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Friday, August 21, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 18 (माहे-शो मोरीरी-सुमडो-शो कार)

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20 जून 2015
साढे आठ बजे सोकर उठे और नौ बजे तक यहां से निकल लिये। बारह किलोमीटर आगे सुमडो है जहां खाने पीने को मिलेगा, वहीं नाश्ता करेंगे। सुमडो का अर्थ होता है संगम। गांव का नाम है पुगा और दो धाराओं के संगम पर बसा होने के कारण बन गया- पुगा सुमडो। लेकिन आम बोलचाल में सुमडो ही कहा जाता है। यहां से एक रास्ता शो मोरीरी जाता है और दूसरा रास्ता शो-कार। आपको याद होगा कि शो-कार झील लेह-मनाली रोड के पास स्थित है। हमें आज पहले शो मोरीरी जाना है, फिर वापस सुमडो तक आकर शो-कार वाले रास्ते पर चल देना है। शो-कार की तरफ चलने का अर्थ है मनाली की ओर चलना और मनाली की ओर चलने का अर्थ है दिल्ली की ओर चलना। इस प्रकार जैसे ही आज हम शो-मोरीरी से वापस मुडेंगे, दिल्ली के लिये वापसी आरम्भ कर देंगे।
सुमडो से थोडा आगे एक दुकान है। हम यहीं रुक गये। दस बजने वाले थे, हम पेट भर ही लेना चाहते थे लेकिन यहां ज्यादा कुछ नहीं मिला। चाय, बिस्कुट में काम चलाया। कोई बात नहीं, आगे शो-मोरीरी पर बहुत कुछ खाने को मिलेगा।

