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Sunday, March 4, 2012

मावली - मारवाड मीटर गेज ट्रेन यात्रा

7 फरवरी 2011, अलार्म बजा और मेरी आंख खुली। गाडी किसी स्टेशन पर खडी थी। देख लेते हैं कि कौन सा स्टेशन है। अरे, यह तो मावली है, उतर भई, जल्दी उतर। मैं मावली में उतर गया, गाडी उदयपुर की तरफ चली गई। मावली से सुबह साढे छह बजे एक पैसेंजर ट्रेन मारवाड के लिये चलती है। यह लाइन मीटर गेज है और 1936 में शुरू हुई थी। यह राजस्थान और भारत की उन गिनी चुनी मीटर गेज लाइनों में से एक है जो अभी भी परिचालन में हैं और कभी भी गेज परिवर्तन के लिये बन्द हो सकती हैं। 

फरवरी में सुबह साढे छह बजे अन्धेरा होता है। अन्धेरे में गाडी अपने निर्धारित समय पर चल पडी। मुझे उम्मीद थी कि गाडी में पूरी यात्रा के दौरान ज्यादा भीड नहीं होगी क्योंकि पूरी 152 किलोमीटर की यात्रा में कोई बडा शहर नहीं पडता। ले-देकर कांकरोली को अपवाद माना जा सकता है। इसलिये मावली से कांकरोली तक ट्रेन में सर्वाधिक भीड रही और यह इतनी थी कि आराम से सीटों पर पडकर सोया जा सकता था।
मावली से निकलने के बाद थामला मोगाना के बाद आता है- नाथद्वारा। यह वही नाथद्वारा है जिसे अक्सर उदयपुर जाने वाले पर्यटक अपनी लिस्ट में रखते हैं। मैं भी पहले कभी उदयपुर गया था तो नाथद्वारा भी हो आया था। मावली से नाथद्वारा तक छोटी लाइन के साथ-साथ बडी लाइन भी बिछी हुई है लेकिन इस पर किसी गाडी के चलने का निशान नहीं मिला। पहले तो मुझे लगा कि शायद गेज परिवर्तन का काम शुरू हो चुका है, इसलिये छोटी लाइन के बराबर-बराबर में बडी लाइन बिछाई जा रही है और एक दिन दस पन्द्रह दिन लाइन को बन्द करके बडी लाइन चालू कर दी जायेगी। बताया जाता है कि जोधपुर से जैसलमेर तक 300 किलोमीटर की लाइन को गेज परिवर्तन करने के लिये 10-15 दिन तक ही बन्द किया गया था। ऐसा तभी सम्भव हो सकता है कि अगर छोटी लाइन के साथ साथ बडी लाइन भी बिछा दी गई हो। बाद में छोटी लाइन को उखाडकर बडी लाइन को चालू कर दिया जाता है। मध्य प्रदेश में जबलपुर- बालाघाट नैरो गेज लाइन पर भी यही हो रहा है। बडी लाइन के लिये सभी पुल बन चुके है, ज्यादातर लाइन बिछाई भी जा चुकी है और एक दिन मात्र कुछ दिनों के लिये नैरो गेज को बन्द कर दिया जायेगा और पांच-चार दिन बाद ही बडी लाइन खुल जायेगी। 

मावली से नाथद्वारा तक छोटी लाइन के साथ साथ बडी लाइन बिछी देखकर मुझे भी यही लगा लेकिन नाथद्वारा के बाद बडी लाइन कहीं नहीं मिली। नाथद्वारा तक बडी लाइन क्यों बिछाई गई है, इस पर ट्रेन के चलने का निशान भी नहीं है। यह भी हो सकता है कि गेज परिवर्तन शुरू हो चुका हो और बाद में किसी कारणवश काम बन्द कर दिया गया हो। 

नाथद्वारा के बाद बेजनाल और कांकरोली। कांकरोली राजसमन्द जिले में पडता है। पहले सभी स्टेशनों के नाम बता देता हूं, फिर कुछ और अनुभव बताऊंगा- मावली जंक्शन, थामला मोगाना, नाथद्वारा, बेजनाल, कांकरोली, सोनियाणा मेवाड, कुआरिया, लावा सरदारगढ, चारभुजा रोड, खारा कमेरी, कुंवाथल, दौला जी का खेडा, देवगढ मदारिया, खामली घाट, गोरम घाट, फुलाद, मारवाड रानावास और मारवाड जंक्शन। 

