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Thursday, August 16, 2012

भारत परिक्रमा- पहला दिन

8 अगस्त 2012 की सुबह मैं नाइट ड्यूटी से निपटकर घर पहुंचा। आज रात पौने बारह बजे जैसे ही नई दिल्ली से पूर्वोत्तर सम्पर्क क्रान्ति रवाना होगी, तभी अपनी भारत परिक्रमा शुरू हो जायेगी। बडा उत्साह था इस मेगा यात्रा को शुरू करने का। कभी इतनी लम्बी ना तो रेल यात्रा की और ना ही कोई और यात्रा। 12000 किलोमीटर से भी ज्यादा की यात्रा होगी यह।
कोई जल्दी तो थी नहीं मुझे ट्रेन पकडने की। घर जाकर सो गया। दोपहर को उठा तो रातभर के जागरण की थकान मिट गई थी। बाहर देखा तो बारिश पड रही थी। दिल्ली में पिछले कई दिन से मौसम अच्छा है। भले ही अभी तक बारिश ने वो मानसून वाला रूप ना दिखाया हो, लेकिन बादल बडे मेहरबान हैं। हल्की फुल्की फुहार भी समय-बेसमय हो जाती है। इस समय भी फुहार हो रही थी।
अमित का फरमान आया कि तू इतने दिनों के लिये जा रहा है, मुझे भूखा मरना पडेगा। असल में जब अमित नहीं होता तो मैं भूखा मरता हूं और जब मैं नहीं होता तो अमित भूखा मरता है। दोनों साथ होते हैं तो साथ ही खाना बनाते हैं। अगर दोनों में से एक नहीं होगा तो खाना नहीं बनेगा। फिर या तो भूखे ही गुजारा करते हैं या दूध ब्रेड से पेट भरते हैं।
अमित ने कहा कि मेरे चले जाने से उसे भूखा मरना है। तो क्यों ना कुछ स्पेशल करके जा। बाहर मौसम भी स्पेशल है, यहां भी कुछ स्पेशल बनना चाहिये। पकौडे बनाते हैं। हमने कल ही दो किलो आलू की पकौडी बनाई थी, बढिया बनी थी। दो टाइम का काम चल गया था हम दोनों का। आज प्याज की पकौडी बनाते हैं। मैंने यह प्रस्ताव मंजूर कर लिया। घण्टे भर में आधा किलो प्याज की पकौडी तैयार थी। अमित ने चाय बनाई और पकौड-भोज तैयार।
तीन जोडी कपडे बैग में रख लिये। एक जोडी पहनकर निकलूंगा। ट्रेनों में शरीर में चिपचिपाहट ज्यादा हो जाती है, तो कपडों की बहुत जल्दी ऐसी तैसी होने लगती है। इसलिये बारह दिनों के लिये चार जोडी कपडे रखे गए। बाकी जरूरी सामान, कैमरा, चार्जर, बिस्कुट-नमकीन के पैकेट भी ले लिये गये।
अपने एक दोस्त हैं- डॉक्टर साहब। एमबीबीएस हैं, अब आईएएस की तैयारी कर रहे हैं। गर्व होता है अगर इतने पढे लिखे लोग अपने दोस्तों की श्रेणी में आते हैं। हम तो काला अक्षर ही रह गये। और जान-पहचान कैसे हुई- यह भी एक बढिया किस्सा है। चलो, सुना देता हूं।
एक बार रात को तीन बजे मैं indiamike.com पर ऑनलाइन था। वहां मैं अपनी तरफ से कुछ नहीं लिखता हूं, लेकिन फोरम में अगर कोई कुछ पूछता है तो बाकी जानकारों की तरह मैं भी कुछ बता देता हूं। एक बन्दे ने पूछा कि- मैंने नई साइकिल ली है। बढिया महंगी वाली गियर वाली साइकिल है, दिल्ली में रहता हूं। कोई ऐसी जगह बताइये जो दिल्ली के आसपास हो और दिनभर में साइकिल से लौट-फेर हो सके। मैंने तुरन्त उन्हें जवाब दिया कि सुल्तानपुर चले जाओ। गुडगांव के पास है और बर्ड सेंचुरी है। सेंचुरी नहीं, नेशनल पार्क है- हरियाणा का एकमात्र नेशनल पार्क।
मेरा यह जवाब पढकर फिर उनके कुछ मैसेज आये और तुरन्त फोन नम्बरों की अदला-बदली हो गई। रात को ही फोन पर बात हुई और वे बोले कि मैं शास्त्री पार्क यानी तुम्हारे ठिकाने पर आ रहा हूं।
साढे चार बजे के करीब महाराज हमारे यहां आ धमके। वे डॉक्टर साहब थे। फिर तो आना-जाना शुरू हो गया। एक बार मेरे साथ मेरठ भी घूम आये। एक दिन वे अपनी साइकिल को हमारे यहां लेकर आये। लेकर आ तो गये लेकिन किसी कारण से साथ नहीं ले जा पाये। अगले दिन उनका फोन आया कि वे साइकिल लेने आ रहे हैं। और अगले दिन वे नहीं आये, उनका फोन भी बन्द। पूरे दस दिन हो गये, लेकिन महाराज का कुछ नहीं पता। फोन भी नहीं मिल रहा था। दिमाग में सबसे पहले यही आया कि डॉक्टर खत्म। लेकिन मन कह रहा था कि नहीं, डॉक्टर इतनी जल्दी खत्म होने वालों में नहीं है। फिर भी दिमाग ने सारी मित्र मण्डली में बात फैला दी कि डॉक्टर खत्म हो गया है और साइकिल अपनी हो गई है।
आखिरकार मन की बात सत्य निकली। डॉक्टर अचानक प्रकट हो गया। प्रकट होते ही हाल-चाल कुछ नहीं पूछा, सीधे पूछा कि साइकिल ठीक तो है ना। दिमाग हैरान रह गया। अरे डॉक्टर, तू तो खत्म हो गया था, अब कहां से आ गया। महाराज ने वही कहा जो कई दिनों से मन कहता आ रहा था कि डॉक्टर इतनी जल्दी खत्म होने वालों में नहीं है।