लगभग 4800 मीटर ऊंचा नामशांग-ला मिला। इसके बाद चढाई खत्म हो जाती है और उतराई आरम्भ हो जाती है। नामशांग-ला पार करते ही एक झील दिखने लगती है- क्यागर शो। यह एक छोटी सी झील है जो शो-मोरीरी से पहले पडती है। बहुत से लोग इसे ही शो-मोरीरी समझ लेते हैं और बहुत से इसे शो-कार मानते हैं।
नामशांग-ला से थोडा ही आगे गये थे कि सामने से एक बुलेट आती दिखी, दो सवार उस पर बैठे थे। उन्होंने बाइक रोक दी, मैंने भी रोकी। हेलमेट के कारण मैं उन्हें नहीं पहचान पाया लेकिन निशा ने पहचान लिये- अरे, ये तो वहीं हैं जिनकी बाइक मेरक के पास रेत में धंस गई थी और हमने उन्हें ट्रक में लदवाया था। फिर तो सब बडी गर्मजोशी से मिले।
उस दिन की घटना के बारे में उन्होंने विस्तार से बताया- “ट्रक में बाइक लदने के बाद हम पेंगोंग पहुंचे। वहां बहुत सारे बुलेट वाले भी थे, लेकिन बाइक ठीक नहीं हुई। वहां से हमने लेह स्थित बाइक के मालिक को फोन किया और उसे सारी बात बताई। उसने कहा कि आप बाइक वहीं छोड दो और किसी तरह लेह आकर दूसरी बाइक ले जाओ। टैक्सी वाले 8000 तक मांग रहे थे लेह जाने के। लेकिन एक भले आदमी ने हमें बैठा लिया। लेह जाकर दूसरी बाइक ली और अब शो-मोरीरी देखकर लौट रहे हैं।” ये लोग भी क्यागर शो को शो-कार समझ रहे थे। अपने आप ही कहने लगे- “यह शो-मोरीरी नहीं है, बल्कि शो-कार है। शो-मोरीरी तो इससे आगे है।” मैंने कहा कि यह शो-कार नहीं है, बल्कि कुछ और नाम है इसका। वे नहीं माने। तब मैंने लद्दाख का नक्शा निकालकर इसका नाम दिखाया और शो-कार की स्थिति दिखाई, तब जाकर उन्हें भरोसा हुआ।
वे तो चले गये और हम एक बात सोचने लगे। खालसी में हमें कर्नाटक के कुछ बाइक वाले मिले थे, वे फिर लेह डीसी कार्यालय में भी मिले, खारदुंग-ला पर भी मिले और पेंगोंग पर भी। इसी तरह ये बाइक वाले पेंगोंग किनारे मिले और अब यहां मिले। लेकिन जिसे मिलना था, वो बराबर से निकल जाता है और हम चूक जाते हैं- कोठारी साहब।
सडक क्यागर शो का चक्कर लगाती हुई चलती है। झील उतनी सुन्दर नहीं लगती जितना इसके आसपास घास का मैदान। यहां खूब भेडें चर रही थीं और अच्छी लग रही थीं। यहां भेडपालकों के तम्बू भी बहुत थे।
क्यागर शो से थोडा ही आगे निकले कि शो-मोरीरी की पहली झलक मिल गई। फिर भी शो-मोरीरी बहुत दूर थी। अब सडक खत्म हो गई और कच्चा पथरीला रास्ता शुरू हो गया जो आगे शो-मोरीरी तक ही रहा। सडक एक हरित पट्टी के साथ साथ चलती है जिससे यह स्थान फोटोग्राफी के लिये शानदार हो जाता है।
शो-मोरीरी भी काफी बडी झील है। इसके किनारे एक गांव है कारजोक। हमें कारजोक तक ही जाना था। लेकिन कारजोक से आठ-नौ किलोमीटर पहले एक शानदार सडक बायें जाती मिली। यह चुमुर जाती है। यहां कोई नहीं था, लेकिन आगे कहीं सैन्य चौकी होगी जो किसी सिविलियन को चुमुर जाने से रोकेगी। अगर हमें चुमुर का परमिट मिल जाता तो हम हनले से चुमुर पहुंचते और इसी सडक से शो-मोरीरी आते। हम इस मोड पर आधे घण्टे तक बैठे रहे। थक गये थे, थोडी सी नींद भी ले ली।
इसके बाद रास्ता झील के साथ साथ है। इसमें बत्तखें बडी संख्या में थीं। उनके छोटे-छोटे चूजे ऐसे लग रहे थे मानों बत्तखों के साथ साथ छोटे छोटे पत्थर चल रहे हों। रास्ता बहुत खराब है और हमें रॉंग साइड में चलना पड रहा था। जहां भी रुक जाते, मक्खियां आक्रमण कर देतीं। ये भी बडी अजीब थीं। कभी ये मच्छर लगते, कभी मक्खियां। इससे पहले पूरे लद्दाख में हमें मक्खी-मच्छर नहीं मिले थे। ये गुदगुदी तो करते ही थे, काट भी लेते थे।
एक बजे कारजोक पहुंचे। प्रवेश से पहले आईटीबीपी की एक पोस्ट है। उन्होंने हमसे परमिट मांगा। चूंकि यहां आने का अब परमिट नहीं लगता इसलिये हमने एक सेल्फ डिक्लरेशन फार्म भरकर उन्हें दे दिया। लद्दाख के बडे भूभाग पर जाने का अब परमिट नहीं लगता, लेकिन जहां पहले परमिट लगता था, वहां सेल्फ डिक्लरेशन फार्म मांगा जा सकता है। यह लेह में फोटो स्टेट की दुकानों पर मिल जाता है। जहां भी आपसे मांगा जाये, साथ के साथ भरकर और अपने हस्ताक्षर करके जमा करा दें।