इस लाइन पर जितने भी मानवरहित क्रॉसिंग पडते हैं, सभी पर एक अनोखी घटना घटती है। ट्रेन क्रॉसिंग से पहले रुकती है, ड्राइवर सडक के दोनों तरफ देखता है कि कोई वाहन तो नहीं आ रहा, सन्तुष्ट होने पर सीटी बजाकर गाडी को आगे बढा देता है। इसके लिये रेलवे लाइन पर फाटक से पहले ड्राइवर के लिये चेतावनी भी लिखी है कि ठहरिये और सावधानी से चलिये। ऐसा मैंने और कहीं नहीं देखा। 

कुवारिया स्टेशन का नजारा तो और भी मजेदार था। वहां प्लेटफार्म पर मुख्य गेट के पास ही एक तालाबन्द बक्सा रखा हुआ था। बक्सा एक पत्थर पर रखा था और डण्डे के सहारे टिका था। मैं सोचने लगा कि यह क्या मामला है। तभी एक आदमी आया और उसके पास दूसरे पत्थर पर बैठ गया और बक्सा खोल दिया। वह बक्सा टिकट काउण्टर था। उसमें गत्ते वाले टिकट थे लेकिन वहां टिकट पर तारीख डालने वाली पंच मशीन नहीं थी इसलिये वो काम पेन से कर दिया जाता था। है ना मजेदार! 

और दौला जी का खेडा पर तो वह भी नहीं था। यहां टिकट देने की जिम्मेदारी ट्रेन के गार्ड की होती है। गार्ड अपने साथ ही टिकट रखता है। जैसे ही गाडी स्टेशन पर पहुंचती है, गार्ड के डिब्बे पर भीड इकट्ठी हो जाती है, पांच-दस मिनट लगें या दस-पन्द्रह मिनट, जब तक सभी को टिकट नहीं मिल जाते, गार्ड ट्रेन को नहीं चलने देता। ऐसा नजारा मैंने पहले भी दो-तीन जगह देखा है। 

दस बजे गाडी खामली घाट पहुंचती है। यहां से घाट सेक्शन शुरू होता है जो 21 किलोमीटर आगे फुलाद तक चलता है। घाट सेक्शन पहाडियों वाले सेक्शन को कहते हैं। इसमें पुलों और सुरंगों की भरमार होती है। खामली घाट पर गाडी काफी देर तक रुकी रही, मैंने खाना खाया और घाट का आनन्द लेने के लिये कैमरा संभाल लिया। यहां एक बोर्ड भी लगा है कि घाट यहां से शुरू होता है। 

अगर मानसून या मानसून के बाद का समय होता तो जबरदस्त हरियाली से ढकी पहाडियां देखने को मिलतीं लेकिन अब सर्दियों में हर तरफ पीली सूखी घास का साम्राज्य होता है तो पहाडियां बडी सूखी और बेजान सी दिख रही थीं। यहां दो सुरंगें भी हैं और पुलों की तो कोई गिनती ही नहीं है। अभी तक मार्ग उत्तर-पश्चिम की तरफ था, घाट खण्ड में एक ऐसा मोड आता है कि यात्रा की दिशा दक्षिण की ओर हो जाती है। यहीं एक स्टेशन गोरम घाट भी है। 

यहां लंगूरों की भरमार है। जैसे ही ट्रेन आती है तो लंगूर ट्रैक के आसपास इकट्ठे हो जाते हैं, यात्री उन्हें रोटी डालते रहते हैं। अगर किसी कारणवश गाडी रुक जाती है तो लंगूर डिब्बों में अन्दर भी घुस जाते हैं। लेकिन बन्दरों की तरह लंगूर उत्पाती नहीं होते, तो उनका डिब्बों में घुसना सवारियों के मनोरंजन का साधन बन जाता है। 

फुलाद जाकर घाट खण्ड खत्म होता है। फुलाद एक अलग तरह का स्टेशन है। यहां गाडियां रिवर्स होती हैं यानी इंजन एक तरफ से हटकर दूसरी तरफ लगाना पडता है और गाडी जिस दिशा से आई थी, उसी दिशा में वापस चल पडती है, हालांकि आगे चलकर अलग ट्रेक पकड लेती है। इसकी टक्कर के मैंने अभी तक कुछ ही स्टेशन देखे हैं और उनमें से एक है पोखरन। हालांकि भारत में लगभग हर जंक्शन पर कुछ गाडियां रिवर्स होती हैं लेकिन यह जंक्शन नहीं है। इस श्रेणी में रखे जाने लायक सबसे बडा स्टेशन है- हावडा। ओडिशा में तालचेर भी एक ऐसा ही स्टेशन है। पठानकोट भी ऐसा ही है। लेकिन हावडा, तालचेर, पठानकोट के मुकाबले फुलाद, पोखरन इस मायने में अलग हैं कि यहां से कोई गाडी टर्मिनेट नहीं होती। हावडा, तालचेर, पठानकोट और पोखरन में एक बाइपास लाइन भी है जबकि फुलाद में नहीं है। 

