ जाओ या फिर बरसात के बाद। ठीक है जी, बरसात के बाद आ जायेंगे।

Wednesday, April 28, 2010

तीन धर्मों की त्रिवेणी – रिवालसर झील

हिमाचल प्रदेश के मण्डी जिले में मण्डी से लगभग 25 किलोमीटर दूर एक झील है – रिवालसर झील। यह चारों ओर पहाडों से घिरी एक छोटी सी खूबसूरत झील है। इसकी हिन्दुओं, सिक्खों और बौद्धों के लिये बडी ही महिमा है। महिमा बाद में सुनायेंगे, पहले वहां पहुंचने का इन्तजाम कर लें। भारत की राजधानी है नई दिल्ली। यहां से लगभग 250 किलोमीटर दूर एक खूबसूरत शहर है – हरियाणा-पंजाब की राजधानी भी है यह – चण्डीगढ। इसे हिमाचल का प्रवेश द्वार भी कह सकते हैं। यहां से शिमला, कांगडा और मनाली की बसें तो जाते ही मिल जाती हैं। मनाली वाले रास्ते पर स्थित है प्रसिद्ध नगर मण्डी। मण्डी से कुछ पहले नेर चौक पडता है। मण्डी और नेर चौक दोनों जगहों से ही रिवालसर की बसें बडी आसानी से मिल जाती हैं। इसका एक नाम पद्मसम्भव भी है।

Monday, April 26, 2010

चण्डीगढ का गुलाब उद्यान

छोटा सा चण्डीगढ और इतिहास भी कुछ खास नहीं; लेकिन देखने लायक-घूमने लायक इतना कुछ कि मन थकता नहीं है। यहां अपने कुछ घण्टों के प्रवास में हम रॉक गार्डन में घूम आये, सुखना झील देख ली, अब चलते हैं गुलाब उद्यान (ROSE GARDEN) की तरफ। इसका पूरा नाम है ज़ाकिर गुलाब उद्यान। यह पूर्व राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन के नाम पर 1967 में बनाया गया था। यह एशिया का सबसे बडा गुलाब उद्यान है। यह तीस एकड से भी ज्यादा इलाके में फैला हुआ है। इसमें 1600 से भी ज्यादा गुलाब की किस्में हैं। इनमें से कुछ किस्में तो बहुत ही दुर्लभ हैं। यह चण्डीगढ के सेक्टर 16 में स्थित है।

एक बार फिर से अपनी बात सुनाता हूं। कल नाइट शिफ्ट की थी, फिर सीधा चण्डीगढ पहुंच गया, फिर रॉक गार्डन, उसके बाद बिना समय गंवाये सुखना झील। यहां तक मैं इतना थक चुका था कि मन कर रहा था कहीं पडकर सो जाऊं। पडकर सोने के लिये रेलवे स्टेशन व बस अड्डा सही जगह है। मुझे चूंकि आज रात को कहीं निकल जाना था, इसलिये मैने बस अड्डे को चुना। सुखना के पास ही एक चौराहे पर रिक्शावाले से पूछा कि भाई, यह सडक ‘सतारा’ ही जा रही है क्या? बोला कि हां, लेकिन पांच किलोमीटर है। आ जा, मेरी रिक्शा में बैठ जा, पहुंचा दूंगा। चण्डीगढ में पंजाबी प्रभुत्व होने की वजह से सेक्टर सत्रह वाले बस अड्डे को सतारा कहते हैं। सतारा मतलब सत्रह।

Monday, March 29, 2010

चण्डीगढ की शान – सुखना झील

पिछली बार हमने आपको चण्डीगढ के रॉक गार्डन में घुमाया था। इसके पास में ही है सुखना झील। पास में मतलब एक डेढ किलोमीटर दूर। मैं तो पैदल ही चला गया था। चण्डीगढ की यही तो बात अच्छी लगती है। एक तो चौडी-चौडी सडकें हैं, अभी ट्रैफिक भी ज्यादा नहीं है, फिर सडकों के किनारे चौडे-चौडे फुटपाथ, छायादार पेड; पैदल चलने में मजा आ जाता है।

मेरी हालत तो आपको पता ही है। पूरी रात जगा रहा, नाइट शिफ्ट की थी, फिर चार-साढे चार घण्टे का जनरल डिब्बे में सफर करके चण्डीगढ पहुंचा, यहां घण्टे भर लाइन में खडा होकर कालका मेल से वापसी का रिजर्वेशन कराया, फिर रॉक गार्डन में पैदल ही घूमता रहा, अब वहां से यहां सुखना तक भी पैदल घिसटन। दोपहर बाद का टाइम तो रॉक गार्डन में ही हो गया था। मेरी जगह खुद को रखकर देखो, अब तक तो कहने लगते कि छोडो सुखना-वुखना, कोई होटल ढूंढते और सो जाते। रखकर देखो तो सही, थोडी बहुत थकान महसूस हो ही जायेगी। मुझे भी उस समय बहुत भयंकर थकावट हो रही थी।

Thursday, March 25, 2010

आज हमारा घर देखिये

यह पोस्ट अपने तय समय से कुछ विलम्ब से छप रही है। क्योंकि नीचे दिये गये ज्यादातर फोटू होली पर खींचे गये थे। उस समय खेतों में बहार आयी हुई थी, सरसों मस्ती मार रही थी। अब तो सरसों अपने पकने के दौर में चल रही है। लेकिन फिर भी देर से ही सही।