और आज फोन आया कि वो मुझे नई दिल्ली विदा करने आयेगा। मैंने समझाया कि यार, मेरा तो हमेशा का आना-जाना लगा रहता है। रात पौने बारह बजे की ट्रेन है। तुझे वापस जाने के लिये मेट्रो भी नहीं मिलेगी। बोला कि साढे दस बजे नई दिल्ली मेट्रो पर आ जाना, वही से विदा कर दूंगा। मेरे कान बजने लगे कि आज तक मुझे विदा करने कोई नहीं आया, तो यात्रा सही सलामत पूरी हो जाती थी। आज पहली बार लम्बी यात्रा पर जा रहा हूं और डॉक्टर महाराज विदा करने पर तुला हुआ है। इस बार जरूर कुछ भयंकर होने वाला है। चलो खैर, देखा जायेगा।
मैं हमेशा लेट होने वालों में रहा हूं। बल्कि कहना चाहिये लेट-लतीफों का अगर कोई कम्पटीशन होगा तो उसमें जाटराम अव्वल रहेगा। सामाजिक-आर्थिक-पारिवारिक हर मामले में लेट। यार-दोस्त समझाते समझाते हार मानने की कगार पर खडे हैं लेकिन जाटराम को सही टाइम पर नहीं ला सके। यात्राओं में बस और ट्रेन छूट जाना तो आम बात है।
लेकिन आज डॉक्टर की वजह से मुझे कम से कम आधे घण्टे पहले ही नई दिल्ली स्टेशन पर पहुंचना पडेगा। पौने ग्यारह बजे मैं मेट्रो स्टेशन पर पहुंचा, डॉक्टर से मुलाकात की। अब अगला डॉक्टर है तो बिना गोली दवाई के तो छोडेगा नहीं। पुदीन हरे की कई गोलियां, पोलो मिण्ट, ऑर्बिट चूंगम और नमकीन का एक पैकेट मेरे हवाले कर दिया। भगवान करे कि मुझे पुदीन हरे की जरुरत ना पडे, बाकियों को तो बिना जरुरत के ही सूड जाऊंगा।
साढे ग्यारह बजे तक डॉक्टर को अच्छी तरह विदा करके मैं नई दिल्ली स्टेशन पर पहुंचा। देखने लगा कि अपनी ट्रेन किस प्लेटफार्म पर खडी है। प्लेटफार्म का पता चला तो मेरी जगह कोई संवेदनशील व्यक्ति होता तो जरूर पुदीने की गोलियों की जरुरत पड जाती। लेकिन इस बला पर कोई असर नहीं हुआ।
ट्रेन आज पौने ग्यारह की बजाय सुबह साढे चार बजे जायेगी। यानी पौने पांच घण्टे लेट।
तभी निगाह पडी कि नई दिल्ली से रीवा जाने वाली ट्रेन सही समय पर छूटेगी। मैं पहुंचा प्लेटफार्म नम्बर एक पर। सबसे पहले निगाह पडी टीटी-घर पर, जा घुसा उसमें ही। टीटियों ने मेरे irctc वाले टिकट को देखते ही कहा कि एक गाडी के लेट हो जाने पर उसकी बजाय दूसरी गाडी में केवल उन्हीं लोगों को परमीशन दी जाती है जिनके पास रेलवे वाला टिकट होता है। यानी मैं रीवा वाली ट्रेन से नहीं जा सकता।
असल में मैंने पूर्वोत्तर सम्पर्क क्रान्ति से दो रिजर्वेशन करा रखे थे- एक तो नई दिल्ली से इलाहाबाद और दूसरा इलाहाबाद से गुवाहाटी। मैं पहले टिकट पर रीवा एक्सप्रेस से इलाहाबाद जाना चाहता था। वहां संगम में स्नान करके दोपहर बाद अपनी लेट आने वाली पूर्वोत्तर एक्सप्रेस को पकड लेता। इलाहाबाद के बाद दूसरा टिकट काम आता। था ना धांसू आइडिया!
यहां से मनाही हो जाने पर मैं पहुंचा वेटिंग रूम में। एक जगह पंखे के नीचे पन्नी बिछाई, चार बजे का अलार्म लगाया और सो गया। मस्त नींद आई।
मुझे परेशान होने की जरुरत इसलिये नहीं थी क्योंकि गुवाहाटी में करीब बारह घण्टे का मार्जिन मिल रहा था इस ट्रेन के पहुंचने में और अगली ट्रेन के चलने में। अभी तो यह ट्रेन पांच घण्टे ही लेट हुई है। इसके बाद भी सात घण्टे बचते हैं। फिर भी अगर दो चार घण्टे लेट हो जायेगी, तब भी परेशानी की बात नहीं है। फरक बस इतना पडेगा कि मैं गुवाहाटी में नहीं घूम सकूंगा। कामाख्या देवी के दर्शन करने की इच्छा थी, वो पूरी नहीं सकेगी। इतना ही फरक पडेगा बस।
ट्रेन से भारत परिक्रमा यात्रा
1. भारत परिक्रमा- पहला दिन
2. भारत परिक्रमा- दूसरा दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. भारत परिक्रमा- तीसरा दिन- पश्चिमी बंगाल और असोम
4. भारत परिक्रमा- लीडो- भारत का सबसे पूर्वी स्टेशन
5. भारत परिक्रमा- पांचवां दिन- असोम और नागालैण्ड
6. भारत परिक्रमा- छठा दिन- पश्चिमी बंगाल व ओडिशा
7. भारत परिक्रमा- सातवां दिन- आन्ध्र प्रदेश व तमिलनाडु
8. भारत परिक्रमा- आठवां दिन- कन्याकुमारी
9. भारत परिक्रमा- नौवां दिन- केरल व कर्नाटक
10. भारत परिक्रमा- दसवां दिन- बोरीवली नेशनल पार्क
11. भारत परिक्रमा- ग्यारहवां दिन- गुजरात
12. भारत परिक्रमा- बारहवां दिन- गुजरात और राजस्थान
13. भारत परिक्रमा- तेरहवां दिन- पंजाब व जम्मू कश्मीर
14. भारत परिक्रमा- आखिरी दिन

