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Wednesday, February 13, 2013

चादर ट्रेक- गुफा में एक रात

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19 जनवरी 2013
आज शनिवार है। लेह वाली बस कल आयेगी। सुबह के दस बजे हैं, अभी अभी सोकर उठा हूं। हालांकि आंख तो दो घण्टे पहले ही खुल गई थी, लेकिन बस पडा रहा। घरवाले भी थोडी थोडी देर बाद दरवाजा खोलकर झांककर चले जाते हैं कि महाराज उठेगा तो चाय-नाश्ता परोसेंगे। उन्हें झांकते देखते ही तुरन्त अपनी आंख मीच लेता हूं। भारी भरकम पश्मीना कम्बल और उस पर रजाई; दोनों के नीचे दबे होने में एक अलग ही आनन्द मिल रहा है।
साढे दस बजे उठ गया। तुरन्त चाय और रोटी आ गई। आज एक अलग तरह की रोटी बनी है। राजस्थान में जैसी बाटी होती है, उससे भी मोटी। लकडी की आग और अंगारों की कमी तो है नहीं, अच्छी तरह सिकी हुई है। इसे मक्खन और जैम के साथ खाया।
आज का लक्ष्य है कि ग्रामीण जनजीवन को देखूंगा, कुछ फोटो खींचूंगा।
अचानक अन्तरात्मा ने आदेश दिया- नेरक चलो। यह आदेश इतना तीव्र और तीक्ष्ण था कि शरीर के किसी भी अंग को संभलने और बचाव करने का मौका भी नहीं मिला। सभी ने चुपचाप इस आदेश को मान लिया। हालांकि पैरों ने कहा भी कि दर्द हो रहा है लेकिन आत्मा ने फौरन कहा- चुप।
नेरक चिलिंग से करीब चालीस किलोमीटर आगे जांस्कर किनारे एक गांव है। आठ किलोमीटर तक सडक बनी है, उसके बाद पगडण्डी है। यह पगडण्डी बर्फ के नीचे दबी है, इसलिये जमी हुई नदी के ऊपर से जाना होता है। यही चादर ट्रेक है।
मेरी वापसी पच्चीस तारीख को है। इस प्रकार मेरे हाथ में अभी भी छह दिन हैं। चार दिन में बडे आराम से नेरक से लौटकर वापस आ सकता हूं। घरवालों से अपनी मंशा बता दी। साथ ही एक डण्डे, एक चश्मे और एक रस्सी के लिये भी कह दिया। बैग के ऊपर रस्सी से स्लीपिंग बैग बांध दिया। भले-मानुसों ने दो रोटियां मक्खन और जैम के साथ पैक करके मुझे दे दीं। वैसे खाने के लिये मेरे पास काफी सामान था।
पांच सौ रुपये रोजाना के हिसाब से एक हजार रुपये का भुगतान कर दिया। पांच सौ में दिनभर ठहरना और खाना पीना सबकुछ शामिल था।
साढे ग्यारह बजे चल पडा। पीछे कमर पर नौ किलो से ज्यादा सामान टंगा था। दिल्ली से चलते समय वजन नौ किलो था, बाद में स्लीपिंग बैग से और वृद्धि हो गई।