मेरे गांव का नाम है- दबथुवा। यह मेरठ जिले में सरधना और शामली जाने वाली सडक पर स्थित है। मुझे दिल्ली से अपने गांव जाने में कम से कम तीन घण्टे लगते हैं। नजदीकी रेलवे स्टेशन मेरठ छावनी है। दबथुवा काफी बडा गांव है। यह जाट बहुल है। हमारा घर पंघाल पट्टी में है, पंघाल पट्टी मतलब पंघाल गोत्र वाले जाट। अपन भी पंघाल हैं। हमारा घर मुख्य सडक से काफी हटकर गांव के बाहरी इलाके में है, खेतों के पास। घर के सामने और बायें, दो तरफ खेत हैं। आजकल गन्ना और गेहूं की खेती हो रही है। गन्ना धीरे-धीरे कट रहा है, एक महीने बाद गेहूं भी कटने लगेगा। गन्ने वाले खेतों में दोबारा गन्ना ही बो दिया जायेगा, गेहूं वाले खेतों में ज्वार या धान बोये जायेंगे। पूरे सालभर यही चक्र चलता रहता है।

Thursday, March 18, 2010

रॉक गार्डन, चण्डीगढ

चण्डीगढ जाना तो कई बार हुआ; शिमला गया, तो चण्डीगढ; धर्मशाला गया, तो चण्डीगढ; सोलन गया, तो चण्डीगढ; एकाध बार ऐसे-वैसे भी चला गया था। लेकिन चण्डीगढ ही नहीं देख पाया। इस बार पक्का मूड बना लिया चण्डीगढ जाने का। अपनी नौकरी भी तो ऐसी है कि तीन शिफ्ट की ड्यूटी लगती है, लेकिन मजेदार ये है कि रात की शिफ्ट पहली शिफ्ट मानी जाती है। इसके बाद पूरे दिन खाली। तो जी, हुआ ये था कि चौदह मार्च को अपनी रात की ही ड्यूटी थी; पन्द्रह मार्च, सोमवार को मेरा साप्ताहिक अवकाश था। मंगलवार को शाम की ड्यूटी थी, दोपहर बाद दो बजे से। मेरे पास थे दो दिन और दो रातें। इनका बंटवारा मैने इस प्रकार किया कि इतवार को सुबह छह बजे तक ड्यूटी करके, हिमालयन क्वीन पकडके, दस-ग्यारह बजे तक चण्डीगढ पहुंचा जाये। दोपहर से शाम तक चण्डीगढ में घूम-घाम के फिर एक रात का सफर किया जाये और अगले दिन किसी नयी जगह पर पहुंचा जाये।

Monday, March 15, 2010

गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब

यह गुरुद्वारा उत्तराखण्ड राज्य के ऊधमसिंहनगर जिले में स्थित है। जिले के बिल्कुल बीच में है जिला मुख्यालय और प्रमुख नगर रुद्रपुर। यहां से एक सडक किच्छा, सितारगंज होते हुए खटीमा और आगे टनकपुर जाती है। सितारगंज और खटीमा के बीच में है नानकमत्ता। मैं जब खटीमा निवासी डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ’मयंक’ जी के यहां गया तो पहले तो एक चक्कर प्रसिद्ध शक्तिपीठ पूर्णागिरी का लगाया। फिर शास्त्री जी के साथ उन्ही की कार में बैठकर नानकमत्ता गया। शास्त्री जी तो इसी इलाके के रहने वाले हैं, उन्हे पूरी जानकारी है। इसलिये उन्होने एक पोस्ट भी लिख दी है नानकमत्ता के बारे में। अब मेरा काम आसान हो गया, फटाफट शास्त्री जी से उनकी पोस्ट का इस्तेमाल करने की आज्ञा ली। अब नानकमत्ता की पूरी कहानी उन्ही की जुबानी-