उन्होंने पूछा- आपके पास कोई जीपीएस या कोई नक्शा तो नहीं है। मैंने कहा- मोबाइल और कैमरे में जीपीएस है और एक नक्शा भी है। बोले- मोबाइल, कैमरा तो कोई बात नहीं लेकिन नक्शा आपको यहां जमा कराना होगा। सीमावर्ती इलाका है, इन्हें आगे ले जाने की अनुमति नहीं है। मैं सोचने लगा कि अब सेनाओं को भी थोडा आधुनिक हो जाना चाहिये। कागज वाले नक्शों का जमाना गुजर गया, अब डिजीटल नक्शों का जमाना है। गूगल मैप ने तो नक्शों की दुनिया में क्रान्ति ही ला दी है। आप घर बैठे सबकुछ देख सकते हैं। लद्दाख में जंगल नहीं हैं, इसलिये सैटेलाइट से छोटी से छोटी पगडण्डी, कच्ची सडक और पक्की सडक सब दिख जाती हैं। टैंट दिख जाते हैं जिससे ये पता चल जाता है कि इस इलाके में मानव गतिविधि है। सीमा कहां है, दर्रा कहां है, कितनी ऊंचाई है; सब पता चल जाता है। मुझे सामने परांग-ला दिख रहा था जिसके उस पार स्पीति है। थोडा सा बायें एक दर्रा और दिख रहा था जिसके उस तरफ चुमुर है और चुमुर के पास ही चीन सीमा। इधर दाहिने एक दर्रा पार करके थोडा आगे पांग का भी आभास हो रहा था। पांग अर्थात लेह-मनाली सडक।
कारजोक में बहुत सारी दुकानें हैं। एक जगह हमने दाल-चावल खाये। सोने का भी इंतजाम था, आधे घण्टे की नींद भी ले ली। हमें आज यहां नहीं रुकना था। लेकिन धूप इतनी तेज थी कि बाहर निकलने का मन भी नहीं हो रहा था। सुबह माहे में जब हम टैंट पैक कर रहे थे तो मेरा काला चश्मा टैंट में ही पैक हो गया था। आपने जिसने भी टैंट पैक किया है, वो जानता होगा कि इसे कितनी मजबूती से और मुक्के बजा-बजाकर पैक किया जाता है। जब हम टैंट बांधने लगे तब पता चला था कि चश्मा इसी में पैक हो गया है। हमने सोचा कि चश्मा टूट गया होगा, आगे कारजोक जाकर दूसरा चश्मा ले लेंगे। लेकिन यहां कारजोक में काला चश्मा नहीं मिला। तेज धूप में बिना चश्मे के नहीं चला जा सकता था इसलिये सोचा कि एक बार टैंट खोलकर देख लेते हैं, क्या पता वो न टूटा हो। और जब खोला तो चश्मा सही-सलामत मिला। डंडी थोडी टेढी जरूर हो गई थी, जो आसानी से सीधी हो गई।
रास्ता कारजोक से भी आगे तक बना है। खराब तो है ही। हम कुछ आगे गये भी लेकिन लौट आये। उधर एक टैंट कालोनी थी। लडके ने हमसे खूब कहा कि आज उनके यहां रुक जायें। किराया 800 रुपये था। हमें रुकना था ही नहीं। उसका एक फोटो लिया और वापस हो लिये।
आईटीबीपी से नक्शा वापस ले लिया। कारजोक से कुछ दूर झील के किनारे बाइक रोक दी। मच्छर तो लग ही रहे थे लेकिन फिर भी अच्छा लग रहा था। साफ सुथरा पानी था झील का। समय होता तो हम यहां टैंट लगाते।
दो गाडियां मिलीं, पंजाब की। सरदारजी ने पूछा कि आगे कारजोक में कुछ देखने लायक है क्या। हमने बता दिया कि वो एक गांव है, झील का किनारा है और खाने-पीने का ठिकाना भी। हमारी तारीफ करते हुए कारजोक की तरफ चले गये।
साढे चार बजे वापस सुमडो पहुंचे। चाऊमीन खाई। अब तक बाइक में पेट्रोल कम होने लगा था। हमने कारजोक में इसके बारे में पूछा था लेकिन वहां बताया गया कि सुमडो में पेट्रोल कारजोक के मुकाबले सस्ता मिलेगा। अब सुमडो में पूछताछ की तो जो पेट्रोल की दुकान थी, वो बन्द थी और मालिक कहीं बाहर गया था। हमारे रास्ते में एक दर्रा पडेगा, चढाई पर बाइक ज्यादा पेट्रोल पीयेगी, इसलिये कुछ भरवा लेना चाहिये था। हालांकि अभी भी हमारे पास दो लीटर की बोतल फुल थी, लेकिन उसे हम तभी निकालेंगे तब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगेगा। हम सुमडो से निराश होकर चलने लगे तो एक जीप वाला बोला कि उसके पास है और वो सौ रुपये प्रति बोतल के लेगा। मैंने बोतल देखी तो वे 700-700 एमएल की बोलतें थीं। यानी लगभग 150 रुपये लीटर पेट्रोल। मैंने मना कर दिया और बिना पेट्रोल भरवाये ही शो-कार की ओर चल दिये।