अगर आज चादर ट्रेक ना किया, तो जिन्दगी भर पछतावा रहेगा कि सर्दियों में लद्दाख जाकर भी चादर पर नहीं चल सका। बाद में कठिनाईयां भुला दी जायेंगी और यही कहा जायेगा कि उतनी बर्फ के बावजूद भी चादर पर चलना मुश्किल नहीं होता। आखिर दूसरे लोग भी तो चलते हैं।
रातभर बर्फबारी नहीं हुई, इसलिये सडक पर कल गुजरी गाडियों के पहियों के निशान अभी भी अमिट हैं। मैं शाम अन्धेरा होने तक इसी सडक पर टहल रहा था, तो मुझे मालूम था कि सबसे आखिरी गाडी का निशान कौन सा है। उसके बाद से अब तक कोई भी गाडी नहीं गुजरी है।
कल के मुकाबले अब बर्फ कुछ कठोर हो गई है, इसलिये पैर रखते समय ज्यादा आवाज कर रही है। आज धूप भी निकली है। धूप में बर्फ कुछ नर्म हो गई है, यह आवाज से साफ मालूम पड रहा है।
आसपास और दू-दूर के सभी पहाड श्वेताम्बर हो चुके हैं। बर्फ में धूप निकलने पर शरीर के नंगे हिस्सों और आंखों को जबरदस्त नुकसान पहुंचता है। दस्ताने और बन्दर टोपी लगाने से शरीर का कोई हिस्सा नंगा तो नहीं रहा, बचे हुए चेहरे पर क्रीम पोत ली। चश्में के सौ रुपये देने पडे, क्योंकि वापसी में मैं यकीन के साथ नहीं कह सकता कि चिलिंग में रुकना होगा। अगर तिलत से ही कोई गाडी मिल गई, तो फिर चिलिंग रुकने का सवाल कहां?
रास्ते भर मुझे आने-जाने वाले मिलते रहे। पूछते कि अकेले हो क्या, कहां तक जाओगे, आज कहां रुकोगे? किसी ने हतोत्साहित नहीं किया। जब मैंने बताया कि तिलत में गुफा में रुकूंगा तो कहते कि अच्छी बात है।
इन्हीं लोगों से पता चला कि आज अभी तक कोई भी ग्रुप लेह से नहीं आया है। यानी मुझे तिलत में अकेला रुकना पडेगा। हालांकि कल एक ग्रुप गया था, वे आज नौ दस बजे चले होंगे, दस पन्द्रह किलोमीटर आगे पहुंच गये होंगे। अगर मैं तेजी दिखाऊं तो उन्हें पकड सकता हूं। फिर सोचा कि अभी बारह एक बजा है, शाम तक कोई ना कोई ग्रुप आ ही जायेगा।
एक भले-मानुस ने कहा कि कल अगर सुबह जल्दी निकल पडो तो शाम होने तक नेरक पहुंच सकते हो। यह मेरे लिये बडी शानदार बात थी। ठान लिया कि सुबह पांच बजे ही तिलत से निकल पडना है। कल नेरक पहुंचने में जी-जान लगा देनी है। मैं लगातार दो रातों तक गुफा में रुकने के लिये तैयार नहीं था। नेरक में मुझे मोटे मोटे रजाई गद्दे दिखने शुरू हो गये।
आज ज्यादातर लोग चादर ट्रेक से वापस लौट रहे हैं। सडक के आखिरी तीन किलोमीटर में नदी पूरी तरह जमी पडी है। अभी भी वापस आने वाले उसी से आ रहे हैं। अब मुझे भी कम से कम अगले तीन दिनों तक इसी पर चलना है।