Thursday, March 11, 2010

बुखार में होली

आज बहुत दिन बाद लिखने बैठा हूँ। अब स्वास्थ्य ठीक है। असल में हुआ ये था कि होली की छुट्टियों में अल्मोडा की तरफ कहीं जाने का इरादा था। लेकिन ऐन टाइम पर बुखार चढ गया। बुखार से पहले नाक बही, खांसी हुई। नाक ठीक हो गयी, बुखार ठीक हो गया। खांसी अब भी है। जब भी थोडी-थोडी देर बाद याद आता है, खूं-खूं खांसना शुरू कर देता हूँ। डॉक्टर नामक प्राणी से सख्त ऐतराज है। जिस तरह जाडे के बाद गर्मी आती ही है, उसी तरह बसन्त के मौसम में ये बीमारियां भी होती ही हैं। डॉक्टर के पास जाओगे तो एक तो बुखार की वजह से खाने-पीने को मन नहीं करता, फिर वो दुनिया भर का परहेज बता देता है। मोटे-मोटे गोले दे देता है कि ये सुबह, ये दोपहर, ये शाम, ये ताजे पानी से, ये दूध से, ये चाय से, ये खाने से पहले, ये खाने के बाद, ये आधे घण्टे पहले, ये बाद में, ये उठने से पहले, ये सोने के बाद, ये एक चम्मच, कडवी हो तो दो चम्मच; और हां, सबसे पहले इंजेक्शन।
खैर, होली पर घर पहुँचा। बुखार से तपता लाल और मुस्कराता चेहरा देखते ही घरवाले समझ गये कि अगले को बुखार है। डॉक्टर के पास जाने से बचने के लिये मुस्कराने की कोशिश कर रहा है। वाकई उस समय था भी भयंकर बुखार। चल भई, डॉक्टर के यहां। पैदल मत जाना, साइकिल से मत जाना, चक्कर आ जावेंगे, गिर-गिरा पडेगा। कटडा-बुग्गी तैयार किये गये। डॉक्टर जी ने आदत से मजबूर होकर वही सुबह-दोपहर-शाम वाली गोलियां दे दीं। और अन्त में, दही-मट्ठे का परहेज बता दिया। घर वापस आये। हाण्डी में दही रखी थी, एक कटोरा भर लिया, गुड का डला ले लिया और गटर-गटर। हां, जो खुराक लेनी थी, वो भी दही से ही ले ली। अगले ही टाइम बुखार खत्म।
रात को सो गये। सुबह उठा तो महसूस हुआ कि बुखार फिर चढ गया है। पिताजी ने नब्ज टटोलकर देखी। मैने कहा कि ऐसे ही गर्म हो रहा है, बुखार नहीं है। पिताजी को वैसे भी पहचान नहीं है, मान गये। फिर मां आयीं, मां को जबरदस्त पहचान है। निन्यानवें का भी बुखार होता है, तो तुरन्त बता देती हैं। आते ही मैं खाट पर से कूद पडा, और बताया कि बुखार नहीं है; नल पर पहुंचकर बोतल भरी, जंगल चला गया।
आज दुल्हेण्डी थी। बुखार की वजह से होली खेलने का जरा भी मन नहीं था। लेकिन खेलनी पडी, नहीं तो फिर डॉक्टर के पास जाना पडता, मोटे-मोटे गोले खाने पडते। रंग-बिरंगे होकर पूरे मोहल्ले में घूमना पडा, जाने कितनी बाल्टी पानी अपने ऊपर गिरा, कई घरों के पूरी-पकवान खाये, समोसे-पकौडे खाये। खाये नहीं, खाने पडे; केवल डॉक्टर की वजह से। अच्छा हां, फिर तो बुखार ऐसा पिण्ड छुडाकर भागा कि अब अक्टूबर-नवम्बर से पहले नहीं आयेगा।
एक सन्देश- यह गर्मी-सर्दी का मौसम चल रहा है। बीमारियां होना लाजिमी है। डॉक्टर-वॉक्टर के चक्कर में ना पडें। गोली-गोले ना खायें। खुश रहने की कोशिश करें। अच्छा ना लगने पर भी ठूंस-ठूंसकर खायें, खूब टहलें, खूब घूमे, घुमक्कड बनें।






इति श्री मौसम परिवर्तनाय बुखार दूर भगाय कथा!!!!

Thursday, February 25, 2010

पूर्णागिरी – जहाँ सती की नाभि गिरी थी

वो किस्सा तो सभी को पता ही है – अरे वो ही, शिवजी-सती-दक्ष वाला। सती ने जब आत्महत्या कर ली, तो शिवजी ने उनकी अन्त्येष्टि तो की नहीं, बल्कि भारत भ्रमण पर ले गये। फिर क्या हुआ, कि विष्णु ने चक्र से सती की ’अन्त्येष्टी’ कर दी। कोई कहता है कि 51 टुकडे किये, कोई कहता है 52 टुकडे किये। हे भगवान! मरने के बाद सती की इतनी दुर्गति!!! जहाँ जहाँ भी ये टुकडे गिरे, वहीं शक्तिपीठ बन गयी। एक जगह पर नाभि भाग गिरा, वो पर्वत की चोटी पर गिरा और पर्वत में छेद करके नीचे नदी तक चला गया। यह नदी और कोई नहीं, भारत-नेपाल की सीमा निर्धारित्री शारदा नदी है।

अब पता नहीं कैसे तो लोगों ने उस छेद का पता लगाया और कैसे इसे सती की नाभि सिद्ध करके शक्तिपीठ बना दिया। लेकिन इससे हम जैसी भटकती आत्माओं की मौज बन गयी और भटकने का एक और बहाना मिल गया। इस शक्तिपीठ को कहते हैं पूर्णागिरी। यह उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊं अंचल में चम्पावत जनपद की टनकपुर तहसील के अन्तर्गत आता है। जिस तरह से जम्मू व कटरा पर वैष्णों देवी का रंग छाया है, उसी तरह टनकपुर पर पूर्णागिरी का। आओ, पहले आपको टनकपुर पहुंचा देते हैं-

Thursday, February 18, 2010

रोहतक का चिड़ियाघर और तिलयार झील

आज पहली बार हरियाणा के पर्यटन स्थल के बारे में बताते हैं। शुरूआत करते हैं रोहतक से। रोहतक दिल्ली से मात्र सत्तर किलोमीटर पश्चिम में है। दिल्ली-फिरोजपुर रेल लाइन पर स्थित एक जंक्शन है। रोहतक का सबसे प्रसिद्द मटरगश्ती केंद्र है - तिलयार झील। यह एक कृत्रिम झील है जिसमे यमुना नहर से पानी पहुँचाया जाता है। झील बहुत बड़े भूभाग में फ़ैली है, बीच बीच में टापू भी हैं। झील के चारों तरफ घूमने के लिए पक्का रास्ता बना है। इस पर कई पुल भी हैं।
झील के बगल में है चिड़ियाघर - रोहतक चिड़ियाघर। वैसे तो यह एक छोटा सा चिड़ियाघर ही है, केवल कुछ पक्षी, हिरन, बाघ व तेंदुआ ही हैं। फिर भी हरियाली से भरपूर है और भीड़ से दूर।