फुलाद से मारवाड जंक्शन ज्यादा दूर नहीं है। मारवाड से मेरे पहुंचने के बाद दिल्ली के लिये एक ही ट्रेन है हरिद्वार मेल और उसमें सैंकडों की वेटिंग चल रही थी, इसलिये मैंने अपना रिजर्वेशन जोधपुर से दिल्ली तक जैसलमेर इण्टरसिटी से कराया था। और यहां से जोधपुर भी ज्यादा दूर नहीं है, आराम से नौ बजे तक मैं जोधपुर चला गया था।

नाथद्वारा रेलवे स्टेशन

कांकरोली स्टेशन

मानव रहित फाटक- ठहरिये और सावधानी से चलिये। यह चेतावनी ट्रेन के ड्राइवरों के लिये है।

सोनियाणा मेवाड रेलवे स्टेशन की इमारत।

कुआरिया स्टेशन का टिकटघर

चार भुजा रोड

मीटर गेज रेल लाइन

दौला जी का खेडा स्टेशन पर भीड

दौला जी का खेडा पर ट्रेन का गार्ड टिकट बांटता हुआ

खामली घाट रेलवे स्टेशन- घाट सेक्शन यहां से शुरू होता है।

खामली घाट पर गाडी काफी देर तक खडी रही।

अब शुरू होता है घाट यानी पहाडियों का सेक्शन।

इस लाइन का सबसे बडा आकर्षण यही सेक्शन है।

अच्छा-खासा ढलान है।

गाडी का इंटीरियर और सवारियां भी घाट के मजे ले रही हैं। अन्दाजा लगा लो कि ट्रेन में कितनी भीड रही होगी।

मानसून होता तो आनन्द कई गुना बढ गया होता।

यह एक साइडिंग है यानी जरुरत पडने पर या फिर आपातकाल में किसी गाडी को इधर साइड में खडा किया जा सकता है।

रास्ते में दो सुरंगें भी है। 

घाट सेक्शन



यह है दूसरी सुरंग

सामने दाहिनी ओर कुछ घर दिख रहे हैं। वो गोरम घाट स्टेशन है।

ऊंचे ऊंचे पुल और सभी के सभी घुमावदार।

बडा रोमांचक अनुभव होता है ऐसे पुलों पर गुजरते समय।

मौका मिलते ही लंगूरों की फौज भी ट्रेन पर धावा बोल देती है।

डिब्बे के अन्दर भी घुस जाते हैं ये लंगूर।

बहुत दूर दूर तक खिडकी पर लटके लटके भी चले जाते हैं।

गोरम घाट स्टेशन।

गोरम घाट स्टेशन।

लंगूरों की फौज- याद रखिये कि ये बन्दर नहीं हैं। बडे ही शान्त स्वभाव के होते हैं लंगूर।



गोरम घाट के पास एक पुल।

राजस्थानी ताऊ।

फरवरी के शुरूआती दिन थे, इसलिये सर्दी रोधक कपडे पहन रखे हैं।

फुलाद स्टेशन। यहां से गाडी रिवर्स में चलती है। यानी इंजन दूसरी तरफ लगाया जाता है।

फुलाद से मावली जाने वाली लाइन। पता नहीं फोटोग्राफी पर प्रतिबन्ध क्यों लगा देते हैं।

फुलाद से मावली जाने वाली लाइन। हम अभी उसी से होकर आये हैं।

और आखिर में मारवाड जंक्शन। यात्रा खत्म।

25 comments:

  1. इस रूट का घाट व बंदर वाला सेक्सन देखने लायक जगह है।

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  2. वाह तो यही है वह जगह जिसके चलते हर राजस्थानी को मारवाड़ी पुकारा जाता है

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  3. ताजगी देती यात्रा.