चादर पर पहला कदम
तिलत सुमडो से करीब दो किलोमीटर पहले जहां सडक खत्म होती है, आने वाली गाडियां वापस मुड जाती हैं, नीचे नदी तक उतरने के लिये पहले आवागमन कर चुके लोगों की वजह से पगडण्डी बन गई है। उतराई ज्यादा तो नहीं है, लेकिन है बडी खतरनाक। ऊपर से कल गिरी बर्फ ने इसे और खतरनाक बना दिया है। किसी तरह नीचे उतर ही गया।
चादर पर पहला कदम रखा।
इतने क्रान्तिक तापमान में पानी जम जाता है, बर्फ कांच की तरह हो जाती है। हालांकि कल बर्फबारी हुई तो इस कांच पर भुरभुरी बर्फ की तीन चार इंच मोटी परत जम गई। इससे फिसलन निःसन्देह कम हुई है। यह भुरभुरी बर्फ अभी भी वैसी ही चर्र-चर्र की आवाज कर रही है, जैसी कि सडक पर कर रही थी।
धूप निकली है। चश्मा लगा रखा है। नहीं तो कभी का अन्धा हो गया होता।
अचानक पैरों के नीचे से खोखलेपन जैसी आवाज आने लगी। आपातकालीन इन्द्रियां वैसे तो पहले से ही सजग होकर बैठी हैं, अब आदेश दे दिया कि नीचे बर्फ की मोटाई काफी कम है, बर्फ के नीचे हवा भी है, तभी इस तरह की आवाज आ रही है। आवाज कुछ कदम तक ही रही, लेकिन इन कदमों में ही बुरी हालत हो गई।
बर्फ पानी पर क्यों तैरती है? क्योंकि बर्फ का घनत्व पानी के मुकाबले कम होता है, यानी बर्फ पानी से हल्की होती है। जब पानी का बर्फ बनाते हैं तो आपने देखा होगा कि फ्रिज में पानी से भरी ट्रे से बर्फ बनने पर बाहर छलकने लगती हैं, तल तो उसका ऊंचा हो ही जाता है। यही कारण है कि पानी जब बर्फ बनता है तो फैलता है। नदियों पर भी यही नियम लागू होता है।
जब नदी के पानी की बर्फ बनती है और फैलती है तो उसमें टूट-फूट भी होती है। दरारें पड जाती हैं। कहीं कहीं छोटे ज्वालामुखी जैसी संरचनाएं बन जाती हैं। यहां भी पूरी सतह पर दरारें पडी हुई हैं। हालांकि ये दरारें हजारों सालों से चलते आये ग्लेशियरों जैसी बडी बडी विशाल दरारें तो नहीं होतीं, इंच इंच भर की दरारें होती हैं। इधर से उधर पैर रखने में भी मुझे बडा डर लग रहा है।
एक स्थान पर कुछ मीटर तक पगडण्डी ऐसी है जैसे किसी ने खुदाई कर रखी हो। कांच जैसी बर्फ के काफी टुकडे दिख रहे हैं। पक्का डर है कि यहां बर्फ की मोटाई बिल्कुल भी नहीं है। सिर में घण्टे बजने लगे कि बेटा, यहां पैर रखते ही तू नदी में गिर पडेगा। इसलिये पगडण्डी से इतर नजर घुमाई। सोचा कि इस खुदी हुई बर्फ से बचकर निकलता हूं। जैसे ही पगडण्डी से बाहर पहला कदम रखा, बरफ चर्र की आवाज के साथ टूट गई और पैर छह इंच नीचे जा धंसा। चीख निकल गई, हालांकि कोई सुनने वाला नहीं है।
पैर उठाकर देखा तो कुदरत का सारा खेल समझ में आ गया। यह भी समझ में आ गया कि सामने खुदी हुई बर्फ क्यों है।
यहां बर्फ की कई परतें हैं। सबसे ऊपर एक इंच मोटी परत और फिर चार पांच इंच का खाली स्थान। उसके नीचे फिर मोटी बर्फ। जैसे ही सबसे ऊपर वाली पर पैर रखा, वो टूट गई, पैर चार इंच नीचे खाली स्थान में जा धंसा। जब यहां लगातार आदमियों के पैर पडते रहे तो ऊपर वाली इंच भर मोटी परत खुदी हुई लगने लगी। इस अनुभव के बाद समझ में आया कि इस खुदाई के नीचे मोटी सुरक्षित परत है, कोई दिक्कत की बात नहीं है।