Monday, February 15, 2010

शिव का स्थान है - शिवखोडी

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एक बार की बात है। एक असुर था- भस्मासुर। उसने शिवजी से वरदान ले लिया था कि वो जिसके सिर पर भी हाथ रखेगा, भस्म हो जायेगा। इसका पहला प्रयोग उसने शिवजी पर ही करना चाहा। शिवजी की जब जान पर बन आयी तो शिवजी जान बचाकर दौडे। लेकिन भस्मासुर भी कोई लंगडा नही था, शिवजी का पीछा किया। वे एक गुफा में जा घुसे। फिर अपने त्रिशूल से गुफा के अन्दर ही संकरा सा रास्ता बनाते बनाते और अन्दर घुसते रहे। हां, उन्होने इस गुफा का रास्ता भी बन्द कर दिया था। भस्मासुर बाहर ही बैठ गया। कभी ना कभी तो बाहर निकलेंगे ही। शिवजी नहीं निकले। फिर आये विष्णुजी, माता पार्वती का वेश बनाकर। भस्मासुर मोहित हो गया। बोला कि हे पार्वती, मुझसे विवाह करो। पार्वती ने शर्त रख दी कि अगर तुम भोले शंकर की तरह ताण्डव नृत्य करो, तो विवाह हो सकता है। भस्मासुर बोला कि ताण्डव तो मुझे आता ही नही है। पार्वती ने कहा कि, मुझे आता है, मेरे साथ करो। भस्मासुर खुश। पार्वती की नकल करने लगा। जैसे ही पर्वती ने अपना हाथ अपने सिर पर रखा, भस्मासुर ने भी ऐसा ही किया और भस्मासुर ध्वस्त।

Thursday, February 11, 2010

माता वैष्णों देवी दर्शन

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जम्मू पहुँचे, कटरा पहुँचे, पर्ची कटाई, जयकारा लगाया और शुरू कर दी चढाई। चौदह किलोमीटर की पैदल चढाई। दो किलोमीटर के बाद बाणगंगा पुल है। यहाँ चेकपोस्ट भी है। सभी यात्रियों की गहन सुरक्षा जांच होती है। पर्ची की चेकिंग भी यहीं होती है। वैसे तो कटरा से बाणगंगा चेकपोस्ट तक टम्पू भी चलते हैं जो आजकल बीस रुपये प्रति सवारी के हिसाब से लेते हैं। चेकपोस्ट के पास से ही पोनी व पालकी उपलब्ध रहती है। पोनी व पालकी का किराया माता वैष्णों देवी श्राइन बोर्ड द्वारा निर्धारित है। पोनी व पालकी की सवारी शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्तियों को ही करनी चाहिये लेकिन भले चंगे लोग भी इनका सहारा ले लेते हैं।
यहाँ तक नकली चढाई थी, असली चढाई तो बाणगंगा के बाद ही शुरू होती है। पूरा रास्ता पक्का बना हुआ है। जगह जगह विश्राम शेड बने हैं। पीने के पानी व फ्री शौचालयों की तो कोई गिनती ही नहीं है। पूरे रास्ते भर खाने-पीने की दुकानों का भी क्रम नहीं टूटता। करीब सौ-सौ मीटर पर कूडेदान रखे हैं। श्रद्धालुओं के साथ साथ ही घोडे व खच्चर भी चढते उतरते हैं। वे लीद करते हैं जिसे श्राइन बोर्ड के सफाईकर्मियों द्वारा तुरन्त ही साफ कर दिया जाता है। इतनी भीड होने के बावजूद भी पूरा रास्ता एकदम ’सफाचट’ रहता है।

Monday, February 8, 2010

जम्मू से कटरा

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उस दिन जम्मू मेल करीब एक घण्टे देरी से जम्मू पहुँची। यह गाडी आगे ऊधमपुर भी जाती है। मैने प्रस्ताव रखा कि ऊधमपुर ही चलते हैं, वहाँ से कटरा चले जायेंगे। लेकिन प्रस्ताव पारित होने से पहले ही गिर गया। यह 27 दिसम्बर 2009 की सुबह थी। जाडों में कहीं जाने की यही सबसे बडी दिक्कत होती है कि भारी-भरकम सामान उठाना पडता है, जिसमे गर्म कपडे ज्यादा होते हैं।

स्टेशन से बाहर निकले। हर तरफ कटरा जाने वालों की भीड। बसें, जीपें, टैक्सियां, यहाँ तक कि नन्हे नन्हे टम्पू भी; कटरा जाने की जिद लगाये बैठे थे। हम तीनों ईडियट एक खाली बस में बैठ गये। बस वाला कटरा कटरा चिल्ला रहा था। हमें बस खाली दिखी तो तीनों ने तीन सीटों पर कब्जा कर लिया, खिडकी के पास वाली। यह 2X2 सीट वाली बस थी। हमारे बराबर में एक एक सीट खाली देखकर बाकी सवारियों ने बैठना मना कर दिया, उन्हे भी खिडकी वाली सीट ही चाहिये थी। कंडक्टर ने हमसे खूब कहा कि भाई, तुम अलग-अलग सीटों पर मत बैठो, साथ ही बैठ जाओ, लेकिन यदि रामबाबू और रोहित मेरे पास बैठ जाते तो उनकी शान कम हो जाती। जब झगडा बढ गया तो, हम बस से ही उतर गये।

Thursday, February 4, 2010

वैष्णों देवी यात्रा

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वैष्णों देवी गए और फिर आये, आते ही एक शुभ काम हो गया। खैर, मेरे साथ अभी तक आप जम्मू मेल से सफ़र कर रहे हो, पानीपत से निकलते ही खर्राटे भरने लगे हो। जागने पर क्या हुआ, ये बताऊंगा मैं बाद में, पहले एक खुशखबरी। हमने एक कंप्यूटर खरीद लिया है। अपनी खाट पर बैठे-बैठे ही रजाई की भुक्कल मारकर (ओढ़कर), गोद में कीबोर्ड रखकर, बराबर में माऊस रखकर ई-आनन्द लेना शुरू कर दिया है। लेकिन सुख है, तो दुःख भी है। अरे भाई, एक कंजूस की जेब से जब पैसा निकलता है तो दुःख तो होगा ही। कोई मामूली रकम नहीं, पूरे पांच अंकों में, वो भी एक ही झटके में। चलो खैर, वापस जम्मू मेल में पहुँचते हैं, और देखते हैं कहाँ पहुँच गए।