नक्शे के अनुसार यहां हॉट स्प्रिंग हैं यानी गर्म पानी के सोते। गर्म पानी का तो पता नहीं कहां से निकलता है या नहीं निकलता लेकिन यह घाटी नमभूमि है। पानी उधर पोलोकोंगका-ला की तरफ से आता है और नमक बहुत ज्यादा है, इसलिये घाटी में कई जगह नमक भी पडा था।
शुरू में दस-बारह किलोमीटर तक अच्छा रास्ता है। फिर तो ऐसी खराब सडक आई कि पूछो मत। किसी जमाने में सडक बनाने के लिये पत्थर-रोडी डाल दिये थे जो अब तक पडे हैं। इन पर न बाइक ढंग से चल सकती, न कोई अन्य गाडी। इसलिये गाडी वालों ने इस सडक से हटकर कच्चे रास्ते में गाडियां चलाकर पगडण्डी बना दी थी। हम भी इसी पगडण्डी पर चलने लगे। कुल मिलाकर चढाई ज्यादा तेज नहीं है लेकिन कभी कभी बडी तेज चढाई मिल जाती। एक जगह इतनी तेज चढाई थी कि बाइक फुल एक्सीलरेटर में पहले गियर में रुकने लगी, मैंने हाफ क्लच में चलाई लेकिन उसमें भी रुक गई। मैंने दोनों ब्रेक लगाये लेकिन बाइक पीछे को फिसलने लगी। पहले गियर में डालकर क्लच छोड दिया; उसके बावजूद भी यह पीछे को खिसकती रही। फिर निशा उतरी और उसने पीछे से धक्का लगाकर इसे रोका, तब तक यह करीब तीन मीटर पीछे जा चुकी थी।
दर्रे से कुछ पहले पंजाब की वे दोनों गाडियां आईं जो हमें शो-मोरीरी के पास मिली थीं। उन्होंने हमें और हमने उन्हें पहचान लिया। खराब रास्ते से वे भी तंग थे। बोले कि तुम्हें यहां डर नहीं लग रहा क्या? फिर अच्छे रास्ते के बारे में पूछा। मैंने बताया कि आगे एक दर्रा है, उससे नीचे उतरकर अच्छा रास्ता मिलेगा। साइकिल यात्रा में मैं शो-कार तक आया था, तब वहां अच्छा रास्ता था। अभी भी अच्छा ही होगा।
पोलोकोंगका-ला लगभग 4900 मीटर ऊंचा है। इसके एक तरफ सिन्धु नदी का जल-क्षेत्र है और दूसरी तरफ शो-कार झील का जल-क्षेत्र है। ठीक तंगलंग-ला की तरह। साढे छह बजे हम दर्रे पर थे। दर्रे से कुछ आगे चले कि शो-कार दिखने लगी। रास्ता उतराई का है और खराब सडक है, इसलिये स्पीड नहीं मिली। जल्दी ही सात भी बज गये लेकिन अच्छी सडक नहीं आई। उतराई समाप्त होकर समतल रास्ता आ गया था लेकिन अभी भी बहुत खराब था। रास्ते के दोनों तरफ खूब रेत थी इसलिये नीचे बाइक नहीं चलाई जा सकती थी। एक बार हमने कोशिश भी की थी लेकिन असफल रहने पर फिर से रास्ते पर आ गये थे।
अन्धेरा हो गया और दूर सामने थुक्जे गांव की लाइटें दिखने लगी थीं। हम थुक्जे से भी बीस किलोमीटर आगे डेबरिंग तक पहुंचना चाहते थे। थुक्जे से पांच-छह किलोमीटर पहले अच्छी सडक मिल गई, स्पीड बढ गई।
थुक्जे में कई गेस्ट हाउस हैं। एक जगह कमरा पूछा- आठ सौ का बताया। थोडा सा मोलभाव करना पडा और बाइक पर बंधे टैंट की तरफ इशारा करना पडा और कमरा हमें पांच सौ का मिल गया। यहीं डिनर किया जिसमें दाल, चावल और आमलेट थे।
अब मनाली रोड ज्यादा दूर नहीं। साइकिल यात्रा में मैं यहां तक आया था। तब यहां से आगे शो-मोरीरी की तरफ जाने पर परमिट लगता था और इसी गांव में परमिट चेक होता था लेकिन पुलिस वालों ने मुझे यहां से थोडा आगे शो-कार झील देखने जाने दिया था। अब शो-मोरीरी का परमिट नहीं लगता, इसलिये किसी चेक करने वाले की ड्यूटी भी नहीं लगी थी।
डेबरिंग और शो-कार दोनों मिलकर एक विशाल चरागाह का निर्माण करते हैं। यहां याक तो कम पाले जाते हैं लेकिन पश्मीना भेड ज्यादा पाली जाती हैं। अंग्रेजी की एक किताब भी यहां रखी थी जिसमें लेखक ने शोध किया था। उसके शोध का मुख्य क्षेत्र यही डेबरिंग इलाका था। हालांकि कुछ फोटो पाक अधिकृत कराकोरम और उधर कजाकिस्तान आदि देशों के भी थे।
यहां बिजली थी और हमारे कैमरे-मोबाइल सब चार्ज हो गये।