एक स्थान पर बर्फ में दो फीट व्यास का एक कुंड था, जिसमें पानी दिख रहा था। इसके पास पैरों के निशान भी दिख रहे थे जिससे पता चल रहा था कि लोगों ने यहां कुण्ड के ऊपर बर्फ पर बैठकर पानी पीया है। मेरी बोतल भी खाली हो चुकी थी, लेकिन आगे भर लूंगा, यह सोचकर मैंने बोतल नहीं भरी। हालांकि बोतल न भरने का मुझे अगले दिन तक पछतावा रहा।
एक बडा अजीब सा वातावरण बन गया था। वायुमण्डल सबसे ठण्डी जगह है जबकि नदी में बहता पानी सबसे गर्म। हालांकि दोनों का तापमान शून्य से नीचे ही है। वायु और पानी के बीच में जो बर्फ की परत है, वो वायु और पानी के संघर्ष की गाथा कहती है। जहां वायु प्रबल है, वहां बर्फ की मोटाई ज्यादा है और जहां पानी प्रबल है वहां बर्फ या तो है नहीं या पतली है। इन दोनों के संघर्ष का फायदा प्रत्यक्ष रूप से मुझे मिल रहा है। मैं चाहता हूं कि मेरे रास्ते में वायु की प्रबलता रहे। बर्फ जितनी मोटी होगी, उतना ही मैं सुरक्षित महसूस करूंगा।
तिलत सुमडो। सुमडो कहते हैं दो नदियों के संगम को। यहां भी जांस्कर नदी में कोई दूसरी नदी आकर मिलती है। जांस्कर के उस तरफ कैम्प साइट है, जहां ट्रेकर तम्बू लगा लेते हैं। मेरे पास तम्बू तो था नहीं, इसलिये मेरी निगाहें एक गुफा को ढूंढ रही थीं। ज्यादा समय नहीं लगा गुफा मिलने में। गुफा नदी के इसी तरफ कुछ ऊपर चढकर थी और इसके मुंह पर चार फीट ऊंची पत्थरों की एक दीवार भी बनी थी। गुफा तक पहुंचने का रास्ता बडा तीक्ष्ण था और रेत व बर्फ के मिश्रण से होकर जाता था। एक ही झटके में ऊपर पहुंच गया और बडी देर तक हांफता रहा।
यह एक मध्यम आकार की गुफा थी, जिसमें पांच छह आदमी आराम से सो सकते थे। कुछ राख और अधजली लकडियां भी पडी थीं। गुफा की छत और दीवारों पर धुआं आसानी से चिपका देखा जा सकता था।
बोतल में पानी नहीं था। नीचे दोनों नदियां पूरी तरह जमी हुई थीं, इसलिये वहां भी कोई सम्भावना नहीं दिख रही थी। कुछ देर पहले बर्फ में एक ‘कुआं’ दिखाई पडा था, मुझे वहां से बोतल भर लेनी थी। गुफा के बाहर चारों तरफ भुरभुरी बर्फ जमी पडी थी, काफी मशक्कत के बाद थोडी सी बोतल में भर ली और बाद में स्लीपिंग बैग के अन्दर घुसकर अपने साथ रख ली तो दो घूंट पानी मिल गया।
मैं तीन बजे के आसपास यहां पहुंच गया था। अच्छी धूप निकली थी, मैं अभी भी दो घण्टे तक चलकर और आगे जा सकता था लेकिन गुफा की उपलब्धता के कारण यही रुक जाना पडा। अभी तक उम्मीद थी कि कोई ना कोई ग्रुप आ जायेगा, लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया, कोई नहीं आया तो घबराहट भी होने लगी। आदमी भी कितना अजीब है! जब शहरों में चारों तरफ आदमियों से घिरा रहता है, तब भी घबराता है और जब कहीं सन्नाटेदार स्थान पर होता है, तब भी घबराता है। यहां दूर दूर तक कोई नहीं था, मैं अभी से रात अकेला होने के बारे में सोचकर घबराने लगा।