Thursday, January 28, 2010

भारत में नैरो गेज

भारत में ज्यादातर रेल लाइन ब्रॉड गेज में है। जो नहीं हैं, उन्हे भी ब्रॉड गेज में बदला जा रहा है। जो नई लाइनें बन रही हैं, वे भी ब्रॉड गेज में ही हैं। धीरे-धीरे मीटर गेज की सभी लाइनों को ब्रॉड में बदल दिया जायेगा। जैसे कि अभी पिछले साल रेवाडी-रींगस-फुलेरा लाइन को पूरा कर दिया है। इस पर चेतक एक्सप्रेस दोबारा दौडने लगी है। रेवाडी-सादुलपुर-बीकानेर लाइन पर भी गेज परिवर्तन का काम पूरा हो चुका है।

Thursday, January 7, 2010

चलूँ, बुलावा आया है

पुरानी दिल्ली के स्टेशन से रात को नौ बजे एक ट्रेन चलती है- जम्मू के लिए (4033 जम्मू मेल)। शुरूआती दिमाग तो रोहित ने ही लगाया था। दिवाली पर ही कह दिया था कि दिसम्बर में वैष्णों देवी चलेंगे। तभी मैंने एकदम रिजर्वेशन करा लिया कि कहीं रोहित बाद में मना ना कर दे। हमने इस लपेटे में रामबाबू को भी ले लिया। साल ख़त्म होते-होते रोहित कहने लगा कि यार, जितनी उम्मीद थी उतनी छुट्टियाँ नहीं मिली। रोहित की मनाही सुन-सुनकर रामबाबू भी नाटने की तैयारी करने लगा।
खैर, लाख डंडे करने पर दोनों इस शर्त पर राजी हो गए कि वैष्णों देवी के दर्शन करते ही तुरंत वापस आ जायेंगे। नहीं तो हमारा चार दिन बाद 30 दिसम्बर को वापसी का टिकट था। 26 दिसम्बर को हमें दिल्ली से जाना था। अच्छा, मैं इन दोनों का ज़रा सा चरित्र-चित्रण कर दूं। हम तीनों ने साथ साथ ही पढ़ाई पूरी की है। आजकल रोहित तो है ग्रेटर नोएडा में होण्डा सीएल कम्पनी में और रामबाबू है गुडगाँव में मारूति कम्पनी में। तीसरे की तो बताने की जरुरत ही नहीं है। उसे तो ऐसी बीमारी लग गयी है कि हाल-फिलहाल लाइलाज ही है। बेटा, जब वा आवेगी ना, लम्बी चोटी वाली, या बेमारी तो तभी ठीक होवेगी। ससुरे को घूमने की खाज है।

Monday, January 4, 2010

जम्मू-ऊधमपुर रेल लाइन

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2009 के आखिर में वैष्णों देवी के दर्शन करने जम्मू गया तो वापसी में कटरा से सीधा ऊधमपुर पहुँच गया। वहां से दोपहर बाद जम्मू जाने के लिए एक पैसेंजर ट्रेन पकड़ी। इस मार्ग पर सफ़र करके दिमाग में आया कि वैष्णों देवी का यात्रा वृत्तान्त तो होता रहेगा, पहले भारतीय इंजीनियरी का अदभुत करिश्मा दिखा दिया जाए।
जितनी जानकारी मुझे अभी तक है उसके अनुसार बात दरअसल ये है कि आजादी से पहले पाकिस्तान नामक देश भारत देश का ही हिस्सा था। उन दिनों पूरे भारत में रेल लाइनों का विस्तार होता जा रहा था। दिल्ली से अम्बाला, अमृतसर होते हुए लाहौर, रावलपिण्डी तक ट्रेनें जाती थीं। पठानकोट को भी अमृतसर से जोड़ दिया गया था। जम्मू तक भी ट्रेनें जाती थीं। उन दिनों जम्मू-सियालकोट के बीच रेल सेवा थी। रावलपिण्डी से श्रीनगर तक भी रेल लाइन बिछाने की योजना बन रही थी।