पुगा सुमडो गांव। गांव के उस तरफ दिख रहा है पोलोकोंगका-ला दर्रा जिसके उस तरफ शो-कार झील है।

शो-मोरीरी की ओर जाती सडक

नामशांग-ला

दूर से दिखती क्यागर शो झील

दिल्ली के बाइकर्स जिनकी किराये की बुलेट को हमने पेंगोंग किनारे ट्रक में लदवाया था।

क्यागर शो

शो-मोरीरी की तरफ

दूर से दिखती शो-मोरीरी

शो-मोरीरी की ओर जाता रास्ता

यहां से दो रास्ते हो जाते हैं- एक बायें चुमुर जाता है और दूसरा सीधा कारजोक।

शो-मोरीरी




कारजोक में खाने के बाद विश्राम।



कारजोक गांव












क्यागर शो के आसपास का इलाका नमभूमि है और पशुचारण खूब होता है।

याक का बच्चा।

सप्ताह में एक बस लेह से कारजोक जाती है।




शो-कार के रास्ते में

शो-कार का रास्ता भी बहुत खराब है।



शो-कार का रास्ता

शो-कार का मुख्य रास्ता इतना खराब है कि लोगों ने इस पर न चलकर अलग चलना शुरू कर दिया और दूसरा रास्ता बना दिया।

पोलोकोंगका-ला




सामने दिखती शो-कार झील

यह एक खरगोश मिला रास्ते में। निशा की निगाहें बडी तेज हैं। पत्थरों के रंग जैसा और उनके बीच बैठा हुआ यह उसने करीब सौ मीटर दूर से और चलती बाइक से ढूंढ निकाला।

शो-कार झील




हमारा डिनर तैयार हो रहा है।






अगले भाग में जारी...

(प्रार्थना: कृपया ‘बहुत ही ज्ञानवर्द्धक’, ‘रोमांचक’ जैसी औपचारिक टिप्पणी न करें। आपकी कोई जिज्ञासा हो, कुछ और जानकारी बांटना चाहते हो या अपना कोई अनुभव हो, उसे ही टिप्पणी के रूप में लिखिये। धन्यवाद।)