इस इलाके में हिम तेंदुआ और भेडिया देखे जाने की बातें आती रहती हैं। इससे डर और भी बढ गया। चार बजे तक मैं वापस जाने की सोचने लगा- अगर अभी भी निकल पडता हूं तो दो घण्टे में काठमांडू यानी मारखा-जांस्कर संगम तक पहुंच सकता हूं, वहां रुक जाऊंगा। फिर सोचा- जो होगा देखा जायेगा।
स्लीपिंग बैग में घुसकर जमीन पर ही लेट गया, मेरे पास कोई मैट्रेस भी नहीं थी। शून्य से कम तापमान में जमीन भी गर्म नहीं थी। पूरी रात मेरे नीचे की जमीन ठण्डी ही रही। समय समय पर नदी में पत्थर गिरने या बर्फ के चटकने की आवाजें आती रहीं, जिससे एक मिनट के लिये भी डर कम नहीं होने पाया। हमेशा लगता रहा कि कोई तेंदुआ गुफा की तरफ आ रहा है, उसके चढने से पत्थर गिर रहे हैं और आवाज आ रही है। हालांकि समय बीतने के साथ आदत पडती गई और डर भी कम होता गया।
सामने की ऊंची चोटियों पर साढे छह बजे तक भी धूप रही। उसके बाद भी अन्धेरा नहीं हुआ। आज शुक्ल पक्ष की नवमी या दशमी थी, इसलिये सूरज छिपने से पहले चांद निकल आया। घाटी में उजाला बरकरार रखने का जिम्मा उसने ले लिया।
स्लीपिंग बैग विकास का था, उन्होंने इसे मेरठ से ग्यारह सौ का खरीदा था। इसमें घुसने से पहले ही इसके दोष सामने आने लगे। यह मुझ से भी छोटा था। बडी मुश्किल से काफी मशक्कत के बाद इसकी चेन बन्द कर सका। इसके अन्दर ही पानी की बोतल रखनी पडी, साथ ही मोबाइल भी ताकि रात-बेरात समय का अन्दाजा हो सके। चाहता था कि कैमरा भी अन्दर ही रखूं लेकिन इतनी जगह नहीं बची। कैमरे को इस क्रान्तिक तापमान में बाहर रहना पड गया।
रात एक बजे मेरी आंख खुली। मैं ठण्ड से बुरी तरह कांप रहा था। सिर पर दो मंकी कैप, हाथों में दस्ताने, पैरों में दो गर्म लोवर और उनके ऊपर एक पैंट, ऊपर तीन गर्म इनर, एक गर्म ऊनी शर्ट और सबसे ऊपर शक्तिशाली जैकेट पहले हुए था। तीन जोडी जुराबें पहन रखी थीं, जो ऊनी और मोटी मोटी थी। जूते भी नहीं निकाले थे, जूते पहने हुए ही स्लीपिंग बैग में घुसा हुआ था, फिर भी पैर की उंगलियां इतनी सर्द हो चुकी थीं कि मालूम होता था कि कहीं ठण्ड से गल न जायें। हालांकि बैग में अभी भी कुछ गर्म कपडे और थे लेकिन उनमें से किसी भी एक को पहनने के लिये मुझे जैकेट उतारनी पडती जिसके लिये मैं इस समय सोच भी नहीं सकता था। हां, एक काम जरूर किया कि जूतों के ऊपर भी एक जोडी जुराबें चढा लीं। फिर भी उंगलियों की सर्दी कम नहीं हुई।
अगर चार दिन पहले यानी बर्फ पडने से पहले, दिन में जबकि अच्छी धूप निकली हुई थी, हवा नहीं चल रही थी; तापमान माइनस दस डिग्री था तो अब यह कम से कम माइनस पच्चीस से नीचे पहुंच गया होगा।
करवट ले ली जिससे शरीर का भूमि सम्पर्क क्षेत्रफल कम हो गया। हाथों को छाती से चिपका लिया जिससे छाती को गर्मी मिलने लगी। जूतों पर जुराब चढा लेने से भी कुछ आराम मिला। नींद आ गई।
पांच बजे आंख खुली। बारह घण्टे पहले सोच रहा था कि इस समय तिलत सुमडो से आगे के लिये चल देना है, तभी शाम तक नेरक पहुंच सकता हूं। वह बात याद आई लेकिन जिस स्थिति में इस समय पडा हुआ था, उसमें इंच भर भी हिलना नामुमकिन था। उठकर चलना तो बहुत दूर की बात है। जिन्दगी में पहले शायद इतने कपडे कभी नहीं पहने थे और इतनी सर्दी भी कभी महसूस नहीं हुई थी।