Friday, January 1, 2010

रेलयात्रा सूची: 2010

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क्रम संकहां सेकहां तकट्रेन नंट्रेन नामदूरी
(किमी)
कुल दूरीदिनांकश्रेणीगेज
1मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा4646शालीमार एक्सप्रेस673689701/01/2010साधारणब्रॉड
2दिल्ली शाहदरामेरठ सिटी9105अहमदाबाद- हरिद्वार मेल633691009/01/2010साधारणब्रॉड
3मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा304कालका- दिल्ली पैसेंजर673702710/01/2010साधारणब्रॉड
4दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी9105अहमदाबाद- हरिद्वार मेल673709425/01/2010साधारणब्रॉड
5मेरठ छावनीगाजियाबाद8478कलिंग उत्कल एक्सप्रेस523714626/01/2010साधारणब्रॉड
6गाजियाबाददिल्ली शाहदरा9106हरिद्वार- अहमदाबाद मेल143716026/01/2010साधारणब्रॉड
7दिल्लीरोहतक1DRदिल्ली- रोहतक पैसेंजर703723004/02/2010साधारणब्रॉड
8रोहतकदिल्ली342फिरोजपुर- दिल्ली पैसेंजर703730004/02/2010साधारणब्रॉड
9दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी9105अहमदाबाद- हरिद्वार मेल673736706/02/2010साधारणब्रॉड
10हाफिजपुरमेरठ सिटी4KMखुर्जा- मेरठ पैसेंजर393740613/02/2010साधारणब्रॉड
11मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा9106हरिद्वार- अहमदाबाद मेल663747213/02/2010साधारणब्रॉड
12दिल्लीमुरादाबाद4556दिल्ली- बरेली एक्सप्रेस1613763320/02/2010साधारणब्रॉड
13मुरादाबादरामपुर3152जम्मू- कोलकाता एक्सप्रेस283766120/02/2010साधारणब्रॉड
14काठगोदामदिल्ली5014रानीखेत एक्सप्रेस2783793921/02/2010शयनयानब्रॉड
15दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी9105अहमदाबाद- हरिद्वार मेल663800527/02/2010साधारणब्रॉड
16दिल्लीरेवाडी1RDदिल्ली- रेवाडी पैसेंजर833808806/03/2010साधारणब्रॉड
17रेवाडीअलवर184भिवानी- मथुरा पैसेंजर753816306/03/2010साधारणब्रॉड
18अलवरबांदीकुई323मथुरा- बांदीकुई पैसेंजर603822306/03/2010साधारणब्रॉड
19बांदीकुईईदगाह आगरा318बांदीकुई- आगरा फोर्ट DMU1493837206/03/2010साधारणब्रॉड
20आगरा छावनीनई दिल्ली1077झेलम एक्सप्रेस1973856906/03/2010साधारणब्रॉड
21दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी9105अहमदाबाद- हरिद्वार मेल663863508/03/2010साधारणब्रॉड
22मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा304कालका- दिल्ली पैसेंजर663870108/03/2010साधारणब्रॉड
23सब्जी मण्डीचण्डीगढ4095हिमालयन क्वीन एक्सप्रेस2633896414/03/2010साधारणब्रॉड
24चण्डीगढदिल्ली2312कालका- हावडा मेल2653922916/03/2010शयनयानब्रॉड
25दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी1DSदिल्ली- सहारनपुर पैसेंजर663929519/03/2010साधारणब्रॉड
26मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा304कालका- दिल्ली पैसेंजर663936120/03/2010साधारणब्रॉड
27नई दिल्लीपानीपत3NKMनई दिल्ली- कुरुक्षेत्र ईएमयू933945427/03/2010साधारणब्रॉड
28पानीपतरोहतक4JPRजींद- रोहतक पैसेंजर723952627/03/2010साधारणब्रॉड
29रोहतकभिवानी1JKBरोहतक- भिवानी पैसेंजर503957627/03/2010साधारणब्रॉड
30भिवानीहिसार347रेवाडी- श्रीगंगानगर पैसेंजर603963627/03/2010साधारणब्रॉड
31हिसारजयपुर182हिसार- जयपुर पैसेंजर3684000427/03/2010शयनयानब्रॉड
32जयपुरजोधपुर491भोपाल- जोधपुर पैसेंजर3134031728/03/2010साधारणब्रॉड
33जोधपुरदिल्ली4060जैसलमेर- दिल्ली एक्सप्रेस6204093728/03/2010शयनयानब्रॉड
34दिल्लीदिल्ली शाहदरा1GDKईएमयू64094329/03/2010साधारणब्रॉड
35दिल्ली शाहदरामेरठ सिटी1DSदिल्ली- सहारनपुर EMU624100504/04/2010साधारणब्रॉड
36मेरठ सिटीमेरठ छावनी8477कलिंग उत्कल एक्सप्रेस44100904/04/2010साधारणब्रॉड
37मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा9106हरिद्वार- अहमदाबाद मेल664107505/04/2010साधारणब्रॉड
38दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी9105अहमदाबाद- हरिद्वार मेल664114118/04/2010साधारणब्रॉड
39दिल्ली शाहदरामुजफ्फरनगर9105अहमदाबाद- हरिद्वार मेल1184125919/04/2010साधारणब्रॉड
40देहरादूनदिल्ली शाहदरा4042मसूरी एक्सप्रेस3354159422/04/2010शयनयानब्रॉड
41दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी1DSदिल्ली- सहारनपुर EMU664166002/05/2010साधारणब्रॉड
42मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा9106हरिद्वार- अहमदाबाद मेल664172603/05/2010साधारणब्रॉड
43मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा9106अहमदाबाद मेल664179205/05/2010साधारणब्रॉड
44रेवाडीश्रीगंगानगर347रेवाडी-श्रीगंगानगर पैसेंजर4304222209/05/2010साधारणब्रॉड
45श्रीगंगानगरबठिण्डा2SHBश्रीगंगानगर- बठिण्डा पैसेंजर1274234910/05/2010साधारणब्रॉड
46बठिण्डासूरतगढ1BSBबठिण्डा- सूरतगढ पैसेंजर1424249110/05/2010साधारणब्रॉड
47मेरठ सिटीदिल्ली शाहदरा372ऋषिकेश- दिल्ली पैसेंजर624255331/05/2010साधारणब्रॉड
48लुधियानासब्जी मण्डी2716सचखण्ड एक्सप्रेस3124286508/06/2010साधारणब्रॉड
49दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी1DSदिल्ली- सहारनपुर पैसेंजर664293113/06/2010साधारणब्रॉड
50दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी1DSदिल्ली- सहारनपुर पैसेंजर664299728/06/2010साधारणब्रॉड
51मेरठ छावनीगाजियाबाद8478कलिंग उत्कल एक्सप्रेस524304930/06/2010साधारणब्रॉड
52दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी1DSदिल्ली- सहारनपुर पैसेंजर664311510/07/2010साधारणब्रॉड
53हजरत निजामुद्दीनआगरा छावनी2280ताज एक्सप्रेस1884330326/07/2010साधारणब्रॉड
54आगरा छावनीझांसी226आगरा-झांसी पैसेंजर2164351926/07/2010साधारणब्रॉड
55झांसीबीना2156भोपाल एक्सप्रेस1534367227/07/2010साधारणब्रॉड
56बीनाकोटा1738बीना- कोटा पैसेंजर3034397527/07/2010साधारणब्रॉड
57कोटाहजरत निजामुद्दीन2964मेवाड एक्सप्रेस4584443327/07/2010शयनयानब्रॉड
58दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी1DSदिल्ली- सहारनपुर पैसेंजर664449904/08/2010साधारणब्रॉड
59मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा9106अहमदाबाद मेल664456505/08/2010साधारणब्रॉड
60दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी9105हरिद्वार मेल664463116/08/2010साधारणब्रॉड
61मेरठ छावनीजयपुर9106अहमदाबाद मेल3864501716/08/2010साधारणब्रॉड
62जयपुरअजमेर202जयपुर- अजमेर पैसेंजर1344515117/08/2010साधारणब्रॉड
63अजमेरआबू रोड170अजमेर- अहमदाबाद पैसेंजर3064545717/08/2010साधारणब्रॉड
64आबू रोडअजमेर4322आला हजरत एक्सप्रेस3064576317/08/2010शयनयानब्रॉड
65अजमेरउदयपुर सिटी307अजमेर- उदयपुर पैसेंजर3004606318/08/2010साधारणब्रॉड
66उदयपुर सिटीदिल्ली सराय रोहिल्ला2982चेतक एक्सप्रेस6734673620/08/2010शयनयानब्रॉड
67दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी9105हरिद्वार मेल664680230/08/2010साधारणब्रॉड
68मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा9106अहमदाबाद मेल664686830/08/2010साधारणब्रॉड
69दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी9105हरिद्वार मेल664693402/09/2010साधारणब्रॉड
70मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा9106अहमदाबाद मेल664700002/09/2010साधारणब्रॉड
71नई दिल्लीअम्बाला छावनी2497शाने पंजाब एक्सप्रेस1994719906/09/2010साधारणब्रॉड
72अम्बाला छावनीनंगल डैम3USNअम्बाला- नंगल ईएमयू1574735606/09/2010साधारणब्रॉड
73नया नंगलचुरारू टकराला1CNAअम्बाला-चुरारू डीएमयू304738606/09/2010साधारणब्रॉड
74चुरारू टकरालाऊना हिमाचल--154740106/09/2010साधारणब्रॉड
75ओलिंडानंगल टाउनशिप--124741307/09/2010साधारणब्रॉड
76नया नंगलदिल्ली4554हिमाचल एक्सप्रेस3574777007/09/2010शयनयानब्रॉड
77दिल्लीदिल्ली शाहदरा4556दिल्ली- बरेली एक्सप्रेस64777608/09/2010साधारणब्रॉड
78मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा2DSसहारनपुर- दिल्ली पैसेंजर664784222/09/2010साधारणब्रॉड
79दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी1DMदिल्ली- मुजफ्फरनगर डीएमयू664790827/09/2010साधारणब्रॉड
80मेरठ सिटीगाजियाबाद4682जालंधर- नई दिल्ली एक्सप्रेस484795628/09/2010साधारणब्रॉड
81दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी305दिल्ली- अम्बाला पैसेंजर664802208/10/2010साधारणब्रॉड
82मेरठ छावनीदिल्ली9106अहमदाबाद मेल724809408/10/2010साधारणब्रॉड
83अम्बाला छावनीलुधियाना1ULMअम्बाला- लुधियाना ईएमयू1144820812/10/2010साधारणब्रॉड
84लुधियानाअमृतसर1AJLलुधियाना- अमृतसर ईएमयू1364834412/10/2010साधारणब्रॉड
85अमृतसरखेमकरन6AKअमृतसर-खेमकरन डीएमयू784842212/10/2010साधारणब्रॉड
86खेमकरनअमृतसर5AKखेमकरन- अमृतसर डीएमयू784850012/10/2010साधारणब्रॉड
87अमृतसरगाजियाबाद2904स्वर्ण मन्दिर मेल4934899312/10/2010साधारणब्रॉड
88गाजियाबाददिल्ली4207पदमावत एक्सप्रेस204901313/10/2010साधारणब्रॉड
89दिल्ली शाहदरारेवाडी9106अहमदाबाद मेल894910218/10/2010साधारणब्रॉड
90रेवाडीसादुलपुर493रेवाडी- हिसार पैसेंजर1424924419/10/2010साधारणब्रॉड
91सादुलपुरश्रीगंगानगर1SHRसादुलपुर- सूरतगढ पैसेंजर2464949019/10/2010साधारणमीटर
92श्रीगंगानगरहनुमानगढ0714स्पेशल पैसेंजर674955719/10/2010साधारणमीटर
93हनुमानगढसूरतगढ5609अवध असम एक्सप्रेस504960720/10/2010साधारणब्रॉड
94सूरतगढमेडता रोड199सूरतगढ- जयपुर पैसेंजर3554996220/10/2010साधारणब्रॉड
95मेडता रोडजोधपुर491भोपाल- जोधपुर पैसेंजर1045006620/10/2010साधारणब्रॉड
96जोधपुरजैसलमेर4810जोधपुर- जैसलमेर एक्सप्रेस3015036720/10/2010शयनयानब्रॉड
97जैसलमेरजोधपुर1JPJजैसलमेर- जोधपुर पैसेंजर3015066821/10/2010साधारणब्रॉड
98जोधपुरमारवाड4707रनकपुर एक्सप्रेस1045077221/10/2010साधारणब्रॉड
99मारवाडजोधपुर171अजमेर- जोधपुर पैसेंजर1045087621/10/2010साधारणब्रॉड
100जोधपुरबाडमेर5JBजोधपुर- बाडमेर पैसेंजर2105108621/10/2010साधारणब्रॉड
101बाडमेरमुनाबाव1BMबाडमेर- मुनाबाव पैसेंजर1195120522/10/2010साधारणब्रॉड
102मुनाबावबाडमेर2BMमुनाबाव- बाडमेर पैसेंजर1195132422/10/2010साधारणब्रॉड
103बाडमेरजोधपुर4JBबाडमेर- जोधपुर पैसेंजर2105153422/10/2010साधारणब्रॉड
104जोधपुरदिल्ली2462मण्डोर एक्सप्रेस6205215422/10/2010शयनयानब्रॉड
105दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी9105हरिद्वार मेल665222025/10/2010साधारणब्रॉड
106दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी9105हरिद्वार मेल665228606/11/2010साधारणब्रॉड
107मेरठ छावनीनई दिल्ली4682जालंधर- नई दिल्ली एक्सप्रेस785236407/11/2010साधारणब्रॉड
108दिल्ली शाहदरामुजफ्फरनगर9105हरिद्वार मेल1185248215/11/2010साधारणब्रॉड
109हरिद्वारलक्सर4042मसूरी एक्सप्रेस275250919/11/2010साधारणब्रॉड
110लक्सरसहारनपुर3005हावडा- अमृतसर मेल535256220/11/2010साधारणब्रॉड
111सहारनपुरमेरठ छावनी2DNSसहारनपुर- दिल्ली पै1105267220/11/2010साधारणब्रॉड
112मेरठ छावनीदिल्ली9105अहमदाबाद मेल725274420/11/2010साधारणब्रॉड
113दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी305दिल्ली- अम्बाला पैसेंजर665281029/11/2010साधारणब्रॉड
114मेरठ छावनीनया गाजियाबाद304कालका- दिल्ली पैसेंजर445285430/11/2010साधारणब्रॉड
115गाजियाबाददिल्ली शाहदरा5GDईएमयू145286801/12/2010साधारणब्रॉड
116दिल्ली शाहदरामेरठ सिटी305दिल्ली- अम्बाला पैसेंजर625293006/12/2010साधारणब्रॉड
117मेरठ सिटीमुजफ्फरनगर4317इंदौर- देहरादून एक्सप्रेस565298606/12/2010साधारणब्रॉड
118दिल्ली शाहदरागाजियाबाद2HHDईएमयू145300009/12/2010साधारणब्रॉड
119गाजियाबाददिल्ली शाहदरा2GDPईएमयू145301410/12/2010साधारणब्रॉड
120दिल्ली शाहदरामेरठ छावनी9105हरिद्वार मेल665308015/12/2010साधारणब्रॉड
121मेरठ छावनीदिल्ली शाहदरा9106अहमदाबाद मेल665314615/12/2010साधारणब्रॉड
122दिल्ली शाहदरासहारनपुर51911दिल्ली- सहारनपुर पैसेंजर1595330521/12/2010साधारणब्रॉड
123सहारनपुरबामनहेडी54542अम्बाला- मेरठ पैसेंजर545335921/12/2010साधारणब्रॉड
124बामनहेडीऋषिकेश54471दिल्ली- ऋषिकेश पैसेंजर1575351621/12/2010साधारणब्रॉड
125ऋषिकेशमेरठ छावनी54472ऋषिकेश- दिल्ली पैसेंजर2125372822/12/2010साधारणब्रॉड
126मेरठ छावनीनई दिल्ली14682जालंधर- नई दिल्ली एक्सप्रेस785380623/12/2010साधारणब्रॉड

