Buy My Book

Monday, July 10, 2017

पुस्तक चर्चा: “तिब्बत तिब्बत” और “एक रोमांचक सोवियत रूस यात्रा”

पिछले दिनों दो पुस्तकें पढ़ने को मिलीं। इन दोनों के बारे में मैं अलग-अलग लिखने वाला था, लेकिन एक कारण से एक साथ लिख रहा हूँ। पहले चर्चा करते हैं ‘तिब्बत तिब्बत’ की।
इसके लेखक पैट्रिक फ्रैंच हैं, जो कि मूल रूप से ब्रिटिश हैं। हिंदी अनुवाद भारत पाण्डेय ने किया है - बेहतरीन उच्च कोटि का अनुवाद। लेखक की तिब्बत और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में गहरी रुचि साफ़ झलकती है। वे भारत में मैक्लोड़गंज में तिब्बतियों से काफ़ी हद तक जुड़े हुए भी हैं और उनके साथ काफ़ी समय व्यतीत किया है। 1986 में उन्होंने पर्यटक बनकर तिब्बत की यात्रा की थी। तो यह पुस्तक मूलतः एक यात्रा-वृत्तांत ही है, लेकिन इसमें तिब्बत और चीन के साथ संबंधों पर सबकुछ लिखा गया है। कहीं भी लेखक भटकता हुआ महसूस नहीं हुआ। उन्होंने तिब्बत की यात्रा अकेले की और दूर-दराज़ में तिब्बतियों के साथ भी काफ़ी समय बिताया, जो तिब्बत में एक बहुत बड़ी बात थी। ऐसा होना आज भी बड़ी बात है।
कुल चौबीस अध्याय हैं। शुरूआती अध्यायों में तिब्बत और निर्वासित तिब्बतियों से परिचय कराया गया है। लेखक चीन पहुँच जाता है और अपनी यात्रा भी आरंभ करता है। हम छठें अध्याय से चर्चा आरंभ करेंगे:

Thursday, July 6, 2017

‘कुमारहट्टी से जानकीचट्टी’ यात्रा की वीड़ियो

पिछले दिनों हमारी “कुमारहट्टी से जानकीचट्टी” यात्रा-श्रंखला प्रकाशित हुई। इस दौरान फ़ेसबुक पेज पर कुछ वीड़ियो भी अपलोड़ कीं। उन्हीं वीड़ियो को यहाँ ब्लॉग पर भी प्रकाशित किया जा रहा है। यदि आपने फेसबुक पेज पर वीड़ियो न देखी हों, तो यहाँ देख सकते हैं।














इस यात्रा के सभी भाग:
1. बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी
2. बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग दो
3. बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग तीन (त्यूणी और हनोल)
4. बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग चार (हनोल से पुरोला)
5. बाइक यात्रा: पुरोला से खरसाली
6. बाइक यात्रा: खरसाली से दिल्ली
7. ‘कुमारहट्टी से जानकीचट्टी’ यात्रा की वीडियो

Monday, July 3, 2017

बाइक यात्रा: खरसाली से दिल्ली

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें
21 मई 2017
कल ही तय हो गया था कि मैं और नरेंद्र आज सुबह-सवेरे पाँच बजे यमुनोत्री जायेंगे और रणविजय यहीं रहेगा। लेकिन पाँच कब बज गये, किसी को भी पता नहीं चला। छह बजे तक आँखें तो तीनों की खुल गयीं, लेकिन उठा कोई नहीं। सात भी बज गये और रणविजय व नरेंद्र फ्रेश होकर फिर से रज़ाईयों में दब गये। तीनों एक-दूसरे को ‘उठो भई’ कहते रहे और समय कटता रहा।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि कमरे में मैं अकेला हूँ। बाकी दोनों चुप हो गये - एकदम चुप। मैंने कुछ देर तक ‘नरेंद्र उठ, रणविजय उठ’ कहा, लेकिन कोई आहट नहीं हुई। मुझे कुछ अटपटा लगा। मामला क्या है? ये दोनों सो तो नहीं गये। ना, सवाल ही नहीं उठता। मैं सो सकता हूँ, लेकिन अब ये दोनों नहीं सो सकते। इसका मतलब मुझसे मज़ाक कर रहे हैं। इनकी ऐसी की तैसी! पूरी ताकत लगाकर रणविजय की रज़ाई में घुटना मारा, लेकिन यह क्या! घुटना रणविजय की रज़ाई पार करता हुआ नरेंद्र की रज़ाई तक पहुँच गया। किसी को भी नहीं लगा।