फिर आंख खुली नौ बजे। यहां जांस्कर एक तंग घाटी से बहती है, इसलिये बारह बजे से पहले यहां धूप का सवाल ही नहीं। लेकिन दूर के पहाडों पर अच्छी धूप दिखाई पड रही थी।
अगर अब नेरक के लिये निकलता हूं तो शाम तक पहुंचना नामुमकिन है। इसका अर्थ है कि अगली रात फिर किसी गुफा में इसी तरह कांपते हुए बितानी पडेगी।
शरीर ने विद्रोह कर दिया। हर अंग को पता था कि आज रविवार है और दोपहर एक बजे चिलिंग से लेह के लिये बस जायेगी। यहां से चिलिंग पहुंचने में करीब साढे तीन घण्टे लगेंगे। नौ बज चुके हैं। इसलिये शीघ्र ही सामान बांध दिया और चिलिंग चलने की तैयारी होने लगी।
हाथों में दो जोडी दस्ताने पहन रखे थे लेकिन फिर भी सामान समेटने के दौरान उंगलियां पूरी तरह सुन्न हो चुकी थी।
जब साढे नौ बजे गुफा से निकला तो नेरक की तरफ से तीन जने आते दिखाई दिये। पूछने पर पता चला कि वे सुबह पांच बजे पिछले कैम्प से चल पडे थे।
वाकई कुछ लोगों को ऊपर वाला स्पेशल मिट्टी से बनाता है।
उनका इरादा आज तिलत में ही रुकने का था। एक स्थानीय गाइड ने मुझसे पूछा कि कहां तक जाओगे, मैंने बता दिया लेह तक। चिलिंग से एक बजे वाली बस पकडनी है। बोला कि आज हमारा एक ग्रुप लेह से आयेगा। पता नहीं कब हमारी गाडी आ जाये। अभी आपको नौ दस किलोमीटर और पैदल चलना है चिलिंग जाने के लिये। अगर हमारी गाडी पहले आ गई और आप हमें रास्ते में मिल गये तो हम आपको अपनी गाडी से ले जायेंगे। मैंने कहा तथास्तु।
कल जब मैं चादर पर चलकर गुफा तक गया था, उसके मुकाबले अब चादर की मोटाई ज्यादा हो गई होगी- रातभर अति निम्न तापमान के कारण। फिर भी रास्ता वही था, जिस पर मैं कल चला था लेकिन अब बिल्कुल भी डर नहीं लग रहा था। कब वो स्थान आ गया जहां चादर छोडकर ऊपर सडक पर चढना था, पता ही नहीं चला।
सडक पर धूप थी। सूरज की तरफ मुंह करके तकरीबन बीस मिनट तक बैठा रहा। उंगलियों में रक्त संचार शुरू हुआ, इनमें चेतना लौटनी शुरू हो गई।
ऐसे में फोटो कैसे खिंच सकते थे?
वाकई चादर ट्रेक पर फोटो खींचना महान हिम्मत का काम है, जहां दो दो जोडी दस्तानों के बावजूद भी उंगलियां सुन्न पडी हों। फोटो खींचने के लिये दस्ताना उतारना पडता है। अगर हमें कहीं इंटरनेट पर चादर ट्रेक के फोटो देखने को मिलते हैं, तो हमें फोटोग्राफर के प्रति कृतज्ञ होना चाहिये। चादर ट्रेक के फोटो महा-विपरीत परिस्थितियों में खींचे जाते हैं।
चादर ट्रेक वैसे तो 100 किलोमीटर से भी लम्बा है। पदुम तक आना-जाना 200 किलोमीटर से ज्यादा होता है। ज्यादातर लोग नेरक तक जाते हैं जो आना-जाना 80 किलोमीटर के आसपास है। मैं मात्र तिलत सुमडो तक ही गया जो आना-जाना तकरीबन चार किलोमीटर है। इस बात का मुझे कोई विक्षोभ नहीं है बल्कि खुशी है कि मैं भी उस बिरादरी में शामिल हो गया जिसने चादर देखी है और उस पर चले हैं।