नोट: दूरी दो-चार किलोमीटर ऊपर-नीचे हो सकती है।
भूल चूक लेनी देनी

कुछ और तथ्य:
कुल यात्राएं: 424 बार
कुल दूरी: 53806 किलोमीटर

पैसेंजर ट्रेनों में: 19894 किलोमीटर (231 बार)
मेल/एक्सप्रेस में: 19819 किलोमीटर (153 बार)
सुपरफास्ट में: 14093 किलोमीटर (40 बार)

ब्रॉड गेज से: 52834 किलोमीटर (415 बार)
मीटर गेज से: 735 किलोमीटर (7 बार)
नैरो गेज से: 237 किलोमीटर (2 बार)

बिना आरक्षण के: 37598 किलोमीटर (396 बार)
शयनयान (SL) में: 16208 किलोमीटर (28 बार)

1000 से 3999 किलोमीटर तक: 4 बार
500 से 999 किलोमीटर तक:  8 बार
100 से 499 किलोमीटर तक: 136 बार
50 से 99 किलोमीटर तक (अर्द्धशतक): 174 बार

किस महीने में कितनी यात्रा
महीनापैसेंजरमेल/एक्ससुपरफास्टकुल योग
जनवरी822618321472
फरवरी83584201677
मार्च180417493713924
अप्रैल172320189274668
मई210610863573549
जून918133640186272
जुलाई142416678833974
अगस्त2363215422976814
सितम्बर110612191992524
अक्टूबर42443780387111895
नवम्बर945135402299
दिसम्बर1604199611384738