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  4. आपके फ़ोटो से सब घूम लिये ।

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  5. मन खुश हो गया, एक अन छुई, एक अन देखी यात्रा, एक असली भारत की सैर।

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  6. बेहतरीन पोस्ट नीरज भाई । यार आपसे यूं ही रश्क नहीं होता अपने बस में होता तो आपही के साथ लटक के हम भी यूं जिंदगी देखते । चलिए आपकी इस पोस्ट को ले जा रहा हूं ...अपने पास सहेजने और दोस्तों से बांटने के लिए । शुक्रिया बहुत बहुत शुक्रिया

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  7. दिल खुश हो गया भाई,
    इतनी सुन्दर पोस्ट, अपनी तो शाम बन गयी..
    बहुत दिन से ईच्छा है की कहीं घूमने निकलूं..
    फिर जैसा अजय भिया ने कहा, की आपसे यु ही रश्क नहीं होता.. :)

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  8. बहुत नोस्टालजिक पोस्ट है दोस्त.. यह वही समझ सकेगा जिसने बचपन में छोटी लाईन पर सफर किया होगा.

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  9. ऐसा ही घाट हम बचपन से कोटा आने के पहले देखा करते हैं जिसे 'दर्रा - घाट ' भी कहते हैं ...कुछ -कुछ ऐसा ही हैं ...बंदरो की टोली अक्सर घाटों पर विराजमान रहती हैं ..फोटू जोरदार हैं ..नाथ द्वारा बचपन में गई थी अब तो स्म्रतिया भी शेष नहीं बची ...

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  10. Memorable post for long time sir! happy colorful holy

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  11. बहुत बढ़िया वर्णन नीरज जी....
    अच्छी जानकारी दी आपने हैं.....
    हम तो नाथद्वारा उदयपुर से बस क द्वारा गए थे...अगर ट्रेन का पहले से पता होता तो इस सुन्दर यात्रा का लाभ हमें भी मिलता...

    नीरज जी आपको और आपके परिवार को हमारे ओर से होली की बहुत-बहुत शुभकामनाये......
    रीतेश.....

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  12. Are Neeraj bhai, bade charche sune hain is 21 Km (Khambli Ghat se Phulad tak) ki romanchak rail yatra ke, aur aaj dekh bhi liya is post ke jariye. Ab toh bas mauka doondh raha hun is shandar yatra ke maje lene ka....

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  13. Neeraj ji, itni sundar post hetu dhanyawad. Mavli se Nathdwara tak broad gauge line , Nathdwara ko Mumbai, Delhi itayadi se jodne hetu dali gayi he parntu iss route par koi train itne time baad bhi shuru nahi huyee he nahi hi ise abhi aage badhane ki koi yojna he.

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  14. बहुत अच्छे. काफी सारी रेल वेबसाइट देखने के बाद आपकी ये साईट हाथ आई. अब आपने बता ही दिया है की आपके पास काफी स्टेशन का डाटाबेस है तो कृपया गोरम घाट स्टेशन की ऊँचाई आपके पास नोट हो तो बताने का कष्ट करें. धन्यवाद. और आगे भी नयी यात्रा जारी रखें.

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    1. खामली घाट- 647 मीटर
      गोरम घाट- 473.35 मीटर
      फुलाद- 352.8 मीटर

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    2. Kudos Bro. वैसे आपको तो रेलवे ट्रेफिक डिपार्टमेंट में होना था. रेलवे का बहुत भला हो जाता. सबसे अच्छी बात यह की आपने खामली घाट की ऊंचाई भी बताकर संशय दूर कर दिया.

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  15. आपकी मीटर गेज यात्राओं का वृत्तांत काफी आकर्षक है. में यह पूछना चाहता हूँ की क्या आपने मध्यप्रदेश में ग्वालियर - सबलगढ़ मीटर गेज तथा श्योपुर मीटर गेज पर यात्राएं की है क्या. यदि की हैं तो उनका वृत्तान्त कहाँ मिलेगा क्यूंकि में धुंध नही पा रहा हूँ. और यदि नहीं किया तो जरुर करें ताकि चम्बल के बीहड़ों का रोमांच भी हमारे पढ़ने में आ जाये.

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    1. नहीं, मैंने अभी तक ग्वालियर-श्योपुर लाइन पर यात्रा नहीं की है।
      जल्दी ही करूंगा उस लाइन पर भी यात्रा।

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  16. एक बात और. आपकी साईट के दर्शक अच्छे खासे हो गए हैं. आप google adsense से साईट पर एड क्यूँ नहीं ले लेते. बैठे बैठे कुछ इनकम हो जायेगी तो यात्रा का खर्च भी निकलेगा. अभी के पेज व्यूस को देखते हुए २०० रु. रोजाना के हो सकते हैं...

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  17. बहुत ही बढ़िया वृतांत

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  18. नीरजजी अगर कभी भी जाना हुआ तो में ये सफ़र जरुर करूँगा, क्योकि पहाडियों और घुमावदार दर्रोने मन मोह लिया,

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  19. bahut hi badiya...aanand aa gaya photos aur article padh ke

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