चिलिंग गांव

इसी घर में मैं रुका हुआ था।

जमी हुई जांस्कर नदी पर ट्रेकिंग


लकडी की स्लेज पर सामान खींचा जाता है।






जमी हुई नदी यानी चादर

यह एक ज्वालामुखीय संरचना है। जो बर्फ बनने के दौरान हुई टूट-फूट का नतीजा है।

सामने अन्तिम छोर पर तिलत सुमडो है।




सामने एक समतल चबूतरा दिख रहा है, वही तिलत सुमडो कैम्प साइट है। फोटो गुफा से खींचा गया है।

ऊपर गुफा से खींचा गया एक और फोटो। नदी में दरारें साफ दिख रही हैं।

गुफा से खींचा गया एक और फोटो।


अगले भाग में जारी...

लद्दाख यात्रा श्रंखला
1. पहली हवाई यात्रा- दिल्ली से लेह
2. लद्दाख यात्रा- लेह आगमन
3. लद्दाख यात्रा- सिन्धु दर्शन व चिलिंग को प्रस्थान
4. जांस्कर घाटी में बर्फबारी
5. चादर ट्रेक- गुफा में एक रात
6. चिलिंग से वापसी और लेह भ्रमण
7. लेह पैलेस और शान्ति स्तूप
8. खारदुंगला का परमिट और शे गोनपा
9. लेह में परेड और युद्ध संग्रहालय
10. पिटुक गोनपा (स्पिटुक गोनपा)
11. लेह से दिल्ली हवाई यात्रा

29 comments:

  1. अवर्णनीय चित्र..पता नहीं इसमें सर्दियों में स्कींइंग क्यों नहीं की जा सकती।
    वैसे, ऐसी ठंड में दिमाग कार्य करना बन्द कर देता है और आपको विज्ञान की सुझ रही है।

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    1. पाण्डेय जी, सर्दियों में स्कीइंग वहां की जाती है जहां बर्फ का भरोसा हो। जमी हुई नदी पर जहां इंच इंच पर बर्फ की मोटाई बदलती रहती हो, नीचे हमेशा पानी बहता हो, वहां स्कीइंग कैसे हो सकती है?

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  2. prashant kumar mosalpuriFebruary 13, 2013 at 6:54 AM

    Amazing SALLAM H AAP KO

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  3. वाकई कुछ लोगों को ऊपर वाला स्पेशल मिट्टी से बनाता है। तुम भी उसमे से एक हो, नीरज भाई ! तुम्हारे जज्बे को सलाम!

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  4. इस पोस्ट को पढ़ते हुए ऐसा लग रहा था जैसे डिस्कवरी चैनल पर मेन वर्सेस वाइल्ड या सर्वाइवल की कोई डाक्यूमेंट्री देख रहे हों। बहुत ही रोमांचक लेख और फोटो तो आश्चर्यजनक थे। आपको ''इंडियन बेयर ग्रिल्स'' की उपाधी देना अतिशयोंक्ति नहीं होगा।

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    1. mai bhi man vs wild banna chahta hun, agar jis kisi ko bhi banna hai mujhse mile......

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  5. "वाकई चादर ट्रेक पर फोटो खींचना महान हिम्मत का काम है, जहां दो दो जोडी दस्तानों के बावजूद भी उंगलियां सुन्न पडी हों। फोटो खींचने के लिये दस्ताना उतारना पडता है। अगर हमें कहीं इंटरनेट पर चादर ट्रेक के फोटो देखने को मिलते हैं, तो हमें फोटोग्राफर के प्रति कृतज्ञ होना चाहिये। चादर ट्रेक के फोटो महा-विपरीत परिस्थितियों में खींचे जाते हैं।"
    यह लगभग हर अच्छी फोटो के लिए कही जा सकती है...
    अगर कोई फोटोग्राफर एक अच्छी फोटो खींचता है तो उसके पीछे भी वर्षों कि म्हणत और लगन होती है..
    और एक अच्छी फोटो के लिए पता नहीं कितने फोटो खराब भी होते हैं....
    पर नीरज salute to you.....

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  6. कुछ लोगों को ऊपर वाला स्पेशल मिट्टी से बनाता है। तुम भी उसमे से एक हो, नीरज भाई ! तुम्हारे जज्बे को सलाम!