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16. लद्दाख बाइक यात्रा-16 (मेरक-चुशुल-सागा ला-लोमा)
17. लद्दाख बाइक यात्रा-17 (लोमा-हनले-लोमा-माहे)
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19. लद्दाख बाइक यात्रा-19 (शो कार-डेबरिंग-पांग-सरचू-भरतपुर)
20. लद्दाख बाइक यात्रा-20 (भरतपुर-केलांग)
21. लद्दाख बाइक यात्रा-21 (केलांग-मनाली-ऊना-दिल्ली)
22. लद्दाख बाइक यात्रा का कुल खर्च

17 comments:

  1. नीरज जी, आपकी लद्दाक यात्रा बहुत शानदार चल रही है। लद्दाक हैट्रिक के लिए एडवांस में बंधाई।
    यदि सितम्बर में मेरठ से बाइक द्वारा (एक ही बाइक पर दो लोग) लेह जाना हो (पेंगोंग लेक भी देखना है) (जाना मनाली की तरफ से और वापसी कश्मीर की तरफ से) तब तक़रीबन कितने दिन लगेंगे और गर्म कपड़ों की कितनी ज़रुरत पड़ेगी। कृपया मदद कीजिए।

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    1. आप अगर मेरठ से सुबह निकले तो रात को अम्बाला या चंडीगढ़ में होंगे

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    2. मेरठ से लद्दाख जाने के लिये दस दिन लेकर चलिये अन्यथा भागमभाग बहुत ज्यादा करनी पडेगी। सितम्बर में वहां सर्दी होने लगती है इसलिये गर्म कपडों की आवश्यकता पडेगी।

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  2. बेहद शानदार पोस्ट नीरज भाई ! तस्वीरें और भी सुन्दर हैं ! समय न मिल पाने के वजह से कभी कभी ही आ पाता हूँ लेकिन बहुत से पेंडिंग पोस्ट निपटा भी देता हूँ. :)

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    1. कोई बात नहीं अभिषेक भाई... आते रहिये और टिप्पणियां करते रहिये।

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  3. नीरज जी ,
    शो-मोरीरी किनारे टेंट लगाकर रात रुकना था ….
    रात Lake के फोटो मिल जाते ……पंगोंग के नही ले पाये थे । …

    खराब रस्ता कितना km का हें,
    आप के पास बुलेट के रेन्ट के बारेमे आदी नियमो जानकारी होगी तो
    कृपया मदद कीजिए।...

    thank you ..

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    1. समय नहीं था शो-मोरीरी किनारे रुकने का अन्यथा हम रुकते जरूर।
      लेह-मनाली सडक आधी खराब है और आधी ठीक है। उधर पेंगोंग की तरफ चांग-ला के आसपास खराब है, शो-मोरीरी की तरफ बहुत ज्यादा खराब है।
      लेह से नोर्मली एक हजार रुपये प्रतिदिन के किराये में बुलेट किराये पर मिल जाती है।

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    2. _/\_ धन्यवाद नीरज जी आपने उपयुक्त जानकारी दि …

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  4. Neeraj Bhai 2 SUV gaddii ka video kis camere se Liya hai...? Quality or zooming result bahut hi sandar hai
    Detail me jankari de..

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  5. गांवो, जगहों, दर्रों आदि के नाम इतने अटपटे व मिलते - जुलते हैं कि कइ बार आपकी यात्रा का सिरा पकड़ने या पुराना संदर्भ ढूंढ़ने के लिये पुरानी पोस्टों को कितनी ही बार खंगालना पड़ता है…

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  6. पत्थरों के बीच पत्थरों के रंग का खरगोश निशा ने दूर से ही देख लिया उसकी नजर काफी तेज है तभी मानवी समुन्द्र में आप जैसा मोती खोज लिया

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  7. नीरज भाई, तुम्हारी सारी पोस्ट पढ़ता हूँ, पर उपर लिखे नोट की वजह से टिप्पणी नहीं करता ! वास्तव में बहुत बढ़िया घुमककड़ी चल रही है लेखों के माध्यम से !

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    1. चौहान साहब, पढते समय जो भी ख्याल आये, उसे ही टिप्पणी के रूप में लिख दिया करो।

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  8. आपकी यात्रा पढ़ के अब मै भी निश्चयः कर लिया हु बाइक से जाने का नीरज भाई..

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