10 comments:

  1. कभी-कभी आपसे ईर्ष्‍या करने को जी चाहता है। :)
    हार्दिक शुभकामनाएं।
    ............
    कितनी बदल रही है हिन्‍दी !
    विश्‍वविख्‍यात पक्षी वैज्ञानिक की अतुलनीय पुस्‍तक।

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  2. शुभयात्रा नीरज जी, वन्देमातरम..

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  3. पांच घंटे पन्नी बिछा कर सो गए . खाना अमित के साथ खाते हो ..... हम साथ चल रहें हैं भूखा नहीं मारना .... प्रायोजक श्री शर्मा जी का धन्यवाद
    आज कल स्टेशन पर सी ऑफ का चक्कर चल रहा है

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  4. http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/08/2012_14.html यहां पर आप प्रकाशित हैं अपने ब्‍लॉग के साथ। इसे कापी करके देख लीजिएगा और संजो लीजिएगा।

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  5. दो भागों में टिकट लेने विचार अच्छा लगा..

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  6. नीरज जी कृपा इस लिंक को चेक करे ये लिंक आप को घुम्मकड़ी के लिए और भी प्रेरणा देगा....
    http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2012/08/120814_gunther_holtorf_road_trip_gallery_ar.shtml

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  7. यात्रा की तयारी तो बढिया रही । दो टिकट का आयडिया भी पसंद आया ।
    मैने कन्याकुमारी वाला भाग पढा और फिर यहां आई । वहां टिप्पणी बॉक्स नही मिला ।आपका वृत्तांत पढ कर अपना कई साल पहले की कगई यात्रा याद आई तब यह बाबा की मूर्ती नही थी । और आपके जैसा कैमेरा भी नही था जो इतने सुंदर चित्र संजोते ।

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  8. भाई आपका लेख पढ़कर मजा आ गया मुझे भी घूमना फिरना बहुत अच्छा लगता है आपका बहुत बड़ा प्रसंशक मैं अब रोज आपका ब्लाग देखता हु

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