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  7. नीरज भाई गज़ब, आपने और आपके कैमरे ने तो कमाल कर दिखाया हैं, वाकई घुमक्कडो के सरताज हो तुम...

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  8. मानना पडेगा नीरज तू किसी और ही मिटटी का बना है ...इतनी बर्फ में रहना और इतनी ठंडी सहना हर किसी के बस की बात नहीं है ..ऐसा फिल्मों में ही देखा था ..पर जब अपना पहचाना आदमी वहाँ जाकर आता है तो ख़ुशी का यह अहसास और भी गहरा हो जाता है ...तेरे जज्बे को और तेरे हौसले को सलाम ..वाकई में तुझे बहादुरी का इनाम तो मिलना ही चाहिए ..गंगोत्री -यात्रा से भी कठिन यह यात्रा थी और वो भी अकेले एकांत ...वो लोग इतने सुनसान जगह में कैसे रहते है ? जीवन की उपयोगी चीजे कैसे लाते है ?
    क्या चादर ट्रेक उसे कहते है जहाँ नदी जम जाती है और नदी पर चलते है ...?

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  9. नीरज भाई आपने जो दुर्लभ काम किया उसके लिए आपका नाम भारत के महान घुम्मकरो में लिखा जायेगा

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  10. अदभुत ... अविश्वसनीय... रोमांचक

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  11. चादर ट्रेक और इसकी फोटोग्राफी बेहतरीन सीरीज में से एक है !! 2013 की एक बेहतरीन उपलब्धि !!

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  12. जाट बिरादरी का नाम तुम ही रौशन करोगे नीरज जी....

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  13. हमें तो कोई लाख रुपये दे तो भी नहीं जा सकेंगे ..यानी हमारे पैर दिमाग का आदेश मानने से साफ़ मना कर देंगे । ऐसी जगह अकेले यात्रा करना साहस का काम है ।

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  14. बहुत ही अच्छा लिखा है , फोटो का तो जवाब ही नहीं है, इतनी सर्दी में जहा दिल्ली में ही रहना मुश्किल हो रहा था तुम वहा बर्फ में घूम आये ! वाकई हिम्मत का काम है धन्यवाद् इन्टरनेट के माध्यम से इतनी कठिन जगह के दर्शन करने के लिए !

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  15. सुबह पांच बजे, NEERAJ NAHI UTHEGA,

    BAKI HIMMAT MAST.

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  16. मुझे तो बर्फ़ देखकर ही ठंड लगने लगती है।अकेले ऐसी जगह तो जाने की अब सोचना भी नहीं है। घूमने के लिए बाकी हिन्दुस्तान पड़ा है। साथ में दो चार कुली और पूरा सामान हो तो जाया जा सकता है। बढिया फ़ोटो हैं, एक फ़ोटो गुफ़ा के भीतर और सामने की भी लगाना।

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    1. ललित भाई चलना है क्या?
      मई में मैं सपरिवार जा रहा हूँ...

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  17. नीरजजी आपका कोई जवाब नही । आपने डिस्कवरी के बीयर ग्रिल्स की याद दिला दी
    अद्भुत , आप जैसे घुमक्कड़ सदियों मे पैदा होते है.

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  18. adbhut or Romanchak varnan... Mahan ghimakkar ho bhai tum to.. vakai me tum bhi special mitti se bane ho..

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  19. कल पढ़ा हुआ वर्णन अधुरा -सा लग रहा था ...लगा था की अचानक रात को सोचा की नहीं जाउगा और सुबह इतना सफ़र तैय कैसे कर लिया ...फिर भी आगे के वर्णन से जो आनन्द आया तो ऊपर का अधुरा पन ख़त्म हो गया ....चिलमिलाती घुप में चश्मे की जरुरत होती है ...

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  20. Aap ki hemant ki daad deni padegi Neeraj Bhai ..................bhut sundar picture hai chadar tark ki picture lena or waha tak jana ye aap jaisa hemmat wala banda he kar sakta hai

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